यूं अभी कुछ हफ्ते बाक़ी हैं, लेकिन हलचल काफी पहले शुरु हो गई है। घर के किसी
कोने में जब दोनों सिर जोड़ कर गुपचुप कर रहे हों, समझो योजनाएं बन रहीं हैं। दोस्तों
के नाम कई बार जोड़े और काटे जा चुके हैं, मेन्यू, रिटर्न गिफ्ट जैसे काम मां के
जिम्मे हैं, लेकिन नए सुझावों की फेहरिस्त रोज़ सामने रखी जा रही है। साल शुरू
होते ही बच्चों का जन्मदिन दस्तक देने लगता है, और ये साल तो यूं भी खास है, ये उनका पहला डबल डिजिट बर्थ डे है। दस साल..क्या बस इतने से होते हैं?
Saturday, January 2, 2016
Sunday, December 27, 2015
ये दिन वो साल
फोन से पुरानी तस्वीरों का बोझ कुछ कम करने बैठी तो नज़रें उस आई-कार्ड के फोटो पर ठिठक गईं। कहीं घूमने जाओ तो टैक्सी या उसके ड्राइवर की फोटो खींच लेने की पुरानी आदत है पतिदेव की। उसका चेहरा और साथ गुज़ारे दो दिन एकदम से आखों के सामने घूम गए। ठीक एक बरस पहले उसी के भरोसे अब तक की सबसे दुरूह सड़क यात्रा की थी। गंगटोक होटल में जब उसे बोलेरो में हमारा सामान डालते देखा तो डर सी गई। इतना छोटा लड़का, ये ले जाएगा उन रास्तों पर जहां जा सकने के लिए खास परमिट लेनी होती है राज्य सरकार से, जिन रास्तों पर ना हर ड्राइवर जा सकता है ना हर गाड़ी।
“कल ही लौटा हूं वहां से, डरो मत, लेप्चा हूं मैं, 23 साल का हूं,
सीज़न में हर तीसरे दिन जाता हूं, उसने स्टीयरिंग व्हील पर बैठते हुए पूरे
प्रोफेशनल रुखाई से जवाब दिया।“ ये लो, एक तो रास्ता दुरूह उसपर रूखे स्वभाव का सारथी, हो गया काम।
Friday, December 18, 2015
तो आज आप क्या होतीं मां?
कल पार्क में शर्मा
आंटी मिली थीं।
कौन सी शर्मा आंटी?
अरे वही जो हर बात
में, ‘तुम्हारे अंकल ये, तुम्हारे अंकल वो’ करती रहती हैं।
हां जी वही जो
सोसायटी की मीटिंगों में सबसे तेज़ बोलती हैं, हर बार नई शिकायत के साथ।
अब कहानी बिना टोके
खत्म करेंगे।
हां तो शर्मा आंटी
पार्क की बेंच पर बैठी एक दूसरी आंटी से बतिया रही थीं, सामने बच्चों का बैडमिंटन गेम चल रहा था, एक तरफ दो लड़कियां सामने
एक लड़के से हार रही थीं।
“जज करके शॉर्ट तो खेल ही नहीं रहीं, कैसे बेमन से मार रही हैं
ये।“
“आप भी खेलती थीं ?”, मैंने हल्के से पूछ लिया।
Saturday, December 12, 2015
द्रौपदी को चाहिए भीम?
इंजीनियरिंग और
मैनेजमेंट की डिग्रियों, बड़े नाम वाली कंपनी में खुद का केबिन और उसके साथ की
सैलरी और सुविधाओं वाली आत्मविश्वास से लबरेज वो लड़की तीस के पायदान को पार करते
ही आजकल परिवार की चिंताओं का सबब बनी बैठी है। कारण जानने के लिए पहेलियां बूझने
की ज़रूरत भी नहीं। एक ही वजह हो सकती है इस इक्वेशन में, उसके लिए योग्य लड़का
नहीं मिल रहा।
“ऐसे बेहूदा सवाल करते हैं लड़के, कुकिंग का शौक
है क्या आपको? जैसे मैं कोई बीए पास लड़की होऊं”, उसने हंसते हुए बताया।
Wednesday, December 9, 2015
ना आना इस देस...
वक्त आने पर सही फैसले लेने की हिम्मत ना आर्थिक स्वतंत्रता से आती है ना ही स्कूली शिक्षा से। हां परिवार और परवरिश का इसमें योगदान ज़रूर हो सकता है लेकिन सबसे ज्यादा शायद व्यक्तित्व का होता है।
पिछली सर्दियों की
एक शाम बीमार कामवाली उसे लेकर घर आई।
“ये ही है मेरी बहू”, सास के बोलने की देर थी कि
गदबदे शरीर वाली उस सावंली सलोनी ने झट से बंगाली तरीके से मेरे पैर छुए और
बर्तनों से भरे सिंक की ओर चली गई। मशीन की गति से उसके मज़बूत हाथों ने मेरे
बर्तनों में जान डाल दी...वो बर्तन जो पिछले दो महीने से दो बार धोए जा रहे थे। एक
बार उसकी सास धोती जो अक्सर जूठे ही रह जाते और दूसरी बार मुझे धोने पड़ते। लेकिन
दिसम्बर-जनवरी के महीने में बर्तन वाली से झिक-झिक करने का जोखिम अनुभवी गृहस्थनें
नहीं उठातीं।
Saturday, December 5, 2015
गुड़िया और कहानियां
चार बहनों वाले घर में ज़्यादा खिलौनों की ज़रूरत नहीं होती। हमारे समय में ज़्यादातर हैसियत भी नहीं होती थी। फिर भी, पता नहीं क्यों, पापा एक बार्बी डॉल लेकर आए थे, पचास रुपए की। छोटे कस्बों के महंगे स्कूलों की एक महीने की फीस होती थी तब इतनी। भूरे बालों और भूरे कपड़ों वाली वो बार्बी हमारे घर में लेकिन उपेक्षित सी पड़ी रही, शो रैक पर। गुड़ियों के खेल के लिए हमें बड़े परिवार की दरकार होती थी। दादा-दादी, चाचा-चाची, भैया-दीदी वाला परिवार, जो ज़रूरत पुरानी सफेद कपड़ों की हाथ से बनी गुड़िया ही पूरी कर सकती थी। इन गुड़ियों का आशियाना बनता पुराने कार्टन में, जिसमें माचिस के खाली डब्बों के सोफे होते और माचिस के डब्बों का ही टीवी भी होता। बाकी काम तरह-तरह के बर्तन सेट पूरे करते जिनकी हमारे पास भरमार थी। इलीट सी बार्बी उसमें आउट ऑफ प्लेस ही रह गई।
Sunday, November 29, 2015
लौटना अपनी जड़ों को
‘मम्मा क्या हम बेहारी है?’ बच्चों ने स्कूल से आकर पूछा।
‘बेहारी नहीं बिहारी, आप अपने राज्य का नाम भी
ठीक से बोल नहीं सकते।‘ मैंने उन्हें डपट दिया। वो रुआंसे हो गए, तो मुझे अपनी
ग़लती का एहसास हुआ। मैं उन्हे पास बिठाकर बताने लगी, दरभंगा, उनकी मां का शहर,
जहां वो तो क्या उनके पैदा होने के बाद उनकी मां तक नहीं गई। सहरसा, उनके पिता का
शहर, जहां हम उन्हें बस एक बार ले गए, दो साल की उम्र में, कुलदेवी के सामने मुंडन
की परंपरा निभाने।
Thursday, November 26, 2015
मेरी प्यारी मां
आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है इसलिए जाने कितने
सालों बाद तुम्हें खत लिखने बैठ गई। याद है ना मां इसके पहले आखिरी खत मैंने कॉलेज
से लिखा था जब फर्स्ट सेमेस्टर की परीक्षा के पहले मेरा दिल बहुत घबरा रहा था और घर का फोन आउट ऑफ आर्डर
था। कितने साल बीत गए उस बात को...शायद उन्नीस या बीस। जानती हूं आज भी जब तुम
सुनोगी तो हंसोगी। दिन में तीन बार तो फोन पर बात होती है हमारी...बच्चों के
होमवर्क से लेकर डिनर के मेन्यू तक हर चीज तो पता होती है तुम्हे मेरे घर की। फिर
आज मैं तु्म्हें लिखने क्यों बैठ गई अचानक? फोन क्यूं नहीं किया? तुम्हारा दिन तो वैसे भी तीनों बच्चों के फोन
के इंतजार में ही कटता है ना...
पर फोन तो तब करते हैं ना मां जब एक दूसरे से
कुछ कहना सुनना हो। जब केवल कहना ही कहना हो तब? मन का बोझ हल्का करने के लिए। और
ये सब कोई मां के अलावा और किससे बांट सकता है।
Saturday, November 21, 2015
बुद्धु बक्से (इडियट बॉक्स) और हम
घर में बच्चों के दोस्तों का गेट-टुगेदर था। उनके कमरे में जूस, सैंडविच और कुकीज़ पहुंचाने के क्रम में बातचीत के कुछ शब्द कानों तक तैरते चले आए।
“मेरे घर में पांच टीवी और आठ एसी हैं”, संयुक्त परिवार में रहने
वाली सहेली ने कहा।
“मेरे घर में चार एसी और दो टीवी”, दूसरी ने कहा।
“हमारे घर में दो टीवी क्यों नहीं हो सकते”, उम्मीद के मुताबिक उनके
जाते ही बिटिया का पहला सवाल था।
Thursday, November 5, 2015
बाबा नागार्जुन और मेरी बहनें
दसवीं के बोर्ड के
बाद की छुट्टियों के दौरान थोड़े दिनों के लिए गांव में थी। बाबा नागार्जुन से
पहली बार तभी मिलना हुआ। दादाजी के एक चचेरे भाई उनके अच्छे दोस्त थे, उस दिन वो
उनसे मिलने पहुंचे। यूं उनका गांव तरौनी हमारे गांव के पास ही था, लेकिन यायावर
बैधनाथ मिश्र का ख़ुद अपने गांव जा पाना बहुत कम ही हो पाता था। उस समय तक मैं
प्रेमचंद, शरत और शिवानी वगैरा में उलझी थी, सातवीं के कोर्स की किताब में बाबा की
सिर्फ एक कविता पढ़ी थी, ‘गुलाबी चूड़ियां’
“प्राईवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का
पिता भी तो है।“
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