Friday, June 15, 2018

मेरे बच्चों के पापा



मेरे बच्चों के पापा,
तुमसे पहली बार मिलने के सोलह महीने और बीस दिन बाद मैं तुम्हारे दोनों बच्चों की मां बन चुकी थी. हमारे रिश्ते की ज़मीन तब इतनी कच्ची थी कि हमारे दरम्यान किसी तीसरे की चर्चा भी तब शुरु नहीं हुई थी. तिस पर कुछेक महीनों का कच्चा-पक्का बसा-बसाया छोड़ हम एकदम से पराए देश में नए सिरे से शुरुआत करने जा पहुंचे थे.  

हम जैसे धरती पर दो अलग दिशाओं से आए उल्कापिंड थे. तुम बड़े से परिवार के सबसे छोटे, तुमने सालों से अपने परिवार के अंदर सबकी अलग दुनिया बसते देखा थे, तुम्हारे लिए मैं और हमारे बच्चे अपने अस्तित्व का लॉजिकल एक्सटेंशन थे. मैं परिवार की सबसे बड़ी बेटी, मेरे लिए लंबे समय तक तुम्हारा नंबर मां-बाप और बहनों के बाद आता रहा, तुम धैर्य से अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे.

मैं महीने भर पहले टीवी रिपोर्टिंग का अफलातूनी करियर छोड़, नए देश के खाली-खाली से अपार्टमेंट में बदहवास भटका करती, तुम हर रोज़ मुझे समझाते, थोड़ा और सहेजते. उन महीनों में मेरे अंदर का सन्नाटा जैसे बाहर पसर गया था और बाहर की सारी हलचल मेरे अंदर होने लगी थी. अंदर बाहर सब नया और फिर कुछ हफ्तों बाद पहली सोनोग्राफी में डॉक्टर की खुशी से किलकती चीख, You got to be kidding me, there are two’ मेरे पसीने से तर हाथ को तुमने थामा था, मैं हूं ना सब संभाल लूंगा. अगले आठ महीने मैं देखती रही, कैसे तुम्हारे हाथों मेरे भरोसे की नींव पर रोज़ एक नई ईंट रखी जा रही थी. सही मायनों में हमारी गृहस्थी की कच्ची दीवार उन आठ महीनों में ठोस होती गई.

जिस देश में लेबर रूम में भी पिताओं की उपस्थिति अनिवार्य और सहज थी, डॉक्टर और नर्स तुम्हें ‘Father who knows everything about his babies, even better than the mom’  बुलाया करते. आखिरी दिनों के डर को डॉक्टर सॉर्किन वेल्स ये कहकर हवा में उड़ा देती कि, ‘He doesn’t need me to deliver your babies, he can handle them both alone’

तुम्हें शायद पता नहीं होगा, औरत सबसे ज्यादा वल्नरेबल तब होती है जब वो नई-नई मां बनी होती है. जिस क्षण वो सबसे अनमोल सिरजती है उसी क्षण वो सबसे ज़्यादा बिखर भी जाती है. उसके कलेजे का टुकड़ा जब एक हाथ से दूसरे हाथ खिलौने की तरह घुमाया जा रहा होता है, वो उन सबसे भाग किसी अंधेरी सुरंग में छुप जाना चाहती है. उस क्षण उसे बधाइयों से ज़्यादा सहारे की ज़रूरत होती है. तभी शायद प्रसव के लिए लड़कियां मायके जाती हैं अपनी मां के पास.  मेरी मां तो मुझसे 45 हज़ार मील दूर थी लेकिन उन दिनों तुम मेरे लिए मेरी मां भी बन गए. बच्चों के साथ मुझे भी सहेजते, संभालते रहे. मेरे हिस्से दो बच्चे आए थे, लेकिन तुमने तीन को एक साथ पाला. सुना था बच्चे के जन्म देने भर से मां नहीं बना जाता, मां बनना सीखना होता है. मैंने तुम्हें देख-देखकर मां बनना सीखा.

शुरु के उन महीनों में जब मांओं के लिए दिन-रात, सर्दी-गर्मी सब एक रंग में ढल जाते हैं, तुम एक रात भी अपनी नींद पूरी करने के नाम पर उनसे अलग नहीं सोए. उनकी हल्की सी कुनमुनाहट पर मुझसे पहले जागे. चार महीने के बच्चों के साथ मैं नई नौकरी शुरु कर पाई क्योंकि तुमने अपनी कपंनी को वर्क फ्रॉम होम प्रोजेक्ट के लिए मना लिया था. सहेलियां छेड़तीं रहीं, ऊपर वाला भी सोच-समझकर ही ट्विन्स भेजता है.

तुम हमेशा मुझसे ज़्यादा उनकी मां रहे, दफ्तर से सीधा घर भागने वाले, बेटी की परफेक्ट चोटी बिना दर्द कराए बनाने वाले, रात-रात जग उनके प्रोजेक्ट बनाने वाले, उनसे लड़कर रूठ जाने वाले, उनकी छोटी-छोटी सफलता पर रो देने वाले, उनकी क्लास के व्हाट्सएप ग्रुप में तमाम मांओं के बीच मौजूद इकलौते पिता. मेरी नई हेयरस्टाइल नोटिस करने में तुम चाहे दस मिनट लगा दो, अपने बच्चों के हाथ पर मच्छर काटे का निशान तुम्हें दस फुट की दूरी से दिख जाता है.

यूं तुम किताबें नहीं इंसानों को पढ़ते हो, फिर भी बता दूं, चांद-तारे तोड़ने का वादा करने वाले मर्द, औरतों को आकर्षित ज़रूर करते हैं लेकिन वो अपना अस्तित्व उसी मर्द के लिए मिटा पाती है जो उसके मन को, उसके सिरजे अंश को समझ पाए. घर बसाना औरत का सबसे बड़ा सपना होता है और उस घर को उसके जितनी ही अहमियत देने वाला पति उस सपने का सबसे मुकम्मल हासिल.

जिनके नन्हें क़दम कभी फर्श पर सीधे नहीं पड़ते थे वो हमारी उंगलियां छोड़ लंबे-लंबे  रास्ते नापने लगे हैं. उनसे भी लंबे हो चले हैं उनके सपने. एक रोज़ जब वो हमारी ओर पीठ किए उन सपनों से अपना दामन भरने निकल चलेगें, मेरी उंगलियों को तब भी तुम्हें थामे रहने की ज़रूरत होगी. हम उस रोज़ भी यही रह जाएंगे, अपने बच्चों के ममा-पापा. हमारी दोस्ती के बाद हमारे रिश्ते की सबसे मज़बूत कड़ी.

ममा वाले पापा को पिता होने का दिन मुबारक़ हो.



Sunday, June 3, 2018

स्वयंसिद्धा-3




फिर यमराज, सत्यवान के अंगुष्ठ मात्र प्राण को लेकर दक्षिण दिशा को बढ़ चले, सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी. उनसे धर्मयुक्त वचन कहती जाती और बदले में एक-एक वरदान के रूप में अपने श्वसुरकुल और पितृकुल के सभी कष्ट दूर करती जाती. आखिरी वरदान उसने सौ पुत्रों की मां बनने का मांगा, तथास्तु कहते ही यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े. वट सावित्री की कथा सावित्री और सत्यवान के दीर्घकाल तक राज्य और संतान सुख भोगने के साथ समाप्त होती है. काश ज़िंदगियों में भी कथा-कहानियों सी सरलता हुआ करती. कथा के बाहर की सावित्रियों को यमराज ना इतना मान देते हैं ना इतनी मोहलत.

यूं भी इस कहानी का पहला अध्याय इसके बहुत पहले एक दूसरे शहर में शुरु हुआ था, सदी भी दूसरी ही थी.

18-19 की उम्र कैसी होती है? स्कूल पूरा कर बंदिशों के पीछे छूट जाने की, कॉलेज के बेफिक्र सालों के इंतज़ार के महीनों में यूं ही खेल-खेल में बेकरी का एक छोटा कोर्स पूरा कर लेने की. उसके अगले कुछ सालों को बादलों के पंख लग जाते हैं जैसे. किताबें हज़ार-हज़ार बाहें फैलाएं हर वक्त अपने आगोश में क़ैद किए रहती हैं. शेक्सपीयर के जटिल पात्रों की एक-एक परत को उघाड़ कर हर बार कुछ नया ढूंढ पाने की, कीट्स के ओड और वर्ड्सवर्थ के बलाड में डूब जाने की चाहत के आगे दिल कुछ और सोचना भी नहीं चाहता. किताबें सीने से लगाए चांद के डूबने तक भी पलकें भी नहीं झपकाने के साल इतने ख़ूबसूरत होते हैं कि वक्त की कदमताल बदल जाने की भनक भी नहीं लगती.  बादलों की सवारी में बड़े धोखे हैं क्योंकि हक़कीत की पथरीली ज़मीन पर मां की वो असाध्य बीमारी छह महीने की मोहलत में ही सब कुछ ख़त्म कर डालती है. फिर सारी बेफिक्री फुटमैट के नीचे बुहार देनी होती हैं, साहित्य तब भी मज़बूती से हाथ थामे रहता है. घर की तमाम ज़िम्मेदारियों की संभाल के बीच भी क़िताबें अपने इश्क का हक़ अदा कर जाती हैं. अंग्रेज़ी साहित्य में एमए का रिज़ल्ट जब आता है तो यूनिवर्सिटी की मेरिट लिस्ट में नाम सबसे उपर नज़र आता है.

फिर एक घर को सहेजते-सहेजते बारी आ जाती है दूसरे घर को संवारने की. वो घर जहां प्रवेश करते वक्त चावल से भरे पात्र को पैर के स्पर्श से अंदर की ओर गिराती, संकोच की लाल गठरी बनी लड़की से अपेक्षा होती है अपनी पीठ पीछे का सब भुलाकर अंदर आने की. नए घर के रिवाज़ अलग-ज़िम्मेदारियां नईं. इस बार क़िताबें और डिग्रियां संदूक की तलहटी में छुपी अपने वक्त का इंतज़ार करते हैं. उनके उपर की धूल कई साल बाद झाड़ी जाती है, स्कूली बच्चों को पढ़ाने की नौकरी के वक्त. विषय पर पकड़ और बच्चों के बीच लोकप्रियता इतनी कि जल्दी ही देश के सबसे बड़े स्कूलों में एक से बुलावा आता है, तीन गुनी तनख्वाह पर. गृहस्थी तिनका-तिनका जोड़ी जा रही है, हर ओर खुशियां बिखरी हैं. इतना सुख कि इस बार लबालब प्याला छलकता नहीं, दरक जाता है. ताप से झुलसी उंगलियां दरार रोकने को तड़पने लग जाती हैं वापस से.

जिस बीमारी ने एक बार दंश दिया था उसने कलेवर बदल लिया है. शराब को कभी हाथ नहीं लगाने वाले पति को लीवर सिरोसिस डायग्नोज़ हुआ, जिसने कभी बिना मोहलत मां को छीन लिया था. इस बार कितनी मोहलत है पता नहीं. दिन और रात का अंतर फिर मिट गया. दिन अस्पतालों और डॉक्टरों की अनवरत भागदौड़ में बीतते और रातें आशंकाओं के बीच.

इसी बीच स्कूल में हफ्ते भर के लिए बेकरी की क्लास लेने की ज़िम्मेदारी औचक मिल गई और यूं मिली कि सालों पहले किए छोटे से कोर्स ने संभावनाओं की सभी सीमाएं तोड़ डालीं. दिल को यकीन नहीं हुआ कि हाथों ने उस हुनर को अब तक साध रखा है. ये काम साहित्य पढ़ाने से थोड़ा कम वक्त लेता, बचा वक्त अस्पतालों को दिया जा सकता था.
इधर समय के साथ ज़िंदगी की रेस जारी थी. लीवर ट्रांस्प्लांट के लिए डोनर ढूंढने में निकला हर दिन आंशकाओं को प्रबल करता जाता. कभी आधी रात की बेचैनी रसोई की ओर मोड़ देती तो कभी एक नए रिपोर्ट में बदतर होती स्थिति का दर्द उंगलियों से रिसता और स्वाद बनकर पिघल जाता केक, पेस्ट्री, कप केकों के अलग-अलग फ्लेवरों में. दर्द बढ़ता गया, हाथ सधता गया. घर में जो कुछ बनता दोस्तों-पड़ोसियों में बांट दिया जाता, घरवालों की जीभ पर डॉक्टरी हिदायत की सख्त पहरेदारी थी. ज़्यादा वक्त नहीं लगा, कई जगहों से ऑर्डर आने लगे. जो एक बार चखता बड़ी दुकानों से ऑर्डर देना भूल जाता. बढ़ते काम को संभालने वाला कोई नहीं था, डॉक्टरों के पास भागमभाग बढ़ती जा रही थी. कई बार ख़ुद के हाथ पीछे खींचने पड़ जाते.

कई बार डोनर मिलता, लाखों ख़र्च कर टेस्ट कराए जाते और आख़िरी वक्त में कोई कमी निकल आती.  एक समय वक्त ने घुटने टेकने पर लगभग मजबूर कर दिया था. पति ने हाथ थाम कर कह दिया, सब छोड़ देते हैं, जितना वक्त है उसी में जीने की कोशिश करते हैं. वो रात शायद सबसे भारी थी, सुबह तकिया हर बार से ज़्यादा गीला. आत्मा की पुकार दूर तक गई होगी क्योंकि जवाब सात समन्दर पार से आया और डोनर हफ्ते भर बाद की फ्लाइट से. सारे टेस्ट पॉज़िटिव निकले. ऑपरेशन की तारीख तय की गई.

सावित्री को तो पति के जीवन के साथ उसका राज-पाट भी वापस मिल गया था लेकिन मेडिकल साइंस जब किसी सत्यवान को यमराज के पाश से मुक्त कराता है तो उसके एवज़ में तिजोरियां तो क्या सालों से पैसा-पैसा जोड़ी गईं गुल्लकें भी खाली करा डालता है. बैंक-बैलेंस, इंश्योरेंस, गहनों के साथ क्राउड फंडिंग का सहारा भी मिला. ज़रूरत अपने और पराए का फर्क मिटा देती है. वक्त ने सारी दुनिया में फैले दोस्तों को पास ला दिया, कई देशों में पैसे इकट्ठा करने की कोशिशें हुई. साल का पहला हफ्ता खुशखबरी लाया. ऑपरेशन सफल हुआ और सफल हुई कई-कई सालों की तपस्या. चढ़ाई खत्म हुई लेकिन ढलान पर भी फिसलन कम नहीं. लाखों का खर्च और महीनों की तीमारदारी अब भी बाक़ी है. लेकिन रातों की बेचैनियां अब उतनी तीक्ष्ण नहीं रहीं, नींद में सपनों की वापसी भी होने लग गई है.
मैंने दर्द में डूबे दिनों के हाथों का स्वाद कई बार चखा है. गुड़गांव आने के बाद शायद ही कहीं और से केक ख़रीदा हो. सर्जरी के बाद के महीनों में बेसब्री से उनके मैसेज के आने का इंतज़ार किया है और बेकिंग शुरु होते ही पहला ऑर्डर भी दिया है. इस बार की मिठास ज़बान से कभी नहीं उतरेगी. अब जितनी बार उनकी रसोई में केक के अलग-अलग फ्लेवर तैरेंगे नए सपने पूरा करने की एक और ईंट रखी जाएगी. अपना घर बनाने का सपना, बेटे के सुरक्षित भविष्य का सपना, सालों-साल तक के साथ का सपना.

उसके पहले एक वेबसाइट बनेगा, ऑर्डर बिना किसी अड़चन के लिए जाएंगे.

मैं मार्केटिंग में बिल्कुल भी अच्छी नहीं, वो हंसने लगती हैं
आपके हुनर को उसकी ज़्यादा ज़रूरत भी नहीं, मैं उन्हें आश्वस्त करती हूं.


Saturday, May 26, 2018

स्वयंसिद्धा- 2




23-24 की उम्र, स्टेट बैंक में पीओ की नौकरी और पहले प्यार से शादी पर परिवार की स्वीकृति. एक परिकथा सी पृष्ठभूमि, कायदे से कहानी को शुरु होने से पहले ही ख़त्म हो जाना चाहिए था. चाशनी में सराबोर कहानियां यूं भी कहां पढ़ी जाती हैं नकारात्मकता के अतिरेक में ऊब-डूब रहे इस दौर में. फिर भी इस कहानी का कहा जाना बेहद ज़रूरी है क्योंकि संघर्ष की कहानियां उन औरतों की ही नहीं होतीं जिन्हें पतियों ने छोड़ दिया, ससुराल वालों ने प्रताड़ित किया या फिर बदकिस्मती ने सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया.
उन औरतों का क्या जिन्हें समाज अपने मानकों के हिसाब से सुखी-सम्पन्न होने के तमगे दे डालता है और उनसे उस सुख के लबालब छलकते प्याले को ताउम्र संभालकर रखने की उम्मीद की जाती है? फिर मान लिया जाता है कि उनके पास अपने लिए कोई और सपना हो ही नहीं सकता. सामाजिक स्वीकार्यता के धागे से बंधी उन लाल पारिवारिक क़िताबों में जाने कितने सपने हर रोज़ सहमकर दम तोड़ देते हैं.
यूं भी हर समय की बेहतरीन कहानियां वहां शुरु होती हैं जहां उन्हें सुखांत में ख़त्म हो जाना चाहिए.
क्योंकि शादी होती है तो परिवार बनता है,परिवार पूरा करने लिए बच्चे ज़रूरी होते हैं और नौकरी, पति, घर और बच्चे को साथ-साथ संभालती औरत को गढ़ पाना तो कहानियों में भी मुश्किल होता है. छह महीने की बेटी को छोड़ नौकरी पर दोबारा जाना प्यार का सबसे बड़ा इम्तहान था. प्यार जीता, करियर ने घुटने टेक दिए. पीओ की डिग्री हमेशा के लिए शून्य में तब्दील हो गई. जबतक दूसरी बेटी आई और स्कूल जाने लायक हुई, सरकारी नौकरियों की उम्र निकल चुकी थी. क़ायदे से अब उसे गृहस्थी की संकरी पगडंडी पर चलते जाना चाहिए था, एक छोटे, सुखी, सम्पन्न परिवार के सुख-दुख का ख्याल रखते हुए, पति के करियर और तरक्की में अपनी खुशी ढूंढते हुए, बहुत हुआ तो छोटी-मोटी नौकरी करते हुए. लेकिन क़िस्मत ने सरल रास्ता उसके लिए चुना ही कहां था. बिना किसी योजना के गर्भ में इस बार किसी और के आने की आहट हुई. पता चला एक नहीं दो जोड़ी क़दमों की आमद थी.
अब?
पोस्टरों वाले सुखी परिवार के पोट्रेट का क्या?
वो अपनी जगह, कुछ फैसले ईश्वर लेता है हमारे लिए. जो बाहर आ गए वो जान से ज़्यादा अज़ीज और जो गर्भनाल से जुड़े हैं उनका....? माएं तो हर बच्चे के लिए एक सा सोचती हैं. ये बच्चे नहीं चाहिए ऐसा ख्याल भी मन में नहीं आया. इस बार बहन अपने साथ भाई भी ले आई.
घर दोनों की किलकारियों से गूंजता कि क़िस्मत ने एक ओर की झोली ख़ाली कर दी. छोटी सी बीमारी आनन-फानन में पिता को ले गई, जिन्होंने ख़ुद पर विश्वास करना सिखाया था उनके जाने पर विश्वास कर पाने में महीनों कम पड़ गए. कुछ ऐसे कि बच्चों पर भी ध्यान नहीं रह पाता. गहरे अवसाद से बचने के लिए पढ़ाई शुरु करने की सलाह दी गई. एमबीए की तैयारी शुरु की. वो भी इस तरह कि कई बार कोचिंग क्लास छोड़कर घर दौड़ना पड़ा क्योंकि बच्चे रोने लग पड़े या फिर बर्तन धोने वाली नहीं आई. साल भर के भीतर उसने वो कर दिखाया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी, शायद उसे भी नहीं. 99 प्रतिशतक अंक लेकर कैट की परीक्षा पास कर ली. आईआईएम में एडमिशन लिया और ख़ुद से 12-14 साल छोटे लड़के-लड़कियों के साथ दो साल की दुरुह पढ़ाई के लिए तैयार हो गई. पढ़ाई दूसरे शहर में होनी थी. पति का प्रोत्साहन तो था ही इस बार बच्चों की ज़िम्मेदारी भी मां ने ले ली थी, उन्हें अपने अकस्मात अकेलेपन को भरने के मासूम बहाने मिल गए थे. लेकिन उसकी चुनौतियां बदस्तूर थीं. मां होना जितना कठिन है, माओं को जज करना उतना ही आसान.
उसने ख़ुद को दो अदालतों के कठघरे में खड़ा पाया. बेटे के लिए तीन बेटियों को जन्म देने वाली मां परिष्कृत समाज की दृष्टि में हेय थी और चार छोटे बच्चों को छोड़, दोबारा पढ़ाई और करियर की बात करने वाली मां के लिए पारंपरिक समाज के पास केवल तिरस्कार था. शुक्र है कैंपस में मिले युवा साथियों ने उसे कभी जज नहीं किया, टीम प्रोजेक्ट हो या कोई प्रेज़ेन्टेशन, ऊर्जा से भरे वो लड़के-लड़कियां हर मोड़ पर हाथ पकड़कर साथ लिए चलते. उसे लगा इतने साल जो गृहस्थी को दिए उन छूटे सालों को भी कैंपस में आकर जी लिया उसने.
उसने ख़ुद को खांचो में बांटकर रहना सीख लिया, पढ़ते वक्त मां को उतारकर आलमारी में बंद कर देती. फिर हर महीने स्पेशल पर्मीशन लेकर घर भागती, चारों बच्चों को समेट कर दो-एक रात उनके साथ बिताने. उसके लिए केवल कपड़े पैक होते, महत्वाकांक्षा हॉस्टल के कमरे में छोड़ दी जाती.  फिर सुबह-सुबह की फ्लाइट पकड़कर कैंपस वापस आना होता. कभी बड़ी बेटी दीवार पर ममा प्लीज़ कम होमलिखकर इंतज़ार करती तो कभी बेटा मां को उतारे गाउन को छाती से लगा सीढ़ियों पर बैठा रहता.
कैसे कर पाई तुम ये सब, आधी नींद सोना, आधी रात जगना, हर रोज़ नई आईडेंटिटी के साथ जीना?’
बेटियों के लिए. कल को ये तीनों ये सोचकर ना बड़ी हों कि मांओं का काम घर में रहना होता है या फिर पढ़ी-लिखी होकर भी औरतों के लिए नौकरी छोड़ना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए.
जब प्लेसमेंट का समय आया तो उसने जी कड़ा कर लिया, वो बातें दोहराई जानी थीं जो उसे दो साल पहले सुनाई गईं. ख़ुद को बेहद मॉडर्न कहने वाला मल्टीनेशनल कॉर्पोरेट कल्चर भी दरअसल अंदर से उतना ही खोखला है. उसने एक बार नहीं, कई बार सुना, फैमिली के लिए एक बार अगर आप नौकरी छोड़ चुके हैं और चार-चार बच्चों की ज़िम्मेदारी अभी भी आप पर है तो नौकरी के ग्राफ में आपकी स्थिति हाशिए पर एक डॉट के समान होती है. ज़्यादातर कंपनियों के इंटरव्यू में बैठने नहीं दिया गया. कुछ मौके हालात ने छीन लिए. जिस रोज़ जेपी मॉर्गन कैंपस प्लेसमेंट के लिए आई थी मैं बेटे को लेकर हॉस्पीटल में थी. कैंपस में मैं आख़िरी थी जिसे प्लेसमेंट मिली.
बहुत सारा संघर्ष और कुछ दे ना दे, अपने अस्तित्व से रूहानी प्यार करना ज़रूर सिखा देता है.
मैंने मंज़िल से नहीं उस दूरी को अहमियत देना शुरु कर दिया है जो मैंने इतने सालों में नापी. कुछ बड़े ऑफरों को ठुकराकर अपने शहर वाली नौकरी चुनी. इन दिनों ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत दिन बिता रही हूं, अपने बच्चों और अपनी कामयाबी दोनों के साथ
समाज कमज़ोर याद्दाश्त वाले बहरे और चीखते लोगों का हुज़ूम है, अभी किसी और मां को नाप-तौलकर नंबर देने में लगा होगा, लेकिन मुझे उसके उन सपनों की परवाह है जिन्होंने एक रोज़ साकार होने की उम्मीद में अपनी सांसें बचा रखी होंगी. कुछ और तो नहीं बाक़ी पूरा करने को?
उसकी दमदार आवाज़ में खनकती हंसी की घंटियां गूंज गई हैं, कुछ छोटे सपने अभी भी बाक़ी हैं, अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी, अपने अनुभवों पर एक क़िताब. कौन जाने, कर ही डालूं कभी
तो मेरा यहीं रुक जाना बनता है, इस इंतज़ार में कि किसी रोज़ उसकी कहानी विस्तार से उसकी कलम ख़ुद कह डालेगी.
किसी रोज़.....आमीन.

Wednesday, May 23, 2018

स्वयंसिद्धा- एक



उसकी टाइमलाइन पर एक साथ कई तस्वीरें आईँ हैं, भरतनाट्यम की पारंपरिक, पीले रंग की पोशाक में. चेहरे पर वैसी ही मासूमियत जैसी पच्चीस बरस पहले थी. मन आया नज़र उतार लूं. हालांकि ये तस्वीर पच्चीस बरस पहले मेरे सामने आई होती तो मन चाहकर भी उतना उदार नहीं हो पाता. मसला केवल टीनएज का ही नहीं उस बचकाने कॉम्पीटीशन का भी था जो कभी हम दोनों के बीच नृत्य की आड़ी-तिरछी मुद्राओं को लेकर हुआ करता. यूं हम दोनों में नृत्य विधिवत सीखा किसी ने नहीं था, लेकिन अपनी छोटी सी दुनिया में दो अंगुल प्रसिद्धि की लड़ाई बदस्तूर थी. वो ये समझने की उम्र नहीं थी कि जो मेरे लिए शौक है उसके लिए उसका जुनून. लेकिन आज व्हाट्सएप्प पर अलग से आई तस्वीरों को बार-बार निहार रही हूं, उसके मैसेज को कई बार पढ़ा है, उसने भरतनाट्यम की फिफ्थ इयर की परीक्षा पास कर ली है, और तीन साल और वो डांस ग्रेजुएट हो जाएगी. कोई कहे 40वीं पायदान पर दस्तक देने वाली औरतों के लिए कौन सी बड़ी अचीवमेंट हो गई जी ये, लेकिन उसके लिए उल्टे पैर पहाड़ चढ़ने जितना दुष्कर था ये सब.

दोस्तियां सचमुच रेल की पटरी सी होती हैं, जाने कहां की छूटी कब आकर वापस लिपट जाती हैं. कुछ बरस पहले इसने भी यूं ही मैसेज बॉक्स में दस्तक दी थी. कागज़ के उस टुकड़े की तस्वीर के साथ जिसमें फेयरवेल पर मेरी ज़बरदस्ती की तुक मिलाई कविता थी, क्लास की सारी लड़कियों के नाम मिलाकर लिखी गई. जाने कैसे घर की सफाई में इसके हाथ आ गई. अपनी गृहस्थी के अनुराग में सराबोर मेरी बातें शायद औपचारिता में ही लिथड़ी रहती अगर माई हस्बैंड इज़ नो मोरके पांच शब्दों ने मेरे रोंगटे ना खड़े कर दिए होते. लेकिन सहानुभूति के मेरे शब्दों को इस बार उसके तटस्थ से, इट्स ओके, ही वॉज़ एन अब्यूसिव एल्कोहलिक ने फूंक सा उड़ा दिया. उसे किसी की औपचारिक सहानुभूति की ज़रूरत नहीं थी, जितना रोना था वो रो चुकी थी, जितना सहना था सह चुकी. बड़ी मुश्किल से ज़िंदगी की बागडोर उसके हाथों में आई थी, अब उसे अपने खोए हुए साल वापस चाहिए थे, वक्त की रेस में वक्त को ही हराना था.  

दसवीं के बाद जिस मोड़ पर हमारे रास्ते अलग हुए पुराने दोस्तों से जुड़ पाने की तकनीक सुलभ नहीं थी. हम सबकी आंखों में जब करियर के सपने थे उसके पास थी रूढ़िवादी पिता की हज़ार बंदिशें और सौतेली मां की बेबसी. इक्कीस की उम्र में जबरन ब्याह दी गई शराब के ठेके चला रहे स्थानीय नेता के परिवार में. पति पंचायत समिति का अध्यक्ष और शराबखोर. बहुओं के घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी. उसने एक सामान्य ज़िंदगी की सारी उम्मीदों को परे सरकाया और साल भर के अंतराल पर हुए दोनों बच्चों को पालने लगी. हर रात नशेड़ी पति के ताने सुनती और दिन भर अपने सपनों को सहला-सहलाकर ज़िंदा रखने की कोशिश करती. हालात और बिगड़े तो पति को डॉक्टर के पास ले जाना शुरु किया लेकिन सत्ता, शराब और बुरी सोहबत ने जीने की सारी मोहलत एकाएक छीन ली. पति के दोनों भाइयों की मौत पहले ही हो चुकी थी.  32 की उम्र, दो छोटे बच्चे, हताश सास- ससुर और उनके उजड़े साम्राज्य का खंडहर.....लेकिन उस सपनीली आंखों वाली लड़की ने खुली आंखों वाले सपने देखे थे. घर के एक हिस्से को किराए पर चढ़ाया लॉ में ग्रेजुएशन किया, एक लॉ फर्म में काम शुरु किया फिर साथ में एलएलएम में भी एडमिशन लिया. अपनी सीमित आमदनी और किराए से बच्चों की अच्छी परवरिश कर रही है. उसका मैसेज मुझे उन्हीं दिनों आया था, अपनी मास्टर्स थीसिस लिखने में उसे मेरी मदद चाहिए थी. इतना सब करने के बाद सबसे पुरानी ख्वाहिश उसे दिन रात बेचैन किए जा रही थी, वो सपना जिसका ज़िक्र उसके पिता को भी भड़का देता था. सास-ससुर का भड़कना भी लाज़िमी था, दो बच्चों की विधवा मां डांस सीखेगी? लेकिन आन्ध्र-महाराष्ट्र के बॉर्डर पर उस छोटे से शहर में उस लड़की को अब कोई बंदिश रोक नहीं सकती थी. उसने अपना प्रारब्ध अपने हाथों लिखना सीख लिया था. डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में वकालत कर रही है, एक स्थानीय लॉ कॉलेज में गेस्ट फैकल्टी है और अब भरतनाट्यम के छठे साल की स्टूडेंट भी.

मैं वक्त को उसके हाथों मजबूर होता देख रही हूं, वो एक-एक कर उससे अपने छीने तमाम साल वापस ले रही है.
इन दिनों कोर्ट और कॉलेज दोनों बंद हैं, वो एक-डेढ़ महीने से ससुराल के गांव में है, खेती-बाड़ी का हालचाल लेने. सिग्नल बहुत मुश्किल से मिला है लेकिन हमारी बातें ख़त्म नहीं हो रही.

आगे क्या प्लान?

मुझे अपनी डांस एकेडमी खोलनी है और हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करनी है, नागपुर या फिर हैदराबाद बेंच, लेकिन सास-ससुर जाना नहीं चाहते. वो बेहद पुरातनपंथी हैं, बहुत सख्ती की मेरे साथ लेकिन हालात के मारे हुए, उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकती.

मैं आखें बंद करती हूं उसे हाईकोर्ट की बेंच पर बैठा देख पाने के लिए, अपनी डांस एकेडमी में सबको अपने ताल पर थिरकाते देख पाने के लिए. लेकिन एक सवाल है जो बार-बार परेशान किए जा रहा है.

उसे किसी का सहारा नहीं चाहिए, ये बात उससे ज़्यादा मैं समझती हूं. लेकिन प्यार? वो तो सबका हासिल होना चाहिए ना. फोन पर ये सुनकर उसकी आवाज़ हिचककर शांत हो गई है. प्यार तो कभी मिला ही नहीं, इसलिए चाहिए ज़रूर. फिर हौले से बताया,  कोई है जो अब भी उसका इंतज़ार कर रहा है. हमारी ही क्लास का एक लड़का. उसने ख़बर भी भिजवाई थी. अपने क्लास के लड़कों की अब कोई याद नहीं मुझे इसलिए उसके साथ किसी चेहरे को खड़ा कर पाने में असमर्थ पाती हूं ख़ुद को. लेकिन मन में एक मीठी सी उम्मीद जागती है.

फिर?

पता नहीं, शराब के नशे से दहकती आंखों की याद क़दमों को रोक लेती है, वैसे भी जिस समाज में मैं हूं, वो दूसरे लेवल की लड़ाई हो जाएगी ना. लेकिन मैने किसी भी बात के लिए ख़ुद को ना कहना बंद कर दिया है अब उसकी खनकती हंसी मेरे फोन को गुलज़ार किए जाती है.

मैं जी भरकर मुस्कुरा लेना चाहती हूं

Sunday, April 29, 2018

वधु चाहिए- है कोई नज़र में?




सात-आठ बरस का लड़का शाम को खेलकर थका-मांदा पसीने से लथपथ घर लौटता है. दौड़ने-भागने के आधिक्य से उसकी दोनों टांगें कांप रही हैं. मां बड़े प्यार से उसके कपड़े बदलवा कर हाथ-मुंह धुलाकर उसे अपने बिस्तर पर लिटा लेती है, फिर कोमल हाथों से उसके पैरों में तेल लगाने लगती है. आराम मिलते ही बच्चे की आंखें मुंदने को आती हैं कि मां प्यार से उसका माथा सहलाकर कहती है, बुढापे में तुझे भी अपनी मां की इसी तरह सेवा करनी होगी, करेगा ना राजा बेटा. आनंद के अतिरेक में लड़का हां में सिर हिलाना ही चाहता है कि पास खड़ी दादी चिहुंक उठती है, तुम्हारी कैसे, तब तक तो बीवी आ जाएगी, उसकी सेवा करेगा ना, उसी की सारी बात मानेगा. बात का इशारा भले ही मां को ओर हो लेकिन लड़का चोट अपने उपर ले बैठता है. खिलखिलाहट के बीच उसे आभास हो जाता है कि उसके लिए किसी बड़े निषिद्ध का नाम ले लिया गया है. वो नींद भूल मां से लिपट जाता है, मैं तो बस अपनी मम्मी की सेवा करूगां, बस्स मम्मी का बेटा रहूंगा और कुछ नहीं. मां का सिर मैं ना कहती थी वाले अंदाज़ में गर्वोन्नत हो उठता है.

बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया है लेकिन अब भी शर्मीला सा है. पढ़ाई-लिखाई में वो अक्सर पिता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाता, अपनी बात सलीके से रखना भी नहीं सीखा उसने. फिर एक दिन पिता उसपर झल्ला उठते हैं, ऐसे डरपोक रहने से क्या होगा, क्या बड़ा होकर बीवी के पेटिकोट धोते रहना है?” बेटा सहम जाता है, उसे समझ में आ जाता है कि जीवन में कुछ नहीं कर पाने वाले को बीवी के पेटिकोट धोने होते हैं. लेकिन वो तो लड़का है, कुछ नहीं करना उसके लिए विकल्प नहीं. वो इस प्रण के साथ पढ़ाई में जुट जाता है कि चाहे कुछ भी हो जाए उसे बड़ा होकर बीवी के कपड़ों को तो हाथ भी नहीं लगाना.

मां-बाप घर पर नहीं है, लड़का पढ़ाई में व्यस्त है. घर में कुछ मेहमान आ गए हैं. लड़का उन्हें सम्मान से बिठाकर पानी और चाय का इंतज़ाम करता है. मां-बाप के लौटते ही मेहमान बेटे की तारीफ शुरु कर देते हैं. कितना सीधा लड़का है आपका, आज के ज़माने में इतना भोलापन. बिल्कुल लड़कियों सा शर्मीला और गुणी, लड़की होता तो हम आज ही इसे बहु बनाकर ले जाते. लड़का शर्म से और सिकुड़ जाता है. उसे समझ आ जाता है कि अच्छे काम की जगह उसने कुछ ऐसा कर दिया है जिसकी उससे अपेक्षा नहीं थी. उसने आगे से अपना सारा ध्यान जनाना और मर्दाना कामों का विभाजन ठीक-ठीक समझने में लगा देने का फैसला किया है.

फिर भी वो लड़का है, घी का लड्डू तो टेढ़ा हो फिर भी भला ही लगता है. पढ़ाई में थोड़ा औसत था ज़रूर लेकिन अपनी मेहनत से अच्छी जगह नौकरी पा गया है. उसपर देखने-भालने में ठीक-ठाक, शांत और सुशील भी. मां को हर पल ये आशंका खाए जाती है कि कहीं कोई लड़की उसे फंसा ना ले. हालांकि उनको पूरी उम्मीद है कि उनसे पूछे बिना बेटा पजामे का नाड़ा तक नहीं बदलेगा लेकिन फिर ज़माने का क्या भरोसा.

ऐसे कमाऊ, खानदानी, सर्वगुण सम्पन्न लड़के के लिए एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर, स्मार्ट, सुलझी हुई, सुशील और घरेलू कन्या की तलाश है जो परिवार में पानी में शक्कर के जैसी घुल जाए. 
है कोई आपकी नज़र में?

Monday, April 16, 2018

बलात्कार और इंसाफ: कभी खत्म ना होने वाला इंतज़ार



एक बार फिर हमारी शिराओं में तनाव है, दुख और क्रोध से हमारी नसें फटी जा रही हैं, अपनी बेबसी हमारा ही दम घोंट रही है, हम असहाय हैं, अपनी बेटियों को खींचकर हम बार-बार अपनी छाती से लगा रहे हैं, क्योंकि उनके प्रति हमारा अपराधबोध फिर बढ़ गया है, हम एक बार फिर अपनी ही बेटियों को बचा पाने में नाकाम रहे हैं.
हम सड़कों पर उतर आए हैं, हमारे हाथ जलती मोमबत्तियों से दग्ध हैं. हमारे अंदर का हाहाकार, विरोध और नारों की शक्ल में धीरे-धीरे बाहर आ रहा है, हम उस दुनिया को नेस्तनाबूत कर देना चाहते हैं जो हमारी बेटियों को सुकून और हिफाज़त भरी ज़िंदगी नहीं दे पा रहा.
सत्ता की चुप्पी टूट रही है, अपना आसन डोलता देख, लेशमात्र ही सही, उनमें हलचल तो हुई. वीभत्स मुस्कुराहट वाला आरोपी सलाखों के भीतर है. बलात्कारियों के पक्ष में तिरंगे के नीचे रैली निकालने वालों ने पद छोड़ दिए हैं. संयुक्त राष्ट्र ने भी संज्ञान ले लिया है. हम खुश हैं, होना भी चाहिए. आखिरकार, हमने एक लोकतांत्रिक देश के सजग नागरिक होने का अपना फर्ज अदा कर दिया है.
लेकिन अब? अब हमारी सामूहिक चेतना क्या करे? क्या हम अपने विरोध के पोस्टर समेट लें? मोमबत्तियां बुझाकर वापस अपने झोले में रख लें और एक-दूसरे को विदा देते हुए अपनी रोज़मर्रा की मुसीबतों से जूझने में व्यस्त हो जाएं?
ये सवाल मौजूं इसलिए है क्योंकि जिन बेटियों की लड़ाई में हमारे चार कदम के साथ ने समाज की एक गलीज़ परत को उघाड़कर रहनुमाओं की प्राथमिकता बदल दी वो अपनी लड़ाई में केवल निचले पायदान तक पहुंच पाई हैं. न्याय की चौखट पर उनके सामने अभी इतनी लंबी चढ़ाई बाकी है जिसे नाप पाने में शायद उनकी उम्र ही निकल जाएगी. जब तक उन्हें न्याय मिलेगा हो सकता है अपनी जिन बेटियों को आज हम चिंताग्रस्त हो स्कूल भेज रहे हैं, तब तक उनकी शादी की तैयारियों में व्यस्त हों. ये मेरे वक्ती ज़ज्बात नहीं, आकड़े कहते हैं.
1996 का सूर्यनेल्ली बलात्कार मामला याद है आपको? 16 बरस की स्कूली छात्रा को अगवा कर 40 दिनों तक 37 लोगों ने बलात्कार किया. कांग्रेस नेता पीजे कुरियन का नाम उछलने से मामले ने राजीनितक रंग भी ले लिया. नौ साल बाद 2005 में केरल हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी के अलावा बाकी सब को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. विरोध हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के आदेश दिए, इस बार सात को छोड़ ज़्यादातर को सज़ा हुई लेकिन कई आरोपी अभी भी कानून की पहुंच से बाहर हैं. इधर पीड़िता की आधी उम्र निकल चुकी है. उसे ना अपने दफ्तर में सहज सम्मान मिल पाया ना समाज में. पड़ोसियों की बेरुखी से परेशान उसका परिवार कई बार घर और शहर बदल चुका है.
1996 में दिल्ली में लॉ की पढ़ाई कर रही प्रियदर्शनी मट्टू की उसी के साथी ने  बलात्कार कर नृशंस हत्या कर दी थी. अपराधी संतोष सिंह जम्मू कश्मीर के आईजी पुलिस का बेटा था. बेटे के खिलाफ मामला दर्ज होने के बावजूद उसके पिता को दिल्ली का पुलिस ज़्वाइंट कमिश्नर बना दिया गया. ज़ाहिर ,है जांच में पुलिस ने इतनी लापरवाही बरती कि चार साल बाद सबूतों के अभाव में निचली अदालत ने उसे बरी कर दिया. लोगों के आक्रोश के बाद जब तक मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा संतोष सिंह खुद वकील बन चुका था और उसकी शादी भी हो चुकी थी जबकि प्रियदर्शनी का परिवार उसे न्याय दिलाने के लिए अदालतों के बंद दरवाज़ों को बेबसी से खटखटा रहा था. ग्यारहवें साल में हाईकोर्ट ने संतोष सिंह को मौत की सज़ा सुनाई जिसे 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने उम्र कैद में तब्दील कर दिया. उसके बाद भी संतोष सिंह कई बार पैरोल पर बाहर आ चुका है.
वैसे भी ये वो मामले हैं यहां अदालती फाइलों में केस अपने मुकाम तक पहुंच पाया. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में देश की विभिन्न अदालतों में चल रहे बलात्कार के 152165 नए-पुराने मामलों में केवल 25 का निपटारा किया जा सका जबकि इस एक साल में 38947 नए मामले दर्ज किए गए.
दुनियाभर में बलात्कार सबसे कम रिपोर्ट होने वाला अपराध है. शायद इसलिए भी कि दुनियाभर के कानूनों में बलात्कार सबसे मुश्किल से साबित किया जाने वाला अपराध भी है, ये तब जबकि खुद को प्रगतिशील और लोकतांत्रिक कहने वाले देश औरतों को बराबरी और सुरक्षा देना सदी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं. ज़्यादातर मामलों में पीड़िता पुलिस तक पहुंचने की हिम्मत जुटाने में इतना वक्त ले लेती है कि फॉरेंसिक साक्ष्य नहीं के बराबर बचते हैं. उसके बाद भी कानून की पेचीदगियां ऐसीं कि ये ज़िम्मेदारी बलात्कार पीड़िता के ऊपर होती है कि वो अपने ऊपर हुए अत्याचार को साबित करे बजाए इसके कि बलात्कारी अदालत में खुद के निर्दोष साबित करे.
यौन उत्पीड़न के खिलाफ काम कर रही अमेरिकी संस्था रेप, असॉल्ट एंड इन्सेस्ट नेशनल नेटवर्क (RAINN) ने यौन अपराधों में सज़ा से जुड़ा एक दिल दहला देने वाला आंकड़ा जारी किया है. इसके मुताबिक अमेरिका में होने वाले हर एक हज़ार यौन अपराधों में केवल 310 मामले पुलिस के सामने आते हैं जिसमें केवल 6 मामलों में अपराधी को जेल हो पाती है जबकि चोरी के हर हज़ार मामले में 20 और मार-पीट की स्थिति में 33 अपराधी सलाखों के पीछे होते हैं.
बलात्कार को नस्ल और धर्म का चोगा पहनाने से पहले संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट की बात भी करते चलें. ‘Conflict Related Sexual Violence’ नाम की इस रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई है कि आंतरिक कलह या आंतकवाद जनित युद्ध के दौरान यौन हिंसा को योजनाबद्ध तरीके से हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की प्रवृति किस तेज़ी से बढ़ी है. गृह युद्ध और आतंकवाद से जूझ रहे 19 देशों से जुटाए आंकड़े बताते हैं कि इन क्षेत्रों में बलात्कार की घटनाएं छिटपुट नहीं बल्कि सोची-समझी सामरिक रणनीति के तहत हो रही हैं. सामूहिक बलात्कार, महीनों तक चले उत्पीड़न और यौन दासता से जन्में बच्चे और बीमारियां एक नहीं कई पीढ़ियों को खत्म कर रहे हैं. इन घृणित साज़िशों के पीछे की बर्बरता को हम और आप पूरी तरह महसूस भी नहीं कर सकते.
इसलिए कहती हूं, उन्नाव और कठुआ की लड़ाई अभी शुरु ही हुई है. लड़ाई लंबी है, क्योंकि सामने वाला पैसे और बाहुबल दोनों से ताकतवर है. इसके पहले कि हमारी मोमबत्तियों की लौ ठंढी हो जाए, याद रखिएगा, जिन गिने-चुने मामलों में सज़ा होती है आम जनता आक्रोश और विरोध की वजह से ही हो पाती है. इसलिए हमारे सामने चुनौती ये है कि हम इन मामलों को अदालती तारीखों के मकड़जाल से निकालकर जल्द से जल्द अंतिम फैसले तक कैसे पहुंचाएं. मरने वाला न्याय-अन्याय से उपर जा चुका होता है. सलाखों के पीछे पहुंचा हर अपराधी भविष्य में होने वाले अपराधों की आशंका को कम करता है. इसलिए ये लड़ाई हमारी है, हमारी बेटियों की, हमारे भविष्य को, हमारे समाज को बचाने की.

ये आलेख सबसे पहले क्विंट में प्रकाशित हुआ था
https://hindi.thequint.com/voices/opinion/kathua-unnao-rape-case-least-recorded-crime-delayed-justice 

Sunday, April 15, 2018

जहां गिनती खत्म हो, वहां शुरु होती है बराबरी



नाम और शक्लें मुझे कम ही याद रहती हैं. इस वजह से कई बार मुश्किल भी आई, शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी लेकिन आदतें कहां आसानी से पीछा छोड़ती हैं. फिर भी एक नाम कई महीनों से सुबह शाम याद आ ही जाता है. कैप्टन रवीना ठाकुर, बहुत कोशिश की दुनिया के बाकी नामों की तरह ये भी दिमाग से उतर जाए, लेकिन पीछा ही छोड़ रहा. नाम है कैप्टन रवीना ठाकुर. कई महीने पहले एक हवाई यात्रा में मुख्य पायलट के तौर पर अनाउंस किया गया ये नाम जाने कैसे ज़ुबा पर चढ़ गया. ये पहली बार था जब मेरे जहाज़ को किसी महिला पायलट ने उड़ाया था. तब के बाद की हवाई यात्राओं में बहुत मन्नतें मांगी कि फिर कोई लड़की चीफ पायलट बनकर आए, इतनी लड़कियां मेरे बैठे जहाज़ों को उड़ाएं कि उनके नाम याद रखने की ज़रूरत ही महसूस ना हो. लेकिन कमबख्त एयरलाइन वालों ने कभी ऐसा मौका दिया ही नहीं. बावजूद इसके कि देश के सिविल एविएशन मंत्री कुछ महीने पहले कह चुके हैं कि भारत में महिला पायलटों की संख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा है. अब जब मंत्री जी ने कहा है तो सच ही होगा, शायद मेरा बैडलक ही ख़राब है. अगर एयरलाइन पायलटों के नाम पहले साझा कर सकते तो मैं कोशिश कर उन्हीं जहाज़ों का टिकट कटाती जिनकी पायलट कोई सुश्री हो, ताकि किसी का भी नाम याद रखने की जहमत ही नहीं उठानी पड़े.

पता है क्यों ज़रूरी है नाम और गिनती भूल जाना? क्योंकि जहां गिनतियां खत्म होती हैं वहीं से बराबरी शुरु होती है. सफलताओं की लिस्ट जब छोटी होती है तो नाम याद रहते हैं, वही सफलताएं जब कई सारी हो जाती हैं तो केवल उसकी लंबाई याद रह जाती है. औरतों की गिनी-चुनी उपलब्धियां उस समाज के शोकेस में सजाई जाती हैं जो वास्तव में उनकी सफलता दर के लिहाज़ से सबसे पीछे है. बराबरी उस दिन आएगी जिस दिन आप खिलाड़ी को खिलाड़ी, लेखक को लेखक, पायलट को पायलट और साइंटिस्ट को साइंटिस्ट कहेंगे. हर अचीवमेंट के आगे महिला लगा देना उनको सांत्वना पुरूस्कार देने जैसा लगता है.

खासकर जब आप खेलों में मिली सफलता को बेटियों ने नाम ऊंचा कियाजैसी हेडलाइन से नवाज़ते हैं तो मन सचमुच खट्टा हो जाता है. बिल्कुल वैसा ही एहसास होता है जैसे एक बेहद ख़राब बाथरूम सिंगर ने नलका चलाते ही फिर से अपना इकलौता, बेसुरा आलाप छेड़ दिया है. आपकी बेटियों का मुकाबला वहां मंगल ग्रह के एलियन्स से नहीं था, किसी ना किसी की बेटी से ही था. रही बात अंतरराष्ट्रीय खेलों की तो वहां तो आपके बेटों के प्रदर्शन भी हमेशा खराब ही रहा. अच्छा होता भी तो कैसे, उनके प्रोफेशनल जूतों और अच्छी खुराक के फंड से तो आपका सरकारी हुक्मरान अपने परिवार को विदेश यात्रा पर ले जाते हैं.

इतना प्रवचन इसलिए कि इन कॉमनवेल्थ खेलों की मेडलतालिका ने दिल दिमाग को आज ठंढक पहुंचा दी है. महिला पदक विजेताओं के नाम की लिस्ट पढ़ना शुरु कीजिए, आप बीच में ही गिनती भूल जाएंगे. ऊपर स्क्रोल करके दोबारा शुरु कीजिए, थोड़ी देर में आप थक जाएंगे, ऊब जाएंगे. फिर आप खुद से कहेंगे, अच्छा 66 मेडल हैं, 26 गोल्ड मिले हैं, सामान्य ज्ञान के लिए इतना ही काफी है.

मैं खुश हूं कि इस कॉमनवेल्थ खेलों ने लड़कियों के नामों की गिनतियां गिनने से निजात दिला दी है. मैं चाहती हूं इसी तरह हम लड़कियों की सफलता से जुड़ी तमाम गिनतियां भूल जाएं, फायटर पायलटों की, वैज्ञानिकों की, कंपनी प्रमुखों की, टैक्सी ड्राइवरों की....और आखिर में बस एक लिस्ट बचे जो इतनी छोटी, इतनी दुर्लभ हो कि उनके नाम प्रेत छाया की तरह समाज का पीछा ही ना छोड़ें, लड़कियों के ऊपर हो रहे शारीरिक अत्याचारों की.

Sunday, April 8, 2018

सफरकथा: संवेदनशून्यता का हासिल




साल 2001 का मार्च महीना था, आजतक के शुरुआती महीने थे. पहले बजट की कवरेज की मारामारी थोड़ी धीमी हुई थी कि नानी की गंभीर हालत की खबर मिली. हड़बड़ी में होली से एक शाम पहले स्लीपर में टिकट कटवा मैं निकल भागी. रात तक ट्रेन जिन भी स्टेशनों से गुजरी, बंद शीशे पर गोबर, मिट्टी, जाने क्या-क्या फेंका जाता रहा. सुबह होते ही बाहर अपेक्षाकृत शांति हुई और बोगी करीब-करीब खाली. मेरे हाथ में एक दोस्त से मांगी अंग्रेज़ी की एक किताब थी जिसे और फटने से बचाने के लिए अखबार का कवर चढ़ाया गया था. सामने बैठे अधेड़ सज्जन ने कनखियों से देखते रहने के बाद कई बार बात शुरु करने की पहल की. उनकी उत्सुकतता मेरी पढ़ाई और नौकरी से शुरु होकर, मेरे अकेले होने की वजह और मेरी किताब का कवर हटाकर झांकने तक पहुंच चली तो एक तरह से डपट देना पड़ा.

साइड वाली बर्थों पर दिल्ली से ही चढ़ा एक खोमचेवाले का परिवार था. मियां-बीवी और चारेक साल का एक बच्चा. वो पढ़े लिखों वाली बात से दूर अपने आप में मगन रहे. थोड़े समय बाद अंकल जी उन्हें हिकारत से देखते हुए उतर लिए. मुझे दोपहर बाद पहुंचना था. ट्रेन हस्बेमामूल लेट हो गई. खाना तो दूर पानी तक देने वाला कोई नहीं. धूप से बचने के लिए साथ वाला परिवार पीछे के कम्पार्टमेंट में चला गया. दूर से कुछ लड़कों के हंसने-गाने की आवाज़ आ रही थी. इसके अलावा पूरी ट्रेन में किसी की आहट नहीं. मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. डर से वॉशरूम तक जाने की हिम्मत नहीं हुई. घबराहट में मैंने आंखें बंद कर लीं. कई मिनट बाद किसी के स्पर्श से खोली, वो बच्चा खड़ा था, फुआ, मम्मी पूछी, आपकौ कुछो चाही. मुझे राहत और खुशी के मारे रो दोना चाहिए था, मैं बस इंकार में सिर हिला सकी. वो टुनमुनाता हुआ चला गया. दसेक मिनट बाद फिर आया, एक ठेकुआ और आधी बोतल पानी के साथ. मैंने चुपचाप ले लिया. झुटपुटा सा हुआ तो मां ने बच्चे को फिर फुआ का हालचाल लेने भेजा. उसके कुछ मिनटों बाद हम सबका स्टेशन आ गया था.

इतने साल बीतने और इस बीच जीवन की इतनी सारी ठेलम-ठेल निकल जाने के बीच उस छोटी सी घटना को याद रखने का कोई ख़ास प्रयोजन नहीं था. मैं नहीं ही याद कर पाती अगर कुछ हफ्ते पहले मां-पापा को ट्रेन में विदा नहीं किया होता तो. इस बार टिकट एसी टू में था, कन्फर्म. बस दोनों सीटें उपर की मिली थीं. मैंने चिंता ज़ाहिर की तो मां हंस पड़ीं, कौन सा वेटिंग का टिकट है जो परेशानी होगी, इस देश में बूढ़ों की इतनी फिक्र अभी भी है सभीको.

सामान पैक करते वक्त हमने उस सफर की यादें भी ताज़ा कर लीं जब मेरी नौकरी के शुरुआती दिनों में वो दिल्ली में मुझे छोड़ आरएसी टिकट पर वापस जा रही थी और उन्हें सीऑफ करते वक्त मैंने रोते-रोते साथ बैठे लड़के से उनका ख्याल रखने को कहा था. बाद में मां ने बताया था कि कैसे पूरी रात वो मां के पैरों के पास बैठा रहा था, उन्हें कोई तकलीफ नहीं होने दी. मुझे हर ओर से निश्चिंत कर मां-पापा चले गए.

कम्पार्टमेंट के तीनों लोअर बर्थ दो टीनएज बच्चों के साथ सफर कर रहे एक परिवार के थे. मां-पापा ने रात के खाने के बाद उस परिवार से सीट बदलने की चर्चा की. उन्होंने सीधा इंकार कर दिया. अगल-बगल के कम्पार्टमेंट में भी कोई नहीं मिला. पापा तो किसी तरह उपर चढ़ गए, मां के आर्थराइटिस ने बहुत कोशिश के बाद भी उन्हें उपर के बर्थ तक पहुंचने नहीं दिया. पापा लाचारी से नीचे देखते रहे, इतनी कोशिश से मां का दर्द बढ़ गया. सहयात्री परिवार इन सब बातों से इम्यून, तय समय पर बत्ती बुझाकर सो गया. मां आधी रात के बाद तक उनकी किशोरी बेटी के पैरों के पास बैठी रही. रात के दो बजे टीटी उन्हें दूसरी बोगी में एक सीट दिलवा पाने में कामयाब हुआ. अगली सुबह मां लगभग बीमार होकर अपने घर उतरीं.  

कोई विमर्श नहीं, कोई प्रवचन नहीं. बहुत सारी पढ़ाई और तरक्की के बाद हाथ में फोन, लैपटॉप, हाई स्पीड इंटरनेट और क्रेडिट कार्ड लेकर बैठी मैं, बेचैन सोच में पड़ी हूं. आधी ज़िंदगी गुज़र गई, ना मैं अपनी बेटी को निश्चिंत होकर सड़क पार की बिल्डिंग में भेज पाने के काबिल बन पाई हूं, ना अपने माता-पिता को सहूलियत से एक ठौर से दूसरे भेज पाने के.

Saturday, March 24, 2018

जुगनुओं की दिवाली...3



उसके रहते अलार्म लगाकर सोने की ज़रूरत नहीं होती, आंखें उसके कॉलबेल बजाने से तय समय पर ही खुलती हैं. अगर गांव नहीं गई हो तो साल भर में 12-15 से ज़्यादा छुट्टियों की उसको दरकार नहीं पड़ती. दरवाज़े पर पड़ी दूध की थैलियां उठाकर जब वह अंदर घुसती है, मैं चाय का पानी चढ़ा चुकी होती हूं. उसके बगल में खड़े होने पर अपने पांच फुट से थोड़ा उपर उठा कद भी बेहद लंबा जान पड़ता है. उसकी सभी बातें समझ पाने में अभी भी ढेर सारी मशक्कत करनी पड़ती है. हालांकि काम की तलाश में पहली बार दिल्ली आए उसे पन्द्रह साल हो चुके हैं, उसने हिंदी भाषा के उतने ही शब्द सीखने स्वीकार किए जितने से काम कर रहे घरों की गृहस्वामिनियों से कामचलाऊ वार्तालाप हो सके. गांव छोड़ना पड़ा क्योंकि शारीरिक तौर पर बहुधा अशक्त पति से मेहनत-मशक्कत वाला देहाती काम नहीं होता. यहां आकर पति को गाड़ियों की साफ-सफाई का काम मिला जिससे झुग्गी में रहने का किराया भी बमुश्किल निकलता.
तो दुधमुहीं बच्ची को सास के साथ गांव वापस भेज इसने घरों में काम करना शुरु किया.  उस बात को काफी साल बीत गए, छोटे हिचकोलों को छोड़ दें तो इनकी गृहस्थी कभी पटरी से नहीं उतरती. दो साल पहले झुग्गी से इनका प्रमोशन खोली में हो चुका है. पति सुबह चार बजे उठकर बंधी-बंधाई गाड़ियों की सफाई करने निकल पड़ता है. ये छह से कुछ पहले उठती है और साढ़े छह मेरे दरवाज़े पर दस्तक देती है. फिर लिफ्ट से ऊपर-नीचे करतीं चार घरों के काम निबटाती दो ढाई बजे वापस घर पहुंचती है. पति गाड़ियों की सफाई से नौ बजे तक लौटकर नाश्ता-पानी, साफ-सफाई कर इसके लिए खाना बनाकर इंतज़ार करता है. नहा धोकर, खाना खाकर, ये अपनी दूसरी शिफ्ट के लिए निकल पड़ती है. पति के पास अब काफी वक्त है, वो रात के खाने की तैयारी करता है, पड़ोस के बच्चों के साथ खेलता है, ज़रूरत पड़ी तो उन्हें संभालने का भार भी उठाता है, इनके अपने तीनों बच्चे क्योंकि दादी के साथ गांव में हैं, पढ़ते-लिखते ऊंची क्लास में पहुंच गए हैं. बड़ी लड़की इस साल कॉलेज में आ जाएगी, वो दादी के साथ घर संभालती है, छोटे भाई-बहन को भी. बैंक का अकाउंट उसी के नाम पर है, खर्चे पानी का हिसाब-किताब भी. उस घर की औरतें जीवट होने का वरदान साथ लाई हैं. पिछले बरस बड़ी बेटी को गले में अल्सर से कैंसर होने का शक हुआ. मां-बाप सारी शक्ति लगाकर चार महीने इलाज कराते रहे, शक गलत निकला, एक ऑपरेशन के बाद वो ठीक हो गई.
जो पइसा दिया महीना-महीना काट लेना, इसने गांव से लौटकर मुझसे कहा था.
रहने दो, वापस नहीं लेने थे.
अच्छा, उसने इतना भर कहा और चली गई. मुझे लगा अगर मैंने सारे पैसे उसी दम भी मांग लिए होते तो भी यह केवल अच्छा ही कहती.
आपका पास कंपूटर वाला पुराना फोन है, बेटी के भेजना है, पढ़ाई का लिए पिछले महीने उसने मुझसे पूछा.
ढूंढती हूं, मैंने कह तो दिया फिर चिंता में पड़ गई, पिछला फोन पांच साल तक घसीटा था, किसी काम का नहीं रहा अब, दे दिया तो ये ही गालियां देगी.
ऊपर वाली दीदी ने नया खरीद दिया, दो दिन बाद मुझे सूचना दे दी गई, पुराना फोन खराब होता, उहां गांव में कोन ठीक करता. महीना-महीना कटा लेगी
इस किस्म के सारे फैसले घर में इसके ही होते हैं.
इन्होंने हेनरी फेयोल रचित प्रबंधन के 14 सिद्धांत कभी नहीं पढ़े. इन्हें नहीं पता Division of Work according to one’s ability and interest क्या बला है. इनकी जिंदगी में इन गूढ़ सिद्धांतों की कोई जगह नहीं. एक गृहस्थी है, दो लोगों की ज़िम्मेदारी, जिसे दोनों अपने-अपने के भर का उठा रहे हैं, बस. एक रिश्ता है, दो लोगों के बीच का, जिसे दोनों अपने-अपने हिस्से का पूरा दे दे रहे हैं, बस.
मेरे किचन में धुले बर्तन जल्दी-जल्दी समेटे जा रहे और फोन कई बार जिंगल बेल की रिंग टोन बजाता है. मेरे बच्चे हंसते हुए कहते हैं, दीदी क्रिसमस तो कब का बीत गया, अब तो बदल दो इसे. वो कुछ नहीं समझ पाने वाली भंगिमा में वापस से हंसती है, बर्तनों को पोंछ-पोंछ कर जगह पर लगाने लगती है.
पौन आठ बजने को हैं, और दिनों से काफी देर. देरी जान पति बिल्डिंग के नीचे पहुंच गया होगा, साथ वापस ले जाने.
आज आटा फिर गीला गूंद दिया है उसने, बेलते वक्त हाथों में चिपक गए आटे को दिखाते हुए मैं उसे छेड़ती हूं,
देखो कितनी दिक्कत हो रही है बनाने में, वैसे तुम कैसे समझोगी, तुम्हें कौन सा बनाना पड़ता है, तुम्हारे घर तो आदमी बनाता है
ना-ना, वो प्रतिरोध में दोनों हाथ हिलाने लगती है,ऊटी नहीं बनाता वो, बस चाउल बनाता हैबोलते हुए उसे हंसी आ जाती है. मैं गीले हाथों से आटा छुड़ाते वक्त देख नहीं पाती कि शर्माने से उसकी हंसी अबीरी तो नहीं बन गई. फोन एक बार और बजा, उसने अपना झोला हाथों में उठा लिया है.