Sunday, July 16, 2017

प्रसव के बाद की पीड़ा (पोस्टपार्टम डिप्रेशन)



पीरिएड्स, स्त्रीत्व से जुड़ा इकलौता ऐसा चक्र नहीं है जिसके बारे में हो रही फुसफुसाहट भी उंगली के इशारे भर से वर्जित कर दी जाती है. एक निषेध और है जिसके बारे में फुसफुसाना तो दूर सोचना भी कुफ्र है.

औरतों के जीवन में वैसा समय भी आता है जब उन्हें पीरिएड्स के मासिक चक्र से छुट्टी मिल जाती है. वो वक्त जब वो शरीर और मन दोनों में परिवर्तन के सबसे बड़े चक्र से गुज़र रही होती हैं. लेकिन ये तो खुश होने की बात है, आखिरकार इतने सालों से चले आ रहे पीड़ा चक्रों से इसी परिणति की उम्मीद में ही तो गुज़रा जा रहा था. ये तो जश्न की बात है, गर्भ और उसके बाद प्रसव की पीड़ा में छुपाने जैसा वैसे भी कुछ नहीं होता.

मातृत्व की गरिमा में डूबती-उतरती वो नौ महीने रही सबके मान-मनुहार की केन्द्र. सौ-सौ बलाएं लेकर उसे बुरी नज़रों से दूर रखा गया. उसकी पसंद-नापसंद की फेहरिस्त सबको कंठस्थ, उसकी एक आवाज़ पर तीमारदारी को पूरा परिवार हाथ बांधे खड़ा. और फिर लेबर रूम में उसकी हर कराह पर बाहर कई बेचैन चहलकदमियां. उसके शरीर का दर्द खत्म होता है शिशु के रुदन के साथ और अगले ही पल वो पाती है खुद को प्राथमिकताओं की सूची से बाहर. अब वो सबकी मनुहार नहीं, अपेक्षाओं का केन्द्र है.

प्रसव खत्म होते ही पीड़ा खत्म नहीं हो जाती, अवसाद बनकर मांओं के मन के किसी कोने में घुसकर बैठ जाती है और उसके बाद और किसी को भी नज़र नहीं आती. धीरे-धीरे उसकी खुशियां खसोटती रहती है बस. मेडिकल साइंस इसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन यानि प्रसवोत्तर अवसाद कहता है. डिलीवरी के बाद माओं के हारमोन स्तर तेज़ी से बदलते हैं, शरीर की कमज़ोरी भी एक झटके में खत्म नहीं होती, दूसरी ओर उनसे उम्मीद की जाती है कि वो जल्द से जल्द नए बच्चे की सारी ज़िम्मेदारियों के साथ अपनी पुराने सारे काम भी करने लग जाए, अवसाद यहीं से शुरु होता है. पोस्ट पार्टम डिप्रेशनके अस्तित्व को अब तक हमारी सामाजिक संरचना सिरे से खारिज करती आई है, जबकि सच्चाई ये है कि हर छह में से एक नई मां इस अवसाद के चरम से होकर गुज़रती है.

उसके चारों ओर खुशियां मनाई जा रही हैं, उसके अंदर से निकला अंश एक गोद से दूसरे में किसी ट्रॉफी की तरह सेलीब्रेट किया जा रहा है और वो चीखकर हर किसी को अपनी नज़रों से दूर कर देना चाहती हैं. वो खुद को किसी एकांत अंधेरे में क़ैद कर लेना चाहती है, वो अपने बच्चे के अगले रोने की आवाज़ से कोसों-कोसों दूर भाग जाना चाहती है.  लेकिन उसके लिए ये कह पाना तो दूर सोचना भी कुफ्र है. मां बच्चे को गोद में लेकर खुश नहीं है? इससे ज़्यादा अविश्वसनीय, अनिवर्चनीय बात भी कुछ हो सकती है क्या? तमाम विशेषणों से नवाज़कर मातृत्व को इतना दिव्य और नैसर्गिक अनुभव बना दिया गया है कि मां के लिए ये बोल भर पाना कि बच्चे को जन्म देने के बाद उसे अवसाद हो रहा है, वर्जनाओं के छत्ते में पत्थर मारने जैसा है.  

दरअसल इस पूरे प्रकरण में एक नहीं दो वर्जनाएं हैं. एक, मां की अपने बच्चे के प्रति उदासीनता और दूसरी, इस पीड़ा का शारीरिक नहीं, मानसिक होना. इसलिए वो अपनी सारी पीड़ा पलंगपोश के पीछे छुपा मुस्कुराहट ओढ़ कर सभी बधाईयां बटोरेगी और अकेले में रोने के लिए तकिए का सहारा लेगी. ये ही वो कला है जिसमें बचपन से लेकर अब तक के अभ्यास ने उसे सिद्धहस्त कर दिया है.
लिज़, मेरी डिलीवरी के चौथे दिन मेरे कमरे में आई थी. तब तक मुझे काले बालों वाले इंडियन ट्विन्स को देखने के लिए दिन भर आते-जाते डॉक्टरों और नर्सों की टोलियों की आदत पड़ चुकी थी.
बच्चे नर्सरी में हैं, मैने उससे कहा था.
मै बच्चों से नहीं मां से मिलने आई हूं, उसने प्यार से मुझसे कहाबच्चा होने के बाद मां को सब भूल जाते हैं, सबका ध्यान बस बच्चे पर होता है और मां से बस अपेक्षाएं रह जातीं हैं. जबकि मां को अभी भी उतनी ही देखभाल और प्यार की ज़रूरत होती है. इसलिए मैं तुमसे मिलने आई हूं, तुम तो ठीक हो ना?” 

एकबारगी मुझे अपने अंदर के खालीपन का एहसास हुआ. मैं उसके गले से लगकर रो लेना चाहती थी. लेकिन उस समय बस एक अस्फुट सा, आयम फाइन, थैंक यू ही कह पाई.

क्या सबकुछ पहले जैसा नहीं हो सकता?” अवसाद के गहन क्षणों में मां ये भी सोच सकती है.
मैं ऐसा कैसे सोच सकती हूं? क्या मैं इतनी बुरी मां हूं?” अगले ही पल वो खुद को धिक्कारेगी भी.

पीछे मुड़कर देखना इंसान की फितरत होती है, एक दिन जब ये बच्चे बड़े होकर अपने पंख फैलाएंगे तो आप ही पुराने अल्बम के पन्नों पर हौले से हाथ फिराते हुए सोचेंगे क्या ये वापस से उंगलियां पकड़कर चलने वाले, हर ज़रूरत पर आपकी ओर मनुहार से देखने वाले नन्हे मुन्ने नहीं बन सकते, एक दफा अपनी गायनोकॉलिस्ट का इंतज़ार करते हुए पेरेंटिंग मैगज़ीन के पन्नों पर ऐसे ही किसी सवाल का ये जवाब पढ़ रखा था. जब मैं अवसाद के उन दिनों से गुज़र रही थी तो इन्हीं पंक्तियों को याद करके खुद को हौसला दिया करती.

पोस्ट-पार्टम डिप्रेशन कोई बीमारी नहीं, खालीपन और व्याकुलता का एक छोटा सा दौर है, जो ज़्यादाकर दो से तीन हफ्तों में खत्म हो जाता है. नई मां को उस समय बस थोड़े से सहारे, थोड़ी सी समझ की ज़रूरत होती है. अक्सर उसे वो भी नहीं मिल पाता.  
कोई उसे गले से लगाकर नहीं कहता, सुनो तुम अकेली नहीं हो, हमने भी गुज़रे उस दौर से.
पगली, किसने कहा तुम अच्छी मां नहीं, थोड़ा समय दो खुद को.
हम सब जो यहां तुम्हें घेरकर खुशियां मना रहे हैं, शोर-शराबा कर रहे हैं, सिर्फ तुम्हारे बच्चे के लिए नहीं आए हैं यहां, हम तुम्हारे होने को भी सेलीब्रेट कर रहे हैं.


बस इतना सा कह पाना काफी होता है उसके लिए, बच्चे के बाद भी उसके मैं का थोड़ा सा अहसास बचा रहे उसके लिए. लेकिन अपनी कंडीशनिंग और वर्जनाओं से घिरा परिवार इतने से भी चूक जाता है अक्सर. 

Saturday, June 24, 2017

नाम में क्या-(क्या) रखा है?



जुमला उछालकर शेक्सपीयर साहब तो चार सौ साल पहले निकल लिए लेकिन द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास अभी तक ये तय नहीं कर पाया है कि अपने नाम के साथ उसका रिश्ता कैसा है, कि उसके नाम में सबकुछ रखा है या फिर कुछ भी नहीं.
सरलतम शब्दों में नाम, वो उच्चारण है जिससे ये पता चल सके कि बहुत सारे लोगों के बीच आपको संबोधित किया जा रहा है. लेकिन दुनिया की तमाम आसान चीज़ों के साथ हमने नाम को भी जितना हो सके कॉम्प्लीकेट कर लिया है. एक तो ये कि हमारे परिवारों में नाम का चुना जाना राष्ट्रपति चुनाव के गणित से भी ज़्यादा दुरूह है.  जन्म के समय ग्रह-नक्षत्रों के मूड से लेकर मां-बाप की इच्छा, रिश्तेदारों का विशेषाधिकार, दोस्तों के सुझाव, किताबों से कन्सल्टेशन कर लंबी फेहरिस्त शॉर्टलिस्ट होती है. फिर उस लिस्ट को और टाइट कर सुझाव देने वालों को मल्टीपल च्वाइस में एक को वोट करने को कहा जाएगा. तब जाकर पंडित जी मोटी दक्षिणा के साथ नाम कान में फूंकेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में किसी ना किसी रिश्तेदार का नाराज़ हो जाना भी तय है. उसके बाद भी लोगों का अपनी मर्ज़ी से बाबू, गुड्डू, मुन्ना, गुड़िया, चुन्नी, मुन्नी जैसे अस्थाई पुकारु नाम इस्तेमाल करना जारी रहेगा.

Wednesday, May 31, 2017

क्योंकि हमारी शर्म मिस्प्लेस्ड है..



कुछ महीने पहले वो तीसरी बेटी का बाप बना है. पांच साल में तीसरी जगची, लिहाज़ा पत्नी को खून, पानी सब चढ़ाना पड़ा. कई रोज़ अस्पताल में रही. लेकिन तीसरे महीने से मंदिर और बाबाओं को दर्शन फिर से शुरु दिए गए हैं. अगली बार बेटा ही हो इसके लिए ज़रूरी है कि किसी भी वजह से मन्नतों और प्रसादों में कोई कमी ना रह जाए. सो ऐसे बाबाओं को ढूंढा जाना जारी है जिनका आर्शीवाद कभी खाली नहीं जाता.
इस बारे में हमारी कई बार बात होती है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे तमाम जुमले उसके ऊपर से तेल पर पानी की तरह फिसल जाते हैं.

Saturday, May 27, 2017

ईव टीज़िंग में प्यार नहीं होता मीलॉर्ड



उसका नाम मुझे कभी पता नहीं चला, मेरे मुहल्ले में वो कहां रहता था ये भी नहीं जानती. आबनूसी रंग के बीच  उसकी लाल आंखें डरावनी लगती थीं. सुबह से शाम तक वो कई बार हमारे घर के सामने से होकर आया-जाया करता और पूरे वक्त हमारे घर की ओर मुंह किए लगातार घूरा करता. बरामदे या लॉन में अगर कोई मर्द बैठा नहीं दिखता तो वहीं रुक कर कुछ इशारेबाज़ी भी करता. नहीं पता कि कानून की परिभाषा में इसे ईव टीज़िंग कहते हैं या नहीं, लेकिन उसकी आंखो के भय ने अक्सर घर से बाहर निकलते मेरे कदम रोके हैं. कई बार गेट से बाहर निकलते ही उसे देख लेने पर उल्टे पैर घर के अंदर भी भागकर आई हूं. आज इतने सालों के बाद पहली बार इस बात की चर्चा करने पर अपना वो डर कितना अर्थहीन लग रहा है, लेकिन उस उम्र में इस तरह की कई छोटी-छोटी घटनाओं ने मेरे जैसी बहुत सी जीवट लड़कियों का आत्मविश्वास तोड़ा है, आज भी तोड़ती जा रही हैं.

Sunday, May 14, 2017

इस मदर्स डे...


मॉल, बाजार, दुकानें फिर से सज गई हैं. हर सुबह दरवाज़े पर पड़े अखबारों को उठाते ही अंदर से कई रंग-बिरंगे फ्लायर्स निकलकर, ऊंची आवाज़ में हमें याद दिला रहे हैं कि मदर्स डे आने वाला है और अगर मां से प्यार जताने का ये मौका हम चूके तो मातृभक्ति साबित करने की अगली बारी बावन हफ्तों बाद ही आएगी, और वक्त का क्या भरोसा. तो मां के नाम की सेल में कपड़ों, गहनों, मोबाइल फोन्स से लेकर किचन के बर्तनों तक, सब पर छूट जारी है. अपनी श्रद्धा और हैसियत के हिसाब से उठा लो, ना हो तो मां को कैंडल लाइट डिनर के लिए ही ले जाओ.

Wednesday, May 3, 2017

बस इतना सा..



रेस्टोरेंट मंहगा था, लेकिन गंवई अंदाज़ का. शायद थीम ही वही रही हो उसकी. लकड़ी की भारी भरकम चौखट पर भारी नक्काशी का काम था. सिर झुकाकर अंदर घुसने की कोशिश में उंगलियां कुछ क्षणों के लिए एक-दूसरे से उलझ गईं तो दोनों चौखट के आर-पार एक-एक पैर किए ठिठक कर खड़े हो गए. जगह ढूंढने के बहाने दूसरी ओर देखते हुए भी अमोल जान गया था कि सुमी की उंगलियां इस वक्त सख्ती से अंदर की ओर मुड़ी होंगी और उसकी पलकें झपकना भूल गई होंगी.

Saturday, April 29, 2017

सशर्त इज्ज़त के विरोध में....



हम उम्र के उस दौर से गुज़र रहे थे जिसे टीनएज कहा जाता है. किसी भी बात पर टोका-टाकी तीर की तरह लगती, और मां थी कि चलने, उठने, खाने, रहने, पढ़ने हर चीज़ का एक रूल बुक लेकर हमारे पीछे पड़ी रहती. आए दिन किसी ना किसी बात पर डांट पड़ती और हम कई-कई रोज़ मुंह सुजाए घूमते रहते. इसी बीच मां को अनदेखा कर पापा के आगे-पीछे करने की आदत पड़ी. जब भी मां से डांट पड़ती हम उनसे मुंह फुला लेते और खूब तत्परता से पापा को खुश करने में लग जाते.


Sunday, April 23, 2017

चालीस की उम्र


इस शीर्षक का एक लेख ग्रेजुएशन में कम्पल्सरी हिंदी के सिलेबस में था. अठ्ठारह बीस की उम्र में जब चालीस का मतलब बुढ़ापा होता है, वो लेख हमें पढ़ाने का क्या मतलब था, समझ में नहीं आया. पढ़ाते वक्त हमारी प्रोफेसर भी बार-बार याद दिलाती रही कि क्योंकि पूरे कमरे में चालीस के पार केवल वही हैं इसलिए उस लेख का गूढ़ मतलब भी केवल वही जान सकतीं हैं. सुनकर ये विश्वास और पुख्ता हो गया कि ये वानप्रस्थ की बाते हैं, हमारे लिए बेज़रूरत.

Saturday, April 15, 2017

फुलटाइम फेमिनिज्म के पहले..


अब बस, बहुत हो गया, अब मैं फेमिनिस्ट हो जाना चाहती हूं, फुलटाइम. नारीवाद से पुरूषत्व की बू आती है, फेमिनिज़्म खांटी जनाना शब्द लगता है. एकदम कूल और वोग, बिल्कुल मेरे शब्दों के चयन की तरह.
हर सुबह जब मैं आटे और मसाले सने हाथों को जल्दी-जल्दी साफ कर, एक हाथ में कंघी और दूसरे में ब्रेकफास्ट का डब्बा लिए भागती हुई गाड़ी में बैठकर ऑफिस के लिए निकलती हूं तो मेरा मन विद्रोह कर उठता है. क्या फायदा कमाकर खाने वाले स्वाभिमान से, इससे तो फेमिनिस्ट ही हो जाते.

Monday, February 27, 2017

फेमिनिज़्म बनाम...टु हेल विद इट



कुमारी ने छोटे शहर के बड़े से घर में आखें खोलीं थीं. परवरिश, संयुक्त परिवार में पाई, जहां लड़के और लड़कियों को पालने में कोई अंतर नहीं किया जाता, खाना-कपड़ा, पढ़ाई-लिखाई का वातावरण दोनों को एक समान मिलता. बाकी लड़के को महंगी पढ़ाई के बाद हर हाल में नौकरी करनी होती थी और लड़कियों को सपनों का राजकुमार होम डिलीवर करने के वादे किए जाते. कुमारी को सपने देखना बेहद पसंद था, चूंकि इतना सारा वक्त सपने देखने में चला जाया करता कि कुछ और करने का समय ही नहीं बचता. कुमारी को पूरा भरोसा था कि जिसने सपने दिए हैं वही उन्हें पूरा करने के रास्ते भी बताएगा. कुमारी की आंखें बड़ी-बड़ी और बातें बड़ी मीठी हुआ करती थीं. बातें करना उसे बेहद पसंद भी था, नख से शिख तक प्रसाधन युक्त होकर, बड़ी अदा से कंधे उचकाकर, आंखें गोल-गोल घुमाकर, वो घंटों अपनी बात सही साबित करने में लगी रह सकती थी.