Saturday, September 9, 2017

अपने दिल के दरवाज़े की खुद ही मालिक हैं गीताश्री की नायिकाएं


अमृता प्रीतम ने अपनी नायिका के दिल के दो दरवाज़े बनाए. सामने का दरवाज़ा उसकी मर्ज़ी से नहीं खुलता और पिछले दरवाज़े का खुलना वो किसी को दिखा नहीं सकती. ना ही पिछले दरवाज़े से आने वाले के लिए सामने का दरवाज़ा खोला जा सकता. पिछला दरवाज़ा खोलने के लिए भी हौलसा चाहिए होता, क्योंकि उस दरवाज़े से जो दिल एक बार चला जाता वो लौटकर कभी छाती में वापस नहीं आता. शायद इसलिए गीताश्री ने अपनी नायिकाओं के दिल में बस एक दरवाज़ा बनाया, उसकी सारी आकांक्षाएं, सारी चाहनाएं सब इस चौखट से नज़र आने दीं. अपनी हसरतों को शब्दों में ढाल कर वो अपने दिल के दरवाज़े को अपनी मनमर्ज़ी से खोलने और बंद करने का हौसला रखती है. गीताश्री की नायिकाओं का दिल हौले से धड़कता नहीं, बड़े हौल से हुलसता है, क्योंकि अपने शरीर और मन की चाहनाओं पर उसने शर्मिंदा होना नहीं सीखा. फिर वो कटोरी भर मलाई खाने की सुरीलिया (मलाई) की हसरत हो या प्रेम में भी अपना स्व बचाकर रखने की सुषमा (सी यू) की ज़िद, पाठक अपने आपको नायिकाओं के इंतिख़ाब के सामने झुकता हुआ पाता है और पन्ने पलटते-पलटते उन्हें अपनी सहमति दे बैठता है.

Tuesday, September 5, 2017

जानने और सिखा पाने के बीच का फर्क



If you can’t explain it simply, you don’t understand well enough 

साठ के दशक में ही इंटरनेट के आने की भविष्यवाणी कर ग्लोबल विलेज की बात करने वाले मशहूर दार्शनिक और संचारविद् मार्शल मैकलुहान यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में प्रोफेसर भी थे. मैंने अपने गुरु से उनके बारे में एक दिलचस्प कहानी सुनी थी. एक बार मैकलुहान को अपनी पार्किंग में उनकी एक छात्रा की गाड़ी खड़ी दिखी. उन्हें बड़ा गुस्सा आया, उन्होंने उसकी कार की विंडशील्ड पर एक पर्ची लिखकर टांग दी, ये आखिरी बार होना चाहिए जब मुझे तुम्हारी गाड़ी, अपनी पार्किंग में नजर आई है.
अगले दिन छात्रा का जवाब उनकी गाड़ी की विंडशील्ड पर था, ये पहली बार है जब आपकी कही कोई बात मेरी समझ में आई है.

Saturday, September 2, 2017

मौत तू एक....


छोटी सी थी, पांच-छह साल की. दादी के साथ सटी रहती. वो बहुत कम बोलतीं लेकिन प्यार करते करते एक सवाल बार-बार पूछतीं, "जियोगी, मरोगी या हुकुर-हुकुर करोगी." मैं सोच में पड़ जाती. मरने का सवाल तो खैर था ही नहीं, लेकिन जीने का मतलब रोज़-रोज़ स्कूल जाना, वापस आकर होमवर्क करना. बहुत सोच-विचारकर भी मैं हर बार लगभग एक ही जवाब देती, हुकुर-हुकुर करब. वो हंस पड़तीं, धुर बतहिया कहकर प्यार करने लग पड़तीं. उस उम्र तक ये नहीं पता था कि हर सुबह उठकर जीने का फैसला हमें खुद ही लेना पड़ता है वरना जब तक जिंदगी के हक में होता है वो हमें हुकुर-हुकुर करते रहने का ही विकल्प देती है.

मौत कोई नहीं चुनता इसलिए चुनने के अधिकार मौत ने अपने पास रख लिए हैं. मरण सागर के पार किसी को नज़र नहीं आता इसलिए हर कोई उस दृश्य को अपने हिसाब से गढ़ लेता है.

Saturday, August 26, 2017

तलाक विमर्श के बाद....




कुछ साल पहले एक पढ़ी लिखी लड़की की कहानी सुनी थी. प्यार और आत्मविश्वास से पली, मां-बाप ने धूम-धड़ाके से शादी की. कुछ ही महीनों में पति ने बिना किसी वजह के छोड़ दिया. मान-मनौवल, बीच-बचाव की सारी कोशिशें नाकाम हुईं. पड़ोस और समाज की सारी संवेदनाएं भी बिचारी लड़की के साथ थीं जो अब मायके में रहकर अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश कर रही थी. कुछ सालों के इंतज़ार के बाद लड़की का धैर्य जवाब दे गया, माता-पिता की सहमति से उसने अदालत में तलाक की अर्ज़ी दे दी. पत्नी की ओर से भेजा गया कानूनी नोटिस लड़के वालों के नाग के फन से फुंफकारते अहम पर ठेस था. उन्होंने उसका जवाब देना अपनी शान के खिलाफ समझा. साल भर बात लड़की को इसी बिना पर तलाक मिल गया. परिवार ने खुशी-खुशी उसकी पसंद के लड़के से उसका घर दोबारा बसाने की तैयारियां शुरु कर दी.
क्या इसे सुखांत समझा जाए?
असल में पूरी तरह नहीं.

Sunday, August 13, 2017

सजना है मुझे.....



यकीन मानिए इस पंक्ति का अगला हिस्सा यमक अंलकार का अप्रतिम और सबसे लोकप्रिय उदाहरण होने से ज़्यादा और कुछ नहीं. यूं इसे पूरा सच मानकर आत्ममुग्धता के शिखर पर बैठी पुरुषों की कई पीढ़ियां अपनी उम्र की सीढ़ियां चढ़ चढ़कर उतरती गईं. और मानते कैसे नहीं, इंकार करने से उनके लार्जर देन लाइफ ईगो को ठेस नहीं लगती भला? तो ज़माने भर के नगमों और कैफियतों से आपके अहम के गुब्बारा इस कथ्य ने फुला दिया कि भई औरतों के कपड़े, साज-श्रृंगार सब अपने उनको रिझाने के लिए. और इसे दुनिया का पहला और आख़िरी ब्रह्म सत्य मानकर आप चले जा रहे हैं कभी गहनों की शॉपिंग पर, कभी फ्यूशा पिंक ड्रेस की मैचिंग लिपस्टिक की ख़रीदारी पर तो कभी सी ग्रीन साड़ी का फॉल ढूंढने. और कर भी क्या सकते हैं आप, वक्त रहते किसी ने आपको सचेत जो नहीं किया.

Saturday, August 5, 2017

हैप्पी फ्रेंडशिप डे, गर्लफ्रेंड्स



नए फैशन के तमाम दिनों की तरह फ्रेंडशिप डे भी बाज़ार का गढ़ा हुआ, गिफ्ट ख़रीदने की बाध्यतता लेकर आया हुआ त्यौहार है. अमेरिकी और यूरोपीय देशों में गर्मी की छुट्टी के दौरान, एक दिन दोस्ती के नाम किया गया. यूं दिन, त्यौहार कोई सा भी हो, हिन्दुस्तान की दुकानें ज़रूर सज जाती हैं. सोचा जाए तो इसमें ग़लत ही क्या है. दोस्ती निभाने में यूं भी हमारा कोई सानी नहीं. कृष्ण-सुदामा की हो या दुर्योधन और कर्ण की, शेर या चूहे की हो या फिर हिरण और कौवे की, पौराणिक कथाएं हों या जातक, दोस्ती की अनूठी मिसाल हर रूप में मिल ही जाती है. हमारे दिल दिमाग को हर कदम पर संचालित करने वाले बॉलीवुड को भी जब-जब प्रेम और बदले से छुट्टी मिली, दोस्ती की आंच पर कुछ ना चढ़ा देता रहा. लेकिन ध्यान रहे, दोस्ती के ये तमाम नायाब किस्से बस एक अधाई को समर्पित हैं. बाकी की आधी आबादी को दोस्ती के लहलहाते महासागर की तलछट भी नसीब नहीं.


Sunday, July 30, 2017

बोलना ज़रूरी है


हमारे स्कूल में क्लासमेट्स को भी भैया और दीदी कहकर पुकारने का रिवाज़ था. पीछे की सोच शायद ये कि संबोधन की यह बाध्यता बोर्डिंग स्कूल के कैंपस में ऐसी-वैसी घटनाएं होने से रोक ले. पूरे कानून को लागू करने का गुरुभार प्राथमिकता से संभालने वाले गुरुजी किसी भी बात पर खुश होकर बड़ी ज़ोर की शाबासी दिया करते. पीठ थपथपाते-थपथपाते सहलाकर ये जांच भी कर लिया करते कि किस लड़की ने ब्रा पहनना शुरु कर दिया है. कभी मौका देखकर स्ट्रैप हल्के से खींचकर छोड़ भी दिया करते.

ऐसा करते उन्हें कई बार स्कूल की महिला टीचर ने देखा. गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन होने के नाते उन्होंने बड़ी हो चुकी लड़कियों के अपने पास बुलाया और इससे बचने के तरीके बताए. जैसे बात करते वक्त गुरुजी के बगल के बजाए सामने खड़ा रहा जाए या उनके पास अकेले नहीं ग्रुप में जाया जाए. 

ध्यान रहे, उन्होंने बचाव के तरीके बताए, प्रतिकार के नहीं.

Saturday, July 29, 2017

बेटी की कमाई




पता नहीं कौन-कौन से धर्म ग्रंथ में लिखा है, कौन से धर्म गुरु कह गए, लेकिन सामाजिक मान्यताओं की सूची में जिन बातों का ज़िक्र भी कुफ्र माना जाता है, बेटी की कमाई उनमें से एक है. पीढ़ियों की कंडीशनिंग ने बेटियों के मां-बाप के लिए अपराधबोध की जो फेहरिस्त बनाई है, उन्हें जिन बातों पर शर्मिंदा होना सिखाया है, बेटी का कमाया धन उसमें काफी ऊपर दर्ज है.
किसी होनहार लड़की के स्वाभिमानी माता-पिता को सरेआम अपदस्थ करना हो तो उनसे उनकी बेटी की कमाई के इस्तेमाल के बारे में पूछ लीजिए. इस देश में लोग अपनी दो नंबर की कमाई का प्रदर्शन भले ही छाती ठोंक कर कर लें, लेकिन बेटी से मिले एक छोटे से तोहफे का ज़िक्र उन्हें तमाम तरह की कैफियतें ढूंढने पर मजबूर कर देता है.
बेटे की कमाई को मेडल बनाकर दुनिया भर में उसका प्रदर्शन करने वालों ने बेटियों की कमाई को पाप का ऐसा जामा पहना दिया है कि बेचारे बेटियों के मां-बाप सिर उठाकर उसके बारे में कुछ बोलने की कभी हिम्मत ही नहीं कर पाते.
हमारे बेटे ने कार ख़रीदकर दिया है, कस्बे की कीचड़ भरी सड़कों पर दनदना कर चलाएंगे, लोगों को पता तो चले कि हमारा इन्वेस्टमेंट अब कैसे रिटर्न्स देने लगा है.
अब तो बेटा कमा रहा है हमारा जी, हम तो काम छोड़ने के मूड में हैं, पजामे को घुटनों तक चढ़ाकर आराम से पीठ खुजाएंगे और दूसरों की बेटियों में नुख्स निकालेंगे.

Sunday, July 16, 2017

प्रसव के बाद की पीड़ा (पोस्टपार्टम डिप्रेशन)



पीरिएड्स, स्त्रीत्व से जुड़ा इकलौता ऐसा चक्र नहीं है जिसके बारे में हो रही फुसफुसाहट भी उंगली के इशारे भर से वर्जित कर दी जाती है. एक निषेध और है जिसके बारे में फुसफुसाना तो दूर सोचना भी कुफ्र है.

औरतों के जीवन में वैसा समय भी आता है जब उन्हें पीरिएड्स के मासिक चक्र से छुट्टी मिल जाती है. वो वक्त जब वो शरीर और मन दोनों में परिवर्तन के सबसे बड़े चक्र से गुज़र रही होती हैं. लेकिन ये तो खुश होने की बात है, आखिरकार इतने सालों से चले आ रहे पीड़ा चक्रों से इसी परिणति की उम्मीद में ही तो गुज़रा जा रहा था. ये तो जश्न की बात है, गर्भ और उसके बाद प्रसव की पीड़ा में छुपाने जैसा वैसे भी कुछ नहीं होता.

Saturday, June 24, 2017

नाम में क्या-(क्या) रखा है?



जुमला उछालकर शेक्सपीयर साहब तो चार सौ साल पहले निकल लिए लेकिन द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास अभी तक ये तय नहीं कर पाया है कि अपने नाम के साथ उसका रिश्ता कैसा है, कि उसके नाम में सबकुछ रखा है या फिर कुछ भी नहीं.
सरलतम शब्दों में नाम, वो उच्चारण है जिससे ये पता चल सके कि बहुत सारे लोगों के बीच आपको संबोधित किया जा रहा है. लेकिन दुनिया की तमाम आसान चीज़ों के साथ हमने नाम को भी जितना हो सके कॉम्प्लीकेट कर लिया है. एक तो ये कि हमारे परिवारों में नाम का चुना जाना राष्ट्रपति चुनाव के गणित से भी ज़्यादा दुरूह है.  जन्म के समय ग्रह-नक्षत्रों के मूड से लेकर मां-बाप की इच्छा, रिश्तेदारों का विशेषाधिकार, दोस्तों के सुझाव, किताबों से कन्सल्टेशन कर लंबी फेहरिस्त शॉर्टलिस्ट होती है. फिर उस लिस्ट को और टाइट कर सुझाव देने वालों को मल्टीपल च्वाइस में एक को वोट करने को कहा जाएगा. तब जाकर पंडित जी मोटी दक्षिणा के साथ नाम कान में फूंकेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में किसी ना किसी रिश्तेदार का नाराज़ हो जाना भी तय है. उसके बाद भी लोगों का अपनी मर्ज़ी से बाबू, गुड्डू, मुन्ना, गुड़िया, चुन्नी, मुन्नी जैसे अस्थाई पुकारु नाम इस्तेमाल करना जारी रहेगा.