Saturday, November 11, 2017

बड़ा होना भी कोई होना है



जब तक ये ख़बर लगती है कि बड़ा होना चाहत नहीं मजबूरी है, बहुत सारा वक्त पोरों से रिस चुका होता है. ज़िंदगी चाहे कितने ही पन्ने पलट ले, पहले पन्ने की सतरें कोई नहीं भूलता. अच्छी तरह याद है पहली बार बड़े होने की चाहना हुई थी ताकि मिलने जाने पर कॉलोनी की आंटियां  स्टील की बड़ी प्लेट में बाकी बच्चों के साथ पकड़ाने के बजाए नाश्ता अलग से सजा कर दें, जैसे मम्मी को मिलता है, बोन चाइना की प्लेट में. बड़ा होने की जल्दी यूं भी मचती कि उन दीदियों की तरह लंबे बाल पीछे झटक अदा से दुपट्टे को गिरा फिर लहराकर उठा सकें या कभी निचले होंठ काटकर तो कभी छोटी से जीभ निकालकर कई तरह के अंदाज़ में बातें की जा सकें. ये दौड़-दौड़कर पकड़म-पकड़ाई खेलने का बचकानापन तो छूटे पहले.

लेकिन हाथ में पकड़ी पेसिंल के पेन में बदलने का दर्प जबतक अपनी जड़ें जमाता है, कद मां के कंधे को पार कर जब तक उनके कान को छूकर निकलने लग पड़ता है, दुपट्टे की अनिवार्यता उसके बोझ लगने की शुरुआत करा चुकी होती है. बड़े होने की जल्दी फिर भी उतनी ही तीव्र होती है. इस बार यूं कि घर के फैसलों में हमारी भी रायशुमारी हो, मां और मौसियों की फुसफुसाती कहानियां दरवाज़े की दरार से सुनने के बजाय सामने बैठ कर सुनी जा सकें. फिर एक समय वो सारी कहानियां आपके साथ भी बांटी जाने लगती हैं. वक्त भी ना, कम चालें नहीं चलता, एकदम से छलांग लगाकर वहां पहुंच जाता है जहां इन कहानियों से रिसते दर्द का बोझ उठाए नहीं उठता. अपनी टेढ़ी चाल से वक्त जब तक बताता है कि फैसला सुना देना दुनिया का सबसे आसान काम नहीं होता, फैसले लेने के बाद उनको उठाने की ज़िम्मेदारी से कंधे भी झुक जाया करते हैं.

आपके कॉलेज में पता कैसे चलता है कि टीचर कौन और स्टूडेंट कौन?”  छुटपन में अपनी मौसी को पूछा था. मौसी की तबतक शादी हो चुकी थी और वो साड़ी और सिंदूर में कॉलेज जाया करतीं.
अंतर होता है ना बेटा, प्रोफेसर हमसे बड़ी होती हैं, उन्होंने समझा दिया. 
एक बार बड़े होने के बाद और कितना बड़ा हुआ जा सकता है, मैं सोच में पड़ गई. 

एक वक्त वो भी होता है जब पचास और साठ के बीच का फासला नज़र नहीं आता. फिर नज़र की उस मासूमियत को वक्त की नज़र लग जाती है. बारीकियों को देख पाने की उम्र नज़र के कमज़ोर होते जाने की शुरुआत की उम्र भी होती है. अनुभव अपने साथ अधजगी रातों की बेचैन करवटें भी लेकर आता है. 

अब जैसे हर रोज़ ठहरकर वक्त अपने बीतने का एहसास कराता है. किसी सुबह अचानक चाय की प्यालियों के पार जाती नज़र मुंह पहले से ज़्यादा पोपला पाती है. महीने भर बाद हुई मुलाकात में नज़र जाती है हड्डियों को छोड़कर लटक आए मांस पर. टोको तो हंसते हुए जवाब मिलता है, तो अब क्या बचा करने को, खाली बैठकर बाकी बची सांसे हीं तो गिननी है.जिनके होने आश्वस्ति पर, जिनके चेहरे की चमक को देखते अब तक की रेस में भागते चले वो अचानक यूं उदासीन हो रहे जैसे स्टेशन आने के पहले अपना सामान समेटने की हड़बड़ी में सहयात्रियों को नज़रअंदाज़ करता मुसाफिर.

बस अब इससे ज़्यादा बड़ा नहीं होना, बड़े होने के नाम पर सांस उखड़ रही है अब.

वक्त तो भी बेरहम है, दो पल रुक कर उन रास्तों को देखने भी नहीं दे रहा जो पीछे छूट गईं, आगे उतना ही लंबा रास्ता पड़ा है, लेकिन ये हिस्सा बंजर, वीरान, पथरीला. सारी हरियाली जैसे पीछे छोड़ आए हम. उम्र बढ़ने के साथ याद्दाश्त जैसे सागर तट की रेत पर लिखी इबारत हो जाती है, ज़िम्मेदारियों का एक रेला आया और मिटा ले गया सब.

कभी बिल्डिंग की बहुत सारी औरतों के साथ एक गेम खेला था, कोई हाथ भर लंबी डोरी में गांठ बांधनी थी, एक मिनट में जितनी बंध सके उतनी. मिनट भर के बाद जिसकी उंगलियां सबसे जल्दी चलीं उनसे सबको को गर्वोन्मुख होकर देखा, बाकियों की आवेश से कांपती उंगलियां शर्म से सिमट आईं. लेकिन ठहर जाओ, ये तो गेम का पहला हिस्सा ही रहा, आखिरी हिस्से में उतनी ही तेज़ी से गांठे वापस से खोल सीधी डोरी वापस पकड़ानी थी. जिंदगी का कोई भरोसा नहीं. कभी-कभी अपना सबकुछ सबसे पीछे चलने वाले के नाम भी कर देती है.

गांठें किसी के साथ नहीं जातीं, सबको अपनी गांठें यहीं खोल कर जाना है.



Sunday, November 5, 2017

कुछ रंग सीरियलों के....


देश में हिंदी टीवी सीरियलों के कंटेंट की जैसी हालत है और उनको लेकर चेतना सम्पन्न आबादी के जैसे विचार हैं, ये कहना कि आप किसी भी तरह से इन सीरियलों से संबंध रखते हैं आपके बुद्धिजीवी होने पर सवाल खड़ा कर सकते हैं. इस ख़तरे को अच्छी तरह समझते हुई भी ब्लॉग में आज पहली बार किसी टीवी सीरियल के बारे में लिखने का रिस्क ले रही हूं.  

कार्यक्रम है टीआरपी के मामले में थोड़े गरीब चैलन सोनी पर पिछले हफ्ते ख़त्म हुआ सीरियल कुछ रंग प्यार के ऐसे भी.” मुझे इसके चर्चित जोड़े शाहिर खान यानि देव और एरिका फर्नांडिस यानि सोनाक्षी की युवाओं में लोकप्रियता पर कुछ नहीं कहना, बात करनी है उसकी कहानी पर. मध्यवर्गीय परिवार की एक स्वाभिमानी न्यूट्रीश्निस्ट गरीबी और खुद्दारी में बड़े हुए बिज़नेस टायकून की मां की निजी डॉक्टर बनकर घर आई और उसके प्यार में पड़ गई. चूंकि सीरियलों वाली शादी थी तो बिना साज़िश, बहकावे और ग़लतफहमी के हो भी कैसे सकती थी सो उन अड़चनों में कुछ हफ्तों के एपिसोड गंवाने के बाद वह भी हो गई. जहां तक याद है शुरुआती कुछ हफ्तों तक देखने के बाद इसी दौरान ऊब कर मैंने इस सीरियल से नाता तोड़ लिया था. उसके बाद बीच-बीच में इंटरनेट पर कहानी के अपडेट पढ़ने का सिलसिला जारी रहा फिर जैसे ही पता चला कि अपने हीरो-हिरोइन के बीच गलतफहमी के चलते डिवोर्स हुआ और कहानी कुछ साल आगे खिसककर वहां पहुंची जहां मुख्य किरदार उर्फ सोनाक्षी एक सफल बिज़नेस वुमन और एक बच्ची की मां है जिसके पिता यानि हीरो देव इस बात से अनजान हैं, अपनी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फिर गया. उसके कुछ महीने बाद सोनी टीवी ने कौन बनेगा करोड़पति के लिए जगह बनाने के लिए हड़बड़ी में कहानी में सब कुछ ठीक कर उसे खत्म कर दिया गया.

लेकिन महीने भर बाद ही जनता की मांग पर कहानी नए समय पर दूसरे सीज़न के साथ वापस आई. इस बार सोनाक्षी दो बच्चों के साथ करियर और परिवार के बीच तालमेल बिठाती हुई मां है जिसे पति के सहयोग के बावजूद सबकुछ बिखरा सा लगता है. और यहीं आता है एक ऐसा मोड़ जो हिंदी सीरियलों के कथानक के अब तक के रिकॉर्ड से आशातीत है. करियर के लिए बीवी का समर्पण देख पति ने घर पर रहकर बच्चे संभालने की ज़िम्मेदारी ले ली है और एक छोटी सी दुर्घटना की बदौलत रोडियो जॉकी बन गया है. देव के रोडियो कार्यक्रम का नाम है सुपर डैड जो करियर और परिवार के बीच तालमेल बिठा रहे पिताओं और पतियों के बीच बेहद लोकप्रिय है. महज़ आठ हफ्ते चले दूसरे सीज़न में कहानी ने ब्लू व्हेल के ख़तरे जैसे मुद्दे को भी उठाया.

दिनों दिन पिछड़ेपन की ओर बढ़ते टीवी सीरियलों की कहानी के बीच इस तरह की बात रख पाना बेहद सकारात्मक है. इससे ज़्यादा उत्साहित करने वाली बात ये कि भले ही रेटिंग की दौड़ में ये सीरियल ससुराल सिमर का और ये रिश्ता.. जैसे थके कार्यक्रमों के आगे टिक नहीं पाई लेकिन यू ट्यूब पर इसके लगभग हर एपिसोड को दस लाख से ज़्यादा बार देखा गया है. इंटरनेट मूवी डेटाबेस यानि आईएमडीबी ने भी इसे 10 में से 9.3 की रेटिंग दी है. जबकि सिमर और साथिया जैसे थकाउ कार्यक्रमों को यहां 2 से भी कम की रेटिंग मिली है.

हमने काफी संभावनाओं से भरी कहानियों को टीआरपी की चौखट पर असमय दम तोड़ते देखा है. जो बच गईं उन्होंने बचे रहने के लिए टीवी सीरियलों के कुल जमा चार-पांच फॉर्मूला में से एक या ज़्यादा को आत्मसात कर लिया. ये बात कई बार कही जा चुकी है कि टीवी सीरियलों को सोप ओपरा इसलिए कहा जाने लगा क्योंकि उन्हें ज़्यादातर साबुन कंपनियों के विज्ञापन मिलते थे. लेकिन भारतीय परिवेश में ढलने के बाद ये सास-बहु सीरियलों के नाम से ज्यादा पहचाने गए. वजह, इनका किचन पॉलिटिक्स और कहानियों को खींचते जाने के चार-पांच आज़माए नुस्खों से कभी आगे नहीं बढ़ पाना. कई बार बदलाव की उम्मीद के साथ शुरु हुई कहानियां भी प्रतीकों और फॉर्मूला के जाल में फंसकर टीआरपी की बलि चढ़ गईं. फिर वो टीवी सीरियलों का इतिहास बदलने वाली  बालिका वधु हो या फिर बंधुआ मज़दूरी की समस्या पर बनी उड़ान, स्क्रीन पर अपनी उम्र लंबी करने के मोह में ऐसे फंसे कि मुद्दे से फिसल कर सारी प्रतिष्ठा खो बैठे. ऐसे में सोनी की ये पहल बेहद सकारात्मक है.

वैसे टीआरपी रेटिंग के आगे नतमस्तक हुए बड़े चैनल बीच-बीच में केटेंट के साथ प्रयोग करने की कोशिश में नज़र आते रहे हैं. इज्रायली सीरियल प्रिज़नर ऑफ वॉर पर बनी स्टार प्लस की पीओडब्ल्यू बंदी युद्ध के हो या गैंगरेप की शिकार लड़की फातमागुल की कहानी पर आधारित स्टार प्लस की ही क्या कसूर है अमला का चैनल अब सीमित एपिसोड वाले सीरियलों पर पैसा लगाने और टीआरपी के मोह में पड़े बिना तय समय पर उन्हें ख़त्म करने का रिस्क ले रहे हैं. लेकिन मक्खी बनी सिमरों और सहमी-सिहरी गोपी बहुओं के झंझावत के आगे इन प्रयोगों को लंबे समय तक याद्दाश्त में बने रहने के लिए बहुत मेहनत की ज़रूरत है.

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में टीवी सीरियलों की जिस हद तक घुसपैठ है उसे सकारात्मक बना पाने के लिए सार्थक बहस वाली ऐसी कहानियों का कहा और देखा जाना बेहद ज़रूरी है जिससे उनकी आर्थिक सफलता भी बनी रहे.


Sunday, October 29, 2017

विचारधारा का उपहास या उपहास की विचारधारा?



बचपन में हमारे एक रिश्तेदार अक्सर घर आते रहते. हम सब पर बहुत स्नेह रहा उनका. पढ़ाई-करियर के बारे में बहुत अच्छी बातें बतातें. कहानियां भी खूब रोचक होती उनकी. आध्यात्म पर तो उनकी बातें हम चमत्कृत होकर सुना करते. नास्तिकता के समर्थन में उनके तर्कों से लाजवाब होते. फिर एक दिन उन्होंने जोश में ईश्वर को चुनौती देते हुए मां के मंदिर के सामने जूते पहने अपना पैर लहराकर एलान किया, ये हैं ना आपके भगवान, मैं तो कुछ नहीं मानता इन्हें.”

मेहमाननवाज़ी का तकाज़ा था, मां ने एक शब्द नहीं कहा. लेकिन मेरे मन में उस रोज़ वो सम्मान के कई पायदान एक साथ उतर गए. उनसे बाद में भी उतना ही स्नेह मिला, लेकिन अपने उपर उनकी बातों का प्रभाव कम होता गया. ज्ञान का ऐसा भी क्या दंभ कि सामान्य सा शिष्टाचार भी निभाने ना दे. किसी की आस्था और मनोबल के केन्द्रबिंदु का यूं अपमान करने वाला शब्दों का चाहे कितना बड़ा सौदागर क्यों ना हो सम्मान के शीर्ष पर पहुंचने लायक कभी नहीं बन सकता.

हम विचारों और विचारधारा के मैगी नूडल युग में जी रहे हैं. हर रोज़ नई किस्म की सामाजिक क्रांति करने को आतुर. फिर निर्धारित शब्द-सीमा में चार लाइनें लिखने को उस क्रांति के यज्ञ में अपनी ओर से पूर्णाहूति मान लेते हैं और उम्मीद करते हैं कि हर कोई उसके समर्थन में जयघोष करे. ना करे तो हिकारत से देखे जाने का भागी बने. ऐसा करने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि वो किसी और का भला करने की आड़ में अपनी श्रेष्ठता साबित करने की उनकी बचकानी ज़िद बहुत कोशिश के बाद भी बुरी तरह एक्सपोज़ हे जा रही है.

विचारधारा हमारे घर की पिछली गली में बहने वाली पतली धार तो है नहीं. इसके अंदर भी कई-कई अंतर्धाराएं निहित होती हैं. फिर कोई ये उम्मीद भी कैसे कर सकता है कि दूसरे उसमें से बिल्कुल उसके बराबर ही अंजुलि भर लें और उसके जितना ही रसास्वादन करें? चूंकि क्रांति की कड़ाही में सबसे तेज़ी से उबाल लाने वाला द्रव्य आजकल फेमिनिज़्म है इसलिए सबसे ज़्यादा आंच भी उसी के नीचे धधकायी जाती है. राजनीति और धर्म का नंबर उसके बाद लेकिन स्त्रीवाद पर विवाद सदाबहार. साड़ी-स्कर्ट से छूटा तो बिंदी-बिछुए पर अटका, कहीं रसोई और दफ्तर का रगड़ा तो कहीं व्रत और त्यौहारों का झगड़ा. कुछ नहीं तो पति के सरनेम का ही टंटा उठा लिया. मैंने हमेशा ही इसे मेरा वाला पिंक छाप फेमिनिज्म कहा है. हर मामले में टांग घुसाकर सबको अपने कंफर्ट ज़ोन में ले चलने का बचपना.

जर्मन चांसलर एंजेला मर्कल तलाक और दूसरी शादी के बाद भी अपने पहले पति का सरनेम इस्तेमाल करती हैं, पेप्सी की चेयरपर्सन इंद्रा कृष्णमूर्ति ने राज नूई से शादी के बाद अपना सरनेम बदला. इधर पत्नी के उठने-बैठने पर भी पैनी नज़र रखने वाले हमारे एक वरिष्ठ ने शादी के बाद पत्नी को नाम ना बदलने का आदेश दिया क्योंकि उनको दकियानूसी कहलाया जाना मंज़ूर नहीं था.

साड़ी और गजरे पहनने वाली इसरो में वैज्ञानिक बन मंगलयान लॉंच कर सकती है और टैंक टॉप वाली को असहज होने पर भी अपना सीना ढकने की इजाज़त नहीं. लेकिन ये कहना भी साधारणीकरण की अति कि साड़ी पहनने वाली हर औरत शिक्षित और स्वतंत्र है या कम कपड़े औरतों की अपनी च्वाइस नहीं हो सकते. वैसे मेरे विचार में तो समाज और परिवार में रहकर किसी के लिए भी एब्सल्यूट फ्रीडम या पूर्ण स्वतंत्रता की बात करने से ज़्यादा भ्रामक और अनरियलिस्टिक और कुछ भी नहीं. फिर भी अगर आज़ादी को ही परिभाषित करना है तो उसका एक ही मानक होता है, अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी और उनका निर्वाह कर सकने लायक कूवत.

आपको क्या लगता है कि सैकड़ों-हज़ारों साल पहले औरतों के श्रृंगार के सामान उनको रूढ़ियों में कैद करने की पूर्व-निर्धारित योजना के साथ इजाद किए गए होंगे? या धर्म और राजनीतिक विचारधाराओं के साथ ऐसा हुआ होगा? हर नई परंपरा किसी ना किसी पुराने रुढ़िवाद को खत्म करने के लिए शुरु की गई लेकिन समय के साथ हर परंपरा का ग़लत इस्तेमाल किया गया. हर नया धर्म पहले से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं की जड़ता और बर्बरता के विरोध में आया और कालांतर में मौकापरस्तों के हाथों खुद भी जड़ और बर्बर बनता गया. लेकिन हम रुढ़ियों के इतने पक्के कि पुरानी खाल के फटे ढोल को ही पीटते जाने में अपनी शान समझते हैं.

इंसानी मान्यताएं और समस्याएं बहुत ही जटिल तंतुओं से बनी है. ज़िंदगी एकल मानक वाले समीकरण नहीं है जिसके सवाल एक तरह से हल कर लिए जाएं. यहां हर कोई अपने स्तर पर अलग किस्म की लड़ाई लड़ रहा है. हरेक के लिए उसकी ज़िंदगी भी एक और उसकी लड़ाई भी सबसे अहम. जो सच में क्रांति लाना चाहते हैं वो हरेक की लड़ाई का सम्मान करते हुए धैर्य से उनमें बृहत बदलाव के लिए काम करते हैं, यू हवा में धधकते गोले नहीं छोड़ते.


Monday, October 16, 2017

सौ बेटों के बराबर बेटियां कैसी होती हैं?



पिछले दिनों सुना डॉटर्स डे देश में आकर बिना ज़्यादा शोर मचाए निकल लिया, काम की अधिकता थी सो ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाई.  चूंकि देश अभी तक बेटियों को बचाने और पढ़ाने में ही जूझ रहा है, इन मौकों पर आमतौर पर गर्माया रहने वाला बाज़ार भी बेटियों को तोहफे देने की अपील में सुस्त ही रहा. 

हां, बेटियों की तारीफ में काफी कुछ लिखा-पढ़ा ज़रूर गया. इनमें सबसे ज़्यादा दोहराई गई पंक्ति रही, हमारी बेटी सौ या दस बेटों के बराबर है. और बेटियों के बारे में यही एक पंक्ति मुझे हमेशा से सबसे ज़्यादा विस्मित करती आई है.

आप किसी बात की चिंता करते ही क्यों हैं, आपकी तो एक-एक बेटी दस बेटों के बराबर है.

Sunday, October 8, 2017

और भी व्रत हैं ज़माने में....



आप करवा चौथ का व्रत नहीं करेंगी?” बिटिया पांचेक साल की रही होगी जब ये सवाल पूछते वक्त उसकी आंखें आश्चर्य से गोल थीं और अविश्वास से भरीं.
वो स्कूल में अपनी टीचर्स की करवा चौथ को लेकर तैयारियों और बातचीत से उत्साहित इस उम्मीद में घर लौटी थी कि यहां भी वैसा ही कुछ माहौल मिलेगा. जहां तक याद है उसी साल उसकी क्लास टीचर की शादी भी हुई थी. मेरे इंकार ने पहले कुछ क्षणों के हैरत को तुरंत ही अस्वीकार में तब्दील कर दिया. हाथों को हवा में लहराकर वो कई मिनट मुझे समझाती रही कि कैसे ये व्रत हर ममा के लिए कम्पल्सरी है क्योंकि उसकी सभी टीचर्स ये करती हैं.

ओके, पर मैं तो मेहंदी लगवा सकती हूं ना?”  काफी कोशिश के बाद उसने हथियार डाले. तब से ये हर साल का सेलिब्रेशन है हमारे लिए, उसके छोटे-छोटे हाथों की मेहंदी और चेहरे की चमक हमारे लिए इस दिन को बाकियों से अलग बनाती है. बाकी का समय हम दिवाली की तैयारियों में बिताते हैं.

Monday, October 2, 2017

भूगोल बदल रहा है








अष्टमी वाली सुबह ही यात्रा से लौटना हुआ, घर पहुंचते ही किसी तरह देवी पाठ निबटा यूनिवर्सिटी की भागमभाग. पिछली रात की अधूरी नींद भी पलकों की सवारी कसे अपना बकाया मांग रही थी. अष्टमी का दुर्गा दर्शन किसी तरह टाला नहीं जा सकता, सो बस रस्म निभाकर वापस लौटना हुआ. नीचे पार्क में गरबा नाइट का आयोजन तेज़ धुनों के साथ आमंत्रण दे रहा था लेकिन किसी तरह भी वहां जाना नहीं हो पाया. बाल्कनी से झांक कर दिल को वैसे भी ज़्यादा लोग कहां हैं वाली तसल्ली दे ली. इन दिनों यूं भी हर मौके पर एक से मौसमी गीतों का शोर कुछ यूं  होता है कि पता ही नहीं लगे, शादी वाला डीजे बज रहा है, कांवड़ियों की सवारी निकली है, गणपति का विसर्जन है या नवरात्रि गरबा. कनफोड़ू संगीत ने वैसे ही आधी रात तक जगाए रखा.

Sunday, September 24, 2017

बेटियों, ख़ुद बचो, ख़ुद पढ़ो और ख़ुद के लिए लड़ो



उसने मेरे साथ छेड़खानी की.’
तुम उस वक्त वहां कर क्या रही थी?’
वो मुझे गंदी नज़रों से देख रहा था.
तो तुम्हारी नज़रें उसकी आखों की तरफ देख ही क्यों रही थी?’
वो मुझे भद्दे इशारे कर रहा था.
उसे देखने के लिए तुम वहां खड़ी क्यों थीं, सामने से हट क्यों नहीं गई?’
ये हमारी सुरक्षा का सवाल है.
हम भी उसी की बात कर रहे हैं, दुनिया के सारे ताले तुम्हारी सुरक्षा के लिए ही तो बनाए गए हैं. तुम्हें उनके पीछे जाने में एतराज़ भला क्यों है?’
लड़की हो तो तुम्हारे हर बयान पर सवाल दागे ही जाएंगे, उनके जवाब देने की आदत डाल लो. तब तक,  जब तक कि सवाल खत्म ना हो जाएं, क्योंकि सवाल पूछने वाले का मकसद जवाब सुनना तो है ही नहीं, वो तो तुम्हारे चुप हो जाने का इंतज़ार कर रहा है ताकि खुद को विजेता घोषित कर सके.

Saturday, September 9, 2017

अपने दिल के दरवाज़े की खुद ही मालिक हैं गीताश्री की नायिकाएं


अमृता प्रीतम ने अपनी नायिका के दिल के दो दरवाज़े बनाए. सामने का दरवाज़ा उसकी मर्ज़ी से नहीं खुलता और पिछले दरवाज़े का खुलना वो किसी को दिखा नहीं सकती. ना ही पिछले दरवाज़े से आने वाले के लिए सामने का दरवाज़ा खोला जा सकता. पिछला दरवाज़ा खोलने के लिए भी हौलसा चाहिए होता, क्योंकि उस दरवाज़े से जो दिल एक बार चला जाता वो लौटकर कभी छाती में वापस नहीं आता. शायद इसलिए गीताश्री ने अपनी नायिकाओं के दिल में बस एक दरवाज़ा बनाया, उसकी सारी आकांक्षाएं, सारी चाहनाएं सब इस चौखट से नज़र आने दीं. अपनी हसरतों को शब्दों में ढाल कर वो अपने दिल के दरवाज़े को अपनी मनमर्ज़ी से खोलने और बंद करने का हौसला रखती है. गीताश्री की नायिकाओं का दिल हौले से धड़कता नहीं, बड़े हौल से हुलसता है, क्योंकि अपने शरीर और मन की चाहनाओं पर उसने शर्मिंदा होना नहीं सीखा. फिर वो कटोरी भर मलाई खाने की सुरीलिया (मलाई) की हसरत हो या प्रेम में भी अपना स्व बचाकर रखने की सुषमा (सी यू) की ज़िद, पाठक अपने आपको नायिकाओं के इंतिख़ाब के सामने झुकता हुआ पाता है और पन्ने पलटते-पलटते उन्हें अपनी सहमति दे बैठता है.

Tuesday, September 5, 2017

जानने और सिखा पाने के बीच का फर्क



If you can’t explain it simply, you don’t understand well enough 

साठ के दशक में ही इंटरनेट के आने की भविष्यवाणी कर ग्लोबल विलेज की बात करने वाले मशहूर दार्शनिक और संचारविद् मार्शल मैकलुहान यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में प्रोफेसर भी थे. मैंने अपने गुरु से उनके बारे में एक दिलचस्प कहानी सुनी थी. एक बार मैकलुहान को अपनी पार्किंग में उनकी एक छात्रा की गाड़ी खड़ी दिखी. उन्हें बड़ा गुस्सा आया, उन्होंने उसकी कार की विंडशील्ड पर एक पर्ची लिखकर टांग दी, ये आखिरी बार होना चाहिए जब मुझे तुम्हारी गाड़ी, अपनी पार्किंग में नजर आई है.
अगले दिन छात्रा का जवाब उनकी गाड़ी की विंडशील्ड पर था, ये पहली बार है जब आपकी कही कोई बात मेरी समझ में आई है.

Saturday, September 2, 2017

मौत तू एक....


छोटी सी थी, पांच-छह साल की. दादी के साथ सटी रहती. वो बहुत कम बोलतीं लेकिन प्यार करते करते एक सवाल बार-बार पूछतीं, "जियोगी, मरोगी या हुकुर-हुकुर करोगी." मैं सोच में पड़ जाती. मरने का सवाल तो खैर था ही नहीं, लेकिन जीने का मतलब रोज़-रोज़ स्कूल जाना, वापस आकर होमवर्क करना. बहुत सोच-विचारकर भी मैं हर बार लगभग एक ही जवाब देती, हुकुर-हुकुर करब. वो हंस पड़तीं, धुर बतहिया कहकर प्यार करने लग पड़तीं. उस उम्र तक ये नहीं पता था कि हर सुबह उठकर जीने का फैसला हमें खुद ही लेना पड़ता है वरना जब तक जिंदगी के हक में होता है वो हमें हुकुर-हुकुर करते रहने का ही विकल्प देती है.

मौत कोई नहीं चुनता इसलिए चुनने के अधिकार मौत ने अपने पास रख लिए हैं. मरण सागर के पार किसी को नज़र नहीं आता इसलिए हर कोई उस दृश्य को अपने हिसाब से गढ़ लेता है.