Saturday, January 13, 2018

कन्यादान कब तक?



कलर्स चैनल के कार्यक्रम शनि देव में प्रसंग शनि की गंधर्व कन्या धामिनी से विवाह का था. कन्यादान की रस्म को कार्यक्रम के नायक शनि ने ये कहकर रोक दिया कि उनकी होने वाली पत्नी कोई वस्तु नहीं जिसे दान में दिया जा सके. पौराणिक कथाओं या पटकथाओं को आधुनिक दर्शकों के लिए लिखते समय उसमें सम-सामयिक विषयों और विवादों का छौंक नज़र आ जाना कोई नई बात नहीं. चर्चित कथाकार अमिष त्रिपाठी ने अपनी राम कथा के पहले भाग में दिल्ली के निर्भया गैंग रेप का सब प्लॉट शामिल किया था. सॉयन्स ऑफ इक्ष्वाकु में मंथरा की बेटी के सामूहिक बलात्कार और हत्या का प्रसंग विस्तृत तौर पर आता है. बीते कुछ सालों में बेटियों को पढ़ाने और बचाने को लेकर जनमानस की बढ़ती मुखरता के बीच स्टार प्लस ने भी अपने सीरियल सिया के राम में रामायण की कहानी को सीता के दृष्टिकोण से दिखाने की कोशिश की थी. पर्दे पर अवतृत हुए रामायण के तमाम संस्करणों में ये पहली बार था जब राम की कहानी के साथ उनकी बहन शांता की कहानी भी कही गई थी. शायद ये वजह भी हो कि अब तक दिखाई गई शनि की कहानियों में न्याय और वक्र दृष्टि के पहलुओं से थोड़ा इतर,  इस बार के कथानक में उनके वैवाहिक और गृहस्थ जीवन को रखा जाना तय किया गया हो. ऐसे में इस कथा में कन्यादान जैसी पुरातन और अनिवार्य रस्म पर प्रश्न उठा, उसे अस्वीकार करने का शनि का फैसला उनके न्यायप्रिय होने की अवधारणा को और मज़बूत करता नज़र आ रहा है.

स्त्री विमर्श से जुड़े तमाम पहलू जितने व्यापक स्तर पर मुख्यधारा के विषय बनते जाएंगे उन तमाम रीति-रिवाजों को नए सिरे से परिभाषित किया जाना भी ज़रूरी हो जाएगा जो अब तक केवल पुरातन होने के कारण पावन और पुनीत माने जाते थे. हिंदु धर्म ने परित्याग को हमेशा ही पुण्य की सर्वोच्च श्रेणी में रखा है. स्वाभाविक है भौतिक वस्तुओं से इतर, जीती जागती, जतन से पाली गई कन्या पर से अपने सारे अधिकार भूल उसका दान कर पाना, पुण्य के उत्कृष्टतम शिखर पर ही विराजमान होगा. यूं भी जो त्याग किसी से करवा लेना सहज-सरल ना हो, उसे पारलौकिक प्रलोभनों के बिना करवा पाना किसी तरह संभव नहीं. सो दान की इस विधा के तहत, अपने जीवन भर की सुरक्षा और भरण पोषण के एवज़ में कन्या किसी के परिवार की समस्त लौकिक और स्थूल ज़िम्मेदारियां अपने कंधों पर लेकर अंतिम सांस उसके निर्वाह को प्रतिबद्ध कर दी जाती है. तिस पर तुर्रा ये कि इस वचनबद्धता का पुण्य भी उसे नहीं उसे दान करने वाले को दिया जाता है. वैसे होने को ये भी हो सकता है कि पुण्य के इस आकलन के पीछे सुकन्या समृद्धि योजना के तर्ज पर ही बेटियों को जीवित बचा कर रखने जैसा कोई पुरातन समीकरण भी शामिल हो.

यूं शादी से जुड़े रीति-रिवाज़ चाहे जिस परंपरा के हों, साथ निभाने और एक घर छोड़कर, दूसरा बसाने की प्रतिबद्धता हर समाज में लड़कियां ही उठाती रही हैं. फिर विवाह सप्तपदी और मंत्रों के साथ हुआ हो या केवल वचनों को दोहराकर. बहरहाल,. हमारी शादियों में विदाई से पहले सबसे भाव विह्वल करने वाला क्षण कन्यादान का ही रहा है. बचपन से लगभग हर शादी में कन्यादान के वक्त वधु के साथ उसके बाकी परिजनों की भरी आखों ने इतनी बार खुद की आखें गीली की हैं कि अपनी शादी तक भी इस रीति को लेकर कोई प्रश्न, कोई शंका मन में नहीं आई. विरोध का तो ख़ैर सवाल ही नहीं. लेकिन जब विवेचना की उम्र आई तो इसके मूल और अर्थ में छिपे अनादर ने विचलित करना शुरु कर दिया. 

पवित्रता का जामा तो एक समय सतीत्व को भी पहना कर उसे इतना महान बना दिया गया कि उसके पीछे की वीभत्सता को समझने में सदियां खप गईं. वैधव्य की पावनता पर से भी पर्दा अब हटने लग गया है. दहेज चूंकि धन से संबद्ध है और धन कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकता, इसलिए उसके जाने में इतना वक्त लग रहा है. इन सभी कुरीतियों के मुकाबले कन्यादान पितृसत्ता से जन्मी ऐसी रस्म है जिसकी बदलते परिवेश में प्रतीकात्मक ज़रूरत भी नहीं. क्योंकि इसका औरतों की आत्मनिर्भरता और सम्मान से सीधा-सीधा विरोधाभास है. अपने आत्मविश्वास और जिजिविषा के दम पर खड़ी लड़की का कोई किस हक से दान करेगा? फिर उसके भरण की हैसियत भी किसके पास? बराबरी जैसे-जैसे मज़बूत होती जाएगी, कन्यादान उतनी ही तेज़ी से अप्रासंगिक होगा. 
 
शादी में केवल साथ निभाने की प्रतिबद्धता सत्य है. बाकी सब सामयिक अनुष्ठान, जैसे प्राण के लिए देह और उसकी सज्जा का आडम्बर. और समय के साथ बदलते जाना ही रीति-रिवाज़ों और अनुष्ठानों की नियति है. समय की बात है, तमाम प्रतीकों और ताम-झाम के बावजूद एक दिन इसे भी चले जाना है. 






Sunday, January 7, 2018

व्यापार की भाषा


पीछे समंदर की लहरें अभी भी एक-दूसरे का पीछा करतीं चूर-चूर हो रही थीं लेकिन अंधेरा होने पर उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं था. सारी रौनक बीच की दूसरी ओर लगी दुकानों और सी फूड से भरे रेस्तरां की कतारों तक सिमट आई थी. उसकी दुकान रेत के उसी फैलाव पर लगी थी. चटक पीली ज़मीन पर लाल फूलों वाली उसकी कुर्ती दूर से ही नज़र आ रही थी. नाक का बूंदा बायीं ओर और कानों में लंबी लटकन वाले चांदी के झुमके. रंग-बिरंगे धागों में अंग्रेज़ी के अक्षरों को पिरोती, नाम वाले ब्रेस्लेट बनाने में जुटी उसकी उंगलियों में बिजली का स्फुरण था. 
राजस्थान से हूं मैं, सवाई माधोपुर सुना है आपने?” 
उसकी नज़रें बस सेकेंड भर के लिए उठीं और बाकी का जवाब सधे हाथों की रफ्तार के साथ दिया गया. बीच में जब एक दक्षिण भारतीय नवोढ़ा मेहंदी लगवाने की गरज से दाम पूछने आई तो जवाब मलयालम में दिया गया.
अब यहां व्यापार करना है तो इनकी भाषा तो सीखनी ही होगी
उसने हंसते हुए कैफियत दी और ग्राहक की पसंद की डिज़ायन का ठप्पा उठा लिया. खास दक्षिण भारतीय तेल से गुंथीं, थक्के की शक्ल की मेहंदी के डब्बे को खोला गया. कलात्मक स्टांप को उसमें दबा कर हथेली पर एक ठप्पा और बेल के आकार के ठप्पे उंगलियों पर. दो मिनट का काम और सत्तर रुपए उसकी जेब में. हफ्ता भर रह जाती है ये इंस्टैंट मेहंदी, उसने उसी अदा से मेरी और बेटी की ओर देखा, फिर कोई जवाब नहीं देख हमारे बताए ब्रेस्लेट पूरे करने लग गई. अंग्रेज़ी की एक क्लास में नहीं गई लेकिन नामों के अक्षर पहचान उन्हें पिरोने में मिनट, दो-मिनट से ज़्यादा नहीं लगते. व्यापार चलाना है तो दो अजनबी भाषाओं को साधना ही होगा, वो भी काम के साथ-साथ, अलग से कोई कोचिंग, कोई ट्रेनिंग नहीं.

यूं तो दिल्ली में एमजी रोड पर सफेद संगमरमर के मंदिर बेचने वाली दुकानों की कमी नहीं लेकिन जिस तफ्सील से रहमान भाई मंदिर दिखाते हैं और जिस सब्र से खरीदार को पसंद आ जाने का इंतज़ार करते हैं वो दुर्लभ है. हाथ बांधे वो बड़े सब्र से एक-एक मंदिर के सामने खड़े होकर उसकी बारीक़ियां बताते हैं. पंसद आने पर ग्राहक से उसके पास उपलब्ध जगह की मालूमात करते हैं और फिर बड़े अदब से बताते हैं कि यूं पैसा देने वाले का है फिर भी बस लेने के लिए इतना बड़ा मंदिर लेने का मतलब नहीं क्योंकि रखने की जगह कम पड़ जाएगी. आखिर में मंदिर के रख-रखाव के बारे में हिदायत देते हुए वो पेशगी लेते हैं और तय समय से दस मिनट पहले ठेले वाला मय मंदिर आपके घर की घंटी बजा देता है. उसे निर्देश है कि ठेले से घर तक मंदिर पहुंचाने में कोई जल्दबाज़ी ना की जाए और मंदिर को हल्की सी खरोंच भी ना आने पाए.

अगर दो कामवालियां रखनी हों तो कोशिश करो कि दोनों अलग धर्मों की हों, ये मंत्र गृहस्थी संभालने के कई साल बाद समझ में आया. दोनों अपने-अपने त्यौहारों पर छुट्टियां लेंगी और किसी भी दिन आपका घर, अजायबघर बनने से बच जाएगा. जब से ये रास्ता अपनाया ज़िंदगी में थोड़ी आसानी हो गई. लेकिन ये सोच दूसरी ओर वाला भी रखता है ये सुनना हैरानी से भरा था. पता तब चला जब एक को उसके धर्म वाली के घर काम करने भेजने का आग्रह एक सहेली से आया तो उसने कंधे झटका दिए, आपके जैसा लोग के घर काम करेगी. नहीं तो वो हमारा त्यौहार पर ही हमको छुट्टी नहीं देगी. उसने सात सेकेंड में मन्तव्य साफ कर दिया. प्योर बिज़नेस डिसीज़न.

स्वीट्ज़रलैंड के माउंट टिटलिस पर पारंपरिक पोशाक में फोटो खिंचाने की दुकान और वहां आने का आग्रह अंग्रेज़ी के अलावा चार और भाषाओं में लिखा हुआ जिसमें हिंदी भी शामिल. वजह, आने वाले सैलानियों में भारतीयों की बड़ी तादाद. पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता से इसका कोई नाता रिश्ता नहीं. अंदर मिलने वाले पिज़्ज़ा में भी इंडियन मसाला पिज्ज़ा का ऑप्शन.



व्यापार की अपनी एक अलग भाषा होती है और अक्सर ये भाषा बाक़ी की ज़ुबानों से ज़्यादा उदार और पारदर्शी होती है क्योंकि उसके मतलब और मक़सद में किसी भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं रहती. 

Sunday, December 17, 2017

तोता बनाम सनी, बिपाशा



आजकल टीवी पर न्यूज़ नहीं देखती तुम, बीते कई महीनों में ससुर जी कई बार टोक चुके हैं.
जी, अब तो हमारा सबकुछ मोबाइल पर ही हो जाता है, मेरा जवाब सतर्कता से चुना गया होता है.  
शादी के बाद के सालों में जब सब साथ बैठकर टीवी पर समाचार देखा करते, परिवार के बाकी लोगों को भूलकर सबसे गर्मागर्म बहस हम दोनों में ही हुआ करती. वो इंटेलिजेंस ब्यूरो के सेवानिवृत आला अधिकारी और पत्रकारिता के जोशोखरम में डूबी मैं. हर खबर का पोस्टमार्टम सरकार बनाम जनता और प्रशासन बनाम पत्रकार के तौर पर होता. हर बहस के दौरान उनकी नौकरी से जुड़ी एक रोमांचक कहानी भी सुनने को मिलती. ये सब मैं अभी भी मिस करती हूं, फिर भी नौकरी की ज़रूरत होते हुए भी परिवार के साथ बैठकर ख़बरों का एक पूरा बुलेटिन सुने ज़माना हो गया. वजह, हर तीसरे मिनट एक एड ब्रेक और हर ब्रेक में कंडोम का एक विज्ञापन, जो अपनों के ही बीच आपको नज़रें चुराने पर मजबूर कर देता है. ऐसी मुश्किल परिस्थिति में फंसने से बेहतर है ऐसे मौके आने ही ना दिए जाएं.

ऐसा नहीं है कि हममें से कोई परिवार नियोजन का महत्व या कंडोम का उपयोग नहीं समझता. लेकिन सुहागरात पर कामुक अदाओं के साथ पहले गहने, फिर कपड़े उतारती सनी लियोनी या पति के साथ बिटवीन द शीट्स खेलतीं बिपाशा बसु को हर दसवें मिनट देखने पर कंडोम के फ्लेवर्स और कामोत्तेजना के बारे में आपका ज्ञानवर्धन चाहे जितना हो जाए, परिवार नियोजन या यौन स्वास्थ्य जैसे शब्द दिल-दिमाग के आसपास भी नहीं फटकते.



फिर एक दिन खबर आती है कि सरकार ने रात के आठ घंटों को छोड़कर टीवी पर कंडोम के विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक लगा दी है. बीमारी के इलाज़ के नाम पर पूरे का पूरा अंग काट लेने की फितरत हमारी सरकारों की आज से तो है नहीं इसलिए उनसे इससे बेहतर समाधान की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी. आदेश का विरोध होना था सो हुआ भी, लोगों ने कंडोम के विज्ञापन देखने के अपने अधिकार को संभोग के मौलिक अधिकार से जोड़कर पोस्ट लिखे, डियोडोरेंट के विज्ञापनों के औचित्य पर सवाल भी उठाए लेकिन सोशल मीडिया पर आक्रोश के ये बुलबुले बनने के अड़तालीस घंटे के भीतर फूट भी गए.

इस देश में जहां लोग टीवी पर नागिन को न्याय दिलाने के इंतज़ार में अपना खाना-पीना भूल जाते हैं और प्रज्ञा को अभि से मिलवाने की चिंता में उनके खुद के बच्चों की शादी की फिक्र पीछे छूट जाती है, जनसंख्या का विस्फोट रोकने या यौन स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए टेलिविज़न से अच्छा प्लेटफॉर्म नहीं मिल सकता. ऐसे में सरकार के सरकार के इस तुगलकी फरमान का औचित्य वाकई समझ से बाहर है. इस समस्या का समाधान बेहतर विकल्प ढूंढकर निकाला जा सकता था जिसके लिए इच्छाशक्ति की कमी दोनों ओर नज़र आई.

दस साल पहले टीवी विज्ञापनों की दुनिया में एक बेहद आम दिखने वाले ब्वाय नेक्स्ट डोर का अवतरण हुआ, कंधे पर एक कंप्यूटर जनित तोता लिए उस भोले भाले शख्स ने पूरी संजीदगी के साथ कहा कि मर्द की पहचान मूंछें नहीं, सुरक्षा की पहचान हेलमेट नहीं, दरअसल मर्दानगी की निशानी है बिना हिचक कंडोम बोलना, दुकान पर जाकर उसकी मांग करना और जो ये ना कर सके वो असली मर्द नहीं. विज्ञापनों की इस कड़ी में कबड्डी के खेल के दौरान कबड्डी-कबड्डी की जगह कंडोम-कंडोम बोलने और मोबाइल फोन पर कंडोम का रिंगटोन डाउनलोड करने जैसी पहल भी शामिल थे.

इस विज्ञापन सीरीज़ को बीबीसी मीडिया एक्शन ने बनाया था. बीबीसी की इस पहल ने कंडोम की खरीद और उपयोग को लेकर कई वर्जनाएं तोड़ डालीं. कुछ ही दिनों में सात लाख से ज़्यादा लोगों ने कंडोम थीम के रिंगटोन को डाउनलोड करने की अर्जी दी. कैंपेन की लोकप्रियता की मुरीद केन्द्र सरकार भी हुई और जल्दी ही इसे सरकारी प्रचार-प्रसार का हिस्सा भी बना लिया गया. यही नहीं, सीएनएन ने इसे कंडोम के सबसे अनूठे विज्ञापन का खिताब भी दिया.

बेचा यहां भी कंडोम ही जा रहा था, बल्कि आज के समय से कहीं ज्यादा दकियानूसी समाज में, फिर भी इनमें ऐसा कुछ नहीं था जिसपर किसी को एतराज़ होता.  

हालिया विज्ञापनबंदी के विरोध में एक मुखर स्वर डियोडोरेंट के विज्ञापनों पर रोक लगाने का भी आया. बीते कुछ सालों में विज्ञापन कंपनियों ने कुछ बाज़ार में डियोडोरेंट की प्लेसमेंट कुछ इस तरह से की है कि इनका मक़सद बस लड़कियों को बिस्तर तक खींच कर ले जाने तक सिमटता लगता है. दरअसल, कंडोम हो या डियोडोरेंट, भेड़चाल में फंसना विज्ञापन कंपनियों की पुरानी बीमारी है. यूं किताबी स्तर पर देखा जाए तो विज्ञापनों का मक़सद खरीदारों को अपने सामान के बारे में अवगत कराने से लेकर, उन्हें उसे खरीदने के लिए कंविंस करना, अपनी क्रिएटिविटी से उस सामान की छवि को निखारने के अलावा उसके उपयोग की ज़रूरत पैदा करना भी होता है. लेकिन हकीकत में ज़्यादातर विज्ञापनों की कोशिश  अपने प्रोडक्ट की ईमेज को नई दिशा में मोड़ने तक सीमित हो गई है. इसी रेलमपेल के बीच करीब दो साल पहले चुपके से घुस आया एक ब्रांड फॉगऔर देखते ही देखते बाज़ार की दशा-दिशा ही बदल गई. बाज़ार में मिले दोस्त, कंटीले तारों के दोनों ओर खड़े भारत और पाकिस्तान के जवान, पुलिस अधिकारी से बात करता मुखबिर, सबसे एक स्वर में दूसरे से ये ही कहा, आजकल तो बस फॉग ही चल रहा है बिना किसी सेक्सुअल इंटोनेशन के, बिना गैस वाले फॉग ने साल भर में प्रचलित ब्रांडों की हवा निकाल दी और बाज़ार का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन बैठा.

इतिहास और बाज़ार दोनों गवाह हैं कि लीक तोड़ने वाले विज्ञापनों ने अक्सर बाज़ार की दशा और दिशा दोनों बदल दी है. बेहतर होता अगर सरकार कंडोम के विज्ञापनों पर सिरे से रोक लगाने के बजाय विज्ञापन फिल्मों के कंटेट को लेकर कोई दिशानिर्देश बनाती. और कुछ नहीं तो टीवी विज्ञापनों पर हर रोज़ जो एक करोड़ से ज़्यादा रुपए सरकारी बजट से खर्च किए जा रहे हैं उसका एक हिस्सा ही क्रिएटिविटी के नाम कर देती. सनी और बिपाशा मार्का कंडोम एड से परे जाकर इस बाज़ार की दशा और दिशा बदलने का ख्याल हमारी सरकार को कभी क्यों नहीं आया?




Saturday, November 25, 2017

असुरक्षित बचपन के ज़िम्मेदार हम


वॉशिंगटन के दिनों में एक शाम बच्चों को पार्क से लेकर घर लौट रही थी. डेढ़-एक साल का बेटा वापस आने को तैयार नहीं था, लिहाज़ा पूरी भारतीयता के साथ चीख-चिल्लाकर रोने लग पड़ा. एक अपरिचित अमेरिकन महिला हमारे साथ लिफ्ट से उतरी और पीछे-पीछे घर तक आ गई. दरवाज़े पर खड़ी होकर उसने विनम्रता से पूछा कि बच्चे को संभालने के लिए मुझे किसी मदद की ज़रूरत तो नहीं. चूंकि हजरत घर घुसते ही खिलौनों में उलझकर कुछ मिनट पहले की मां की शर्मिंदगी भूल चुके थे, वो मुस्कुराकर वापस चली गई. पता चला उसका घर ना केवल किसी दूसरी मंज़िल बल्कि बिल्डिंग के दूसरे ब्लॉक में है. दोस्तों से बातचीत के दौरान बाद में ये एहसास हुआ कि वो दरअसल ये जानना चाह रही थी कि मां होने के बावजूद बच्चा कहीं मेरी किसी गलती की वजह से तकलीफ में तो नहीं है या फिर ये कोई ऐसा मसला तो नहीं जिसे लेकर उसे अथॉरिटीज़ को अलर्ट करने की ज़रूरत हो. वो पड़ोसी का सामान्य शिष्टाचार ही नहीं एक सजग नागरिक का धर्म भी निभा रही थी.

अमेरिकी संस्कृति से अपनी तमाम असहमतियों के बीच वो एक घटना अभी भी एक बड़ी सीख लिए जहन में ताज़ी है. इसकी एक वजह ये भी कि अपने समाज में हम बड़ी तेज़ी से इस सजगता को भूलते जा रहे हैं. आधुनिकता की आड़ में हमने बड़ी सहूलियत से पड़ोसी धर्म को निजता के हनन का जामा पहनाकर परे कर दिया है. जबकि सच्चाई ये है कि हर वो मसला जो सचमुच निजता के हनन के दायरे में आता है चटकारे लेकर उसे जान जाने में हमारी दिलचस्पी अभी भी बरक़रार है.

अपने बच्चों को सुरक्षित बचपन देने के लिहाज़ से दुनियाभर में भारत का स्थान 116वां है. इसके पहले कि इसका ठीकरा कुपोषण, गरीबी, लौंगिक प्राथमिकताएं जैसे मसलों पर फोड़ा जाए, ये जान लेना भी ज़रूरी है कि बाल अपराध के ज़्यादातर मामले महानगरों में होते हैं.

औसत परिवारों में पत्नियों के काम करने या नहीं करने के फैसले स्त्रीवाद, स्वतंत्रता और समानता जैसे भारी-भरकम शब्दों की नियमावली के तहत नहीं लिए जाते. चूंकि हम लैंगिक समानता जैसे मुद्दों को अभी तक केवल सतही स्तर पर समझ पाए हैं, मर्दों के लिए कमाकर परिवार चलाना अभी भी उनके जीवन की प्राथमिकता है. औरतों का नौकरी करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि भौतिक सुविधाओं से लैस परिवार चलाने के लिए दो लोगों की कमाई की दरकार होती है.  इस अलावा भी औरतों की पढ़ाई-लिखाई अपने साथ केवल ज्ञान और डिग्री ही नहीं लेकर आती है, लेकर आती हैं एस्पिरेशन्स, आगे बढ़ने की लालसा. लेकिन एकल परिवारों की चलन के बीच औरतों के करियर के शीर्ष पर नौकरी छोड़ने की एक बड़ी वजह होती है बच्चों की सुरक्षा और परवरिश को लेकर उपजी समस्याएं.

अफ्रीकी कहावत है, एक बच्चे की परवरिश के लिए एक गांव की ज़रूरत होती है. समाज चाहे जितना भी आधुनिक हो जाए, सुविधाओं के लिए चाहे कितनी मशीनें और उपकरण जुटा लिए जाएं, बच्चों की परवरिश के लिए हमेशा ही प्यार, देखभाल और सुरक्षित वातावरण की ज़रूरत सबसे उपर होगी. हम मुहल्लों को छोड़ अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स में बस गए हैं जहां एक दरवाज़ा भर बंद कर देने से दुनिया से कटा जा सकता है, जहां व्हाट्सएप पर भले ही फॉर्वर्ड किए ऊल-जलूल मैसेज बेखटके हम तक पहुंच जाएं, हमसे बिना अप्वायंटमेंट लिए कोई हमारा दरवाज़ा नहीं खटखटा सकता. बंद दरवाजों के पीछे दुनिया बसाने की हमारी इसी चाहना ने हमारे बच्चों की सुरक्षा को बिना किसी आहट के दांव पर लगा दिया है.

बचपन में पापा की तमाम मित्र पत्नियों में केवल एक वर्किंग थीं. छोटे से बच्चे को आया के पास छोड़ काम पर जातीं. पूरी दोपहर वो बच्चा तो काम वाली की निगरानी में होता लेकिन उस कामवाली के उपर पड़ोस की सभी औरतों की नजर रहा करती. शाम को घर लौटने पर उनका बेटा किसी भी घर में सुरक्षित खेलता मिल जाता था. आज हम भले ही बड़े व्यस्त होने का दंभ भरते हों, क्या ये सब कर पाना सचमुच इतना मुश्किल है?

बार-बार एक सी कहानियां कलेवर बदल कर हमारे सामने आ जाती है, हम सदमे से मुंह फाड़े अपने बच्चों को छाती से चिपकाकर ज़माने को लानत भेजते हैं और घंटे भर बाद मॉल में शॉपिंग थेरेपी के लिए चले जाते हैं. एक बार रुक कर ख़ुद से पूछ नहीं सकते कि अपने स्तर पर इसे बदलने के लिए क्या किया जा सकता है?

कहीं कोई बच्चा संदिग्ध स्थिति में दिखे, हमारी ओर से एक सतर्क नज़र, व्यस्त होने का नाटक छोड़कर दो मिनट रुकने की जहमत, दो-चार सवाल पूछने की हिम्मत इससे ज़्यादा की तो दरकार भी नहीं. घर-बाहर, दफ्तर-बाज़ार, मॉल-पार्क, हर जगह बस ये सोचते हुए नहीं रहा जा सकता कि बच्चा चाहे किसी का हो, समाज और उसके भविष्य में हमारे बच्चों के बराबर का भागीदार है.

सोचकर देखिए, क्या ये सब किया जाना सचमुच इतना मुश्किल है?






Saturday, November 11, 2017

बड़ा होना भी कोई होना है



जब तक ये ख़बर लगती है कि बड़ा होना चाहत नहीं मजबूरी है, बहुत सारा वक्त पोरों से रिस चुका होता है. ज़िंदगी चाहे कितने ही पन्ने पलट ले, पहले पन्ने की सतरें कोई नहीं भूलता. अच्छी तरह याद है पहली बार बड़े होने की चाहना हुई थी ताकि मिलने जाने पर कॉलोनी की आंटियां  स्टील की बड़ी प्लेट में बाकी बच्चों के साथ पकड़ाने के बजाए नाश्ता अलग से सजा कर दें, जैसे मम्मी को मिलता है, बोन चाइना की प्लेट में. बड़ा होने की जल्दी यूं भी मचती कि उन दीदियों की तरह लंबे बाल पीछे झटक अदा से दुपट्टे को गिरा फिर लहराकर उठा सकें या कभी निचले होंठ काटकर तो कभी छोटी से जीभ निकालकर कई तरह के अंदाज़ में बातें की जा सकें. ये दौड़-दौड़कर पकड़म-पकड़ाई खेलने का बचकानापन तो छूटे पहले.

लेकिन हाथ में पकड़ी पेसिंल के पेन में बदलने का दर्प जबतक अपनी जड़ें जमाता है, कद मां के कंधे को पार कर जब तक उनके कान को छूकर निकलने लग पड़ता है, दुपट्टे की अनिवार्यता उसके बोझ लगने की शुरुआत करा चुकी होती है. बड़े होने की जल्दी फिर भी उतनी ही तीव्र होती है. इस बार यूं कि घर के फैसलों में हमारी भी रायशुमारी हो, मां और मौसियों की फुसफुसाती कहानियां दरवाज़े की दरार से सुनने के बजाय सामने बैठ कर सुनी जा सकें. फिर एक समय वो सारी कहानियां आपके साथ भी बांटी जाने लगती हैं. वक्त भी ना, कम चालें नहीं चलता, एकदम से छलांग लगाकर वहां पहुंच जाता है जहां इन कहानियों से रिसते दर्द का बोझ उठाए नहीं उठता. अपनी टेढ़ी चाल से वक्त जब तक बताता है कि फैसला सुना देना दुनिया का सबसे आसान काम नहीं होता, फैसले लेने के बाद उनको उठाने की ज़िम्मेदारी से कंधे भी झुक जाया करते हैं.

आपके कॉलेज में पता कैसे चलता है कि टीचर कौन और स्टूडेंट कौन?”  छुटपन में अपनी मौसी को पूछा था. मौसी की तबतक शादी हो चुकी थी और वो साड़ी और सिंदूर में कॉलेज जाया करतीं.
अंतर होता है ना बेटा, प्रोफेसर हमसे बड़ी होती हैं, उन्होंने समझा दिया. 
एक बार बड़े होने के बाद और कितना बड़ा हुआ जा सकता है, मैं सोच में पड़ गई. 

एक वक्त वो भी होता है जब पचास और साठ के बीच का फासला नज़र नहीं आता. फिर नज़र की उस मासूमियत को वक्त की नज़र लग जाती है. बारीकियों को देख पाने की उम्र नज़र के कमज़ोर होते जाने की शुरुआत की उम्र भी होती है. अनुभव अपने साथ अधजगी रातों की बेचैन करवटें भी लेकर आता है. 

अब जैसे हर रोज़ ठहरकर वक्त अपने बीतने का एहसास कराता है. किसी सुबह अचानक चाय की प्यालियों के पार जाती नज़र मुंह पहले से ज़्यादा पोपला पाती है. महीने भर बाद हुई मुलाकात में नज़र जाती है हड्डियों को छोड़कर लटक आए मांस पर. टोको तो हंसते हुए जवाब मिलता है, तो अब क्या बचा करने को, खाली बैठकर बाकी बची सांसे हीं तो गिननी है.जिनके होने आश्वस्ति पर, जिनके चेहरे की चमक को देखते अब तक की रेस में भागते चले वो अचानक यूं उदासीन हो रहे जैसे स्टेशन आने के पहले अपना सामान समेटने की हड़बड़ी में सहयात्रियों को नज़रअंदाज़ करता मुसाफिर.

बस अब इससे ज़्यादा बड़ा नहीं होना, बड़े होने के नाम पर सांस उखड़ रही है अब.

वक्त तो भी बेरहम है, दो पल रुक कर उन रास्तों को देखने भी नहीं दे रहा जो पीछे छूट गईं, आगे उतना ही लंबा रास्ता पड़ा है, लेकिन ये हिस्सा बंजर, वीरान, पथरीला. सारी हरियाली जैसे पीछे छोड़ आए हम. उम्र बढ़ने के साथ याद्दाश्त जैसे सागर तट की रेत पर लिखी इबारत हो जाती है, ज़िम्मेदारियों का एक रेला आया और मिटा ले गया सब.

कभी बिल्डिंग की बहुत सारी औरतों के साथ एक गेम खेला था, कोई हाथ भर लंबी डोरी में गांठ बांधनी थी, एक मिनट में जितनी बंध सके उतनी. मिनट भर के बाद जिसकी उंगलियां सबसे जल्दी चलीं उनसे सबको को गर्वोन्मुख होकर देखा, बाकियों की आवेश से कांपती उंगलियां शर्म से सिमट आईं. लेकिन ठहर जाओ, ये तो गेम का पहला हिस्सा ही रहा, आखिरी हिस्से में उतनी ही तेज़ी से गांठे वापस से खोल सीधी डोरी वापस पकड़ानी थी. जिंदगी का कोई भरोसा नहीं. कभी-कभी अपना सबकुछ सबसे पीछे चलने वाले के नाम भी कर देती है.

गांठें किसी के साथ नहीं जातीं, सबको अपनी गांठें यहीं खोल कर जाना है.



Sunday, November 5, 2017

कुछ रंग सीरियलों के....


देश में हिंदी टीवी सीरियलों के कंटेंट की जैसी हालत है और उनको लेकर चेतना सम्पन्न आबादी के जैसे विचार हैं, ये कहना कि आप किसी भी तरह से इन सीरियलों से संबंध रखते हैं आपके बुद्धिजीवी होने पर सवाल खड़ा कर सकते हैं. इस ख़तरे को अच्छी तरह समझते हुई भी ब्लॉग में आज पहली बार किसी टीवी सीरियल के बारे में लिखने का रिस्क ले रही हूं.  

कार्यक्रम है टीआरपी के मामले में थोड़े गरीब चैलन सोनी पर पिछले हफ्ते ख़त्म हुआ सीरियल कुछ रंग प्यार के ऐसे भी.” मुझे इसके चर्चित जोड़े शाहिर खान यानि देव और एरिका फर्नांडिस यानि सोनाक्षी की युवाओं में लोकप्रियता पर कुछ नहीं कहना, बात करनी है उसकी कहानी पर. मध्यवर्गीय परिवार की एक स्वाभिमानी न्यूट्रीश्निस्ट गरीबी और खुद्दारी में बड़े हुए बिज़नेस टायकून की मां की निजी डॉक्टर बनकर घर आई और उसके प्यार में पड़ गई. चूंकि सीरियलों वाली शादी थी तो बिना साज़िश, बहकावे और ग़लतफहमी के हो भी कैसे सकती थी सो उन अड़चनों में कुछ हफ्तों के एपिसोड गंवाने के बाद वह भी हो गई. जहां तक याद है शुरुआती कुछ हफ्तों तक देखने के बाद इसी दौरान ऊब कर मैंने इस सीरियल से नाता तोड़ लिया था. उसके बाद बीच-बीच में इंटरनेट पर कहानी के अपडेट पढ़ने का सिलसिला जारी रहा फिर जैसे ही पता चला कि अपने हीरो-हिरोइन के बीच गलतफहमी के चलते डिवोर्स हुआ और कहानी कुछ साल आगे खिसककर वहां पहुंची जहां मुख्य किरदार उर्फ सोनाक्षी एक सफल बिज़नेस वुमन और एक बच्ची की मां है जिसके पिता यानि हीरो देव इस बात से अनजान हैं, अपनी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फिर गया. उसके कुछ महीने बाद सोनी टीवी ने कौन बनेगा करोड़पति के लिए जगह बनाने के लिए हड़बड़ी में कहानी में सब कुछ ठीक कर उसे खत्म कर दिया गया.

लेकिन महीने भर बाद ही जनता की मांग पर कहानी नए समय पर दूसरे सीज़न के साथ वापस आई. इस बार सोनाक्षी दो बच्चों के साथ करियर और परिवार के बीच तालमेल बिठाती हुई मां है जिसे पति के सहयोग के बावजूद सबकुछ बिखरा सा लगता है. और यहीं आता है एक ऐसा मोड़ जो हिंदी सीरियलों के कथानक के अब तक के रिकॉर्ड से आशातीत है. करियर के लिए बीवी का समर्पण देख पति ने घर पर रहकर बच्चे संभालने की ज़िम्मेदारी ले ली है और एक छोटी सी दुर्घटना की बदौलत रोडियो जॉकी बन गया है. देव के रोडियो कार्यक्रम का नाम है सुपर डैड जो करियर और परिवार के बीच तालमेल बिठा रहे पिताओं और पतियों के बीच बेहद लोकप्रिय है. महज़ आठ हफ्ते चले दूसरे सीज़न में कहानी ने ब्लू व्हेल के ख़तरे जैसे मुद्दे को भी उठाया.

दिनों दिन पिछड़ेपन की ओर बढ़ते टीवी सीरियलों की कहानी के बीच इस तरह की बात रख पाना बेहद सकारात्मक है. इससे ज़्यादा उत्साहित करने वाली बात ये कि भले ही रेटिंग की दौड़ में ये सीरियल ससुराल सिमर का और ये रिश्ता.. जैसे थके कार्यक्रमों के आगे टिक नहीं पाई लेकिन यू ट्यूब पर इसके लगभग हर एपिसोड को दस लाख से ज़्यादा बार देखा गया है. इंटरनेट मूवी डेटाबेस यानि आईएमडीबी ने भी इसे 10 में से 9.3 की रेटिंग दी है. जबकि सिमर और साथिया जैसे थकाउ कार्यक्रमों को यहां 2 से भी कम की रेटिंग मिली है.

हमने काफी संभावनाओं से भरी कहानियों को टीआरपी की चौखट पर असमय दम तोड़ते देखा है. जो बच गईं उन्होंने बचे रहने के लिए टीवी सीरियलों के कुल जमा चार-पांच फॉर्मूला में से एक या ज़्यादा को आत्मसात कर लिया. ये बात कई बार कही जा चुकी है कि टीवी सीरियलों को सोप ओपरा इसलिए कहा जाने लगा क्योंकि उन्हें ज़्यादातर साबुन कंपनियों के विज्ञापन मिलते थे. लेकिन भारतीय परिवेश में ढलने के बाद ये सास-बहु सीरियलों के नाम से ज्यादा पहचाने गए. वजह, इनका किचन पॉलिटिक्स और कहानियों को खींचते जाने के चार-पांच आज़माए नुस्खों से कभी आगे नहीं बढ़ पाना. कई बार बदलाव की उम्मीद के साथ शुरु हुई कहानियां भी प्रतीकों और फॉर्मूला के जाल में फंसकर टीआरपी की बलि चढ़ गईं. फिर वो टीवी सीरियलों का इतिहास बदलने वाली  बालिका वधु हो या फिर बंधुआ मज़दूरी की समस्या पर बनी उड़ान, स्क्रीन पर अपनी उम्र लंबी करने के मोह में ऐसे फंसे कि मुद्दे से फिसल कर सारी प्रतिष्ठा खो बैठे. ऐसे में सोनी की ये पहल बेहद सकारात्मक है.

वैसे टीआरपी रेटिंग के आगे नतमस्तक हुए बड़े चैनल बीच-बीच में केटेंट के साथ प्रयोग करने की कोशिश में नज़र आते रहे हैं. इज्रायली सीरियल प्रिज़नर ऑफ वॉर पर बनी स्टार प्लस की पीओडब्ल्यू बंदी युद्ध के हो या गैंगरेप की शिकार लड़की फातमागुल की कहानी पर आधारित स्टार प्लस की ही क्या कसूर है अमला का चैनल अब सीमित एपिसोड वाले सीरियलों पर पैसा लगाने और टीआरपी के मोह में पड़े बिना तय समय पर उन्हें ख़त्म करने का रिस्क ले रहे हैं. लेकिन मक्खी बनी सिमरों और सहमी-सिहरी गोपी बहुओं के झंझावत के आगे इन प्रयोगों को लंबे समय तक याद्दाश्त में बने रहने के लिए बहुत मेहनत की ज़रूरत है.

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में टीवी सीरियलों की जिस हद तक घुसपैठ है उसे सकारात्मक बना पाने के लिए सार्थक बहस वाली ऐसी कहानियों का कहा और देखा जाना बेहद ज़रूरी है जिससे उनकी आर्थिक सफलता भी बनी रहे.


Sunday, October 29, 2017

विचारधारा का उपहास या उपहास की विचारधारा?



बचपन में हमारे एक रिश्तेदार अक्सर घर आते रहते. हम सब पर बहुत स्नेह रहा उनका. पढ़ाई-करियर के बारे में बहुत अच्छी बातें बतातें. कहानियां भी खूब रोचक होती उनकी. आध्यात्म पर तो उनकी बातें हम चमत्कृत होकर सुना करते. नास्तिकता के समर्थन में उनके तर्कों से लाजवाब होते. फिर एक दिन उन्होंने जोश में ईश्वर को चुनौती देते हुए मां के मंदिर के सामने जूते पहने अपना पैर लहराकर एलान किया, ये हैं ना आपके भगवान, मैं तो कुछ नहीं मानता इन्हें.”

मेहमाननवाज़ी का तकाज़ा था, मां ने एक शब्द नहीं कहा. लेकिन मेरे मन में उस रोज़ वो सम्मान के कई पायदान एक साथ उतर गए. उनसे बाद में भी उतना ही स्नेह मिला, लेकिन अपने उपर उनकी बातों का प्रभाव कम होता गया. ज्ञान का ऐसा भी क्या दंभ कि सामान्य सा शिष्टाचार भी निभाने ना दे. किसी की आस्था और मनोबल के केन्द्रबिंदु का यूं अपमान करने वाला शब्दों का चाहे कितना बड़ा सौदागर क्यों ना हो सम्मान के शीर्ष पर पहुंचने लायक कभी नहीं बन सकता.

हम विचारों और विचारधारा के मैगी नूडल युग में जी रहे हैं. हर रोज़ नई किस्म की सामाजिक क्रांति करने को आतुर. फिर निर्धारित शब्द-सीमा में चार लाइनें लिखने को उस क्रांति के यज्ञ में अपनी ओर से पूर्णाहूति मान लेते हैं और उम्मीद करते हैं कि हर कोई उसके समर्थन में जयघोष करे. ना करे तो हिकारत से देखे जाने का भागी बने. ऐसा करने वाले अक्सर भूल जाते हैं कि वो किसी और का भला करने की आड़ में अपनी श्रेष्ठता साबित करने की उनकी बचकानी ज़िद बहुत कोशिश के बाद भी बुरी तरह एक्सपोज़ हे जा रही है.

विचारधारा हमारे घर की पिछली गली में बहने वाली पतली धार तो है नहीं. इसके अंदर भी कई-कई अंतर्धाराएं निहित होती हैं. फिर कोई ये उम्मीद भी कैसे कर सकता है कि दूसरे उसमें से बिल्कुल उसके बराबर ही अंजुलि भर लें और उसके जितना ही रसास्वादन करें? चूंकि क्रांति की कड़ाही में सबसे तेज़ी से उबाल लाने वाला द्रव्य आजकल फेमिनिज़्म है इसलिए सबसे ज़्यादा आंच भी उसी के नीचे धधकायी जाती है. राजनीति और धर्म का नंबर उसके बाद लेकिन स्त्रीवाद पर विवाद सदाबहार. साड़ी-स्कर्ट से छूटा तो बिंदी-बिछुए पर अटका, कहीं रसोई और दफ्तर का रगड़ा तो कहीं व्रत और त्यौहारों का झगड़ा. कुछ नहीं तो पति के सरनेम का ही टंटा उठा लिया. मैंने हमेशा ही इसे मेरा वाला पिंक छाप फेमिनिज्म कहा है. हर मामले में टांग घुसाकर सबको अपने कंफर्ट ज़ोन में ले चलने का बचपना.

जर्मन चांसलर एंजेला मर्कल तलाक और दूसरी शादी के बाद भी अपने पहले पति का सरनेम इस्तेमाल करती हैं, पेप्सी की चेयरपर्सन इंद्रा कृष्णमूर्ति ने राज नूई से शादी के बाद अपना सरनेम बदला. इधर पत्नी के उठने-बैठने पर भी पैनी नज़र रखने वाले हमारे एक वरिष्ठ ने शादी के बाद पत्नी को नाम ना बदलने का आदेश दिया क्योंकि उनको दकियानूसी कहलाया जाना मंज़ूर नहीं था.

साड़ी और गजरे पहनने वाली इसरो में वैज्ञानिक बन मंगलयान लॉंच कर सकती है और टैंक टॉप वाली को असहज होने पर भी अपना सीना ढकने की इजाज़त नहीं. लेकिन ये कहना भी साधारणीकरण की अति कि साड़ी पहनने वाली हर औरत शिक्षित और स्वतंत्र है या कम कपड़े औरतों की अपनी च्वाइस नहीं हो सकते. वैसे मेरे विचार में तो समाज और परिवार में रहकर किसी के लिए भी एब्सल्यूट फ्रीडम या पूर्ण स्वतंत्रता की बात करने से ज़्यादा भ्रामक और अनरियलिस्टिक और कुछ भी नहीं. फिर भी अगर आज़ादी को ही परिभाषित करना है तो उसका एक ही मानक होता है, अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी और उनका निर्वाह कर सकने लायक कूवत.

आपको क्या लगता है कि सैकड़ों-हज़ारों साल पहले औरतों के श्रृंगार के सामान उनको रूढ़ियों में कैद करने की पूर्व-निर्धारित योजना के साथ इजाद किए गए होंगे? या धर्म और राजनीतिक विचारधाराओं के साथ ऐसा हुआ होगा? हर नई परंपरा किसी ना किसी पुराने रुढ़िवाद को खत्म करने के लिए शुरु की गई लेकिन समय के साथ हर परंपरा का ग़लत इस्तेमाल किया गया. हर नया धर्म पहले से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं की जड़ता और बर्बरता के विरोध में आया और कालांतर में मौकापरस्तों के हाथों खुद भी जड़ और बर्बर बनता गया. लेकिन हम रुढ़ियों के इतने पक्के कि पुरानी खाल के फटे ढोल को ही पीटते जाने में अपनी शान समझते हैं.

इंसानी मान्यताएं और समस्याएं बहुत ही जटिल तंतुओं से बनी है. ज़िंदगी एकल मानक वाले समीकरण नहीं है जिसके सवाल एक तरह से हल कर लिए जाएं. यहां हर कोई अपने स्तर पर अलग किस्म की लड़ाई लड़ रहा है. हरेक के लिए उसकी ज़िंदगी भी एक और उसकी लड़ाई भी सबसे अहम. जो सच में क्रांति लाना चाहते हैं वो हरेक की लड़ाई का सम्मान करते हुए धैर्य से उनमें बृहत बदलाव के लिए काम करते हैं, यू हवा में धधकते गोले नहीं छोड़ते.


Monday, October 16, 2017

सौ बेटों के बराबर बेटियां कैसी होती हैं?



पिछले दिनों सुना डॉटर्स डे देश में आकर बिना ज़्यादा शोर मचाए निकल लिया, काम की अधिकता थी सो ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाई.  चूंकि देश अभी तक बेटियों को बचाने और पढ़ाने में ही जूझ रहा है, इन मौकों पर आमतौर पर गर्माया रहने वाला बाज़ार भी बेटियों को तोहफे देने की अपील में सुस्त ही रहा. 

हां, बेटियों की तारीफ में काफी कुछ लिखा-पढ़ा ज़रूर गया. इनमें सबसे ज़्यादा दोहराई गई पंक्ति रही, हमारी बेटी सौ या दस बेटों के बराबर है. और बेटियों के बारे में यही एक पंक्ति मुझे हमेशा से सबसे ज़्यादा विस्मित करती आई है.

आप किसी बात की चिंता करते ही क्यों हैं, आपकी तो एक-एक बेटी दस बेटों के बराबर है.

Sunday, October 8, 2017

और भी व्रत हैं ज़माने में....



आप करवा चौथ का व्रत नहीं करेंगी?” बिटिया पांचेक साल की रही होगी जब ये सवाल पूछते वक्त उसकी आंखें आश्चर्य से गोल थीं और अविश्वास से भरीं.
वो स्कूल में अपनी टीचर्स की करवा चौथ को लेकर तैयारियों और बातचीत से उत्साहित इस उम्मीद में घर लौटी थी कि यहां भी वैसा ही कुछ माहौल मिलेगा. जहां तक याद है उसी साल उसकी क्लास टीचर की शादी भी हुई थी. मेरे इंकार ने पहले कुछ क्षणों के हैरत को तुरंत ही अस्वीकार में तब्दील कर दिया. हाथों को हवा में लहराकर वो कई मिनट मुझे समझाती रही कि कैसे ये व्रत हर ममा के लिए कम्पल्सरी है क्योंकि उसकी सभी टीचर्स ये करती हैं.

ओके, पर मैं तो मेहंदी लगवा सकती हूं ना?”  काफी कोशिश के बाद उसने हथियार डाले. तब से ये हर साल का सेलिब्रेशन है हमारे लिए, उसके छोटे-छोटे हाथों की मेहंदी और चेहरे की चमक हमारे लिए इस दिन को बाकियों से अलग बनाती है. बाकी का समय हम दिवाली की तैयारियों में बिताते हैं.

Monday, October 2, 2017

भूगोल बदल रहा है








अष्टमी वाली सुबह ही यात्रा से लौटना हुआ, घर पहुंचते ही किसी तरह देवी पाठ निबटा यूनिवर्सिटी की भागमभाग. पिछली रात की अधूरी नींद भी पलकों की सवारी कसे अपना बकाया मांग रही थी. अष्टमी का दुर्गा दर्शन किसी तरह टाला नहीं जा सकता, सो बस रस्म निभाकर वापस लौटना हुआ. नीचे पार्क में गरबा नाइट का आयोजन तेज़ धुनों के साथ आमंत्रण दे रहा था लेकिन किसी तरह भी वहां जाना नहीं हो पाया. बाल्कनी से झांक कर दिल को वैसे भी ज़्यादा लोग कहां हैं वाली तसल्ली दे ली. इन दिनों यूं भी हर मौके पर एक से मौसमी गीतों का शोर कुछ यूं  होता है कि पता ही नहीं लगे, शादी वाला डीजे बज रहा है, कांवड़ियों की सवारी निकली है, गणपति का विसर्जन है या नवरात्रि गरबा. कनफोड़ू संगीत ने वैसे ही आधी रात तक जगाए रखा.