Saturday, May 27, 2017

ईव टीज़िंग में प्यार नहीं होता मीलॉर्ड



उसका नाम मुझे कभी पता नहीं चला, मेरे मुहल्ले में वो कहां रहता था ये भी नहीं जानती. आबनूसी रंग के बीच  उसकी लाल आंखें डरावनी लगती थीं. सुबह से शाम तक वो कई बार हमारे घर के सामने से होकर आया-जाया करता और पूरे वक्त हमारे घर की ओर मुंह किए लगातार घूरा करता. बरामदे या लॉन में अगर कोई मर्द बैठा नहीं दिखता तो वहीं रुक कर कुछ इशारेबाज़ी भी करता. नहीं पता कि कानून की परिभाषा में इसे ईव टीज़िंग कहते हैं या नहीं, लेकिन उसकी आंखो के भय ने अक्सर घर से बाहर निकलते मेरे कदम रोके हैं. कई बार गेट से बाहर निकलते ही उसे देख लेने पर उल्टे पैर घर के अंदर भी भागकर आई हूं. आज इतने सालों के बाद पहली बार इस बात की चर्चा करने पर अपना वो डर कितना अर्थहीन लग रहा है, लेकिन उस उम्र में इस तरह की कई छोटी-छोटी घटनाओं ने मेरे जैसी बहुत सी जीवट लड़कियों का आत्मविश्वास तोड़ा है, आज भी तोड़ती जा रही हैं.
शुक्र है सुप्रीम कोर्ट ने ईव टीज़िंग को आपत्तिजनक और धृणित कहा है. लेकिन ये क्या, ईव टीजिंग को बस लड़कियों का प्यार हासिल करने की कवायद भी बता दिया. क्या लड़कियों को सड़क, बाज़ार, मुहल्ले, कॉलेज, दफ्तर में छेड़ने वाले हर लड़के का मकसद उनका प्यार पाना ही होता है? मानसिक विकृति, यौन कुंठा, अपोषित अहम जैसे शब्दों का इससे कोई लेना देना नहीं? 
मेरी एक सहकर्मी अपने कॉलेज के दिनों में अपनी मां के साथ हॉबी क्लास के लिए निकली, एक लड़के ने छेड़खानी कर दी. अगले दिन दोनों फिर से उसी रास्ते गए, लड़का फिर उनके पीछे लग गया. तीसरे दिन उसका हॉबी क्लास जाना बंद कर दिया गया. वो लड़का उसके प्यार में पागल होकर पीछे नहीं आया, उसके बाद के दिनों में वो शायद किसी और सड़क पर किसी और शिकार का इंतज़ार कर रहा होगा.
बसों में, ट्रेन में, भीड़-भाड़ का फायदा उठाकर लड़कियों से शरीर से अपना लिंग घिसने वाले मर्दों को उनकी हां या ना से कोई मतलब नहीं होता. सड़क के किनारे-किनारे बच-बच कर चल रही लड़कियों रही लड़कियों के सामने से बाइक पर आकर उनका दुपट्टा खींच लेने वाले शोहदों को अक्सर उनकी शक्ल याद भी नहीं रहती. बाज़ार की धक्का-मुक्की के बीच लड़कियों की छातियां दबाकर बेधड़क निकल जाने वाले मर्दों के प्लान में उनसे रिश्ता जोड़ने का ख्याल दूर-दूर तक नहीं आता. बात-बात पर पीठ ठोंकने के बहाने टीनएज लड़कियों की ब्रा की स्ट्रैप खींच कर आंख मारने वाले टीचर भी ज़्यादातर शादी-शुदा ही होते हैं, कई अधेड़ भी. हरम खड़ा करने की ना तो इनकी औकात होती है ना योजना. ये वही लोग हैं जो हर शाम अपने घर वापस जाकर हर कोने से तसल्ली कर लेना चाहते हैं कि इनकी पत्नियों ने दिन भर घर से बाहर तांक-झांक तो नहीं की, साड़ी के पल्लू के इधर-उधर से कुछ दिख तो नहीं गया. इनका बस चलते तो ये अपनी बीवी-बहनों के लिए अपने घर के दरवाज़े पर तो क्या उनके सोचने की क्षमता पर भी ताले लगा दें. इसलिए, ईव टीज़िंग के मसले पर सवाल लड़कियों का प्यार पाने की सहमति का तो है ही नहीं. वैसे भी हमारे शहर में ये मशहूर था कि जिस लड़की के बाप-भाई जितने बड़े लफंगे, उसके घर पर बंदिशों की पहरेदारी उतनी ही ज़्यादा.  

यकीन मानिए, ज़्यादातर लड़कों के लिए लड़कियों के छेड़ना उतना ही खामखा का काम है जितना राह चलते कुत्ते को पत्थर से मार देना, जिससे उनकी ज़िंदगी का कुछ नहीं बनता-बिगड़ता बस एक सैडिस्टिक प्लेज़र मिल जाता है, अहम पर थोड़ा सा मल्हम लग जाता है. ना कुत्ता अपने पीठ पर लगे धाव की रिपोर्ट लिखाने जाता है और ना ही लड़की ना अपने चोटिल आत्मविश्वास को दिखाकर किसी से शिकायत कर पाती है.
उन्होंने पैदा होने के बाद से ही सीखा है कि कैसे बस उनका लिंग परिवार में हर किस्म की सहूलियत पर उनका पहला हक निर्धारित कर देता है. उन्होंने लड़कियों के खिलाफ किए गए हर
अपराध के बाद
लड़कों से ग़लती हो जाती है की कैफियत देते, उन्हें अपनी ओट में छुपा लेने वाले समाज के रहनुमा देखे हैं. उन्हें ज़र और ज़मीन के साथ-साथ जोरू को भी उपलब्धियों की फेहरिस्त में शामिल करना सिखाया गया है, जिसे हासिल के लिए कुछ भी कर गुज़रना जायज़ है. इन सब परिस्थितियों में पले लड़के जब लड़कियों के साथ छेड़खानी करते हैं तो वो प्यार के प्रतिदान के अभिलाषी नहीं होते बल्कि विक्षिप्तता और विकृत मानसिकता के शिकार होते हैं.
इसलिए, ईव टीज़िंग की ये अदालती व्याख्या बस सतह को कुरेदने जैसी है. एक लड़की को हर रोज़ इस तरह की इतनी सारी घटनाओं से रू-ब-रू होना पड़ता है कि एक सीमा के बाद उसकी सारी संवेदनाएं मर जाती हैं. प्यार की उम्मीद में लड़कियों का पीछा करने वाले लड़के मुझे इस जमात के सबसे मासूम बच्चे लगते हैं. अगर मसला सचमुच प्यार का है तो ज़्यादातर मामलों में वो कभी भी एक सीमा से बाहर नहीं जाएंगे. ना, मैं यहां उन मामलों को कतई जस्टीफाई नहीं कर रही जिनका अंत लड़कियों पर एसिड फेंकने या फिर उनकी हत्या कर देने पर जा होता है. ये जघन्य कृत हैं, सरेआम फांसी पर लटका दिए जाने की सज़ा के लायक. लेकिन ये वो एक्सट्रीम घटनाएं हैं जिनकी खबर बनती है.
मैं बात उन घटनाओं की कर रही हूं जो हमारे आस-पास हर रोज़ घटती हैं, इतनी आम है कि हम उससे आंखें मूंदे रहते हैं. उस पर खबर बनाया जाना तो दूर, हम उसे ग़लती मानते ही नहीं. अपनी बेटियों की कंडीशनिंग भी हमने ऐसी कर दी है कि भुक्त-भोगी लड़की उसकी चर्चा भी किसी से नहीं कर पाती. इस ग़लत को ग़लत साबित करने की कोशिश में वो खुद निचुड़ जाएंगी और आखिर में नुक्सान भी उसी का होगा.
इन्द्र ने अहल्या के साथ जो किया वो वैयक्तिक अपराध था, लेकिन इन्द्र के कुकर्म की सज़ा जो अहल्या को मिली वो सामाजिक अपराध था. सभ्य और आधुनिक होने के बाद हम इन्द्र को दोषी पाकर सज़ा देने की वकालत तो करते हैं लेकिन वैसा समाज नहीं बनना चाहते जो इन्द्र के अपराध की सज़ा अहल्या को ना दे.  





Sunday, May 14, 2017

इस मदर्स डे...


मॉल, बाजार, दुकानें फिर से सज गई हैं. हर सुबह दरवाज़े पर पड़े अखबारों को उठाते ही अंदर से कई रंग-बिरंगे फ्लायर्स निकलकर, ऊंची आवाज़ में हमें याद दिला रहे हैं कि मदर्स डे आने वाला है और अगर मां से प्यार जताने का ये मौका हम चूके तो मातृभक्ति साबित करने की अगली बारी बावन हफ्तों बाद ही आएगी, और वक्त का क्या भरोसा. तो मां के नाम की सेल में कपड़ों, गहनों, मोबाइल फोन्स से लेकर किचन के बर्तनों तक, सब पर छूट जारी है. अपनी श्रद्धा और हैसियत के हिसाब से उठा लो, ना हो तो मां को कैंडल लाइट डिनर के लिए ही ले जाओ.
इधर वैलेंटाइन डे को मातृ-पितृ दिवस बनाने की मुहिम छेड़ने वाले लोग गर्मी के मारे थोड़े सुस्त से हैं. थोड़ा कोंच कर पूछो तो कांखते हुए कहेंगे, ये तो विदेशी चोंचले हैं भाई, हमारे लिए तो पूरा साल ही मातृ दिवस है. सच में? जीते भी तो रोज़ हो, हैप्पी बर्थ डे भी रोज़ ही मना लेते. लब्बो-लुआब ये कि मदर्स डे पर सरकार, बाज़ार सबकी बात सुनी जाएगी, नहीं पूछा जाएगा तो मां से. क्योंकि हम तो माओं को लेकर सिनेमा के भारी-भरकम डोज़ पर पले-बढ़े हैं, त्याग की मूर्ति, बच्चों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढने वाली, परिवार को जोड़ कर रखने वाली. मां दरवाज़ा खोलेगी, आप गिफ्ट उसकी ओर बढाएंगे और उसकी आंखों में खुशी और कृतज्ञता के तारे झिलमिलाने लगेंगे. वैसे भी उनके ज़माने में कहां होते थे ये सब, उनके बच्चे देखो तो कैसे व्यस्तता के बीच भी समय निकालकर पहुंचे हैं. नहीं भी पहुंचे तो ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स और होम डिलीवरी सिस्टम तो है ही तत्परता से आपकी कमी पूरी करने को आतुर.
हम मां को इकाई तो मानते ही नहीं, मान लेते हैं कि वो मां बनी तो गढ़ दी गई एक ही सांचें में, एक सा सोचने, एक सा करने वाली. बकवास.
छोड़ों, बाक़ी की बात करने से पहले एक क्विज़ खेलते हैं,
मां की पसंदीदा सब्ज़ी कौन सी है और क्या है ऐसा जो मां को हाथ लगाना भी पसंद नहीं?
कौन सा हीरो जिसकी फिल्में देखकर मां की धड़कनें आज भी बढ़ जाती हैं?
कौन सा एडवेंचर स्पोर्ट्स मां एक बार ज़रूर ट्राई करना चाहती है?
वो कौन सा काम है जिसे मां बाकी की ज़िंदगी करते हुए बिताना चाहती है?
मां हमेशा वो नहीं होती जिसे देखते हम बड़े हुए हैं. मां ने दबा रखा होता है खुद को सोशल एक्सेप्टेंस की कई परतों के भीतर. जैसे कभी उनके संस्कार और कर्तव्य उनपर थोपे गए थे, आज अपना तोहफा उनपर मत थोपिए. त्याग और महानता के नाम पर शहादत का तमगा पहनाकर सैनिकों और माओं से उनकी ज़िंदगी की बहुत बड़ी क़ीमतें वसूलते आए हैं हम. इस मदर्स डे, चलिए अपेक्षाओं और उपेक्षाओं की कई परतों के भीतर छुपी अपनी मां को ढूंढ निकालते हैं.
अच्छा बताइए, अगर आपकी शादी ना करके, आपको पढ़ने दिया जाता तो आप क्या बनतीं?’ कल शाम की चाय पीते-पीते मैंने सासू मां से पूछा. मां दसवीं की परीक्षाएं छोड़कर सोलह साल की उम्र में पत्नी बनीं और उसके अगले वर्ष मां. अपना आश्चर्य छुपाती मां को कई मिनट लगे सोचने में, वैसे तो उसके लिए अब बहुत देर हो गई है, लेकिन मैं बनती जज.
वकील क्यों नहीं?’
ना, वकील लोग बहुत झूठ बोलते हैं, जज ठीक है, न्याय करता है. लेकिन अब बोल कर क्या फायदा, समय तो निकल गया.
अच्छा, अब अगर कोई शौक पूरा करना हो तो?’
उम्र के 73वें पायदान पर खड़ी मां ने बिना एक सेकेंड सोचे जवाब दिया, बस गाते रहने का मन करता है, बिना रुके. बारह सालों में मैंने मां को आरती के अलावा मां कुछ भी गुनगुनाते नहीं सुना. सुना है तो अपने सबसे छोटे बेटे को बारबार गाने के लिए आग्रह करते जाना. लेकिन अब मां ने वादा किया है कि मदर्स डे पर वो कैरिओके में अपने पंसदीदा गाने गाकर हमें सुनाएंगी. वो गाने जिनकी फेहरिस्त उनकी बच्चों को भी नहीं मालूम.
इस मदर्स डे चलो अपनी मांओं को ये विश्वास दिलाते हैं कि उनकी ख्वाहिशों के लिए अभी भी देर नहीं हुई है.
58 की उम्र में मेरी मां बेसब्री से इंतज़ार कर रही है अपनी पीएचडी की डिग्री का. पूछने पर मासूमियत से मुस्करा देती है, पैंसठ साल है रियटरमेंट की उम्र, 6-7 साल तो अभी भी काम कर सकते हैं.  
मां को सब पता होता है, रसोई के किस डब्बे में कितनी दाल, बेटे की पीठ पर चार हफ्ते पहले हुई फुंसी का हाल, आने वाली एकादशी की तारीख, पड़ोस के लड़के की सुंदर स्वेटर में कितने फंदे सीधे और कितने उल्टे, कपड़ों की आलमारी को कब धूप की है ज़रूरत, रिश्तेदारों के आने-जाने की तारीख. मां ढूंढ सकती है घर में खोए कागज़ के एक छोटे से टुकड़े को भी, बस नहीं ढूंढ पाती खुद को. घर के कोने-कोने से धूल झाड़ती मां उदासीन ही रह जाती है अपनी  हसरतों पर जमी लाचारी की मोटी परतों से. इस मदर्स डे क्यों ना अपनी मां को वो विश्वास दें कि वो अपने ऊपर के तमाम आवरणों को हटाकर खुद को वापस पा ले. 
माएं अधूरी ख्वाहिशों का मेला हैं, मां बनने का मतलब किसी और की नींद से सोई, किसी और की ज़रूरत से जागी, सोई तो उसके सपने भी उसके अपने नहीं रहते. जीभ भूल जाती है अपने ही स्वाद की पहचान और समय गुज़र जाने के बाद सपने भी डर जाते हैं वापस आने में या क्या पता तब तक दम ही तोड़ दिया हो उन्होंने. एक बार टटोलकर देखें तो सही, क्या पता कुछ हसरतों में सांस और उम्मीद बाकी हो अभी.
इस मदर्स डे चलो अपनी मां को तोहफा नहीं, सपने देते हैं. और देते हैं उसे पूरा कर पाने की आज़ादी और हौसला. ताकि नाप सकें वो अपने हिस्से का आसमान और समेट लें अपनी पसंद की हंसी.
हर साल मां को ये क्यों बताना कि हम कितना प्यार करते हैं उनसे, एक बार, बस एक बार, क्यों ना मां को खुद से भी प्यार करना सिखा दें?   
इस मदर्स डे, चलो मां के लिए उनकी वो उंगलियां बन जाएं जो उसके मन की सारी गांठें खोल दे, और मिला दे उनको अपने आप से.


Wednesday, May 3, 2017

बस इतना सा..



रेस्टोरेंट मंहगा था, लेकिन गंवई अंदाज़ का. शायद थीम ही वही रही हो उसकी. लकड़ी की भारी भरकम चौखट पर भारी नक्काशी का काम था. सिर झुकाकर अंदर घुसने की कोशिश में उंगलियां कुछ क्षणों के लिए एक-दूसरे से उलझ गईं तो दोनों चौखट के आर-पार एक-एक पैर किए ठिठक कर खड़े हो गए. जगह ढूंढने के बहाने दूसरी ओर देखते हुए भी अमोल जान गया था कि सुमी की उंगलियां इस वक्त सख्ती से अंदर की ओर मुड़ी होंगी और उसकी पलकें झपकना भूल गई होंगी.
अंदर थोड़ी सी जगह में गांव को जबरन इतना ज़्यादा ठूंसने की कोशिश की गई थी कि अमोल को थोड़ी घुटन हो आई. एलईडी बल्ब लालटेन में डाल कर जगह-जगह छत से लटका लिए गए थे, एक ओर मूंज की खाट रखी थी, दूसरी ओर चौकी के ऊपर छोटे स्टूल रखकर उस पर खाना परोस दिया गया था, प्राइवेट केबिन के लिए हॉल के भीतर झोपड़ीनुमा कुछ बन रखा था. अमोल फिर पसोपेश में पड़ गया, मौजूदा स्टेटस के मुताबिक दोनों का फूस के इस बाड़े के पीछे बैठना ठीक होगा या नहीं. सुमी तब तक दूसरे कोने में पहुंच गई थी जहां नकली पेड़ की फाइबर की बनी टहनियों से झूलानुमा सीटें आमने सामने लटक रही थीं.
अमोल मन ही मन हिसाब लगाने लगा, चौदह महीने, तीन हफ्ते और पांच दिन बाद पहली बार वो दोनों ऐसे साथ थे जब उनके बीच कोई और शख्स धाराप्रवाह बोलकर मध्यस्थता की कोशिश नहीं कर रहा था. शायद इसलिए इस वक्त अमोल को दोनों के बीच शब्दों की कमी बेतरह साल रही थी. यूं सुमी के साथ रहते हुए शब्दों की ज़रूरत कभी ज़्यादा नहीं होती थी. लेकिन आज शब्द होते तो अमोल को यूं बार-बार थूक निगलना नहीं पड़ता. उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि बस स्टॉप के बाहर अचानक टकराने पर वो सुमी को साथ में लंच करने का न्यौता दे पाया और वो बिना कुछ सवाल पूछे उसके पीछे चल पड़ी. साथ रहते रहते जो बातें सांसों की तरह अनिवार्य होकर भी ग़ैरमकसद लगती रह सकती हैं, दूरियां बढ़ने पर उनका होते जाना कितना बड़ा प्रिविलेज लगने लगता है.
सुमी उसे एकटक देख रही थी, वो जानता था इस वक्त वो उसके अलावा दुनिया में किसी के भी बारे में सोचती हो सकती है. सुमी की आंखों में तटस्थ उदासी थी, अमोल बहुत असहज हो गया.
सालों का हिसाब अब मायने नहीं रखता लेकिन पहली बार वो ही आया था सुमी के पीछे, उसकी डायरी से गिरी चिट्ठियां उसे लौटाने. चिट्ठियां लिफाफे से बाहर थीं.
कहां मिलीं?’ चिट्ठियों को एकटक देखते हुए बिना उसकी ओर हाथ बढ़ाए सुमी ने पूछा था.
लाइब्रेरी के बाहर. आप ही की हैं ना?’
कॉफी पिएं?’
इस अप्रत्याशित जवाब से वो चौंक गया था.
पढ़ लीं तुमने सारी?’ कॉफी की पहली घूंट के साथ ही औपचारिकताएं गटक कर सुमी ने उससे पूछा था.
हां, पता ढूंढने के लिए ज़रूरी था. अपने इस एक्सप्लानेशन पर उसे खुद हंसी आई.
मेरी बहन थी वो, नौ साल की थी, मैं सात कीहम गांव गए थे, तालाब के बगल में मिट्टी के घरौंदे बनाने साथ निकले. मिट्टी कम पड़ गई, उसने कहा तुम खिड़कियों में माचिस की सलाखें लगाओ हम मिट्टी लेकर अभी आते हैं. वो नहीं आई. शाम को उसे तालाब से निकाला सबने, मुझे देखने भी नहीं दिया. बीस साल हो गए, ये सारी चिट्ठियां मैं उसी को लिखती हूं, जब भी दिल उदास होता है, या किसी से नाराज़. इन्हें हमेशा साथ रखती हूं. सब मज़ाक बनाते हैं मेरी इस आदत का, मैं छोड़ नहीं पाती इसे. तुम्हें भी अजीब लगा क्या?
वो बिना किसी प्रतिक्रिया के उसे देखता रहा, थोड़ी देर बाद उसने महसूस किया सुमी की नज़र उससे जवाब मांग रही है.
लस्सी पिएं? उसके मुंह से निकला.
सुमी हंस पड़ी, गर्म ठंढा नहीं होता क्या तुमको?
वो क्या होता है? वो लस्सी लेने चला गया.
नॉर्मल रह पाने के लिए ज़रूरी होता है कि हम सभी के अंदर कुछ ना कुछ एब्नॉर्मल रहे.लस्सी की आखिरी घूंट के साथ अमोल ने जवाब दिया था. सुमी और वो उस दिन से कभी अलग नहीं हुए.
बाकी सब नार्मल है मुझमें, तीन महीने बाद प्यार के पहले इज़हार के जवाब में सुमी ने हंस कर कहा था.
बाकी सब नॉर्मल से बहुत खूबसूरत है इसके अंदर, दो साल बाद उसकी ऊंगली में सगाई की अंगूठी डालते हुए अमोल ने सोचा था.
इस यकीन के साथ जीते जाने कितने साल बीत गए. अपनी प्रेम कहानी से सुंदर कहानी यूं भी किसी को कोई और नहीं लगती. ना कोई और जोड़ा अपनी जोड़ी की तरह मेड फॉर इच अदर लगता है. लेकिन उन दोनों को देखकर बहुत सारे लोगों ने कई बार ऐसे अल्फाज़ कहे थे. या शायद उनके भीतर सब इतना खुशनुमा था कि अमोल के कान बस अच्छी बातें सुन पाते थे.
कुछ यूं ही दोनों साथ रहे, एक दूसरे के होने की अनिवार्य शर्त की तरह. जब तक इस साथ की आदत इतनी नहीं पड़ गई कि उसके होने का अहसास ही खत्म हो गया. पहली दरार कब पड़ी अमोल को याद नहीं, पूछने पर सुमी को भी याद हो ये ज़रूरी नहीं. याद है तो बस ये कि दरार इतनी बढ़ गई कि उसे पाटने के लिए दोनों के बीच बहुत से लोगों को आना पड़ा, फिर जितने लोग बीच में आए दूरी और बढ़ती रही.
अमोल जो मनाने की तरकीब पहले ढूंढता फिर बेसब्री से इंतज़ार करता कि कब सुमी रूठे और वो मनाना शुरु करे, अब नाराज़गी की वजहों की पड़ताल करना चाहता. सुमी जो अमोल की खामोशियों से मायने समझ जातीं, अब हर अहसास का शब्दों की शक्ल में सबूत मांगती थी. सुमी जिस दिन घर छोड़कर गई अमोल ने भी वहां ताला लगा दिया. ऑफिस के पास पीजी में शिफ्ट हो गया. दोनों के पास एक दूसरे तक लौट के आने के सारे ठौर बंद हो गए. बस इतनी सी मज़बूती होती है क्या उस रिश्ते में जिसकी दुहाई लोग जन्मों के नाम पर देते हैं? अमोल कई बार सोचता है.
दो लोग चाहे कुछ भी कर लें, बातचीत से कभी अपने मनमुटाव का हल नहीं ढूंढ सकते जबतक वो इस इंतज़ार में रहें कि सामने वाला अपनी ग़लती मान ले. आज इस अनजान जगह में जाने कितने समय बाद अमोल को अपना गुरूर अंधेरे में परछाईं की तरह गायब होता महसूस हुआ. जी चाहा कि वो ज़ोर लगाकर बीच के इन सारे महीनों को किसी इरेज़र से मिटा दे, फिर वो सोचने लग पड़ा, अगर उसके क़दम छोटे पड़ गए तो क्या सुमि आगे बढ़कर उसका हाथ थाम पाएगी? उसे आश्वस्ति नहीं हुई.
खाना आ गया था, अमोल ने सर उठाकर देखा, सामने की कुर्सी पर बेहद छोटे कटे बालों वाली लड़की बार-बार उसकी ओर देखे जा रही थी. थोड़ा ज़ोर डालने पर अमोल को याद आ भी जाता, लेकिन उसने पराठें का निवाला तोड़ने में अपनी सारी ताकत लगा दी, इस समय सामना करने के लिए उसे सुमी के अलावा और किसी की निगाहें नहीं चाहिए थीं. नज़र वापस ऊपर करने पर उसने पाया कि वो लड़की उनकी टेबल की ओर बढ़ रही है.
हाय, पहचाना मुझे, रितु सरीन, नाउ महरोत्रा, मैं एचएमएस बैंगलोर में थी तुम्हारे साथ. सॉरी तुम्हारा चेहरा याद है लेकिन नाम भूल सी गई हूं, सम शुक्ला इफ आय एम नॉट मिसटेकन, वो धाराप्रवाह बोलती जा रही थी, लेकिन तुम्हारा चेहरा इतनी अच्छी तरह याद है कि कुडंट इग्नोर यू एनी मोर, अपने हस्बैंड से तब से यही कह रही थी, लेकिन नाम याद करने तक पेशेंस नहीं हुआ, उसने लाल चूड़े से भरा अपना हाथ हवा में लहरा तक जता दिया कि हस्बैंड नाम का ये संबोधन उसकी ज़िंदगी में इतना नया जुड़ा है कि उसका उच्चारण वो जितना जी चाहे ज़ोर लगाकर, चबाकर, कर सकती है.
अमोल, उसने कहना चाहा, लेकिन तब तक रितु सरीन उर्फ महरोत्रा सुमी से मुखातिब थीं, एंड यू मस्ट बी सुमी, मिस्टर शुक्ला का चेहरा देखकर मुझे तुम्हारा ही नाम याद आया. आई मीन दिस वॉज़ द नेम ऑन हिज़ लिप्स ऑल द टाइम. कोई और बात ही नहीं करनी, सुबह-शाम बस सुमी और सुमी की कहानियां. इतने साल हो गए लेकिन इनके मुंह से तुम्हारी सुनी कहानियां मुझे याद हैं, इन्फैक्ट हमारी पूरी टीम को याद होगी. कोई हंस ले, मज़ाक बना ले या जेलस हो ले, इनको कोई फर्क नहीं. हैव नेवर सीन ए मैन सो मच इन लव बिफोर, इनफैक्ट मैं अनिरुद्ध आई मीन अपने हस्बैंड से भी यही बता रही थी. इस बार उसने हाथ हिलाकर अपने हस्बैंड को भी बुला लिया.
कुर्सियां खींच ली गईं, बाकी का खाना साथ में पूरा हुआ. सालों पुरानी कहानियां दोहराई गईं, हंसी मज़ाक शुरू हुआ. अमोल ने बीच में नज़र उठाकर सुमी को देखा, सुमी उसे ही देख रही थी, अमोल को चौदह महीने, तीन हफ्ते और पांच दिन दोनों के बीच की खाई में गिरते नज़र आए.
रेस्तरां से बाहर निकलते वक्त उंगलियां फिर टकराईं लेकिन इस बार सड़क पर निकलने तक यूं ही उलझी उन दोनों के बीच चलती रहीं. मेरी एक मीटिंग है, बस स्टॉप पर पहुंचकर सुमी ने कहा. उसे अलग दिशा में निकलना था. लेकिन अमोल जानता था इस बार वापसी मुश्किल नहीं होगी.
कभी-कभी असंभव सी लगने वाली दूरी को पाटने के लिए बस इतना सा कुछ चाहिए होता है.



Saturday, April 29, 2017

सशर्त इज्ज़त के विरोध में....



हम उम्र के उस दौर से गुज़र रहे थे जिसे टीनएज कहा जाता है. किसी भी बात पर टोका-टाकी तीर की तरह लगती, और मां थी कि चलने, उठने, खाने, रहने, पढ़ने हर चीज़ का एक रूल बुक लेकर हमारे पीछे पड़ी रहती. आए दिन किसी ना किसी बात पर डांट पड़ती और हम कई-कई रोज़ मुंह सुजाए घूमते रहते. इसी बीच मां को अनदेखा कर पापा के आगे-पीछे करने की आदत पड़ी. जब भी मां से डांट पड़ती हम उनसे मुंह फुला लेते और खूब तत्परता से पापा को खुश करने में लग जाते.

नाराज़गी के एक ऐसे ही सीज़न में हमने पापा को खुश करने के लिए गोलगप्पों का इंतज़ाम किया. चूंकि मोटिव मां को इग्नोर करने का था तो उनसे बिना कुछ पूछे, बिना कोई मदद लिए काम को अंज़ाम देना था. हम पूरे दिन लगे रहे, शाम तक तैयारी मुकम्मल हुई. पापा को साग्रह बुलाकर लाया गया. पापा हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए आए, डायनिंग चेयर पर बैठे, हमने बड़े जतन से पहला गोलगप्पा बना कर पापा को सामने रखा. पापा ने वैसे ही मुस्कुराते हुए कहा, बेटियों ने बनाया है तो हमें खाना ही होगा लेकिन जब तक मम्मी नहीं खाएंगी, हम कैसे खा सकते हैं.

हमारा सारा गुरूर एक सेकेंड में फुस्स, काटो तो खून नहीं. हमें तो अब तक यही लगता रहा था कि पापा को मम्मी के साथ हमारे इस मेरी गो राउंड का पता ही नहीं होगा. लेकिन पापा ना केवल सब जानते थे बल्कि हमें हमारी जगह दिखाने के लिए सही वक्त भी चुन कर इंतज़ार भी करते रहे थे. हम इस तरह की कई घटनाओं के बीच बड़े हुए, जब पापा ने हर उस इंसान से किनारा कर लिया जिसने मां की उपेक्षा की.

मेरी मां वर्किंग नहीं हैं. घर और बाहर के कार्यक्षेत्र मां और पापा के लिए बड़े कायदे से बंटे हुए थे. मैंने दोनों को कभी एक-दूसरे के मामलों में अनधिकृत टांग अड़ाने की कोशिश करते नहीं देखा. लेकिन कभी भी घर का छोटा-बड़ा कोई फैसला मां के बिना नहीं लिया गया. हर बात मे मां की सहमति ज़रूरी होती है.

पापा के मुंह से हमेशा एक ही वाक्य सुना, पैसे चाहे कोई लेकर आए, घर तो घरनी का ही होता है.

बड़े होते वक्त हमारे सामने करियर नहीं बनाने का ऑप्शन कभी था ही नहीं, कभी नहीं कहा गया कि पढ़ाई नहीं करोगी तो कोई बात नहीं, शादी कर देंगे. फिर भी हम कभी भी ये सोचकर नहीं बड़े हुए कि सहमति उन्हीं की ली जाती है जो पैसे कमाते हैं या विचार उन्हीं के मायने रखते हैं जो कमाकर घर चलाते हैं.

द्रौपदी की अनुमति के बिना उसके जीवन का फैसला लेने वाले युद्धिष्ठिर सशरीर स्वर्ग पहुंचकर भी अपने उस अपराध से बरी नहीं हो पाए. लेकिन मर्द फिर भी बाज़ नहीं आते.

ये कहकर कि इज्ज़त और सहमति का अधिकार पाने के लिए औरतों का आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर होना पहली शर्त है, आप उन तमाम सदियों के योगदान को सिरे से खारिज कर रहे हैं जो औरतों ने घर में रहकर परिवार और समाज के लिए किया है. औरत की इज़्जत इस बात से निरपेक्ष होनी चाहिए कि वो कमाती है या नहीं. उसे इज़्जत इसलिए मिलनी चाहिए क्योंकि वो इंसान है, घर की सदस्य है. परिवार के लिए उसकी सहमति इसलिए मायने रखनी चाहिए कि उसके पास अच्छे-बुरे का फर्क करने की तमीज़ है, वो हर मसले को अपने नज़रिए से देखकर उसपर विचार व्यक्त कर सकती है, मुश्किल परिस्थितियों में तटस्थ रहकर फैसला ले सकती है.

उन्हें पढ़ाई और नौकरी के लिए बराबर इसलिए मिलने चाहिए क्योंकि उनमें काबलियत है, क्योंकि आधुनिक समाज कार्यक्षेत्र में उसके योगदान के बिना आगे नहीं बढ़ सकता. और सबसे अहम बात, क्योंकि ये उनकी मर्ज़ी है. 

इज़्जत और सहमति का अधिकार उन सबसे बहुत पहले की ज़रूरत है, हमारे लिए सांस लेने जितना अनिवार्य, इसलिए उसके हो सकने के लिए किसी भी शर्त की दरकार नहीं. सशर्त ज़मानत दी जाती है, इज्ज़त और आज़ादी नहीं.

और हां, पहला गोलगप्पा उस दिन मां ने ही खाया था.

  

Sunday, April 23, 2017

चालीस की उम्र


इस शीर्षक का एक लेख ग्रेजुएशन में कम्पल्सरी हिंदी के सिलेबस में था. अठ्ठारह बीस की उम्र में जब चालीस का मतलब बुढ़ापा होता है, वो लेख हमें पढ़ाने का क्या मतलब था, समझ में नहीं आया. पढ़ाते वक्त हमारी प्रोफेसर भी बार-बार याद दिलाती रही कि क्योंकि पूरे कमरे में चालीस के पार केवल वही हैं इसलिए उस लेख का गूढ़ मतलब भी केवल वही जान सकतीं हैं. सुनकर ये विश्वास और पुख्ता हो गया कि ये वानप्रस्थ की बाते हैं, हमारे लिए बेज़रूरत.

Saturday, April 15, 2017

फुलटाइम फेमिनिज्म के पहले..


अब बस, बहुत हो गया, अब मैं फेमिनिस्ट हो जाना चाहती हूं, फुलटाइम. नारीवाद से पुरूषत्व की बू आती है, फेमिनिज़्म खांटी जनाना शब्द लगता है. एकदम कूल और वोग, बिल्कुल मेरे शब्दों के चयन की तरह.
हर सुबह जब मैं आटे और मसाले सने हाथों को जल्दी-जल्दी साफ कर, एक हाथ में कंघी और दूसरे में ब्रेकफास्ट का डब्बा लिए भागती हुई गाड़ी में बैठकर ऑफिस के लिए निकलती हूं तो मेरा मन विद्रोह कर उठता है. क्या फायदा कमाकर खाने वाले स्वाभिमान से, इससे तो फेमिनिस्ट ही हो जाते.

Monday, February 27, 2017

फेमिनिज़्म बनाम...टु हेल विद इट



कुमारी ने छोटे शहर के बड़े से घर में आखें खोलीं थीं. परवरिश, संयुक्त परिवार में पाई, जहां लड़के और लड़कियों को पालने में कोई अंतर नहीं किया जाता, खाना-कपड़ा, पढ़ाई-लिखाई का वातावरण दोनों को एक समान मिलता. बाकी लड़के को महंगी पढ़ाई के बाद हर हाल में नौकरी करनी होती थी और लड़कियों को सपनों का राजकुमार होम डिलीवर करने के वादे किए जाते. कुमारी को सपने देखना बेहद पसंद था, चूंकि इतना सारा वक्त सपने देखने में चला जाया करता कि कुछ और करने का समय ही नहीं बचता. कुमारी को पूरा भरोसा था कि जिसने सपने दिए हैं वही उन्हें पूरा करने के रास्ते भी बताएगा. कुमारी की आंखें बड़ी-बड़ी और बातें बड़ी मीठी हुआ करती थीं. बातें करना उसे बेहद पसंद भी था, नख से शिख तक प्रसाधन युक्त होकर, बड़ी अदा से कंधे उचकाकर, आंखें गोल-गोल घुमाकर, वो घंटों अपनी बात सही साबित करने में लगी रह सकती थी.

Saturday, February 25, 2017

आईलाइनर


दावे के साथ कह सकता हूं कि लड़कियों की 'दुर्दशा' पर आठ-आठ आंसू बहाने वाले और उन्हें बराबरी का हक दिलाने के लिए गला फाड़कर चिल्लाने वाले मर्द कभी भी किसी गर्ल्स कॉलेज की भीतर अकेले नहीं गए होंगे और अगर गए भी होंगे तो बिना सिर मुंडाए बाहर लौट कर नहीं आए होंगे। पहली बार मेरा जाना हुआ था जब मिताली फीस भरने के आखिरी दिन पैसे और आईकार्ड घर भूल आई थी और पापा ने मुझे सीधे उसकी प्रिंसीपल के ऑफिस पहुंचने का हुक्म सुनाया था। बास्केट बॉल कोर्ट की दीवार पर तीस-चालीस लड़कियां कोरस में टांगे झुलातीं दिख गईं तो नज़रों समेत मेरा पूरे का पूरा सिर 60 डिग्री के कोण पर झुक गया। बड़ी मुश्किल से हकलाते हुए एक से मैंने प्रिंसिपल ऑफिस का रास्ता पूछा तो गेट से दाएं, फिर तीन दरवाज़े पार बाएं, फिर सीधे, दाएं और बाएं का दुरूह रास्ता समझ जिस जगह पर मेरी यात्रा खत्म हुई उसके सामने संड़ांध मारता टायलेट नज़र आया। उल्टे पैर वापस बाहर आया तो सामूहिक ठहाकों ने ऐसा स्वागत किया कि फिर वापस अंदर...

Sunday, February 19, 2017

कहानी ???



दावे के साथ कह सकता हूं कि लड़कियों की दुर्दशा पर आठ-आठ आंसू बहाने वाले और उन्हें बराबरी का हक दिलाने के लिए गला फाड़कर चिल्लाने वाले मर्द कभी भी किसी गर्ल्स कॉलेज की भीतर अकेले नहीं गए होंगे और अगर गए भी होंगे तो बिना सिर मुंडाए बाहर लौट कर नहीं आए होंगे। पहली बार मेरा जाना हुआ था जब मिताली फीस भरने के आखिरी दिन पैसे और आईकार्ड घर भूल आई थी और पापा ने मुझे सीधे उसकी प्रिंसीपल के ऑफिस पहुंचने का हुक्म सुनाया था। बास्केट बॉल कोर्ट की दीवार पर तीस-चालीस लड़कियां कोरस में टांगे झुलातीं दिख गईं तो नज़रों समेत मेरा पूरे का पूरा सिर 60 डिग्री के कोण पर झुक गया। बड़ी मुश्किल से हकलाते हुए एक से मैंने प्रिंसिपल ऑफिस का रास्ता पूछा तो गेट से दाएं, फिर तीन दरवाज़े पार बाएं, फिर सीधे, दाएं और बाएं का दुरूह रास्ता समझ जिस जगह पर मेरी यात्रा खत्म हुई उसके सामने संड़ांध मारता टायलेट नज़र आया। उल्टे पैर वापस बाहर आया तो सामूहिक ठहाकों ने ऐसा स्वागत किया कि फिर वापस अंदर...

Sunday, February 12, 2017

बियाह किलास



हम जिस दौर में आंखें खोलकर दुनिया पहचानना सीख रहे थे, शादी ब्याह के संदर्भ में लड़की क्या करती है जैसा सवाल पूछने लायक नहीं बना था. वैसे करने को तो लड़के भी कुछ नहीं करते रह सकते थे लेकिन सवाल का गैरज़रूरी होना केवल लड़कियों तक सीमित था. समय के साथ तमाम गैरत-बगैरत की जिज्ञासाओं के साथ ये सवाल भी पूछा जाना शुरू हो गया तब उर्वरक दिमागों ने एक नया शब्द इज़ाद किया, लड़की बियाह किलास में पढ़ती है. अर्थात, जब तक बियाह तय नहीं हो जाता है, कॉलेज में नाम लिखा दिया गया है. बियाह किलास में पास होने के लिए इम्तिहान होना या रिज़ल्ट निकलना कभी ज़रूरी नहीं होता था. जिस दिन लड़के वालों ने तिलक-दहेज फिक्स कर मुंह दिखाई की अंगूठी पहनाई, कन्या का बियाह किलास से कस्टमाइज़्ड फेयरवेल हो गया समझो.