Tuesday, September 5, 2017

जानने और सिखा पाने के बीच का फर्क



If you can’t explain it simply, you don’t understand well enough 

साठ के दशक में ही इंटरनेट के आने की भविष्यवाणी कर ग्लोबल विलेज की बात करने वाले मशहूर दार्शनिक और संचारविद् मार्शल मैकलुहान यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में प्रोफेसर भी थे. मैंने अपने गुरु से उनके बारे में एक दिलचस्प कहानी सुनी थी. एक बार मैकलुहान को अपनी पार्किंग में उनकी एक छात्रा की गाड़ी खड़ी दिखी. उन्हें बड़ा गुस्सा आया, उन्होंने उसकी कार की विंडशील्ड पर एक पर्ची लिखकर टांग दी, ये आखिरी बार होना चाहिए जब मुझे तुम्हारी गाड़ी, अपनी पार्किंग में नजर आई है.
अगले दिन छात्रा का जवाब उनकी गाड़ी की विंडशील्ड पर था, ये पहली बार है जब आपकी कही कोई बात मेरी समझ में आई है.

यहां हम बात उन मैकलुहान की कर रहे हैं जिनका नाम दुनिया भर में मास कम्यूनिकेशन के चोटी के पांच दिगग्जों में आसानी से लिया जा सकता है . मैकलुहान की सबसे चर्चित किताब का नाम अंडरस्टैंडिंग मीडिया- द एक्सटेंशन ऑफ मैन है, जो जनसंचार के गुर सीखने और सिखाने वाले दुनियाभर के शिक्षाविदों के लिए बाइबल समान है. 
बड़ी साधारण सी बात है, शिक्षा के लिए सिखाने वाले के पास ज्ञान होना भर ज़रूरी नहीं है, ज़रूरी है उसे सिखा पाने की क्षमता होना. और सिखा पाने की योग्यता के लिए महत्वपूर्ण है सीखने वाले के स्तर तक उतरकर आने की तत्परता. गुरु के अर्जित तमाम ज्ञान का कोई महत्व नहीं रह जाता अगर शिष्य की आंखें उसके आगे इतनी चुंधिया जाए कि वो उससे कुछ भी सीख नहीं पाए.
मेरे पहले गुरु शनीचर सर बस मिडिल पास थे, लेकिन उस छोटे से शहर के साधारण से प्राइवेट स्कूल के प्राइमरी में पढ़ने वाले बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय. इतने कि, स्कूल के बाद उन्हें कई घरों में ट्यूशन के लिए जाना पड़ता. जिसमें मैं भी शामिल रही. उस छोटे स्कूल में मेरा दाखिला शहर के नामी अंग्रेज़ी स्कूल से कटवा कर कराया गया था क्योंकि वहां तीन-चार साल के बच्चों के लिए भी सीखने से ज़्यादा ज़ोर अनुशासन पर था. जिस उम्र के बच्चों को एक पल के लिए भी एक जगह बिठा पाना असंभव होता है, शनीचर सर के साथ मेरी शाम की शुरुआत इस शर्त पर होती कि वो मुझे पढाएंगे नहीं. इसलिए वो सामने बैठकर मुझे कहानियां सुनाते. तीन राजकुमारों की, लालची कुत्ते की, टोपीवाले और बंदरों की. फिर पूछते, "बीस टोपी बंदर ले गए और टोपी वाले के पास बची पांच. बताओ कितनी टोपी लेकर चला था वो?" 
अपने बच्चों को हमने शहर के सबसे चर्चित प्ले स्कूल में डाला. अपनी पीढ़ी के तमाम अभिभावकों की तरह हम अपने बच्चों को दुनिया की बेहतरीन मौके उपलब्ध कराने को तत्पर थे और ब्रांड को लेकर बेहद जागरुक भी. वहां की मालकिन के अंग्रेज़ीदां व्यक्तित्व से चमत्कृत होकर लौटे, अपने चुनाव पर अपनी पीठ थपथपाते. स्कूल ने नर्सरी एडमिशन में शहर के बड़े-बड़े स्कूलों में चुने गए बच्चों के नाम हाइलाइट करके लगा रखे थे. बिल्कुल वैसे ही आईआईटी के कोचिंग संस्थान जेईई निकालने वाले बच्चों का इस्तेमाल अपने विज्ञापन के लिए करते हैं. ज़ाहिर है वहां बच्चे की स्वाभाविक जिज्ञासा को दबाकर सारा ज़ोर उन्हें शहर के बड़े स्कूलों में एडमिशन के इंटरव्यू के लिए तैयार करने पर रहता. ज़ाहिर है वहां बच्चों की लर्निंग से ज़्यादा अनलर्निंग हुई.
वो एक साल हमारे लिए कई स्तरों पर अंसतुष्टियों और ग़लतियों से सीखने का रहा. सबसे बड़ी सीख ये मिली कि शिक्षकों को तो माली का सा धैर्य चाहिए होता है. पौधों को एक समान नाप कर पानी देने वाला माली ज़्यादातर अपनी बगिया उजाड़ बैठता है. एक लय में कदमताल करना सेना के लिए अच्छा होता है, समाज के लिए नहीं.

Students don’t care how much you know until they know how much you care

एक अच्छा कोच अच्छा खिलाड़ी भी रहा हो ये कहीं से ज़रूरी नहीं. बेहतर कोच वो होता है जो अपनी ख़ामियों को भी अपने खिलाड़ियों की ताकत बना डाले. शिक्षक को आंकने का पैमाना उसकी खुद की काबलियत नहीं, उसके पढाए बच्चों की क़ाबलियत होनी चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य से शिक्षकों की नियुक्ति में जितना ज़ोर उनकी डिग्रियों को तोलने पर होता है उसका एकांश भी इस बात पर नहीं कि बच्चों के साथ कनेक्ट कर पाने की उनकी क्षमता क्या है. बाकी सिखाने और पढ़ाने का काम अभी भी डंडे के ज़ोर और परीक्षाओं के डर के भरोसे छोड़ दिया जाता है. हमारी शिक्षा प्रणाली की तमाम विंसगतियों में ये भी एक बहुत बड़ा पहलू है. स्टूडेंट्स को उनके टीचर का ज्ञान भर नहीं, उनका अपने उपर किया विश्वास भी गढ़ता है.
गुरु का ज्ञान असीमित भले ना हो, नए विचारों को लेकर उसकी स्वीकार्यता और खुलापन असीमित होना चाहिए. अक्सर कहा जाता है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली Disruptive innovators बनाने में चूक जाती है जो यथास्थिति को चुनौती दे सकें, बदलाव के कारण बन सकें. इसकी सबसे बड़ी वजह इस वैकल्पिक व्यवस्था को बनाने में शिक्षक प्रजाति की अरुचि और कोताही है. बाकी की कसर सरकारी उदासीनता और दखलअंदाज़ी से पूरी होती है.
हैरी पॉटर के दूसरे वर्ष की कहानी में एक बहुत अच्छा प्रसंग है. हैरी, प्रोफेसर डंबलडोर से जानना चाहता है कि क्या सचमुच उसके और लॉर्ड वॉल्डेमॉर्ट के बीच समानताएं हैं. डंबलडोर हंसते हुए स्वीकारते हैं कि दोनों के स्वाभाव में एक नहीं कई समानताएं हैं, दोनों वाक्चतुर, महत्वाकांक्षी, दृढनिश्चयी हैं और एक सीमा तक नियमों को तोड़ने में विश्वास भी रखते हैं. गुरु-शिष्य के रिश्ते में ये बहुत महत्वपूर्ण बात है. एक जैसे गुण वाले दो इंसानों में हैरी पॉटर को पहचान, उसपर विश्वास रख कर, पूरी संवेदना से उसमें आत्मसंयम का संचार कर उसको गढ़ पाने की क्षमता ही बतौर शिक्षक डंबलडोर को उसका कद देती है. इसलिए हैरी की कहानी डंबलडोर के संयमित योगदान के बिना पूरी नहीं होती.


नोट: ये लेख सबसे पहले क्विंट हिंदी में प्रकाशिक हुआ था. https://hindi.thequint.com/india/2017/09/05/5-september-teachers-day-special-2017





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