Friday, March 8, 2019

शीशे की चप्पलें या शीशे की छत?



 पत्रकारिता की क्लास में अमूमन कुछ भी आउट ऑफ सिलेबस नहीं होता. उस रोज़ चर्चा का विषय था कुछ भी हो सकता है एक लड़की ने चिहुंक कर कहा, जब अभिषेक को ऐश्वर्या मिल सकती है तो कुछ भी हो सकता है.
सहमति में एक साथ कई सिर हिले
क्यों भला?’
जबाब लगभग एक, कहां वो ब्यूटी क्वीन, मिस वर्ल्ड और सुपर स्टार. कहां ये फ्लॉप एक्टर.
हां बिल्कुल सही बात है, ऐश्वर्या को तो बल्कि सलमान खान से शादी कर लेनी चाहिए थी, थोड़ी मार-पिटाई ही तो करता था, और सरे आम थोड़ी सी बेइज़्ज़ती. है तो अभी तक सुपर स्टार ही.
इस बार कमरे में असहज सन्नाटा.
ये सुविधाओं, बराबरी के मौकों और आत्मविश्वास से लबरेज़ आधुनिक लड़कियां हैं. पढ़ाई और रिज़ल्ट का औसत भी लड़कों से बेहतर. फिर भी परवरिश की कंडीशनिंग ऐसी कि करियर की बुलंदी पर पहुंचने के बाद भी जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि खुद से ज़्यादा सफल और कमाने वाला पति हासिल करना हो जाता है.  
दहेज़ में मिली कार की ड्राइविंग सीट पर चौड़ा सीना किए बैठे एक परिचित से पहले भी इस तरह के मुद्दे पर लंबी बहस हो चुकी है. मैं फिल्मों की गूढ़ समझ नहीं रखती. अभिषेक, अभिनेता भले ही औसत हों लेकिन मेरी नज़र में इंसान आला दर्जे के हैं.  कई सारे सफल व्यक्तित्वों के बीच खड़े एक औसत सफलता वाले इंसान के लिए अपना आत्मसम्मान बरकरार रख पाना बहुत संयम और गरिमा का काम होता है. वो भी तब, जब उन सफलतम व्यक्तियों में से एक उसकी पत्नी हो.  अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में, रेड कार्पेट पर, पुरस्कार समारोहों में, अभिषेक जिस गरिमा और समग्रता के साथ पत्नी के साथ खड़े होते हैं, उनकी नज़र उतारने का मन करता है.       
ये कर पाना मुश्किल इसलिए भी है हमारा दोमुंहा समाज अपनी सरंचना में तिनका बराबर फेरबदल देखकर भी असंयमित हो उठता है. किसी के बारे में कुछ भी कह सकने का अभिमान रखने वाला सोशल मीडिया अभिषेक को लेकर ऐसे बेशर्म चुटकुलों से भरा पड़ा है. बावजूद इसके कि हमारी बुद्धि और कर्म को हर कोण से प्रभावित और नियंत्रित कर रही फिल्म इंडस्ट्री ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है जहां करियर की ढलान पर पहुंची अभिनेत्रियों ने सफल और शादीशुदा उद्योगपतियों की ट्रॉफी वाइफ बनना स्वीकार किया है. उस बिज़नेस डील को, जिसमें एक को आर्थिक सुरक्षा और दूसरे को कैमरा लेंसों की अटेंशन मिलती है, हम खूब शोर-शराबे के साथ परिकथा के तर्ज पर साल की सबसे सुंदर प्रेमकहानी वाली हेडलाइन बनता देखते हैं. सालों तक उन्हें प्रेम में डूबे पिक्चर पर्फेक्ट जोड़ी मानकर निहारा करते हैं. लेकिन जैसे ही परिदृष्य बदलता है, पति-पत्नी एक-दूसरे से जगह की अदला-बदली करते हैं, हमारी चेतना बेचैन करवटें बदलने लगती है. 
पेप्सिको की चेयरपर्सन इंद्रा नुई से वॉशिंगटन में मिलना हुआ था. इंद्रा को अमेरिकी गृह मंत्रालय की ओर से सम्मानित किया जाना था. उन दिनों प्रवासी भारतीयों के अखबार इंडिया अब्रॉड में छपे इंद्रा के एक इंटरव्यू की बड़ी चर्चा थी. उस इंटरव्यू में इंद्रा ने अपनी कामयाबी का सेहरा अपने पति राज के सिर बांधते हुए कहा था, जो लड़कियां मेरी तरह अपने करियर में सफल होना चाहती हैं जाओ पहले अपने राज को ढूंढ लाओ.
राज उस रोज़ भी उनके साथ थे. सौम्य और गरिमामय.
आपकी बड़ी तारीफ सुनी है, मैंने राज से कहा.
अच्छा, मेरे बारे में कौन बात करता है भला, उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा.
मैं, और कौन?” बालसुलभ चपलता से इंद्रा ने जवाब दिया था.
पूरे इंटरव्यू के दौरान राज कैमरे के फ्रेम से बाहर उसी सौम्यता से खड़े रहे और इंटरव्यू पूरा होते ही इंद्रा का हाथ पकड़कर पार्किंग की ओर बढ़ गए. उन दोनों की वो प्यार भरी छवि कई साल बाद भी मेरे जेहन में ताज़ा है. हालांकि राज एक बड़ी कंपनी के अध्यक्ष हैं और कई दूसरी कंपनियों के बोर्ड मेंबर भी हैं फिर भी  राज नूई के नाम से गूगल कीजिए, वो इंद्रा के पति के तौर पर ही सामने आएंगे. ये परिचय दुनिया के तमाम सफलतम कंपनी प्रमुखों और अध्यक्षों के जीवनसाथियों जैसा ही है. बस किरदारों की प्लेसमेंट,  जेंडर के प्रचलित मापदंडों के हिसाब से नहीं है. और यहीं आकर गड़बड़ शुरु हो जाती है.
सफल पति के पीछे उसकी अनुगामिनी बनी पत्नी समाज के लिए पिक्चर पर्फेक्ट है. इस तस्वीर में जैसे ही पति और पत्नी ने अपनी जगहों की अदला-बदली की, सारे समीकरण डगमगाने लगते हैं.
वैसे भी हमे शुरू से बताया गया, हर सफल आदमी के पीछे एक औरत होती है. लेकिन ज़्यादातर औरतें अपनी सफलता के साथ अकेली रह जाती हैं. यही नहीं उनकी सफलता का पीछा करतीं चलती हैं, कई असंतुष्टियां और आहत अहम, और चलते हैं उसके छोड़े अधूरे काम जिन्हें वो चाहकर भी पूरा नहीं कर सकती. इस तरह कामयाब औरत अपनी कामयाबी को भी बोझ कर तरह ढोती चली जाती है.
इन्द्रा से हुई उस मुलाकात के कुछ सालों बाद उनके इंटरव्यू का एक और वीडियो क्लिप वायरल हुआ जिसमें उन्होने स्वीकारा कि, औरतें बस सोचती हैं कि उन्हें सबकुछ मिल गया है लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं है, वो कितनी भी कोशिश कर लें, उनसे कुछ ना कुछ ज़रूर छूट जाता है.
ऐसा इसलिए नहीं होता कि औरतों के करने में कुछ कमी रह जाती है, बल्कि इसलिए कि उससे सबकुछ एक साथ उठाकर चलने की उम्मीद की जाती है. और उसे बांटने वाला अगर कोई पुरुष सामने आए तो सामाजिक छिद्रान्वेषी अपने तानों से उसे वहीं का वहीं ध्वस्त कर देंगे.  
पति पत्नी एक दूसरे के पूरक होते हैं, सही है, लेकिन कोई इस रिश्ते में किस तरह की पूर्णता चाहता है वो हर संबंध का निजी फैसला होना चाहिए. सामाजिक परिपाटी का इससे कोई भी लेना देना क्यों हो?
इस बार वीमेन्स डे पर इनबॉक्स में आए ढेरों संदेशों में से एक दिल को छू गया, “Teach your daughters to worry less about fitting into glass slippers and more about shattering glass ceilings”
तो सिन्ड्रेला को पीछे छोड़ते हुए शीशे की एक छत ऐसी भी तोड़ी जाए कि लड़कियां रह जाएं पेड़ की तरह सतर और अपनी ज़िंदगी के सबसे ज़रूरी रिश्ते में सहारा नहीं बल्कि सहजता और आत्मविश्वास ढूंढें.  


Sunday, January 6, 2019

मांडू देखने के बाद...



नए साल की दहलीज़, इस क़िताब का हाथ थाम कर लाँघी. एक तरफ पहले सात अध्याय और दूसरी ओर बाक़ी के दो. संयोग ऐसा कि साल के आख़िरी इतवार इंदौर से मांडू देखने निकलना हुआ. मैं पिछली सीट पर बच्चों के बीच क़िताब में ऐसी डूबी कि जहाज़ महल पहुँच बाकी लोग कब उतर लिए पता ही नहीं चला. किताब का नाम देख जेठजी चिढ़ाते रहे, अरे वही दिखाने तो लाए हैं तुम्हें, पहले उतर तो लो. बाज बहादुर के महल से निकलते-निकलते झुटपुटा हो चला था. जेठजी ने फिर खिंचाई शुरू की, कहीं किताबों की दुकान दिखे तो तुम्हारे लिए नई क़िताब ढूँढ लाएं, मैंने मांडू देख लिया.
मैं क्या बताती, देखा तो लिखने वाले ने भी नहीं था. वैसे देखने की रस्म क्या बस गंतव्य तक पहुँच कर पूरी हो जाती है? 




बाज़ बहादुर का महल जाते बरस के सूर्य के इन्द्रधनुषी छींटों से नहाया हुआ था. हम बच्चों के उत्साह से चारों और देखते जाते थे कि दो चौक़ीदार आकर खड़े हो गए, आप सबको निकलना होगा, हमें ताला लगाना है.
पूरे महल में दरवाज़ा तो कहीं है नहीं, ताला कहाँ लगाते हो?”  मैंने खिंचाई शुरू की.
बाहर के गेट में, उन्होंने मशीनी जवाब दिया.
अच्छा सुनो, क्या सचमुच यहाँ रात को राजा की रूह अपनी रूपमती के साथ गाने गाती है? आवाज़ आती है आपको भी?” मैंने संजीदा होकर पूछा
उनके लिए मज़ाक का बटन अब ऑन हुआ, आती है ना, हम भी आकर उनके साथ गाते हैं यहाँ
मैं उदास हो गई. मालवा का आख़िरी स्वतंत्र शासक, कमज़ोर सेना का नायक और मौसिक़ी का शौक़ीन, बंजारन की आवाज़ और सौंदर्य पर निछावर, उसे रानी बना लाया. दुनिया की हर ख़ूबसूरत प्रेम कहानी की तरह इसे भी ताक़त के गुरूर की नज़र लगी. मुगलिया सेना के सामने राजा के घुटने टेकते ही रानी ने ज़हर खा लिया, राजा की मौत उसके साल भर बाद हुई. इतनी कहानी गूगल ने बताई. इन महलों के आसपास कोई गाइड नहीं. रूपमती के महल से नर्मदा की झलक भी नहीं पाई थी. इतवार का दिन सैलानियों की भीड़ से भरा, ऊपरी मंज़िल पर जाने के लिए कतार लंबी थी, सामने आसमान में रंग-बिरंगा पैरा सेलर दिखा और मिनट भर में भीड़ तितर-बितर हो उस उड़ते पंछी को निहारने लगी. उत्साही जन उसके उद्गम स्त्रोत का पता कर बुकिंग करने भी निकल पड़े.
महल की ऊँचाई पर पहुँचकर अपना हर दुख छोटा लगने लगता है. राजा बाज़ बहादुर और रानी रूपमती की प्रेम कहानी उनकी यादों की ही तरह खंडहर में तब्दील होती जा रही है. क़िताब में जहाँ मेरी ऊँगलियाँ अटकी हैं, स्वदेश दीपक के जले शरीर से कीड़ों के साथ मांस के लोथड़े निकाले जा रहे हैं. मैं अगले पन्ने में लिखी पंक्तियों से ख़ुद को दिलासा दे रही हूँ, “Perhaps there will come a time when we will be so enlightened, that we will view, with indifference the brutal, cynical and heartless spectacle that life has to offer”

Saturday, December 22, 2018

बायोलॉजी और साइकोलॉजी का फ़र्क




जाने किस संयोग से बीते हफ्ते दो-तीन सहेलियों-सहकर्मियों ने बातचीत में जानना चाहा कि पीरिएड्स की उम्र के आस-पास बेटियों से बातचीत किस आधार पर शुरु की जाए. हम माएँ परवरिश का आधा ककहरा यूँ ही साझा अनुभवों से सीख लिया करती हैं. मेरे लिए ये बात हालाँकि साल भर पुरानी ही है लेकिन पहली शुरुआत के बाबत ठीक-ठाक कुछ याद नहीं आया. मैंने बिटिया को ही पूछा, उसने हँसते हुए याद दिलाया कि पूछने की पहल उसकी ओर से हुई थी. हाँ, और मेरे मुँह से इतना सुनकर कि ये एक बायोलॉजिकल प्रोसेस है, वो छूटते ही ये कहती पिता के पास भाग ली थी कि आपकी बायोलॉजी तो बड़ी वीक थी, पापा बेहतर समझाएँगे. पापा ने बक़ायदा पेपर पर ड्राइंग कर समझा दिया था.

मेरी बायोलॉजी वाकई कमज़ोर रही लेकिन जुड़वां भाई के साथ बड़ी हो रही बिटिया को पीरिएड्स को लेकर सहज करने के लिए माँ को बायोलॉजी से ज़्यादा साइकोलॉजी की समझ चाहिए थी.

हमारी पीढ़ी तक लड़कियों और लड़कों की परवरिश में फर्क की सबसे बड़ी विडम्बना समझाने की ही रही है. हर बात को जबरन समझाने की जितनी अनिवार्यता लड़कियों के लिए रही लड़कों को ख़ुद समझदार हो लेंगे के तर्ज पर उससे उतना ही दूर रखा गया. नामालूम ख़ुद समझ लेने की नौसर्गिक क्रिया लड़कियों के लिए ही इतनी असंभव क्यों प्रतीत होती रही.
बहरहाल, उसके कुछ हफ्ते बाद बच्चों के स्कूल ने एक अवेरनेस वर्कशाप कराया. लड़कों का अलग, लड़कियों का अलग. बेटा ने घर आकर चिहुँकते हुए सबको बताया कि उसे स्कूल में लड़कियों वाले डायपर हाथ में दिए गए. उसके बताने में तथ्य से ज़्यादा कौतूहल था, जवाब से ज़्यादा सवाल. बायोलॉजी का पाठ उसने बहन जितना ही पढ़ा था लेकिन दोनों की समझ में अनुभव का जो अंतर आना था वो अपनी जगह बदस्तूर था. उसे स्कूल में जिन दिनों के दौरान क्लास की लड़कियों से सेंसेटिव रहने की शिक्षा दी गई थी, वो उन दिनों के बारे में और जानने को उत्सुक हो रहा था. लड़कियों का डायपर उसकी जिज्ञासा की फेहरिस्त में नया शामिल नाम था. बहन और भाई के माँ-बाप से छुपाए ढेर सारे राज़ों के बीच ये नई घटना पर्दे की तरह पड़ गई थी.

माँ, बेटे से बात करने के लिए सही शब्दों के वाक्य विन्यास बुनने की प्रक्रिया में थी कि एक दिन शॉर्टकट सूझ गया. दरवाज़ा खोलते वक्त बेटे की नज़र केमिस्ट की दुकान से आए थैले पर थी, माँ ने थैला सीधा उसके हाथ में पकड़ा कर कहा, इसमें बहन के लिए सैनेटरी नैपकिन्स हैं, जाकर उसे दे दो.

बेटा ने चुपचाप काम पूरा किया और उसके बाद इस बारे में कोई सवाल नहीं किया. ना माँ से, ना बहन से.

माँ होना ताज़िंदगी एक ही कक्षा में एक ही पाठ को अलग-अलग तरीक़े से पढ़ने जैसा है. आप रोज़ नए तरीके सीखते हैं, अनुभव की नई गाँठ रोज़ आपके दुपट्टे के छोर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है. कुछ बातों को समझा पाने के लिए शब्दों की बहुलता से ज़्यादा शब्दों की किफ़ायत काम आती है. हमारे बीच तमाम दूसरी बातों की फेहरिस्त इतनी लंबी रहती है कि इस बारे में हमने वाकई लंबी बात नहीं की. यूँ भी महत्वपूर्ण ये नहीं है कि आप समझाते समय शब्दों का चयन किस निपुणता से करते हैं. ज़रूरी ये है कि समझा पाने के बाद आपके शब्द आपके दैनंदिन व्यवहार में परिलक्षित होते हैं कि नहीं.

धूप सेंकते हुए हम दोनों ने बड़े महीनों बाद इस बात पर सच में बात की है, फिर, अब कैसे डिफाइन करोगी तुम पीरिएड्स को?”

इट्स अ बायोलॉजिकल प्रॉसेस, मुझसे नज़रें मिलाती हुई वो ज़ोर से हँसती है.

माँ ख़ुद से संतुष्ट है, इस मामले में साइकोलॉजी के हिस्से की ज़िम्मेदारियाँ बख़ूबी निभ गई हैं, अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं बची. 



Sunday, December 16, 2018

टूटती वर्जनाओं के दौर में..



नई नवेली अभिनेत्रियों में सारा अली खान पसंद की सूची में तेज़ी से अपनी जगह बनाती जा रही है. उसकी अभिनय क्षमता हो, इंटरव्यू देने की दक्षता या फिर परिष्कृत हिंदी में किया वार्तालाप, पिछले कुछ महीनों में हर जगह उसने तारीफ़ें बटोरीं हैं. इन्हीं तारीफों के बीच पिछले हफ्ते एक न्यूज़ चैनल को दिया सारा का इंटरव्यू क्लिप नज़र के गुज़रा. अपने बढ़े वज़न के दिनों को याद कर सारा ने बड़ी सहजता से कहा कि उसे पीसीओडी है जिसकी वजह से वज़न बड़ी आसानी से बढ़ जाता है और उसे कम करना उतना ही मुश्किल होता है. क्लिप को रिप्ले कर दोबारा सुना. समझ नहीं आया लड़की से भोलेपन और नएपन में ये चूक हो गई या फिर बड़ी समझदारी से अपनी पीढ़ी की लड़कियों के लिए एक मिसाल क़ायम कर गई ये.

पीसीओडी यानि पॉलीसिस्टिक ओवेरी डिज़ीज़ औरतों से जुड़ी परेशानियों की फेहरिस्त में जुड़ा वो नाम है जो बड़ी तेज़ी से नई पीढ़ी को अपनी चपेट में ले रहा है. हर दस में से एक भारतीय महिला इस रोग से पीड़ित है. पीसीओडी या पीसीओएस एक किस्म का हार्मोनल डिस्बैलेंस है जिसमें अंडाशय के इर्द-गिर्द छोटे-छोटे सिस्ट बन जाते हैं. पीसीओडी का संबंध केवल बेवजह वज़न बढ़ने से ही नहीं है, इसके मरीज़ों के लिए पीरिएड्स के दिन ज़्यादा तकलीफदेह भी होते हैं. मर्ज़ ज़्यादा बढ़ जाए तो डायबीटिज़, एक्ने या इंफर्टीलिटी जैसी दूसरी बीमारियों की वजह भी बनता है. बीमारी फिलहाल लाइलाज़ है और इसमें होने वाली तक़लीफ बेतरह. ज़ाहिर है जिस बीमारी के तार पीरिएड्स या गर्भधारण से जुड़े हों उसके बारे में लड़कियों को नेशनल टेलीविज़न पर यूँ बिंदास अंदाज़ में तो क्या फुसफुसाकर बात करने की बंदिश है. और ये पच्चीस बरस की लड़की अपनी पहली फिल्म के प्रमोशन के दौरान इतनी सहजता से कह गई कि उसे पीसीओडी है जिससे उसका वज़न तेज़ी से बढ़ जाता है और उसे दोगुनी मेहनत लगती है उसे वापस कम करने में. सिने तारिकाओं की सो परफेक्ट और सो पॉलिटिकली करेक्ट दुनिया में उसका अपने नॉट सो परफेक्टशरीर के बारे में सहजता से बात करना सुखद लगा.

पीसीओडी का नाम पहली बार दो बरस पहले सुना जब एक स्टूडेंड ने हिचकते हुए एक पुरुष टीचर से बात करने में मेरी मदद मांगी थी. उसे पीसीओडी था जिसके ब्लड टेस्ट के लिए अपने मासिक चक्र के दूसरे दिन उसे एक क्लास टेस्ट छोड़ हॉस्पीटल जाना था. उस वक़्त तो उसकी समस्या का समाधान कर दिया लेकिन बाद के दिनों में इस मुद्दे पर खुलकर बात करने या नहीं करने को लेकर उससे कई बार लंबी चर्चा की. निष्कर्ष ये कि उसके अगले सेमेस्टर जब उसे कम्यूनिकेशन रिसर्च का प्रोजेक्ट पूरा करना था तो उसने पीसीओडी और उसपर खुलकर नहीं हो रही बातचीत की वजहों की पड़ताल करनी चाही. अगले तीन महीने तक वो कैंपस में पीसीओडी की मरीज़ों की ढूंढती, उनके इंटरव्यू करती रही. इस दौरान जब भी उसे प्रोजेक्ट से जुड़े कुछ सवाल करने होते हम क्लास में सारे छात्र-छात्राओं के बीच खुलकर इसपर बात करते. कम्यूनिकेशन की क्लास में विषय चाहे जो हो, संवाद किसी तरह भी बाधित ना हो, मेरी कक्षाओं में ये संदेश शुरू से साफ रहा है.

बहरहाल, मास कम्यूनिकेशन की दूसरी विधा से जुड़ी लगभग उसी उम्र की एक लड़की ने इस विश्वास को फिर से पुख्ता किया है. एक-एक कर वर्जनाऐं यूँ ही टूटनी चाहिएं. नई पीढ़ी की लड़कियाँ अपने आप को सहजता से स्वीकारना सीख रही हैं. अपनी कमियों और अपनी ख़ूबियों के साथ आत्मविश्वास से अपनी ज़मीन तैयार कर रही हैं.

कई बरस पहले एक ज़बरदस्ती के हितैषी ने सलाह दी थी कि मुझे अपने थॉइराइड होने वाली बात भावी जीवनसाथी से यथासंभव छुपाकर रखनी चाहिए. मैंने दूसरी मुलाक़ात के दूसरे वाक्य में सब बता दिया था. रिश्तेदारों की थोड़ी बात तो माननी ही चाहिए.

Sunday, December 9, 2018

जाते साल के फुटनोट्स




आँखें, अलार्म बजने के कुछ मिनट पहले स्वत: खुल जाती हैं. फिर तय समय की ओर एक-एक बढ़ता सेकेंड रक्तचाप पर दवाब बढ़ाता जाता है. अलसाई ऊँगलियों से अलार्म बंद कर चादर में वापस मुँह छिपाने की मचलन जाने किन तहों में समा गईं है. सख़्त उँगलियाँ तय समय से कुछ सेकेंड पहले मोबाइल हाथ में उठा अलार्म को ठिकाने लगा कटाक्ष में मुस्कुराती हैं, जैसे किसी नादान बच्चे का मासूम सरप्राइज़ स्पॉइल करने की परपीड़ा का लुत्फ़ उठा रही हों. 

अब उठना होगा, समय से बंधकर रहना अच्छी गृहस्थियों के गुण हैं. वैसी औरतों के जो उदाहरण बन जाएँ सबके लिए. इस बात का कोई ज़िक्र कहीं भूले से भी ना हो कि बेचैनियों का सबब कुछ ऐसा कि जिस दिन घड़ी के साथ जितना सधा क़दमताल किया, वो तारीख़ अंदर से उतना ही खोखला कर गई. किसी दिन रसोई में तरतीब से लगे डिब्बे निहारते-निहारते उन्हें उठाकर सिंक में फेंक देने का मन हो आए तो उँगलियों तो चाय के कप के इर्द-गिर्द भींच बाल्कनी में निकल लेना चाहिए. पिछली सालगिरह पर तोहफे की शक्ल में मिले एक पत्ती बराबर मनी प्लांट की लतड़ियां सहारा देते डंडे को चारों ओर से अलोड़तीं, रेलिंग से उसपार उचकने लगी हैं. मन चाहे कितना भी विषाक्त हो प्रिटोनिया, अरहुल और गेंदे की खिली शक्लें देख उन्हें नोच फेंकने जैसे ख़्याल तो नहीं आएँगे.
ऊंगलियाँ ठुमककर आती ठंढ में ठिठुरने को बेताब हैं ताकि भारी पलकों को अपने पोरों से सहलाकर थोड़ी राहत दे पाएँ. दिसम्बर यूं भी साल का सबसे बोझिल महीना होता है. जाने कितनी टूटी ख्वाहिशों, अधूरी कोशिशों और टीसते सपनों का हिसाब करता कोई दुष्ट साहूकार हो जैसे. इससे नज़रें मिलाने का मन ही नहीं करता. इसके पीठ पीछे खड़ा तारीखों का वो जमघट भी है जो नए साल की शक्ल में जल्द इसके कंधे पकड़ पीछे छोड़ देगा. पूरे के पूरे पहाड़ सा खड़ा आने वाला नया साल. जी में आता है आते ही उसके सारे मौसमों को नोंच-उखाड़कर यहां वहां चिपका दूं. एक बार ये बरस और उसके महीने भी तो देखें कि सिलसिलेवार नहीं जी पाना भी एक किस्म की नेमत है. कि बेतरतीब मन की चौखट तक सपने ज़्यादा सुगमता से दस्तक दे पाते हैं. कि सपने हकीकत से पलायन नहीं जी पाने की वजह और ताकत दोनों होते हैं.
बेचैन मन को वक्त का ठहरना भी पहरेदारी लगती है और उसका चलते जाना भी. आँखें बंद कर उस अधेड़ चेहरे को याद करने की कोशिश करती हूँ जिसकी ट्राली में बैठ स्विट्ज़रलैंट में ज़रमैट से मैटरहॉर्न की यात्रा की थी. हम हिमआच्छादित पहाड़ों की विहंगम स्निग्धता को बड़े-बड़े घूंट भर पीए जाते थे कि उसकी याचना भरी आवाज़ आई, तुम्हारे देश में तो ख़ूब बड़े शहर होते होंगे.
हाँ, और धूल-धुआँ और शोर भी.
जो भी हो, मैं सब देखना चाहता हूँ, शहर, धूप, धूल, समुद्र सब चलेगा मुझे, बस अब इन पहाड़ों को एक दिन के भी नहीं झेल सकता.
उस रोज़ हम अविश्वास में हँसे थे, आज उसकी बेचैनी जानी-पहचानी लगती है.
ज़िंदगी दरअसल इर्द-गिर्द बिछी ढेर सारी चूहेदानियों का मकडजाल है, जितनी ताक़त एक से बचकर दूसरी के किनारे से निकलने में झोंक कर वक्त बिता देने में लगती है उतनी ही किसी एक में फँसकर उम्र गुज़ारने में भी. उम्र बहुत गुज़र जाए तो पता चलता है कि बच बचकर निकल जाना भी उतनी ही बड़ी सज़ा है जितनी किसी एक में फंसकर रह जाना.
सारी उम्र ग़लतियों से पर्दा किया, इस डर से कि जाने कब कौन सी ग़लती ज़िंदगी पर ही भारी पड़ जाए. इस डर से कोई ग़लती ना हो पाई, ग़लती से भी नहीं. अब ये डर सोने नहीं देता कि कहीं ये समझदारी ही ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती ना बन जाए. 

Sunday, November 25, 2018

सफरकथा: शिकारगाह से पक्षी विहार बने अरण्य की सैर




सुबह की हवा में हर रोज़ बढ़ती नमी को देखते हुए सूरज देव ने अपना अलार्म क्लॉक भले ही थोड़ा आगे की ओर सरका लिया हो, भरतपुर के केवलादेव घना राष्ट्रीय पक्षी अभ्यारण्य में सुबह की सुगबुगाहट अभी भी अपने समय से ही शुरु हो जाती है. पार्क के गेट और टिकट खिड़की के खुलने का समय छह बजे है और उसके पहले ही वहां कैमरा और दूरबीन टांगे सैलानियों की कतार लग चुकी होती है.
टिकट से ज़्यादा होड़ रिक्शा लेने की होती है क्योंकि पार्क के दोनों ओर के ग्यारह किलोमीटर का सफर सरकारी मान्यता वाले रिक्शे या फिर किराए पर ली गई सायकिल पर बैठकर ही पूरा किया जा सकता है. पहले दिन नाश्ता निबटाकर आठ बजे पहुँचने की ग़लती की तो अंदर जाने वाले रिक्शों के लिए इंतज़ार करते सूरज सर पर चढ़ गया था. तभी दूसरे दिन हम गेट खुलने के पहले ही पहुंच कतार में शामिल हो गए.  
ये अरण्य दो नामों की वजह से जाना जाता है. पहला, पक्षी वैज्ञानिक डॉ सालिम अली का, जिनके अथक प्रयासों से ये पार्क वो शक्ल ले पाया जिसके चलते हर साल लाखों सैलानी यहां खिंचे चले आते हैं, और दूसरा, केवलादेव यानि भगवान शिव का जिनका मंदिर पार्क के दूसरे छोर पर है. डॉ सालिम अली के नाम का टूरिस्ट इंटरप्रटेशन सेंटर पार्क के गेट से चंद मिनटों की दूरी पर है जहाँ ज़्यादातर सन्नाटा पसरा रहता है. दूसरे छोर पर बने एतिहासिक केवलादेव मंदिर तक पहुँचने वाले सैलानियों की तादाद भी ज़्यादा नहीं होती. हालाँकि पार्क के बाक़ी का हिस्सा,  सैलानियों की चहल-पहल से भरा रहता है.

 
अभ्यारण्य में अगर अनुभवी रिक्शे वाले का साथ मिल गया तो टूर गाइड लेने की कोई ज़रूरत नहीं. चूंकि रिक्शे वालों का मीटर घंटे के मुताबिक चलता है, वे बड़े तफ्सील से एक-एक स्पॉटिंग लोकेशन पर रुकते, पत्तों के झुरमुठ में छिपे पक्षियों को देखते-दिखाते चलते हैं. क़िस्मत से दूसरे दिन हमें अमर सिंह जी के रिक्शे की सवारी मिली. चालीस साल से पार्क में रिक्शा चला रहे अमर सिंह के बायोडाटा की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि उन्होंने डॉ सालिम अली के साथ भी काम किया है. वो गर्व से बताते हैं कि ऐसा कोई टूर गाइड भी नहीं जो इन पक्षियों के बारे में उनसे ज़्यादा जानता हो. एक शांत और वीरान जगह पर रिक्शा रोकते हुए हमें चुपचाप नीचे उतरने का इशारा होता हैं, ग्रे हॉर्नबिल्स का जोड़ा है वहां, डॉ अली का पसंदीदा पक्षी था ये. हमें थोड़ा आश्चर्य हुआ इतने ख़ूबसूरत पक्षियों के रहते भला डॉ अली को मैदानी इलाकों में हर जगह पाए जाने वाले धनेश पक्षियों से सबसे ज़्यादा प्यार कैसे हो सकता है. लेकिन अमर सिंह के ज्ञानकोश को चुनौती देने की हमारी कूवत नहीं. वैसे भी जब डॉ अली मोर की जगह, लुप्त हो रहे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानि सोहन चिड़िया को राष्ट्रीय पक्षी बनाने की जंग छेड़ सकते थे तो हॉर्नबिल्स को सबसे ज़्यादा प्यार भी कर सकते थे.
सर्दियों में यहाँ साढ़े तीन सौ से भी ज़्यादा प्रजाति के पक्षी देखे जा सकते हैं. लेकिन सबसे पहले नज़र आता है नींद में मग्न स्पॉटेड उल्लूओं का परिवार. वैसे तो यहाँ केवल उल्लुओं की ही सात प्रजातियाँ हैं लेकिन ये वाली शान किसी और की नहीं.


सुबह के सन्नाटे को लाफिंग डव की हँसी रोशन किए जाती है. हर सौ मीटर पर रिक्शे से उतर, कबूतरों और सारसों की कई और प्रजाति के साथ बाँग्लादेश से आए ब्लू रॉबिन, सुदूर दक्षिण से आ पँहुचे किंगफिशर, स्नेक बर्ड, ट्री पाई जैसे नाम सुन, उन्हें क़ैमरे में क़ैद करते सुबह का दोपहर में बदलना भी नोटिस नहीं करते.  





झील के पानी में दो साल बाद हलचल होने को है. पिछले साल पानी कम होने के चलते यहां बोटिंग नहीं हुई तो इस बरस सरकारी कार्यवाही में हुई देर के चलते तय समय से महीने भर बाद हरी झंडी मिली है. लेकिन हमारे जाने की तारीख़ तक बोटिंग शुरू नहीं हो पाई.



आपको दो-तीन हफ्ते बाद फिर से आना चाहिए, हमारे गाइड और चालक ने घंटे भर में तीसरी बार हमसे ये बात कही है. तब तक कई सारे नए पक्षी और आ जाएँगे. लेकिन साइबेरियन हंसो का जोड़ा अब यहाँ कभी नहीं आ पाएगा. उनकी आवाज़ में ये बताते हुए अफसोस है कि कुछ बरस पहले यहाँ से वापस जाते वक्त हिमालय की तराई में उनका शिकार कर लिया गया. हालाँकि अगर हमारी किस्मत साथ दे तो भारतीय हंसों से जोड़े को हम आज भी देख सकते हैं. कई बार घूमते-घामते वो सड़क से दिखाई देने वाली दूरी तक आ जाते हैं. हमारी क़िस्मत उस दिन आधी साथ थी, दूरबीन से प्रेमरत हंस दिखाई दे गए, क़ैमरे में क़ैद नहीं हो सके.
सैलानियों की सबसे ज़्यादा भीड़ पेंटेड स्टोर्क्स की कालोनी के सामने जमा होती है. सैकड़ों रंगीन सारसों के कलरव से ये पार्क का सबसे गुलज़ार हिस्सा भी है. सारसों की ब्रीडिंग खत्म होने के चलते झील के बीचों बीच बबूल के पेड़ों की कोई डाली ऐसी नहीं बची जिसपर घोंसला ना हो और उन घोंसलो से चोंच निकाले, रूई के गोलों से सफेद चूज़े, अपने खाने के इंतज़ार में शोर ना कर रहे हों. पूरी तरह वयस्क होने पर इन सारसों की चोंच नारंगी और शरीर पर नारंगी, गुलाबी और काली धारियां नज़र आने लगती है. इस वजह से इन्हें पेंटेड स्टोर्क्स का नाम मिला है.


पार्क में आने वाले प्रवासी पक्षियों को अपना शीतकालीन आशियाना पहले से कुछ ख़ाली-खाली, उजाड़ सा दिखेगा. इस साल मई में आए भयंकर तूफान में हज़ारों की तादाद में पेड़ गिर गए थे. पार्क की मुख्य सड़क के दोनों ओर ही विशालकाय पेड़ गिरे नज़र आते हैं जिन्हें यहां के नियमों के मुताबिक उठाया नहीं गया है.

एक समय ये पार्क, राजस्थान के राज परिवारों और अंग्रेज़ हुक्मरानों का शिकारगाह था. कभी यहां दिनभर में मारे गए पक्षियों की संख्या पत्थरों में खुदवा कर रखी जाती थी. केवलादेव मंदिर के सामने बड़े-बड़े शिलालेख, यहां के शिकार के इतिहास की तस्दीक करते हैं. एक दिन में सबसे ज़्यादा पक्षियों के शिकार का रिकॉर्ड 1938 में वॉयसराय, लॉर्ड लिनलिथगो के नाम है. उस साल नवंबर की बारह तारीख को इस जंगल में 4,273 पक्षियों का शिकार हुआ था जो अभी तक विश्व रिकॉर्ड है.
उन शिलालेखों से ध्यान हटाकर हमने केवलादेव शिव मंदिर की ओर रुख किया. बोगनविला की लताओं के बीच छोटे सा मंदिर अपनी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में भी आमंत्रित करता है. हालांकि बहुत कम लोग यहाँ तक आते दिखते हैं.



हमारे हाथों में बड़े प्रेम से प्रसाद रखते पंडित जी को उनसे बातचीत की हमारी उत्सुकता भली लगती है. हमें अपने हाथों के बने कढ़ी-चावल और चूरमा खिलाने के प्रस्ताव की मनाही के बाद भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ. मंदिर के इतिहास के बाद उनकी शिकायतों की बारी है, घर-परिवार छोड़ पचास सालों से यहाँ रह रहा हूं, राज परिवार के ट्रस्ट से मिली 24 हज़ार रुपए सालाना तनख्वाह पर काम चलाता हूं, मज़ाल है जो सरकार ने एक पैसा भी इस मंदिर पर ख़र्च किया हो.पार्क के गिफ्ट शॉप के अधिकारी, पुजारी जी की शिकायत पर हौले से मुस्कुराते हैं, धार्मिक आस्था का प्रश्न नहीं होता तो सरकार इस मंदिर को कब का हटवा चुकी होती. पक्षी अभ्यारण्य में भला मंदिर का क्या काम?”  इस सवाल पर लंबी बात हो सकती है लेकिन फिलहाल अपने रिक्शे वाले का शुक्रिया करने का वक्त है. दोबारा ज़रूर आना, उनका आग्रह जारी है.

बाहर निकलते समय हमने अपना कैलेंडर खोला, नबंबर के आख़िर में शायद एक और लंबा सप्ताहांत मिले.






Sunday, November 11, 2018

बाज़ार ना हों तो भावनाएँ सूख जाएं



दिवाली की जगमग रोशनी के बीच एक अधेड़ औरत मिट्टी के बने दिए और सकोरे बेचने की असफल कोशिश कर रही है. दिये ख़रीदने आया एक बच्चा अपने फोन से उसकी तस्वीर भी खींच लेता है और अगले दिन उसके सारे दिये हाथों-हाथ बिक जाते हैं. जो आँखें पटाखों पर लगी रोक से नहीं गीली हुईं वो सवा तीन मिनट के इस वीडियो को देखते ही अविरल बहने लग पड़ीं. मेरे फोन पर अलग-अलग स्रोतों से पहुंचे इस वीडिओ को इतनी बार देखा गया कि आख़िर में नज़रों ने ये भी पकड़ लिया कि पोस्टरों पर लगी तस्वीर दरअसल वो नहीं है जो बच्चे ने अपने कैमरे से ली थी. हालांकि पहली बार में आँखें इतनी भर आईं थीं कि उस प्रिंटर कंपनी का नाम ही नज़रों से रह गया जिसके प्रचार के लिए भावनाओं का इतना सुंदर ताना-बाना बुना गया था. फिर भावुक दिल ने दुनियादार दिमाग को फटकार लगाई, विज्ञापन ना होता तो इतने सुंदर वीडियो को बनाने के लिए वक्त और पैसा कहां से आता मूर्ख. अब वजह जो हो, दिये लकदक दुकानों के बाहर लगी पटरी से ही लिए गए और पटाखे जलाने से बचा वक्त उनमें प्यार से तेल भरकर जलाने में ख़र्च किया गया.

इस दिवाली वायरल हुए इस वीडिओ ने लोकप्रियता के सारे कीर्तिमान तोड़ दिए. अकेले यू ट्यूब पर इसे एक करोड़ बार देखा जा चुका है जबकि फेसबुक पर 87 हज़ार से ज़्यादा बार शेयर किए जाने के बाद इसे 48 लाख दर्शक मिले. ट्विटर पर तू जश्न बन के हैशटैग के साथ ये विज्ञापन तीन दिन तक ट्रेंड करता रहा. लब्बोलुआब ये कि तीन मिनट की इस फिल्म ने सफलता के वो सारे मकाम हासिल कर लिए जिसे विज्ञापन की भाषा में टचिंग द राइट कॉर्ड कहा जाता है.

कभी-कभी लगता है कि अगर बाज़ार ना हो तो हम सब संवेदनाशून्य हो जाएंगे. बाज़ार ही है जो हमें ख़रीद फरोख्त के साथ भावानाएं भी पिरोकर थमाता जा रहा है. कैडबरी सेलिब्रेशन हो या एमेजॉन, बिग बाज़ार हो या रिलायंस, बाज़ार रिश्ते बनाने के लक्ष्य भी निर्धारित करता है और उन्हें हासिल करने का ज़रिया भी बताता जाता है.

दिवाली पर फॉर्वर्ड हुए सैकड़ों संदेशों ने इनबॉक्स भर दिया. फेसबुक पर फॉर यू वाले संदेश हासिल करने का सौभाग्य भी मिला. लेकिन इनमें से शायद ही कोई ऐसा हो जिसने नाम से याद किया, चेहरा याद कर मिस किया. नाम वाले पर्सनलाइज़्ड संदेश आए भी तो फोन के मैसेज बाक्स में. कांपती उंगलियों और धड़कते दिल से यू हैव बिन मिस्ड ए लॉट इन लास्ट सेवरल मंथ्स, वाले जिस संदेश को पढ़ा गया उसे भेजने वाले का नाम फुटस्टेप्स डिज़ायनर फुटवियर था जहां अभी तक केवल दो बार जाना हुआ. लेकिन उनका दिल इतना उदार कि आज भी ना नाम भूले ना मिलने की तारीख़. त्यौहार वाले दिन खाना बनाते-बनाते हमारे चेहरे का नूर ख़त्म हो जाएगा इसकी चिंता केवल बिरयानी बाई किलोज़ को हुई जिसने केवल 90 मिनट में गर्मागर्म बिरयानी हमारे दरवाज़े तक पहुंचाने की पेशकश की. जन्मदिन वाले दिन, बिना नागा, वी केयर फॉर यू कहता जो पहला बधाई संदेश मिलता है उसे वो बैंक भेजता है जिसमें हर महीने (तारीख़ नहीं बता सकती) तनख्वाह जमा होती है.

बाज़ार हमें हमारे होने का एहसास भी कराता है और हमें अपने आप पर इतराने की वजह भी देता है. लो जी, पड़ोसियों को हमारा नाम नहीं मालूम तो क्या, मॉल में कितने हैं जिन्हें हमारे नाम के साथ हमारी जन्म कुंडली भी पता है.

भारत एक भावना प्रधान देश है और विज्ञापन उन भावनाओं का अविरल बहने वाला सोता, जो बाज़ार की गंगोत्री से निकलकर चहुं ओर बहता-बहता, वापस उसी स्रोत में समाकर उसे और विस्तार देता जाता है. अब किया जाए भी तो क्या, भावनाएं पिरोना है ही महंगा शौक. दिल चाहे जितना बड़ा हो, छोटा बटुआ तो इस शौक को अंजाम तक पहुंचाने से रहा. ऐसे में संवेदनाओं के एक-एक मोती को चुन-चुनकर उसे पूंजी के साथ निकालने का एक ही मकसद होता है, उसका इस्तेमाल उस चुंबक की तरह करना, जो और बड़ी पूंजी की उंगलियां थामे वापस घर पहुंचे.

बाज़ार कर्म और भावना प्रधान होने के साथ पूरी तरह से धर्म और पंथ निरपेक्ष भी है. अब देखो ना, अपने कठिन श्रम से वैलेंटाइन डे और मदर्स डे का वट वृक्ष तैयार करने के साथ उसने मातृ-पितृ दिवस के नवांकुर भी खिला दिए. बाज़ार खुशी चाहता है, जितनी खुशियां उतना बेहतर. वो जानता है कि हम कार ख़रीदने जाएं या कपड़े, हमें उसके साथ ख़ुशियां भी गिफ्ट रैप करके देनी हैं.   

दिवाली मना, भले ही हमारी थकान अभी तक शिराओं में हावी हो, मज़ाल है जो बाज़ार एक मिनट को भी सुस्ताने गया हो. दिवाली की लड़ियां उतरीं नहीं कि क्रिसमस की बत्तियां टिमटिमाने का वक्त आ गया. जब तलक हम रज़ाइयों और गद्दों को धूप दिखाएंगे, रंग-बिरंगे गिफ्ट रैप में लिपटी ख़ुशियां, दस्ताने पहन, फिर से दरवाज़े पर दस्तक देती मिलेंगी. जितनी मर्ज़ी हो समेट लो.

क्या कहा, बटुआ कराह रहा है? अमां उस पर भी ऑफर है, नया ख़रीद लो.

Monday, November 5, 2018

कोउ ना जाननहार



सौतेली माँ ने नए-नवेले दामाद से शिकायत की कि उसकी पत्नी खुले तालाब में छाती मल-मलकर नहाती है, दामाद बाबू को ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने ससुराल में ही पत्नी की पिटाई कर दी. कुछ साल बाद एक बार पत्नी को लेकर पंजाब भाग गए. वहां एक बार उससे कहा, इतने बांके-सजीले सरदार घूमते हैं यहां, तुम्हें क्या कोई पसंद नहीं आता. पत्नी से सिर पकड़ लिया, किस सिरफिरे के पल्ले बंध गई, कभी झूठी शिकायत पर हाथ उठाता है तो कभी बीवी को लड़के पसंद करने को कहता है. जाने कैसे कटेगी इसके साथ ज़िंदगी मेरी. आगे की ज़िंदगी काट पाना सचमुच दुरूह था, फक्कड़ पति भटकता रहा अपनी अनगिनत यात्राओं पर, पत्नी नाममात्र की ज़मीन के सहारे अकेले छह बच्चों को पालने का संघर्ष करती रही. उनकी पढ़ाई-लिखाई के साथ उनके मुंडन, उपनयन, शादी के भी सरंजाम जुटातीं. पति को ख़बर जाती तो समय पर उपस्थित भर हो पाते.
कहानी बाबा नागार्जुन की है, सुनी थी उन बैठकों को दौरान जिनका उनके जीवन के आख़िरी सालों में सौभाग्य मिला.  उन दिनों जितनी बार उनसे मिलना होता, हौले से हंसते हुए थोड़ी लटपटाई हो चली ज़बान में कई कहानियां सुनाते रहते.  एक बार राहुल सांकृत्यायन के साथ तिब्बत की यात्रा पर थे, एक स्थान पर पहुंच राहुल जी ने उनसे लौट जाने का आग्रह किया और कहा कि रास्ते में उनके परिवार से मिलते, उनकी सलामती का संदेश पहुंचाते जाएं. मिलने पर राहुल जी की पत्नी रो पड़ीं, कहा, उनसे पूछना मेरी क्या ग़लती जिसकी ये सज़ा मिली मुझे. राहुल जी की मां ने बहु को रोका, किसके सामने रो रही हो, ये भी तो किसी को ऐसे ही छोड़ आया है. ये बात सुन बाबा उस बार घर लौट आए, लेकिन वो लौट आना भी फिर किसी नई यात्रा को निकल जाने का अल्पविराम ही था.
दरभंगा में बिताए उनके जीवन के आख़िरी सालों को करीब से देखा. बड़े सुपुत्र शोभाकांत जी का परिवार उनकी परिचर्या करता. अपनी बड़ी बहु की हिम्मत की बाबा बड़ी प्रशंसा करते. उन्हीं बड़ी बहु ने एक बार मुझसे कहा था, मैं इन्हें अपना श्वसुर नहीं मानती, वो होते तो मेरे बच्चों को श्लोक सिखाते, मेरे दालान पर बैठ घर के बड़े होने का कर्तव्य निभाते, लेकिन इन्होंने इसमें से कुछ भी नहीं किया. इनकी सेवा इसलिए करती हूं क्योंकि ये मेरे गुरु है और देश की इतनी बड़ी विभूति हमारे पास धरोहर है.
बाबा की पत्नी अपराजिता देवी से कभी मिलना नहीं हो पाया. आख़िरी सांस तक भी उन्होंने अपना गांव, अपनी डीह नहीं छोड़ी. उनकी मत्यु बाबा से बरस दो बरस पहले हुई थी. चूंकि ख़बर नहीं बनी तो पता नहीं चल पाया. एक बार मंदिर में उनकी बड़ी बहु से मिलना हुआ, बाबा की सेहत को पूछा तो हाथ पकड़कर रो पड़ीं, वो तो ठीक हैं लेकिन मेरी मां चली गईं.” परिवार के अंदर उनकी लौह इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प का इतना ही मान था.
आज बाबा की 20वीं पुण्यतिथि है. उनके बारे में, उनके लिखे के बारे में बात करने का दिन. शायद इन बातों को याद करने का सही दिन नहीं. आज का लिखना लेकिन तो भी रुक नहीं पाया. अंतर्मन को ये बात हमेशा मथती रहती है कि अमृता प्रीतम को याद की जाने वाली हर तारीख़ पर उनकी लेखनी से ज़्यादा उनके और इमरोज़ के रिश्ते और उस रिश्ते में इमरोज़ के त्याग और समर्पण को याद किया जाता है.
लेखन कठिन विधा है, जीवसाथी का त्याग और सहयोग जिसमें बहुत अपेक्षित है. बाबा के जीवन को बहुत क़रीब से देखने का सौभाग्य मिला. पति से अपमानित, तिरस्कृत होकर भी उनके लिखे को संवारने वाली वीएस नायपॉल की जीवनी के कई  हिस्से भी पढ़े. बावजूद इसके पति के लेखन के पीछे पत्नियों के त्याग की ऐसी जाने कितनी कहानियां होंगी जिन्हें कोई नहीं दुहराता, जो शायद किन्हीं पन्नों में दर्ज नहीं हुईं या गर हुई भी हों तो उन्हें पलटने की ज़रूरत अब किसी को नहीं होती.