Sunday, November 11, 2018

बाज़ार ना हों तो भावनाएँ सूख जाएं



दिवाली की जगमग रोशनी के बीच एक अधेड़ औरत मिट्टी के बने दिए और सकोरे बेचने की असफल कोशिश कर रही है. दिये ख़रीदने आया एक बच्चा अपने फोन से उसकी तस्वीर भी खींच लेता है और अगले दिन उसके सारे दिये हाथों-हाथ बिक जाते हैं. जो आँखें पटाखों पर लगी रोक से नहीं गीली हुईं वो सवा तीन मिनट के इस वीडियो को देखते ही अविरल बहने लग पड़ीं. मेरे फोन पर अलग-अलग स्रोतों से पहुंचे इस वीडिओ को इतनी बार देखा गया कि आख़िर में नज़रों ने ये भी पकड़ लिया कि पोस्टरों पर लगी तस्वीर दरअसल वो नहीं है जो बच्चे ने अपने कैमरे से ली थी. हालांकि पहली बार में आँखें इतनी भर आईं थीं कि उस प्रिंटर कंपनी का नाम ही नज़रों से रह गया जिसके प्रचार के लिए भावनाओं का इतना सुंदर ताना-बाना बुना गया था. फिर भावुक दिल ने दुनियादार दिमाग को फटकार लगाई, विज्ञापन ना होता तो इतने सुंदर वीडियो को बनाने के लिए वक्त और पैसा कहां से आता मूर्ख. अब वजह जो हो, दिये लकदक दुकानों के बाहर लगी पटरी से ही लिए गए और पटाखे जलाने से बचा वक्त उनमें प्यार से तेल भरकर जलाने में ख़र्च किया गया.

इस दिवाली वायरल हुए इस वीडिओ ने लोकप्रियता के सारे कीर्तिमान तोड़ दिए. अकेले यू ट्यूब पर इसे एक करोड़ बार देखा जा चुका है जबकि फेसबुक पर 87 हज़ार से ज़्यादा बार शेयर किए जाने के बाद इसे 48 लाख दर्शक मिले. ट्विटर पर तू जश्न बन के हैशटैग के साथ ये विज्ञापन तीन दिन तक ट्रेंड करता रहा. लब्बोलुआब ये कि तीन मिनट की इस फिल्म ने सफलता के वो सारे मकाम हासिल कर लिए जिसे विज्ञापन की भाषा में टचिंग द राइट कॉर्ड कहा जाता है.

कभी-कभी लगता है कि अगर बाज़ार ना हो तो हम सब संवेदनाशून्य हो जाएंगे. बाज़ार ही है जो हमें ख़रीद फरोख्त के साथ भावानाएं भी पिरोकर थमाता जा रहा है. कैडबरी सेलिब्रेशन हो या एमेजॉन, बिग बाज़ार हो या रिलायंस, बाज़ार रिश्ते बनाने के लक्ष्य भी निर्धारित करता है और उन्हें हासिल करने का ज़रिया भी बताता जाता है.

दिवाली पर फॉर्वर्ड हुए सैकड़ों संदेशों ने इनबॉक्स भर दिया. फेसबुक पर फॉर यू वाले संदेश हासिल करने का सौभाग्य भी मिला. लेकिन इनमें से शायद ही कोई ऐसा हो जिसने नाम से याद किया, चेहरा याद कर मिस किया. नाम वाले पर्सनलाइज़्ड संदेश आए भी तो फोन के मैसेज बाक्स में. कांपती उंगलियों और धड़कते दिल से यू हैव बिन मिस्ड ए लॉट इन लास्ट सेवरल मंथ्स, वाले जिस संदेश को पढ़ा गया उसे भेजने वाले का नाम फुटस्टेप्स डिज़ायनर फुटवियर था जहां अभी तक केवल दो बार जाना हुआ. लेकिन उनका दिल इतना उदार कि आज भी ना नाम भूले ना मिलने की तारीख़. त्यौहार वाले दिन खाना बनाते-बनाते हमारे चेहरे का नूर ख़त्म हो जाएगा इसकी चिंता केवल बिरयानी बाई किलोज़ को हुई जिसने केवल 90 मिनट में गर्मागर्म बिरयानी हमारे दरवाज़े तक पहुंचाने की पेशकश की. जन्मदिन वाले दिन, बिना नागा, वी केयर फॉर यू कहता जो पहला बधाई संदेश मिलता है उसे वो बैंक भेजता है जिसमें हर महीने (तारीख़ नहीं बता सकती) तनख्वाह जमा होती है.

बाज़ार हमें हमारे होने का एहसास भी कराता है और हमें अपने आप पर इतराने की वजह भी देता है. लो जी, पड़ोसियों को हमारा नाम नहीं मालूम तो क्या, मॉल में कितने हैं जिन्हें हमारे नाम के साथ हमारी जन्म कुंडली भी पता है.

भारत एक भावना प्रधान देश है और विज्ञापन उन भावनाओं का अविरल बहने वाला सोता, जो बाज़ार की गंगोत्री से निकलकर चहुं ओर बहता-बहता, वापस उसी स्रोत में समाकर उसे और विस्तार देता जाता है. अब किया जाए भी तो क्या, भावनाएं पिरोना है ही महंगा शौक. दिल चाहे जितना बड़ा हो, छोटा बटुआ तो इस शौक को अंजाम तक पहुंचाने से रहा. ऐसे में संवेदनाओं के एक-एक मोती को चुन-चुनकर उसे पूंजी के साथ निकालने का एक ही मकसद होता है, उसका इस्तेमाल उस चुंबक की तरह करना, जो और बड़ी पूंजी की उंगलियां थामे वापस घर पहुंचे.

बाज़ार कर्म और भावना प्रधान होने के साथ पूरी तरह से धर्म और पंथ निरपेक्ष भी है. अब देखो ना, अपने कठिन श्रम से वैलेंटाइन डे और मदर्स डे का वट वृक्ष तैयार करने के साथ उसने मातृ-पितृ दिवस के नवांकुर भी खिला दिए. बाज़ार खुशी चाहता है, जितनी खुशियां उतना बेहतर. वो जानता है कि हम कार ख़रीदने जाएं या कपड़े, हमें उसके साथ ख़ुशियां भी गिफ्ट रैप करके देनी हैं.   

दिवाली मना, भले ही हमारी थकान अभी तक शिराओं में हावी हो, मज़ाल है जो बाज़ार एक मिनट को भी सुस्ताने गया हो. दिवाली की लड़ियां उतरीं नहीं कि क्रिसमस की बत्तियां टिमटिमाने का वक्त आ गया. जब तलक हम रज़ाइयों और गद्दों को धूप दिखाएंगे, रंग-बिरंगे गिफ्ट रैप में लिपटी ख़ुशियां, दस्ताने पहन, फिर से दरवाज़े पर दस्तक देती मिलेंगी. जितनी मर्ज़ी हो समेट लो.

क्या कहा, बटुआ कराह रहा है? अमां उस पर भी ऑफर है, नया ख़रीद लो.

Monday, November 5, 2018

कोउ ना जाननहार



सौतेली माँ ने नए-नवेले दामाद से शिकायत की कि उसकी पत्नी खुले तालाब में छाती मल-मलकर नहाती है, दामाद बाबू को ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने ससुराल में ही पत्नी की पिटाई कर दी. कुछ साल बाद एक बार पत्नी को लेकर पंजाब भाग गए. वहां एक बार उससे कहा, इतने बांके-सजीले सरदार घूमते हैं यहां, तुम्हें क्या कोई पसंद नहीं आता. पत्नी से सिर पकड़ लिया, किस सिरफिरे के पल्ले बंध गई, कभी झूठी शिकायत पर हाथ उठाता है तो कभी बीवी को लड़के पसंद करने को कहता है. जाने कैसे कटेगी इसके साथ ज़िंदगी मेरी. आगे की ज़िंदगी काट पाना सचमुच दुरूह था, फक्कड़ पति भटकता रहा अपनी अनगिनत यात्राओं पर, पत्नी नाममात्र की ज़मीन के सहारे अकेले छह बच्चों को पालने का संघर्ष करती रही. उनकी पढ़ाई-लिखाई के साथ उनके मुंडन, उपनयन, शादी के भी सरंजाम जुटातीं. पति को ख़बर जाती तो समय पर उपस्थित भर हो पाते.
कहानी बाबा नागार्जुन की है, सुनी थी उन बैठकों को दौरान जिनका उनके जीवन के आख़िरी सालों में सौभाग्य मिला.  उन दिनों जितनी बार उनसे मिलना होता, हौले से हंसते हुए थोड़ी लटपटाई हो चली ज़बान में कई कहानियां सुनाते रहते.  एक बार राहुल सांकृत्यायन के साथ तिब्बत की यात्रा पर थे, एक स्थान पर पहुंच राहुल जी ने उनसे लौट जाने का आग्रह किया और कहा कि रास्ते में उनके परिवार से मिलते, उनकी सलामती का संदेश पहुंचाते जाएं. मिलने पर राहुल जी की पत्नी रो पड़ीं, कहा, उनसे पूछना मेरी क्या ग़लती जिसकी ये सज़ा मिली मुझे. राहुल जी की मां ने बहु को रोका, किसके सामने रो रही हो, ये भी तो किसी को ऐसे ही छोड़ आया है. ये बात सुन बाबा उस बार घर लौट आए, लेकिन वो लौट आना भी फिर किसी नई यात्रा को निकल जाने का अल्पविराम ही था.
दरभंगा में बिताए उनके जीवन के आख़िरी सालों को करीब से देखा. बड़े सुपुत्र शोभाकांत जी का परिवार उनकी परिचर्या करता. अपनी बड़ी बहु की हिम्मत की बाबा बड़ी प्रशंसा करते. उन्हीं बड़ी बहु ने एक बार मुझसे कहा था, मैं इन्हें अपना श्वसुर नहीं मानती, वो होते तो मेरे बच्चों को श्लोक सिखाते, मेरे दालान पर बैठ घर के बड़े होने का कर्तव्य निभाते, लेकिन इन्होंने इसमें से कुछ भी नहीं किया. इनकी सेवा इसलिए करती हूं क्योंकि ये मेरे गुरु है और देश की इतनी बड़ी विभूति हमारे पास धरोहर है.
बाबा की पत्नी अपराजिता देवी से कभी मिलना नहीं हो पाया. आख़िरी सांस तक भी उन्होंने अपना गांव, अपनी डीह नहीं छोड़ी. उनकी मत्यु बाबा से बरस दो बरस पहले हुई थी. चूंकि ख़बर नहीं बनी तो पता नहीं चल पाया. एक बार मंदिर में उनकी बड़ी बहु से मिलना हुआ, बाबा की सेहत को पूछा तो हाथ पकड़कर रो पड़ीं, वो तो ठीक हैं लेकिन मेरी मां चली गईं.” परिवार के अंदर उनकी लौह इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प का इतना ही मान था.
आज बाबा की 20वीं पुण्यतिथि है. उनके बारे में, उनके लिखे के बारे में बात करने का दिन. शायद इन बातों को याद करने का सही दिन नहीं. आज का लिखना लेकिन तो भी रुक नहीं पाया. अंतर्मन को ये बात हमेशा मथती रहती है कि अमृता प्रीतम को याद की जाने वाली हर तारीख़ पर उनकी लेखनी से ज़्यादा उनके और इमरोज़ के रिश्ते और उस रिश्ते में इमरोज़ के त्याग और समर्पण को याद किया जाता है.
लेखन कठिन विधा है, जीवसाथी का त्याग और सहयोग जिसमें बहुत अपेक्षित है. बाबा के जीवन को बहुत क़रीब से देखने का सौभाग्य मिला. पति से अपमानित, तिरस्कृत होकर भी उनके लिखे को संवारने वाली वीएस नायपॉल की जीवनी के कई  हिस्से भी पढ़े. बावजूद इसके पति के लेखन के पीछे पत्नियों के त्याग की ऐसी जाने कितनी कहानियां होंगी जिन्हें कोई नहीं दुहराता, जो शायद किन्हीं पन्नों में दर्ज नहीं हुईं या गर हुई भी हों तो उन्हें पलटने की ज़रूरत अब किसी को नहीं होती.



Thursday, October 18, 2018

जब मर्द ‘कुछ’ नहीं करते



लड़कियों ने साफगोई से बोला कि अकबर ने कुछ नहीं किया.
जब कुछनहीं किया तो आरोप किस बात का? सत्ता के मद ने अपनी ऊंचाई से बिना नीचे झांके प्रश्न किया. फिर अपने मान को हुई हानि से नाराज़ हो आँखें लाल कर ऐसा गुर्राए कि पूरा सिस्टम सावधान की मुद्रा में सर्कस की अगली कड़ी का इंतज़ार करने जुट गया.
क्योंकि मान की हानि के लिए तो कानून में प्रावधान है लेकिन आत्मविश्वास को छलनी करने पर जुर्माना भी नहीं लगता. मर्यादा की सीमा लांघने में कानूनी तो दूर, सामाजिक अड़चन भी नहीं होती. चूंकि पब्लिक प्लेस में हैं औरतें तो पब्लिक प्रॉपर्टी हैं आपके लिए.
आप कुछ नहीं करते हैं, बस झांक लेते हैं, खुले बटन के अंदर, कपड़ों की तीन तहों के पार, शरीर की गोलाइयों में. काम करती वो लड़की असहज हो अपने कपड़ों की साज संभाल में व्यस्त हो अपनी लापरवाही के अपराधबोध से भर जाती है. आपका क्या, झांकने का कोई सबूत थोड़े ही ना छोड़ा आपने.
आप टटोल लेते हैं, भीड़ में, अकेले में, अंधेरे में, हाथ को मौका नहीं मिला तो नज़रों से. आपका मुर्झाया अहम पोषित हो उठता है, अपने आत्मविश्वास पर पड़ी चोट से वो और सिकुड़ जाती है अपनी खोल में. आपके लिए वो शरीर है, उससे जुड़े चेहरे का आपके लिए कोई मतलब नहीं, उसके लिए आप एक चेहरा हैं दशहत का, कायरता का. वो चेहरा जो आंखें बंद करते ही उसे डराता है लेकिन सबके सामने उस चेहरे पर उंगली उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई होगी वो.
आप दबोच लेते हैं, मौका मिलते ही, बोलकर, मांगकर, गिड़गिड़ाकर, झपटकर. क्योंकि ना सुनना आपको सिखाया नहीं गया, वैसे ही जैसे औरतों को नहीं सिखाया गया बोलना. वैसे भी उसके शरीर पर आपके पंजों के निशान का कोई फोरेंसिक सबूत नहीं.
ना कपड़े नोंचे, ना मुंह पर हाथ रख चीखें रोकीं, ना बदन पर चोटों के निशान छोड़े. फिर कैसा अपराध और किस बात का अपराधबोध? आपकी बेशर्म नज़रें, आपके असभ्य ठहाके, आपके भद्दे चुटकुले, आपकी लिज़लिज़ी उंगलियां, इनमें से कुछ भी कुछ कहां है जिससे समाज के बेचैन हो जाने की नौबत आए.
क्योंकि मर्दों के कुछ करने का मतलब होता है औरतों को वैसी स्थिति में ला छोड़ना जिसके बाद वो अपना चेहरा छिपाती फिरें, ख़ुद को अपने अंधेरों में क़ैद कर लें या अगर ज़रा भी ग़ैरत हुई तो परिवार की इज़्ज़त का फंदा गले में डालकर झूल जाएं. फिर इन दर्जन दो दर्जन लड़कियों ने तो पलक भी नहीं झपकाई, बेग़ैरतों की तरह हर रोज़ काम पर आती रहीं, प्रमोशन पाती रहीं, करियर बनाती रहीं. यही नहीं, इनकी शह पर एक पूरी पीढ़ी निकल आई है अपने-अपने घरों से और फैल गई हैं चारों ओर.  टिड्डियों की तरह.  
ये ही क्यों, जितनी लड़कियां इतने सालों बाद जाने किस की शह पर चपड़-चपड़ बोले जा रही हैं उन्होंने उसी वक्त शोर क्यों नहीं मचाया? क्योंकि उस वक्त उन्हें विरोध के नहीं बचाव के तरीके सिखाए गए थे. उन्हें रास्ते सुझाए गए मुख्य सड़क छोड़ पगडंडियां नापने के. लेकिन वो तो वाकई ढीठ निकलीं, फिर भी नहीं छोड़ा उन्होंने अपना रास्ता. देर से ही सही, पहुंचने लगीं अपनी मंज़िल पर.
औरतों का शरीर आपके लिए अपनी सत्ता और रसूख से हासिल की जा सकने वाली भौतिक सुविधाओं की लंबी फेहरिस्त में एक है. आपको लगता है जब आप महंगी गाड़ियां, घड़ियां और जूते ख़रीद सकते हैं तो दर्जनभर देह क्या चीज़ है. आपको लगता है कि रसोई और बिस्तर में एक चुनना हो तो समझदार लड़की रसोई क्यों चुनेगी भला?
आपमें से ज़्यादातर के लिए शायद लड़कियों के छेड़ना उतना ही खामखा का काम है जितना राह चलते कुत्ते को पत्थर से मार देना. जिससे आपका कुछ बनता बिगड़ता नहीं बस एक सैडिस्टिक प्लेज़र मिल जाता हैअहम पर थोड़ा सा मल्हम लग जाता है. ना कुत्ता अपने पीठ पर लगे धाव की रिपोर्ट लिखाने जाता है और ना ही लड़की ना अपने चोटिल आत्मविश्वास को दिखाकर किसी से शिकायत कर पाती है.
यौन उत्पीड़न के बारे में मुखर हो पाना औरतों के लिए उतना ही बड़ा निषेध है जितना नामर्दी मर्दों के लिए है. आपको अपने लिंग के तमाम फायदे गिनाए गए, उन्हें अपने शरीर की कमज़ोरियां दिखाई गईं. क्योंकि उन्हें अपने बचाव के लिए झुंड में रहना सिखाया गया, उसी झुंड में वो बाहर आ गई हैं
यूं भी जिस देश में यौन शोषण के बाद प्रेमिकाओं की हत्या कराने वाले तथाकथित राजनीतिज्ञ प्रेमी सालों खुले सांड़ की तरह घूमते रहते हैं, उस देश में कुछ नहीं करने के बाद भी नप जाने वाले मंत्री औरतों की एक पूरी पीढ़ी के लिए आसमान में सुराख कर पाने के बराबर है.
अब आपके डरने का वक्त आ गया है, जानते हैं क्यों? क्योंकि बेग़ैरत, बेहया लड़कियों की पूरी फौज सड़कों पर निकल आई है, फैल रही हैं ट्ड्डियों की तरह हर ओर. आप डरिए, इसलिए भी कि उन्होंने आपसे डरना छोड़ दिया है. एक की आवाज़ दूसरी के लिए वो सांस बन रही है जिसके दमपर वो ढूंढ पा रही है अपने प्रतिरोध के शब्द भी.
उसने तब नहीं कहा क्योंकि उसे चुप रहना सिखाया गया, आप नहीं सुधरे क्योंकि आपको सीमा में नहीं रहना सिखाया गया. लेकिन अब जब उसने अपना पाठ बदल डाला है तो समय आ गया है कि आप भी अपना सिलेबस रिवाइज़ कर डालें. 

Tuesday, October 2, 2018

ज़िंदगी की निष्पाप कतरन है 'विलेज रॉकस्टार्स'




देखने को तो सुई-धागा और पटाखा के बीच किसी एक को चुना जा सकता था. या फिर मंटो, स्त्री या मनमर्ज़ियां के इक्के-दुक्के बच रहे शो की दौड़ भी लगाई जा सकती थी, जो बच्चों की परीक्षाओं के बीच निकल गईं. फिर भी इतवार की शाम विलेज रॉकस्टार्स का आकर्षण सभी बड़े नामों को काफी पीछे छोड़ गया. इतने सारे विकल्पों के बीच भी थिएटर लगभग सारी सीटें भरी देखना सुखद रहा.

विलेज रॉकस्टार्स दरअसल फिल्म नहीं, बेहद सरल ज़िंदगी की वो निष्पाप और अनछुई कतरन है जिसे दूर से निहारते रहने से मन नहीं भरता लेकिन पास जाकर छूने से मैली हो जाने का भय होता है. फिल्म का कोई भी किरदार आपके लिए अभिनय नहीं करता. उनके पास कैमरे में आँखें डालकर बोलने के लिए भारी भरकम संवाद नहीं है. ज़्यादातर वक्त तो वो एक-दूसरे की आँखों में आँखें डालकर भी नहीं बोलते. लेंस के एक ओर वो अविरल अपनी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव लांघते चले जाते हैं और दूसरी ओर बैठे आप मंत्रमुग्ध से उनकी सुबहों और शामों खुद की डूबता-उतरता पाते हैं. उनकी ज़िंदगी मुश्किलों भरी है जिसे उसी तरह से जीना उन्होंने सीख लिया है, उसमें बाहरी चमक-दमक और हस्तक्षेप की कोई जगह नहीं.

पूरी फिल्म बिना किसी अतिरिक्त बैकग्राउंड साउंड के आगे बढ़ती है. चिड़ियों की चहचहाहट, पानी के कलकल, यहां तक कि हवा की सरसराहट में भी इतना मधुर संगीत है कि एक समय बाद आपको अपने पॉपकार्न की आवाज़ भी अशांति पैदा करती लगेगी.

शुरुआती क्रेडिट तीन स्लाइड्स में खत्म कर फिल्म उसी गति में आगे बढ़ती है जिसमें उसके किरदारों का जीवन चलता है. कहानी के केन्द्र में है दस साल की धुनु और उसकी मां बसंती का खूबसूरत और सशक्त रिश्ता. मां जो पति को खोने के बाद घर-बाहर की सारी ज़िम्मेदारियां अकेली उठाए जा रही है फिर भी अपने बच्चों, ख़ासकर बेटी के सपनों को मरने नहीं देती बल्कि उन्हें पूरा कर पाने की हर संभव कोशिश करती है. धुनु को केवल लड़कों का साथ पसंद है. खिलौनों के अभाव में इन बच्चों की टोली मनोरंजन के जैसे मौलिक तरीके ढूंढ लाती है वो बचपन की मासूमियत और स्वाभाविकता को जीवंत कर देता है.

गांव की औरतें जब धुनु को लड़कों के साथ खेलने के लिए डांट लगाती हैं तो बसंती अपना आपा खो बैठती है. पहले मासिक चक्र के प्रतिबंधों को पूरा करने के बाद धुनु जब वापस अपने दोस्तों के साथ उछल-कूद में मगन हो जाती है तो मां के चेहरे पर खिंच आई स्निग्ध मुस्कान अनमोल है. सफेद साड़ी, तुड़ी-मुड़ी ब्लाउज़ और लगभग सपाट छाती वाली ये मां फेमिनिज़्म और वुमन एमपावरमेंट का इतना सशक्त पाठ पढ़ाती है जिन्हें हज़ारों जुमलों और सैकड़ों पन्नों को छानकर भी समझा नहीं जा सका है.

एक दृश्य में अपनी मां से तैरना सीखते हुए धुनु पूछती है, तुम इतना अच्छा तैरती हो फिर पिता बाढ़ के पानी में कैसे डूब गए?’
क्योंकि उन्होंने डरना नहीं छोड़ा, मां पानी को निहारते हुए कहती है.

दूसरे दृश्य में बाढ से बर्बाद हो गई फसल को देखती धुनु अपनी मां से पूछती है, जब हर साल बाढ़ सब बर्बाद कर देती है तो तुम इतनी मेहनत से खेती क्यों करती हो.

क्योंकि मेहनत के अलावा हम और कुछ नहीं कर सकते, मां उतने ही शांत स्वर में जवाब देती है.

मां-बेटी के बीच ऐसे सरल-सहज संवाद लंबे समय तक संजोकर रखे जाने योग्य हैं. 

कहानी बस इतनी सी है कि गांव के मेले में पर्फॉम रहे बैंड को सुनने के बाद धुनु और उसके साथी थर्मोकोल के गिटार बनाते हैं और उसे असल गिटार में बदलने का सपना संजोते है, ताकि वे गांव में अपना रॉक बैंड बना सकें. बेटी के इस सपने को पूरा करने के लिए मां भी प्रतिबद्ध है. डेढ़ घंटे की अवधि में फिल्म कहीं भी अपनी रफ्तार तेज़ नहीं करती. फिल्म का कोई भी दृश्य आपको उत्तेजित नहीं करता, कहीं भी आंखों में आंसू नहीं आते, क्लाइमेक्स का सस्पेंस कहीं दिल की धड़कन नहीं बढ़ाता. फिर भी थिएटर से निकलते वक्त आप अपने गले में कुछ अटका पाते हैं, छाती भारी सी लगती है और एक अशांत सी शांति घर लौटने के बहुत बाद तक भी आपको नहीं छोड़ती.

अड़तालीस घंटे बाद भी वो सम्मोहन वैसे ही तारी है.

Sunday, August 19, 2018

आवाहनं ना जानामि




बचपन में पढ़ा था, जिनके भगवान जितने सूक्ष्म होते हैं वो उसमें उतना ही उलझकर मरते हैं. जिनके भगवान स्थूल रहते हैं वो सुगमता से अपनी मुक्ति का मार्ग निकालते जाते हैं. मेरी बुद्धि का शैथिल्य कहो या उस पढ़े गए का प्रतिफल, मेरे भगवान स्थूल ही बने रह गए. उतना ही पगडंडीनुमा रिश्ता भी रह गया हमारा, बिना किसी नियम-क़ायदे के लेकिन नंगे पैर भी चल सकने लायक.
दादाजी को सुबह का नाश्ता फ्रेश होने के तुंरत बाद चाहिए होता था और लंच होता नहाकर निकलने के बाद. जबतक खाने के लिए अंदर से पुकार होती आरामकुर्सी पर बैठ आंखें बंद कर कुछ बुदबुदा लिया करते. ये कैसी पूजा हुई भला, ना दिया, ना अगरबत्ती, ना घंटी, ना फूल. इसको भगवान के दरबार में हाजरी लगाना कहते हैं, उनको याद दिलाना होता है कि हमसे किसी का कोई बुरा ना हो जाए इसका ख्याल रखें.
मेरे आलसी मन को ये विधि जम गई, हींग लगे ना फिटकरी, रंग चोखा. ना विधि की चिंता, ना विधान की, एक सरल सी डोर बन जाए एक सहज रिश्ते को बांधे रहने का सबब.
अक्सर कई-कई दिन मंदिर की ओर जाना नहीं हो पाता, मिलने पर उलाहना दे बैठती हूं, कितने सारे कामों में लगा छोड़ा है, इंसान दो मिनट आसन बिछा बैठ भी नहीं सकता तुम्हारे सामने. नियम पालन में बड़ी वाली ग़लती के बाद क्रोध और दंड जैसे शब्द तारे दिखाने लगते हैं तो पूछना पड़ता है, क्यों जी, इतने इंसानी हो तुम, मन के विपरीत हो तो तुरंत बदला लोगे? कुछ समय बाद समझ आ जाता है कि बात दिल को लग गई, उस ओर से फॉर्गेट एंड मूव ऑन का फैसला ले लिया गया है
यूं उम्र के साथ मन का झुकाव कृष्ण से शिव की ओर बढ़ा है, लेकिन छोटे से मंदिर में देव मूर्तियों का घनत्व देश की जनसंख्या जितना ही है. जो तीर्थ के लिए जाता है प्रसाद के साथ वहां के अराध्य की एक मूरत लाकर साधिकार मंदिर में स्थापित कर देता है. देसी देवताओं के बीच बैंकाक से लाए बुद्ध महाशय भी ठाठ से बैठे हैं. मैने कई बार पूछा, जब तुमको साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं होती तो बाहर वालों को समझाते क्यों नहीं. इस सवाल पर मेरी तरह वो भी निरुत्तर रह जाते हैं.
बाल्कनी के गमलों में खिले फूल अक्सर कम पड़ जाते हैं, तोड़कर मंदिर के बीचों-बीच रख देती हूं, मिल बांटकर ग्रहण कर लो. या फिर जिन देवता की विशेष पूजा का दिन होता है एक फूल उनके सामने डाल बाकी साझा खाते में, वैसे ही जैसे बर्थडे वाले दिन मां से एक मिठाई ज़्यादा मिला करती थी. कभी आसन पर बैठने के बाद याद आता है, फूल तोड़ना तो भूल गए. उनको कह देती हूं, छोड़ो ना पेड़ में लगे हैं तो कौन सा तुमसे अलग हैं, समझो वहीं से अर्पित हो गए तुमको, वो उतना भी मान जाते हैं. कामवाली मुस्लिम है, पूजा के बर्तन चमकाकर रख जाती है, ना उन्होंने इसपर कोई एतराज़ जताया ना मैंने
कभी चोट खाया मन जाकर गुहार लगाता है, किसी ने धोखा दिया है मुझे. वो कहते हैं देखने की जगह बदलकर देखो, वो तुमको नहीं अपने आपको धोखा दे रहे हैं. मैं मान जाती हूं, मन हल्का हो जाता है. व्रत के मामले में हमारा बहीखाता एकदम पक्का है, मैं कहती हूं बीएमआई सुधारने के लिए करती हूं, वो कहते हैं कुछ कर लो, वो कभी ठीक नहीं होगा. ना वो मेरा मन बदल पाते हैं ना मैं अपना शरीर. तीर्थयात्रा पर जाने का मकसद धुमक्कड़ी ही रही, मंदिरों से निकलने की सबसे ज़्यादा हड़बड़ी भी मुझे ही रहती है. मैं कहती हूं इन बंद दीवारों की धक्कापेल से ज़्यादा तुम तो बाहर नज़र आते हो. वो खामोशी से स्वीकारते हैं इसे
बहुत बरस हुए, मेरे मन को मंदिरों की दानपेटी से दूर कर दिया है. ब्राह्मणों (नाम के ही सही) के लिए तो तीन समय खाना वैसे ही पकाना पड़ता है इसलिए अलग से कुछ कर सकने की ज़रूरत नहीं बची. लेकिन मन को अभी भी भीरू ही रख छोड़ा है इसलिए मन्नतों के धागे बांधने होते हैं जब-तब. उनकी पूर्णाहूति हमेशा किसी संस्था से जुड़ने, किसी बच्चे की पढ़ाई का भार अपने उपर लेने, किसी आश्रम के लिए किताबें भिजवाने में होती है. हर ऐसे काम के बाद मैं उलाहना दे आती हूं, इसी वजह से ही डर भरा था ना मेरे अंदर? जानबूझकर काम अटकाते हो मेरे और खर्चा बढ़वाते हो. वो शरारत से मुस्कुराते हैं.
जन्म मरण जैसे गूढ़ विषय हमारे संवाद में स्थान नहीं पाते कभी. जीवन बना रहा तो भगवान ने बचा लिया और जीवन चला गया तो भगवान ने बुला लिया का फलसफा मेरी समझ के परे ही रहा. मैं पूछती हूं तुम बचाने में अधिक उदार हो या बुलाने में?  वो चुप लगा जाते हैं.
हमारी डील पक्की है, मैं कहती हूं ज़्यादा समझकर क्या होगा तुम अपने सरलतम रूप में मिलो ना मुझे, मैं अपने कोशिका भर ज्ञान से तुमको पाकर तृप्त हूं. उनके अंदर की मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर खिंच आती है. तभी रातों को सुकून भरी नींद आती है.

Saturday, August 11, 2018

विकासनामा





इन दिनों हम दोनों के बीच चिंता की महीन लकीरें फिर से हिलोरे ले रही हैं. हर बार की तरह उसकी चिंता स्थूल है, जिसका कोई ना कोई हल वो निकाल लाएगी. मेरी चिंता हमेशा की तरह सूक्ष्म है जो बेमतलब रह जाएगी. वो परेशान है ये सोचकर दिवाली बाद जब उसे महीने भर के लिए गांव जाना होगा तो मेरे घर का काम कौन देखेगा. मेरी परेशानी उसके गांव जाने की वजह है. उसे बेटी की शादी करानी है जिसमें अब हो रही हर बरस की देरी का उनके लिए मतलब ज़्यादा दहेज़ जुटाना है.

बड़ी समझदार बेटी है उसकी, मां-बाप से दूर गांव में रह अकेली पूरे परिवार को संभाल रही है. इस साल बारहवीं के इम्तहान भी दिए थे, उम्मीद अच्छे नंबरों की थी लेकिन चारेक नंबरों से अंग्रेज़ी में रह गई. उधर रिज़ल्ट निकले और मारे गम के वो तीन दिन फोन पर भी नहीं आई. ये परेशान कि फोन पर बात हो तो तसल्ली मिले. पिछले बरस तीन महीने बीमार रही, गर्दन में निकले अल्सर के कैंसर होने का शक हुआ. ऑपरेशन हुआ, तब जाकर ठीक हुई और परीक्षा में बैठ पाई.

इतने से रह गई तो क्या हुआ? फिर दे लेगी, मैं इसे समझाती रही.

अब इस बरस में शादी का मतलब उसका बारहवीं पास करने की उम्मीद का हमेशा के अधर में लटके रह जाना है. 

शादी के बाद एक पेपर तो दे लेगी ना?”

पता नहीं, वो तो कइसा आदमी मिलेगा तो बताएगा

फिर क्यों इतनी जल्दी मची है तुम्हें शादी कराने की? मार्च में इम्तहान दे लेने दो, फिर कराना

आप कुछ नहीं समझते, वहां गांव में लोग बात बनाता है हमारे लिए

 तुमको जो कहा था उसको कम्प्यूटर कोर्स करा दो उसका क्या? फीस के पैसे मैं दूंगी ना, तुमने वो भी नहीं लिए.
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पास के सेंटर में अच्छा नहीं सिखाते, उसको कोर्स के लिए बस में दूर जाना पड़ता, उधर के लड़के परेशान करते हैं, उसने नाम लिखाने से मना कर दिया

जब कोर्स ही नहीं करना तो फीस के पैसे मुझसे लेकर रखने का ख्याल इसको दूर-दूर तक भी नहीं आया होगा, इतना इसको पहचानने लगी हूं मैं.

बेटी को पूछा तुमने वो क्या कहती है शादी के लिए,” मैने फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी

वो क्यों कुछ कहेगी, बेटी बहुत अच्छी है हमारी, हम जो कहेंगे वही करेगी. उसकी आवाज़ गर्वोन्नत है

फिर क्या फायदा उसे पढाकर, अपने फैसले लेने लायक भी नहीं बनाया तुमने तो उसे, मैं झुंझला उठती हूं

वो मेरी तरफ वैसी नज़रों से देखती है जिसके लिए अंग्रेज़ी का Exasperated शब्द सबसे सटीक है, जैसे इससे बेहतर तर्क की मुझसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती.

उसने कटी सब्जियां मेरी तरफ बढ़ाकर बर्तन धोने शुरु कर दिए हैं

सुनो, क्या फायदा उसे इतना पढाकर, अगर उसे भी तुम्हारी तरह बर्तन ही धोने हैं तो तुम्हारे और उसमें क्या अंतर रह गया, दो-तीन साल और रुक जाओ, बीए कर लेगी तो अच्छी नौकरी मिल जाएगी उसे, अबकी मेरी आवाज़ में मनुहार है

वो चुप रह जाती है.

मुझे अपनी जीत का क्षणिक आभास हुआ ही था कि उसके मास्टरस्ट्रोक ने पासा पलट दिया, वैसे मेरी बहन के बेटे को अभी तक नौकरी नहीं मिली, पांच साल कॉलेज पढ़ा, कम्पूटर कोर्स भी किया, अब छोटा काम करता नहीं, ऑफिस का काम मिलता नहीं.”

ये उसका ब्रह्मास्त्र है जिसके आगे मैं हर बार की तरह ध्वस्त हूं. बहन के बेटे की नौकरी का जुगाड़ अभी तक नहीं किया जा सका है.

वैसे अभी लड़का मिला नहीं है, नहीं मिलेगा तो परीक्षा के बाद करेंगे, मुझे दिलासा देकर वो पोंछे की बाल्टी लाने निकल जाती है.

मेरा बस चले तो उसके गांव के आस-पास के विवाह योग्य सारे लड़कों को अगले आठ महीनों के लिए ताले में बंद कर दूं.

अगली सुबह हमारी बातचीत का मुद्दा दूसरा है,

आपको पता है बकरीद में पूरी कालोनी खाली हो रही है हमारी. बस दो घर में हमलोग रहेंगे बाकी सब जा रहे हैं गांव

उसकी कालोनी मतलब ड्राइवरों, कामवाली बाइयों, प्लबंरों और क्लीनरों के किराए के कमरों की कतार

मेरी ओर से जवाब नहीं पाकर वो खुद बात बढ़ाती है, 
सबने प्लेन का टिकट कटाया है, एक तरफ का ढाई हज़ार का. तीन दिन नहीं, अब एक दिन में पहुंच जाएंगे गांव

अच्छा? इतने सस्ते में टिकट मिल गई

हां और क्या, एक महीना पहले कटाओ तो मिल जाती है,  

ट्रेन में तो तीन महीना पहले नहीं कटाया तो तत्काल में कटाना पड़ता है, बिना एसी का भी बारह सौ लगेगा, उपर से दो दिन ज्यादा. इससे तो प्लेन अच्छा है ना, दो दिन इधर ज़्यादा काम कर लेगें तो पइसा बराबर

उसका गणित और अर्थशास्त्र हमेशा से ही सुलझा हुआ रहा है, क्योंकि उसने ये दोनों की बातें किसी क्लासरूम में नहीं सीखीं.

बेटी का शादी में जाएगा तो हम भी प्लेन से टिकट कटाएगा

उसकी आवाज़ भले ही सपाट हो लेकिन मुझे लगा उसकी पूरी कालोनी मुझे चिढ़ा रही है.  

Sunday, July 29, 2018

इतवारनामा: बच्चे बड़े होते हैं, माएं नहीं





इतवार की दोपहर मेरे पास चार घंटे खाली हैं जिन्हें मॉल में गुज़ारना है. फिलवक्त कोई छूटा काम भी नहीं है जिसे पूरी करने की चिंता घर वापस ले जाए क्योंकि इस मोहलत के बाद बच्चों को इसी मॉल से वापस ले जाना है, बर्थडे पार्टी के बाद. इसके पहले मैं उन्हें बायनुमा कुछ बोलूं दोनों ने घूमकर मुझसे ही कह दिया, आप बाहर जाकर एन्जॉय करिएगा प्लीज़.

संभावना से भरी दोपहर है, पार्लर, शॉपिंग, मूवी, कुछ भी हो सकता है. लेकिन बाहर निकलते ही मेरे क़दम खो से गए हैं. छोटे बच्चों को मां-बाप, बहनों के पास छोड़कर भागते हुए मॉल-मूवी जाने में जो एक किस्म की बेफिक्री होती थी वो उनके बड़े होते जाते ही जाने कहां खो सी गई है. मल्टीप्लेक्स के गेट के बाहर तीन-चार चक्कर लगाने के बाद गेटकीपर के निगाहों से बचने के लिए मैं एक फ्लोर नीचे उतरकर चक्कर काटने लगती हूं.

हर दुकान के बाहर सेल का बोर्ड लगा है, इत्तेफाक ये कि इतवार और सेल की ख़बर पूरे शहर को है. सामने पहली दुकान में कदम रखते ही भागने का मन किया. एक फॉर्मल शर्ट लेनी तो थी, सामने रखी शेल्फ से एक उठाया, ट्रायल रूम के बाहर लंबी कतार देख पैर बिलिंग काउन्टर पर मुड़ चले. ट्राई करें भी तो पसंद की मुहर किससे लगवाएं.  सेल लिखा ही सही अब एक शॉपिंग बैग हाथ में है, मॉल के अंदर भटकना जस्टीफाई किया जा सकता है. 

मुझे लगता है किसी भी वीकएंड मॉल जाने के फैसला हमें जिंदगी के कई अधर में लटके वक्ती फैसलों पर सोचने की ज़हमत से बचा लेता है.

किसी और दुकान के अंदर जाने का मन नहीं हुआ, बस साइड में लगी कुर्सी पर बैठा जा सका.
अंकल मेरे ठीक सामने से निकले हैं, फिर पीछे मुड़कर पूछा, एही है रे यहां का सबसे बड़ा मॉल
बेटा थोड़ा पीछे मां के साथ है, ऊंची आवाज़ में पूछे सवाल से सिकुड़ा सा, हां यही है, आप बताइए लंच क्या करेंगे.
कुच्छो कर लेगें, पहले बैइठने का इंतजाम करा दो, टांग टटा रहा है
मेरे बगल की सीट पर जिन हजरत का बैग रखा है वो फोन में मस्त हैं, मैं उठने को होती हूं लेकिन बेटा मां-बाप को लेकर आगे निकल गया. आंटी की साड़ी पीछे से बित्ता भर मुड़ गई है, इतनी की पेटीकोट पर लगी मिट्टी भी नज़र आ रही है. मेरा मन किया आगे बढ़कर ठीक कर दूं, अच्छा नहीं लग रहा आंटी, लाख छोह दिखा लें बेटे, ये बारीकियां कहां समझ पाते हैं. तबतक एस्केलेटर के सामने ठिठकी आंटी बेटे के कान में कुछ कहकर लिफ्ट की ओर निकल चलीं.

मेरी बगल की सीट अब खाली है, पचासेक साला महिला वहां अकेली आकर बैठी, हाथ में मैकडॉनल्ड की सॉफ्टी लिए, हम दोनों ने मुस्कुराहट भरी नज़रें मिलाईं. उन्हें अकेला एन्जॉय करते देख हौसला और भूख दोनों जगे. फूड कोर्ट में, खुद से फैसला लेना है किसी की मर्ज़ी नहीं जाननी, एक राय बनाने पर कोई बहस नही, फिर भी एक-एक काउन्टर के बाहर रुकते रहे. ऑर्डर आखिरी काउन्टर पर दिया गया.  

एयरपोर्ट के रास्ते से पति का फोन आया, मेरी आवाज़ मेले में खोकर मिल गई बच्ची सी चिहुंकने लगी. शिकायत सुनते ही दूसरे छोर पर हंसी तैर जाती है, अब समझी तुम ट्रिप पर जाना घर से पीछा छुड़ाना नहीं होता. मैं आपस में किया महीनों पहले का वादा याद दिलाना चाहती हूं, हम एक दूसरे के लिए शापिंग करने साथ निकलेंगे. लेकिन बदली सी आवाज़ कानों में आती है,

आप उठेंगीं ना?’

उनकी आवाज़ में सौम्यता है, लेकिन आंखों में हड़बड़ी. मैनें आखिरी निवाला मुंह में ठेलते हुए प्लेट उठा ली. घड़ी देखी, 2 घंटे 40 मिनट और बाकी हैं, फोन ने सूचित किया अबतक 5000 कदमों की घिसाई हो चुकी है. 

ऐसे में एक ही जगह पनाह ली जा सकती है. यूं बुक स्टोर में भी सेल है, भीड़ भी, लेकिन मेरे पंसदीदा कोने में कोई हलचल नहीं. किताबें हाथ में उठाकर खिड़की के बगल की कुर्सी पकड़ ली.

बेचैनी फिर भी मिज़ाज पर तारी है. कुछ समय पहले बिटिया से फिर से घिसा-पिटा सवाल पूछ लिया कि बड़ी होकर क्या बनना चाहती है, इस समय की सारी संभावनाएं क्रमबद्ध गिनाने के बाद उसने पलट सवाल किया, आप बड़ी होकर क्या बनेंगी?
उसकी आंखों की शरारत देखकर मुंह से बेसाख्ता निकला दादी और नानी बनूंगी और क्या,. उसने मुझे जिन नज़रों से देखा उसे उसकी  जेनरेशन गो गेट अ लाइफ कहती है

मातृत्व एकतरफा पगडंडी है, चलते जाना होता है, रुकने का मन भी करे तो भी. मैं किताबों के पन्ने पलटने लगती हूं, अब समय सरपट दौड़ेगा.

कुछ शॉपिंग भी की या बुक स्टोर ही गए, बच्चे देखते ही पूछते हैं.

मैं चोरी पकड़ी जाने वाली नज़र से उन्हें देखती हूं. साथ-साथ ही तो चल रहे थे इनके, फिर भी बराबर रास्ता कहां तय पाए? ये तो बड़े भी हो गए..और मां?

Saturday, July 28, 2018

‘बेचना’ युगधर्म है



बनाने वाले से बेचने वाला ज़्यादा बड़ा होता है, ये आज के दौर का सबसे गूढ़ सत्य है अतएव इस पंक्ति को इक्कीसवीं सदी का वेदवाक्य माना जाए. जिसने इसका मर्म और इससे जुड़े कर्म, दोनों सीख लिए उसने अरमानों और आकांक्षाओं से भरी सांसारिक वैतरणी पार करने का अचूक उपाय पा लिया समझो.

बड़े होते समय एक फिल्म देखी थी जिसे देखना हमारी पीढ़ी में बड़ा होने के लिए ज़रूरी समझा गया था. रिचर्ड गियर और जूलिया रॉबर्ट्स की प्रीटि वुमन. फिल्म में रिचर्ड का किरदार एडवर्ड बिज़नेस टायकून होता है. वो घाटे में चल रही कंपनियों को कम क़ीमत पर ख़रीदकर, उन्हें टुकड़ों में बांट ऊंची क़ीमत पर बेचता और मुनाफा कमाता है. जूलिया पेशे से कॉलगर्ल है कुछ दिनों के लिए एडवर्ड की गर्लफ्रेंड बनने का नाटक कर रही है ताकि उसके साथ बिजनेस मीटिंग्स में जा सके. एक दृश्य में वो रिचर्ड से उसके बिज़नेस के बारे में जानना चाहती है और जवाब सुनकर आश्चर्य से पूछती है, मतलब तुम बस बेचते हो, कुछ बनाते नहीं?” वो फिल्म थी इसलिए वो सवाल रिचर्ड की ज़िंदगी बदलने वाला साबित होता है और आखिर में वो ख़ुद को बेचने से बनाने वाले में तब्दील कर लेता है. लेकिन असल ज़िंदगी में जिसने बेचने की कला सीख ली उसके लिए बेचने का लोभ छोड़ पाना इतना आसान नहीं होता.

मेरे जैसे यथार्थपरक लोग इसलिए मंटो में ज़्यादा यकीन रखते हैं. मंटो की एक कहानी (नाम याद नहीं) में विभाजन के बाद चार नाई एक ख़ाली पड़े सैलून में अपना धंधा शुरु करते हैं. एक बेघर इंसान उनसे दुकान के पीछे रहने की इजाज़त मांगता है. बदले में उनका बहीखाता संभालने की ज़िम्मेदारी ले लेता है. कुछ महीनों में वो उन सबका मैनेजर और चारों नाई उसके वेतनभोगी मुलाजिम बन जाते हैं.

बेचने वालों का प्रभामंडल है ही ऐसा, रास्ता दिखाने के नाम पर आंखें ऐसी चुंधिया देता है कि बनाने वाले बिचारे उसी के दिए अंधेपन के निकलने के लिए उसी के हाथों का सहारा लेने को मजबूर हो जाते हैं. बनाने वाले की त्रासदी ये है कि वो बनाने की नैसर्गिक क्रिया में ही इतना सुख पा लेता हैं कि उससे उपर उठकर कभी सोच ही नहीं पाता. तिसपर बेचने वाला उसे सतत् आश्वासन देता रहता है कि वो अपनी कला पर ध्यान लगाए, ये सारी निकृष्ट सांसारिक ज़िम्मेदारियां उसके लिए छोड़ दे. ये निकृष्ट सांसारिक ज़िम्मेदारी दरअसल वो शेषनाग है जिसकी फुंफकार बनाने वाले पर पड़ती है और सेज बेचने वाले के लिए तैयार रहती है.

चूंकि समय कभी एक सा नहीं रहता समय के साथ समझदार होते जाना पीढ़ियों का क्रमविकास (evolution) पूरी तरह वैज्ञानिक है इसलिए अब हर कोई बस बेचना सीखना चाहता है. चारदीवारी के भीतर जिनके हिस्से भविष्य को बनाने की जिम्मेदारी थी वो अब उस कमरे की सीटें बेचने का काम कर रहे हैं. चौथा खंभा तो कब से अपनी दुकान के बाहर हम विज्ञापनों के व्यापार में हैं का बोर्ड लगाकर बैठा है. लोकतंत्र जितना खुद से बिक सकता था बिका, अब उससे आगे के लिए स्पेशलिस्ट काम पर लगा दिए गए हैं.

आम जनता बेचने के चातुर्दिक चमत्कार को साष्टांग होकर स्वीकार कर चुकी है. इसलिए बेचने का कारोबार सिखाने वाली दुकाने गली-गली खुल चुकी हैं. जिसे देखो सदी की इस महानतम कला को आत्मसात करने में लगा हुआ है. आधे कलात्मक और आधे सांसारिक इन इंसानों ने डार्विन के सिद्धांत को उस चोटी पर पहुंचा दिया है जहां से केवल उतार ही उतार बचता है.

बेचने और बिकने के बीच कोई विभाजक रेखा बची ही नहीं. एक ही समय पर हर कोई बेचने और बिकने दोनों क्रियाओं के लिए बाज़ार में खड़ा है. इस हद तक कि ये समझ पाना मुश्किल कि कौन किसको बेच रहा है.
एक दिन इस दुनिया में केवल बेचने वाले रह जाएंगे, बनाने वाला कोई नहीं बचेगा देख लेना.