टूरिस्ट बनकर किसी देश में जाना किसी के घर जाकर ड्राईंग रूम में बैठने जैसा है। घर का सबसे साफ-सुथरा, सजा-संवरा कोना जहां बैठने वाले को ना बाथरुम में टपक रहे नलके की चिंता ना किचन की आलमारियों के टूट रहे कब्जों की, ना बाल्कनी की कुर्सियों पर धूल की परतों की खबर ना स्टोर में लटक रहे डेढ़ हाथ के जालों की। अलग-अलग इमारतों, चौराहों और बाज़ारों के सामने जब आप रंग-बिरंगी मुस्कान ओढ़ फोटो खिंचवाते हैं तो एंबुलेंस या सायरन की आवाज़ भी चौंका देती है। अच्छा! अस्पताल भी हैं यहां, ज़रुरत इनकी भी होती है रोशनी और खिलखिलाहटों से भरे इस शहर को!
लेकिन बर्लिन के थोड़ा हटकर ओरानियनबर्ग की यात्रा बिल्कुल वैसी रही जैसे आपने किसी के घर का सबसे वर्जित कोना देख लिया हो.....उस बंद दरवाज़े के पीछे झांकने की हिमाकत कर ली हो जिसने घर के इतिहास के सारे काले पन्नो को अपने अँधरे में क़ैद कर रखा है।