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Monday, April 16, 2018

बलात्कार और इंसाफ: कभी खत्म ना होने वाला इंतज़ार



एक बार फिर हमारी शिराओं में तनाव है, दुख और क्रोध से हमारी नसें फटी जा रही हैं, अपनी बेबसी हमारा ही दम घोंट रही है, हम असहाय हैं, अपनी बेटियों को खींचकर हम बार-बार अपनी छाती से लगा रहे हैं, क्योंकि उनके प्रति हमारा अपराधबोध फिर बढ़ गया है, हम एक बार फिर अपनी ही बेटियों को बचा पाने में नाकाम रहे हैं.
हम सड़कों पर उतर आए हैं, हमारे हाथ जलती मोमबत्तियों से दग्ध हैं. हमारे अंदर का हाहाकार, विरोध और नारों की शक्ल में धीरे-धीरे बाहर आ रहा है, हम उस दुनिया को नेस्तनाबूत कर देना चाहते हैं जो हमारी बेटियों को सुकून और हिफाज़त भरी ज़िंदगी नहीं दे पा रहा.
सत्ता की चुप्पी टूट रही है, अपना आसन डोलता देख, लेशमात्र ही सही, उनमें हलचल तो हुई. वीभत्स मुस्कुराहट वाला आरोपी सलाखों के भीतर है. बलात्कारियों के पक्ष में तिरंगे के नीचे रैली निकालने वालों ने पद छोड़ दिए हैं. संयुक्त राष्ट्र ने भी संज्ञान ले लिया है. हम खुश हैं, होना भी चाहिए. आखिरकार, हमने एक लोकतांत्रिक देश के सजग नागरिक होने का अपना फर्ज अदा कर दिया है.
लेकिन अब? अब हमारी सामूहिक चेतना क्या करे? क्या हम अपने विरोध के पोस्टर समेट लें? मोमबत्तियां बुझाकर वापस अपने झोले में रख लें और एक-दूसरे को विदा देते हुए अपनी रोज़मर्रा की मुसीबतों से जूझने में व्यस्त हो जाएं?
ये सवाल मौजूं इसलिए है क्योंकि जिन बेटियों की लड़ाई में हमारे चार कदम के साथ ने समाज की एक गलीज़ परत को उघाड़कर रहनुमाओं की प्राथमिकता बदल दी वो अपनी लड़ाई में केवल निचले पायदान तक पहुंच पाई हैं. न्याय की चौखट पर उनके सामने अभी इतनी लंबी चढ़ाई बाकी है जिसे नाप पाने में शायद उनकी उम्र ही निकल जाएगी. जब तक उन्हें न्याय मिलेगा हो सकता है अपनी जिन बेटियों को आज हम चिंताग्रस्त हो स्कूल भेज रहे हैं, तब तक उनकी शादी की तैयारियों में व्यस्त हों. ये मेरे वक्ती ज़ज्बात नहीं, आकड़े कहते हैं.
1996 का सूर्यनेल्ली बलात्कार मामला याद है आपको? 16 बरस की स्कूली छात्रा को अगवा कर 40 दिनों तक 37 लोगों ने बलात्कार किया. कांग्रेस नेता पीजे कुरियन का नाम उछलने से मामले ने राजीनितक रंग भी ले लिया. नौ साल बाद 2005 में केरल हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी के अलावा बाकी सब को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. विरोध हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के आदेश दिए, इस बार सात को छोड़ ज़्यादातर को सज़ा हुई लेकिन कई आरोपी अभी भी कानून की पहुंच से बाहर हैं. इधर पीड़िता की आधी उम्र निकल चुकी है. उसे ना अपने दफ्तर में सहज सम्मान मिल पाया ना समाज में. पड़ोसियों की बेरुखी से परेशान उसका परिवार कई बार घर और शहर बदल चुका है.
1996 में दिल्ली में लॉ की पढ़ाई कर रही प्रियदर्शनी मट्टू की उसी के साथी ने  बलात्कार कर नृशंस हत्या कर दी थी. अपराधी संतोष सिंह जम्मू कश्मीर के आईजी पुलिस का बेटा था. बेटे के खिलाफ मामला दर्ज होने के बावजूद उसके पिता को दिल्ली का पुलिस ज़्वाइंट कमिश्नर बना दिया गया. ज़ाहिर ,है जांच में पुलिस ने इतनी लापरवाही बरती कि चार साल बाद सबूतों के अभाव में निचली अदालत ने उसे बरी कर दिया. लोगों के आक्रोश के बाद जब तक मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा संतोष सिंह खुद वकील बन चुका था और उसकी शादी भी हो चुकी थी जबकि प्रियदर्शनी का परिवार उसे न्याय दिलाने के लिए अदालतों के बंद दरवाज़ों को बेबसी से खटखटा रहा था. ग्यारहवें साल में हाईकोर्ट ने संतोष सिंह को मौत की सज़ा सुनाई जिसे 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने उम्र कैद में तब्दील कर दिया. उसके बाद भी संतोष सिंह कई बार पैरोल पर बाहर आ चुका है.
वैसे भी ये वो मामले हैं यहां अदालती फाइलों में केस अपने मुकाम तक पहुंच पाया. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में देश की विभिन्न अदालतों में चल रहे बलात्कार के 152165 नए-पुराने मामलों में केवल 25 का निपटारा किया जा सका जबकि इस एक साल में 38947 नए मामले दर्ज किए गए.
दुनियाभर में बलात्कार सबसे कम रिपोर्ट होने वाला अपराध है. शायद इसलिए भी कि दुनियाभर के कानूनों में बलात्कार सबसे मुश्किल से साबित किया जाने वाला अपराध भी है, ये तब जबकि खुद को प्रगतिशील और लोकतांत्रिक कहने वाले देश औरतों को बराबरी और सुरक्षा देना सदी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं. ज़्यादातर मामलों में पीड़िता पुलिस तक पहुंचने की हिम्मत जुटाने में इतना वक्त ले लेती है कि फॉरेंसिक साक्ष्य नहीं के बराबर बचते हैं. उसके बाद भी कानून की पेचीदगियां ऐसीं कि ये ज़िम्मेदारी बलात्कार पीड़िता के ऊपर होती है कि वो अपने ऊपर हुए अत्याचार को साबित करे बजाए इसके कि बलात्कारी अदालत में खुद के निर्दोष साबित करे.
यौन उत्पीड़न के खिलाफ काम कर रही अमेरिकी संस्था रेप, असॉल्ट एंड इन्सेस्ट नेशनल नेटवर्क (RAINN) ने यौन अपराधों में सज़ा से जुड़ा एक दिल दहला देने वाला आंकड़ा जारी किया है. इसके मुताबिक अमेरिका में होने वाले हर एक हज़ार यौन अपराधों में केवल 310 मामले पुलिस के सामने आते हैं जिसमें केवल 6 मामलों में अपराधी को जेल हो पाती है जबकि चोरी के हर हज़ार मामले में 20 और मार-पीट की स्थिति में 33 अपराधी सलाखों के पीछे होते हैं.
बलात्कार को नस्ल और धर्म का चोगा पहनाने से पहले संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट की बात भी करते चलें. ‘Conflict Related Sexual Violence’ नाम की इस रिपोर्ट में इस बात पर चिंता जताई है कि आंतरिक कलह या आंतकवाद जनित युद्ध के दौरान यौन हिंसा को योजनाबद्ध तरीके से हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की प्रवृति किस तेज़ी से बढ़ी है. गृह युद्ध और आतंकवाद से जूझ रहे 19 देशों से जुटाए आंकड़े बताते हैं कि इन क्षेत्रों में बलात्कार की घटनाएं छिटपुट नहीं बल्कि सोची-समझी सामरिक रणनीति के तहत हो रही हैं. सामूहिक बलात्कार, महीनों तक चले उत्पीड़न और यौन दासता से जन्में बच्चे और बीमारियां एक नहीं कई पीढ़ियों को खत्म कर रहे हैं. इन घृणित साज़िशों के पीछे की बर्बरता को हम और आप पूरी तरह महसूस भी नहीं कर सकते.
इसलिए कहती हूं, उन्नाव और कठुआ की लड़ाई अभी शुरु ही हुई है. लड़ाई लंबी है, क्योंकि सामने वाला पैसे और बाहुबल दोनों से ताकतवर है. इसके पहले कि हमारी मोमबत्तियों की लौ ठंढी हो जाए, याद रखिएगा, जिन गिने-चुने मामलों में सज़ा होती है आम जनता आक्रोश और विरोध की वजह से ही हो पाती है. इसलिए हमारे सामने चुनौती ये है कि हम इन मामलों को अदालती तारीखों के मकड़जाल से निकालकर जल्द से जल्द अंतिम फैसले तक कैसे पहुंचाएं. मरने वाला न्याय-अन्याय से उपर जा चुका होता है. सलाखों के पीछे पहुंचा हर अपराधी भविष्य में होने वाले अपराधों की आशंका को कम करता है. इसलिए ये लड़ाई हमारी है, हमारी बेटियों की, हमारे भविष्य को, हमारे समाज को बचाने की.

ये आलेख सबसे पहले क्विंट में प्रकाशित हुआ था
https://hindi.thequint.com/voices/opinion/kathua-unnao-rape-case-least-recorded-crime-delayed-justice 

Saturday, November 25, 2017

असुरक्षित बचपन के ज़िम्मेदार हम


वॉशिंगटन के दिनों में एक शाम बच्चों को पार्क से लेकर घर लौट रही थी. डेढ़-एक साल का बेटा वापस आने को तैयार नहीं था, लिहाज़ा पूरी भारतीयता के साथ चीख-चिल्लाकर रोने लग पड़ा. एक अपरिचित अमेरिकन महिला हमारे साथ लिफ्ट से उतरी और पीछे-पीछे घर तक आ गई. दरवाज़े पर खड़ी होकर उसने विनम्रता से पूछा कि बच्चे को संभालने के लिए मुझे किसी मदद की ज़रूरत तो नहीं. चूंकि हजरत घर घुसते ही खिलौनों में उलझकर कुछ मिनट पहले की मां की शर्मिंदगी भूल चुके थे, वो मुस्कुराकर वापस चली गई. पता चला उसका घर ना केवल किसी दूसरी मंज़िल बल्कि बिल्डिंग के दूसरे ब्लॉक में है. दोस्तों से बातचीत के दौरान बाद में ये एहसास हुआ कि वो दरअसल ये जानना चाह रही थी कि मां होने के बावजूद बच्चा कहीं मेरी किसी गलती की वजह से तकलीफ में तो नहीं है या फिर ये कोई ऐसा मसला तो नहीं जिसे लेकर उसे अथॉरिटीज़ को अलर्ट करने की ज़रूरत हो. वो पड़ोसी का सामान्य शिष्टाचार ही नहीं एक सजग नागरिक का धर्म भी निभा रही थी.

अमेरिकी संस्कृति से अपनी तमाम असहमतियों के बीच वो एक घटना अभी भी एक बड़ी सीख लिए जहन में ताज़ी है. इसकी एक वजह ये भी कि अपने समाज में हम बड़ी तेज़ी से इस सजगता को भूलते जा रहे हैं. आधुनिकता की आड़ में हमने बड़ी सहूलियत से पड़ोसी धर्म को निजता के हनन का जामा पहनाकर परे कर दिया है. जबकि सच्चाई ये है कि हर वो मसला जो सचमुच निजता के हनन के दायरे में आता है चटकारे लेकर उसे जान जाने में हमारी दिलचस्पी अभी भी बरक़रार है.

अपने बच्चों को सुरक्षित बचपन देने के लिहाज़ से दुनियाभर में भारत का स्थान 116वां है. इसके पहले कि इसका ठीकरा कुपोषण, गरीबी, लौंगिक प्राथमिकताएं जैसे मसलों पर फोड़ा जाए, ये जान लेना भी ज़रूरी है कि बाल अपराध के ज़्यादातर मामले महानगरों में होते हैं.

औसत परिवारों में पत्नियों के काम करने या नहीं करने के फैसले स्त्रीवाद, स्वतंत्रता और समानता जैसे भारी-भरकम शब्दों की नियमावली के तहत नहीं लिए जाते. चूंकि हम लैंगिक समानता जैसे मुद्दों को अभी तक केवल सतही स्तर पर समझ पाए हैं, मर्दों के लिए कमाकर परिवार चलाना अभी भी उनके जीवन की प्राथमिकता है. औरतों का नौकरी करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि भौतिक सुविधाओं से लैस परिवार चलाने के लिए दो लोगों की कमाई की दरकार होती है.  इस अलावा भी औरतों की पढ़ाई-लिखाई अपने साथ केवल ज्ञान और डिग्री ही नहीं लेकर आती है, लेकर आती हैं एस्पिरेशन्स, आगे बढ़ने की लालसा. लेकिन एकल परिवारों की चलन के बीच औरतों के करियर के शीर्ष पर नौकरी छोड़ने की एक बड़ी वजह होती है बच्चों की सुरक्षा और परवरिश को लेकर उपजी समस्याएं.

अफ्रीकी कहावत है, एक बच्चे की परवरिश के लिए एक गांव की ज़रूरत होती है. समाज चाहे जितना भी आधुनिक हो जाए, सुविधाओं के लिए चाहे कितनी मशीनें और उपकरण जुटा लिए जाएं, बच्चों की परवरिश के लिए हमेशा ही प्यार, देखभाल और सुरक्षित वातावरण की ज़रूरत सबसे उपर होगी. हम मुहल्लों को छोड़ अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स में बस गए हैं जहां एक दरवाज़ा भर बंद कर देने से दुनिया से कटा जा सकता है, जहां व्हाट्सएप पर भले ही फॉर्वर्ड किए ऊल-जलूल मैसेज बेखटके हम तक पहुंच जाएं, हमसे बिना अप्वायंटमेंट लिए कोई हमारा दरवाज़ा नहीं खटखटा सकता. बंद दरवाजों के पीछे दुनिया बसाने की हमारी इसी चाहना ने हमारे बच्चों की सुरक्षा को बिना किसी आहट के दांव पर लगा दिया है.

बचपन में पापा की तमाम मित्र पत्नियों में केवल एक वर्किंग थीं. छोटे से बच्चे को आया के पास छोड़ काम पर जातीं. पूरी दोपहर वो बच्चा तो काम वाली की निगरानी में होता लेकिन उस कामवाली के उपर पड़ोस की सभी औरतों की नजर रहा करती. शाम को घर लौटने पर उनका बेटा किसी भी घर में सुरक्षित खेलता मिल जाता था. आज हम भले ही बड़े व्यस्त होने का दंभ भरते हों, क्या ये सब कर पाना सचमुच इतना मुश्किल है?

बार-बार एक सी कहानियां कलेवर बदल कर हमारे सामने आ जाती है, हम सदमे से मुंह फाड़े अपने बच्चों को छाती से चिपकाकर ज़माने को लानत भेजते हैं और घंटे भर बाद मॉल में शॉपिंग थेरेपी के लिए चले जाते हैं. एक बार रुक कर ख़ुद से पूछ नहीं सकते कि अपने स्तर पर इसे बदलने के लिए क्या किया जा सकता है?

कहीं कोई बच्चा संदिग्ध स्थिति में दिखे, हमारी ओर से एक सतर्क नज़र, व्यस्त होने का नाटक छोड़कर दो मिनट रुकने की जहमत, दो-चार सवाल पूछने की हिम्मत इससे ज़्यादा की तो दरकार भी नहीं. घर-बाहर, दफ्तर-बाज़ार, मॉल-पार्क, हर जगह बस ये सोचते हुए नहीं रहा जा सकता कि बच्चा चाहे किसी का हो, समाज और उसके भविष्य में हमारे बच्चों के बराबर का भागीदार है.

सोचकर देखिए, क्या ये सब किया जाना सचमुच इतना मुश्किल है?