इस शीर्षक का एक लेख ग्रेजुएशन में कम्पल्सरी
हिंदी के सिलेबस में था. अठ्ठारह बीस की उम्र में जब चालीस का मतलब बुढ़ापा होता
है, वो लेख हमें पढ़ाने का क्या मतलब था, समझ में नहीं आया. पढ़ाते वक्त
हमारी प्रोफेसर भी बार-बार याद दिलाती रही कि क्योंकि पूरे कमरे में चालीस के पार
केवल वही हैं इसलिए उस लेख का गूढ़ मतलब भी केवल वही जान सकतीं हैं. सुनकर ये
विश्वास और पुख्ता हो गया कि ये वानप्रस्थ की बाते हैं, हमारे लिए बेज़रूरत.
