अष्टमी वाली सुबह ही यात्रा से लौटना हुआ, घर
पहुंचते ही किसी तरह देवी पाठ निबटा यूनिवर्सिटी की भागमभाग. पिछली रात की अधूरी नींद भी पलकों की सवारी कसे अपना बकाया मांग रही थी. अष्टमी का दुर्गा दर्शन किसी
तरह टाला नहीं जा सकता, सो बस रस्म निभाकर वापस लौटना हुआ. नीचे पार्क में गरबा
नाइट का आयोजन तेज़ धुनों के साथ आमंत्रण दे रहा था लेकिन किसी तरह भी वहां जाना
नहीं हो पाया. बाल्कनी से झांक कर दिल को ‘वैसे भी ज़्यादा लोग कहां हैं’ वाली तसल्ली दे ली.
इन दिनों यूं भी हर मौके पर एक से मौसमी गीतों का शोर कुछ यूं होता है कि पता ही नहीं लगे, शादी वाला डीजे बज
रहा है, कांवड़ियों की सवारी निकली है, गणपति का विसर्जन है या नवरात्रि गरबा. कनफोड़ू
संगीत ने वैसे ही आधी रात तक जगाए रखा.
