Saturday, June 18, 2016

फिर पापा, मां बन जाते हैं


गलत कहता है विज्ञान। समय कभी एक गति से नहीं चलता। अगर चलता तो छोटा सा बचपन ज़िंदगी का सबसे लंबा हिस्सा कैसे लगता? सबसे ज्यादा कहानियां बचपन की, सबसे ज़्यादा यादें बचपन से। बचपन की बस एक ही चीज़ छोटी होती है, स्कूल की छुट्टियां। खासकर तब, जब छुट्टियों के उस पार बोर्डिंग वाला स्कूल इंतज़ार कर रहा हो।

बोर्डिंग से हमसे ज़्यादा चिढ़ मां को थी। हम बोर्डिंग में होते तो मां रात-रात को उठकर रोतीं, पापा से लड़तीं, अच्छी पढ़ाई के लिए बेटियों को हॉस्टल भेजने पर मां ने पापा को कभी माफ नहीं किया। हर छुट्टी के बीतते-बीतते मां, पापा से छुपकर, हज़ार-हज़ार प्रलोभन देती, एक बार बोल दो नहीं जाना है, मत जाओ, यहीं के स्कूल में पढ़ना। छोटा है तो क्या हुआ, पढ़ाई तो तुम्हारी मेहनत पर निर्भर करेगी। दिल डोल जाता, फिर हमारी ज़रूरत की चीज़ें जुटाने में स्कूटर से शहर के कई-कई चक्कर लगाते पापा का चेहरा याद आता और हम मन मार लेते। मां घर में तैयारियां करतीं और रोती रहतीं। पापा रोते नहीं, आखें नम होती हों शायद, लेकिन मां के आसुंओं की बाढ़ में उनकी नम आखों की याद हमेशा धुंधला जाती।

Saturday, June 11, 2016

स्त्री विमर्श की आड़ में...




ऐसा क्यों लगता है आपको कि अपनी देह और मन की आज़ादी की बात खुलकर बस वैसी औरतें ही कर सकती हैं जो किसी टूटे रिश्ते या रिश्तों के कछार पर खड़ी हों? ये भी तो हो सकता है कि दैहिक और वैचारिक स्वतंत्रता की पैरोकार वो स्त्री एक ऐसे समृद्ध रिश्ते की ज़मीन पर पूरे आत्मविश्वास से पैर जमाए खड़ी है जहां से, देह तुम्हारी, संस्कार तुम्हारे, मर्जी और अधिकार हमारे जैसे बेतुके कंकड़ों को बहुत पहले चुन लिया गया हो। इसलिए उनके आज़ाद ख्यालों की आड़ में उनसे फ्लर्ट करने के मौके ढूंढने का कोई फायदा नहीं। ये मान लेने में इतनी ज़ोर से क्यों हिलता है असहमति से भरा आपका सिर? पुरुषत्व के अहम् के बोझ से?

तीन समय चूल्हा जला पूरे परिवार की पसंद का खाना पकाने वाली औरत भी अपने स्वतंत्र स्पेस की प्रतिरक्षा के लिए कटिबद्ध हो सकती हैं जहां अपनी जिम्मेदारियां पूरी होते ही वो खुले मन से वापस पहुंच जाती हैं। उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा अपना होता है जहां अनधिकृत प्रवेश वर्जित का बोर्ड हर किसी के लिए लगा होता है, इसका ये मतलब नहीं कि अपनी ज़िंदगी के बाकी हिस्से दूसरों को खुश रखने में बिताने से गुरेज़ है उनको।  

Saturday, June 4, 2016

महाभारत जारी है....


फिर कौरवों ने पांडवों से कहा, ये बताने की ज़रूरत नहीं कि तुम्हारा ऐश्वर्य देखकर हमारे कलेजे पर सांप लोट रहे हैं, हमने लाख तुम्हें अपने से कमतर रखना चाहा लेकिन अपनी शिक्षा, कर्मठता और शौर्य के बल पर तुमने हमें पीछे छोड़ दिया। हम चाहें भी तो निष्ठा, लगन, वीरता और कर्तव्यपरायणता में तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकते और हम चाहें भी तो तुम्हारे लिए हो रहे इस जय घोष को सुनने के बाद चैन की नींद नहीं सो सकते। इसलिए हमने विजय के मापदंड ही बदल दिए। हम चाहते हैं कि तुम अब द्यूत क्रीड़ा में हमें परास्त करो तब हम तुम्हें विजयी समझेंगे। पांडव जानते थे कि ये छल है, इस एक निर्णय से उनका अभी तक का सारा श्रम और पराक्रम व्यर्थ हो सकता है। फिर भी उन्हें अपने प्रभुत्व का प्रमाण देना था और इसके लिए हर चुनौती स्वीकार की जानी थी। इसलिए उन्होंने द्यूत का आमंत्रण स्वीकार किया और उसके बाद हज़ारों सालों तक दोहरायी जाने वाली कहानी का जन्म हुआ।
इतिहास में प्रासंगिकता की ये बिसात बार-बार बिछाई जाती है। इस बार इसके आर-पार दो इंसानी नस्लें हैं।  सदियों से अपने प्रभुत्व के मद में झूमते पुरुष और उसके रचे समाज में अपना होना तलाशती स्त्रियां।

Saturday, May 28, 2016

नानी की चिड़ैया



बचपन था, गर्मी की छुट्टियां थीं और उन छुट्टियों के कुछ दिन नानी के घर के लिए मुकर्रर थे। नानी का घर दरअसल एक तिलिस्म था जहां पहुंचते ही सब खो जाते, मांएं अपनी दुनिया में और हम बच्चे अलग अपनी दुनिया में। मां के लिए यहां बस उनकी मां थोड़े ही थीं, आलमारी के कोने में पुराने कपड़ों की तहों में सिमटा उनका बचपन भी था जो उंगलियों के पोरों के छूने भर से वापस हरकत में आ जाता था, कमरों के कोने में वो कहानियां थीं जो ज़रा सी सरगोशी से हुमक पड़तीं और जिन्हें अभी भी याद कर मां और मौसियां घंटों हंसती जा सकती थीं। रसोई में अभी तक कच्ची उम्र में की गई नाकाम कोशिशों की महक तक मौजूद थी। हमारे लिए भी तो वहां रोज़ के बोरिंग काम नहीं थे, बोरिंग सुबह और शाम भी नहीं थे।  

Saturday, May 21, 2016

बेटे सबकुछ तो नहीं कहते...




पहाड़ों में बच्चों के स्कूल की लर्निंग ट्रिप। जाना भी अनिवार्य। पहली बार बिना मां-बाप के, घर से चार दिन के लिए दूर रहना होगा। तुर्रा ये कि इन चार दिनों के दौरान उनसे फोन पर बात भी नहीं कर सकते, बस स्कूल के मैसेज और वेबसाइट पर उनके अपडेट का इंतज़ार करना होगा। जिस दिन से स्कूल का नोटिस आया और वापसी में सहमति की चिट्ठी के साथ चेक भेजा गया, मां की चिंताओं और बच्चों के उत्साह में जैसे चरम पर पहुंचने की होड़ लगी रही।
मां को खुश रखने के लिए बिटिया आश्वासन की प्रतिमूर्ति बनी हुई है।
मैं अच्छे से रहूंगी ममा, टीम के साथ ही रहूंगी, भाई का भी पूरा ख्याल रखूंगी, वो चिढ़ाएगा तो भी नहीं लड़ूंगी उससे।
लेकिन जिस ओर से आशंका ज़्यादा है वहां से आश्वासन का एक शब्द नहीं। बेटा एक ही सवाल के जवाब बदल-बदल कर देता है,
प्रॉमिस करो संभल कर रहोगे, बहन का ख्याल रखोगे।
बिल्कुल नहीं, मैं तो उसे खूब परेशान करूंगा।
ख्याल? मैं तो मैम से कहकर दूसरे ग्रुप में चला जाऊंगा।

Wednesday, May 11, 2016



क्योंकि माएं सांचों से नहीं निकलतीं


ज़्यादा थकीं हों तो मां मैगी बनाती हैं और चटखारे लेकर खाती हैं। मदर्स डे पर सुबह से बच्चों के फोन का इंतज़ार शुरू कर देती है। नए फैशन के कपड़े देखकर मचल उठती है, काश हमारे ज़माने में भी ये प्रिंट और कट्स मिलते। अभी पहनूं तो कैसा लगेगा?‘
कुछ महीने बाद मिलती है तो डांट लगाती हैं, जिम जाना क्यों छोड़ा, कितनी मोटी हो रही हो।
सास बहू वाले सीरियल मां को सख्त नापसंद है, जब आज तक अपने घर के पचड़े  ना सुलझा पाए तो इनके झगड़े में कौन पड़े।

Thursday, April 28, 2016

उत्तरार्ध



बाय, सी यू, मिस यू’, के नारों के साथ जाने वालों की आखिरी गाड़ी भी विदा हो गई तो कई मिनट तक दोनों बरामदे के दो कोनों में एक-दूसरे से आखें चुराते बैठे रहे।
दो हफ्तों से आशियाने को गुलज़ार किए सभी पाखी अपने-अपने घोंसलों को उड़ चले और पीछे छोड़ गए ये असहज सन्नाटा। बच्चे थे तो उनके बच्चे भी थे, बातें थीं, कहकहे थे, शिकायतें थीं, उलाहने थे, माफी थी, प्यार था, चिंताएं थीं, आश्वासन थे, महत्वाकांक्षाएं थीं, भरोसा था, सराहने थे, साथ था। चले गए तो इन सबके साथ मां-बाप के बीच जुड़ीं सारी की सारी डोरें भी साथ ले गए। चालीस सालों का जो आशियाना जोड़ा था उसकी नींव भी बच्चे और छत भी बच्चे।

Friday, April 22, 2016

प्रेम का बिरवा


पार्क सरकारी था, महानगर के सुदूर कोने में, बड़ी-बड़ी रिहायशी इमारतों के बीच हाल ही में बनाया गया। उन ऊंची अट्टालिकाओं की दूसरी ओर, ऊबर-खाबड़ गलियों और बजबजाती नालियों वाला एक गांव भी था, जहां के हिलते-डुलते घरों से निकलकर हर सुबह सैकड़ों औरत-मर्द इन अट्टालिकाओं में घुसते थे, किसी की गाड़ी चलाने, किसी की जूठन साफ करने, किसी के कपड़े इस्त्री करने, किसी के चूल्हे की आंच सवांरने, किसी के बच्चे संभालने के लिए। इन अट्टालिकाओं से भी हर सुबह सैकड़ों औरत-मर्द हड़बड़ाकर बाहर निकलते थे, महानगर के अलग-अलग कोने में बने सरकारी और प्राइवेट दफ्तरों में सूरज के डूबने तक गुम हो जाने के लिए।

Saturday, April 16, 2016

बेटे के नाम एक अपराधबोध का स्वीकारनामा


मेरे प्यारे बेटे,
तुम अपनी बहन के ठीक एक मिनट बाद मेरे गर्भ से बाहर आए। तुम्हारी बहन तब डॉक्टर सॉर्किन वेल्स के हाथों में ही थी। उन्होंने उसे हौले से पुचकारा, देखो कितनी भाग्यशाली हो तुम, तुम्हारा ख्याल रखने साथ-साथ एक भाई भी आया है।
उस पीड़ा में भी मैं प्रतिवाद करना चाहती थी। अमेरिकन होकर भी डॉक्टर ने ऐसा क्यों कहा? ख्याल तो दोनों को ही रखना होगा एक-दूसरे का, ये ज़िम्मेदारी केवल भाई की ही क्यों? और फिर बहन की अपने भाई पर निर्भरता रहेगी ही क्यों? हम उसे भी तो उतना ही सक्षम बनाएंगे। मेरा तो कोई भाई नहीं और इस बात को मैंने और तुम्हारी मौसियों ने हमेशा एक तरह से सेलीब्रेट ही किया है, एक दूसरे का संबल बनकर, एक दूसरे को बिना शर्त प्यार देकर।