गलत कहता है
विज्ञान। समय कभी एक गति से नहीं चलता। अगर चलता तो छोटा सा बचपन ज़िंदगी का सबसे
लंबा हिस्सा कैसे लगता? सबसे ज्यादा कहानियां बचपन की, सबसे ज़्यादा यादें बचपन से।
बचपन की बस एक ही चीज़ छोटी होती है, स्कूल की छुट्टियां। खासकर तब, जब छुट्टियों
के उस पार बोर्डिंग वाला स्कूल इंतज़ार कर रहा हो।
बोर्डिंग से हमसे
ज़्यादा चिढ़ मां को थी। हम बोर्डिंग में होते तो मां रात-रात को उठकर रोतीं, पापा
से लड़तीं, अच्छी पढ़ाई के लिए बेटियों को हॉस्टल भेजने पर मां ने पापा को कभी माफ
नहीं किया। हर छुट्टी के बीतते-बीतते मां, पापा से छुपकर, हज़ार-हज़ार प्रलोभन
देती, “एक बार बोल दो नहीं जाना है, मत जाओ, यहीं के स्कूल में पढ़ना। छोटा है तो
क्या हुआ, पढ़ाई तो तुम्हारी मेहनत पर निर्भर करेगी।“ दिल डोल जाता, फिर हमारी
ज़रूरत की चीज़ें जुटाने में स्कूटर से शहर के कई-कई चक्कर लगाते पापा का चेहरा
याद आता और हम मन मार लेते। मां घर में तैयारियां करतीं और रोती रहतीं। पापा रोते
नहीं, आखें नम होती हों शायद, लेकिन मां के आसुंओं की बाढ़ में उनकी नम आखों की
याद हमेशा धुंधला जाती।









