Sunday, September 25, 2016

धर्म, भोजन और भूगोल



दरभंगा में बचपन की यादों में सुबह-सुबह सर पर टोकरी लिए मछली बेचने के लिए निकली मछुआरिनों की आवाज़ भी शुमार है। किसी रोज़ बरामदे पर बैठे दादाजी मम्मी को आवाज़ लगाकर पूछते कि खाने की तैयारी शुरु नहीं हुई हो तो मछली ले लें और अंदर से हां होते ही घर का माहौल बदल जाया करता। मछली की सफाई, पीसे जा रहे मसालों की महक और लंच शुरु होने के पहले ही तली हुई मछलियों से पेट भर लेना, स्मृतियों में ये सबकुछ अभी भी ताज़ा है। थोड़ी बड़ी होने पर हॉस्टल में मछली के नाम पर बने सर्वनाश डिश ने मन ऐसा फेरा कि शाकाहारी होने का मन बना लिया। दादाजी ने सुना तो परेशान हो गए, मैथिल ब्राह्मण की लड़की मछली खाना कैसे छोड़ सकती है। ब्राह्मणों को शाकाहारी होना चाहिए वाला तर्क तब तक पल्ले नहीं पड़ा था जबतक एक दक्षिण भारतीय टीचर ने मुझे नज़रें टेढ़ी कर तंज़ कसते हुए मांस भक्षी नकली ब्राह्मणकहकर नहीे बुलाया था।

Sunday, September 4, 2016

अपनी-अपनी आज़ादी


अपनी बिल्डिंग में सिक्योरिटी गार्ड की वर्दी पहने औरतें नज़र आ रही हैं आजकल। जितनी बार गेट से अंदर-बाहर जाओ सैन्य तत्परता से खड़ी होकर विश करती हैं। शॉपिंग मॉल और दफ्तर की बिल्डिंगों में तो कई साल से तैनात हैं, हमारे पर्स टटोलतीं, स्कैनर लेकर जांच करतीं।

ओहदा चाहे कोई भी हो वर्दी पहनकर शान तो आ ही जाती है। चेहरे पर नई शादी की ताज़गी, सुंदर चूड़ियां, मांग भर सिंदूर, गले में आर्टिफिशियल मंगलसूत्र और माथे पर लाल बिंदी, तिस पर वर्दी की नीली पतलून में टक्ड इन आसमानी शर्ट और काली बेल्ट। फैशन के तमाम प्रचलित मापदंडों को चुटकियों में उड़ातीं।

Sunday, August 28, 2016

तीन कहानियां


पहली कहानी: हमारी बेटी (कही-सुनी)

वॉइस ऑफ अमेरिका के दिनों में एक वरिष्ठ भारतीय सहकर्मी एक दिन तय समय से कुछ पहले, थोड़ा हड़बड़ाते हुए दफ्तर से बाहर निकलीं। उन्हें मंदिर होते हुए घर जाना था। पता चला कि अगले दिन काम के सिलसिले में उनकी बेटी अपने कुछ सहकर्मियों के साथ पाकिस्तान जा रही थी। अमेरिका में पली और अमेरिकन से ब्याही उनकी बिटिया जिस समूह के साथ पाकिस्तान के दौरे पर जा रही थी उसमें वो अकेली ही भारतीय मूल की थी। वापस आकर उसने बताया कि पाकिस्तान के जिस भी शहर में जाना हुआ, मिलने वालों ने देखते ही कहा, तुम्हारी टीम के बाकी लोग होंगे विदेशी, तुम तो हमारी अपनी हो। बिचारी ने कई बार अपने सरनेम का हवाला देते हुए कहना चाहा कि वो अमेरिकन ही है, तो जवाब मिला, शादी की है ना अमेरिकी से तुमने, बेटी तो हमारी ही हो।

Saturday, August 20, 2016

पिता..बीस साल बाद


मोबाइल और इंटरनेट दोनों का युग आ चुका था लेकिन पिता अभी भी खबरें सुबह के अखबार में पढ़ते और शाम को दूरदर्शन का सरकारी बुलेटिन देखते। मोबाइल का इस्तेमाल बस दूरभाष के लिए होता, वो भी भरसक एक जगह पर बैठे-बैठे। 

बेटा अभी भी पिता से आंखों में आंखें डालकर बात करने में हिचकता था। हालांकि उसके पास अब एक अदद नौकरी, छोटी सी गाड़ी के अलावा बड़े शहर के छोटे मुहल्ले में डेढ़ कमरे का एक घर भी था। हालांकि बेटा जो काम करता था वो पिता की समझ से बिल्कुल परे था फिर भी उन्हें इस बात का गर्व था कि इतनी सी उम्र में उसने घर भी खरीद लिया और गाड़ी भी जबकि ग्रैचुय्टी के पैसों से घर बनाने के बाद पिता अपने दो पहियों के खटारा स्कूटर में दो और पहिए जोड़ पाने का सपना भी नहीं देख सकते थे।

Saturday, August 13, 2016

पिता


इंटरनेट, मोबाइल युग से बहुत पहले की एक शाम।

घर में हाहाकार मचा था। मां, बहनों का रो-रोकर बुरा हाल। शाम को ट्यूशन के लिए गया बेटा अभी तक घर नहीं लौटा। आधी रात होने को थी, पूरा पड़ोस घर में इकठ्ठा था। इस घर में तो क्या आस-पास के चार-आठ घरों में भी बना खाना चूल्हे पर रखा ठंढा हो रहा था। बदहवास पिता कभी बेटे के दोस्तों और दोस्तों के दोस्तों को घर तक दौड़ लगा रहे थे कभी घर की महिलाओं को ढाढस बंधा रहे थे।  दिमाग ने काम करना कब का बंद कर दिया था। अब इतनी हैसियत तो थी नहीं कि पैसे के लालच में बेटे को कोई उठाकर ले जाए। छोटी तनख्वाह वाली मामूली नौकरी में उन्हें दफ्तर के बाहर बहुत कम लोग जानते थे। पड़ोसियों को छोड़ दें तो शहर क्या मुहल्ले के भी चार-पांच घरों में बमुश्किल आना जाना था। फिर वो कोई छोटा बच्चा भी तो नहीं था जो रास्ता भूल जाए, 15-16 साल का जवान लड़का। पढ़ाई के अलावा घर-बाहर के कई काम संभालने वाला लड़का।

पड़ोसी बार-बार पुलिस में जाने का दबाव बना रहे थे। लेकिन घर में बड़ी होती बेटियां हों, तो पुलिस के पास जाने से पहले भी दस बार सोचता है शरीफ आदमी। मन भर के पैरों से दरवाज़े के बाहर निकले ही थे कि बेटे का खास दोस्त सामने दिखा। उसे कुछ बात करनी थी। शाम को उसने ही पूछे जाने पर मासूम इंकार में सिर हिलाया था। कोने में ले जाकर उससे बात की और उल्टे पैर घर में घुसे।

Sunday, August 7, 2016

छोटी-मोटी बातें


ये कहानी बहुत बचपन में पढ़ी थी।
अपने समय के एक बड़े चित्रकार ने एक सुंदर चित्र बनाया, दो बैलों की लड़ाई का चित्र। जिसने भी देखा वाह-वाह कह उठा। चित्रकार ने ऐसी जीवंत रेखाएं खीचीं थीं कि देखने वाले की आखों के सामने सायस ही दृश्य स्थापित हो जाता था। युद्धरत दोनों बैलों की मांसपेशियां खिचीं हुई थीं, शरीर के हर हिस्से में तनाव नज़र आता था। क्रोध और उत्तेजना में उनके फड़कते हुए रोंए तक महसूस किए जा सकते थे। नथुने फड़कते हुए थे, उनकी बोलती आखों से जैसे खून टपक रहा था। देखने वाला भी तारीफ किए बिना कैसे रह पाता। तारीफों से चित्रकार की छाती चौड़ी हो गई।

Saturday, July 30, 2016

स्त्री, अर्थ, अनर्थ?


कौन कहता है कि मर्दों के लिए औरतें शरीर मात्र हैं। अब इतनी भी संकुचित नहीं है उनकी मानसिकता। नज़र घुमाने की देर है, ऐसे परम प्रतापियों से भरी पड़ी है दुनिया जिनकी औरतों में दिलचस्पी चातुर्दिक होती है। जो उनके धर्म, काम और मोक्ष के साथ-साथ उनके अर्थ के भी तारणहार बनना चाहते हैं। जो हमारे अर्थोपार्जन पर हर किस्म की टिप्पणी करने का दम खम भी उतनी ही शिद्दत से रखते हैं। बहुतों की नींदें हराम रहीं हैं ये सोच सोचकर कि औरतों को नौकरी क्यों चाहिए, पैसों की ज़रूरत ही क्यों है, कमाती हैं तो उनका करती क्या हैं वगैरा-वगैरा।
हम जब नौकरी की तलाश में आकाश पाताल एक कर रहे थे तो साथ पढ़ने वाले कुछ लड़के ऐसे देखते जैसे जॉब मार्केट में उतरने की हिमाकत कर लड़कियों ने उनके हिस्से की रोटी छीनकर खा ली हो। एक ने तो दार्शनिक अंदाज़ में कह भी दिया हमारे लिए भी तो छोड़ दो कुछ नौकरियां, तुम्हें कौन सा घर चलाना है, कमाने वाला पति तो ढूंढ ही देंगे मां-बाप

Saturday, July 23, 2016

आधी आबादी का निर्वाण


अपने ईश को पाने के लिए, अपने दीन की राह में, अपने सत्य की तलाश के लिए, पुरूष छोड़ते आए हैं अपना घर, अपना परिवार, अपने लोग। हर वो रिश्ता जो सत्य संधान और उनके बीच बाधा बनकर आ सकता है। बिना पीछे मुड़े, मोह के सारे बंधन एक झटके में तोड़ चले गए। फिर उन्होंने पा भी लिया अपना सत्य, अपना प्रभुत्व। नए धर्म गढ़े, नए पंथ जोड़े। उन्होनें कहे हज़ारों शब्द, हर शब्द पत्थर की लकीर, जिसे अपना अंतिम सत्य मानने वाले लाखों अनुयायी भी जुट गए।

लेकिन प्रथम पुरूष की छाया से जन्मी, आदम की पसली से गढ़ी गई, किसी औरत ने कभी कोई धर्म नहीं गढ़ा। कोई स्त्री नहीं सिरज पाई किसी पंथ को, नहीं दिखा पाई कोई राह मुक्ति की आस लगाए अनुयायियों को। औरतों ने नहीं रचीं ऋचाएं, आयतें, वर्सेज। इन पन्नों में उनके लिए लिखे कर्मों की सूची भी तो भौतिक कर्तव्यों से इतर कुछ ज़्यादा नहीं। स्वर्गारोहण के मार्ग में, सुमेरू की तलहटी में सबसे पहले पांचाली के ही तो पैर फिसले थे। परिवार और प्रजा के प्रति आसक्त द्रौपदी की चाहतों की सीमा से कितना परे था ना सशरीर स्वर्ग में प्रवेश का सौभाग्य। 

शाम की चाय उस दिन लंबी खिंच गई थी। बाबूजी (श्वसुर) तन्मयता से लक्ष्मीनाथ गुसाई की कहानी सुना रहे थे। 18 शताब्दी के प्रसिद्ध कवि और योगी, कई दूसरे सत्यान्वेषी योगियों की तरह उन्होंने परिवार के कहने पर शादी की और पत्नी की ओर देखे बिना घर छोड़ दिया। पांडित्य प्राप्त करने के बाद जब पत्नी, संग की कामना के लिए उनके पास पहुंची तो उन्होने इसका प्रयोजन पूछा। पुत्र प्राप्ति की चाहना की तो पति की खड़ाऊं मिली जिसे धोकर पीने से लाल की प्राप्ति होगी। हो गई प्राप्ति। और साथ में पति  धर्म का निर्वाह भी। कहानी सुनकर मैं और मां एक दूसरे को एक सी नज़र से देख रहे थे, पुरूषों के लिए निर्लिप्त रह पाना इतना सहज कैसे हो पाता है? 

बचपन में अपने पिता की नानी की कहानियां सुना करती थी। पति की बेरुखी और मनमानियों से आहत एक बार अयोध्या गईं तो सीता की प्रतिमा में मन ऐसा रमा कि लौट कर कभी घर नहीं आईँ। वहीं के एक आश्रम में जीवन के बाकी साल बिता दिए। लेकिन घर पूरी तरह से तो भी नहीं छूट पाया उनसे। पति का परित्याग करने वाली औरतें भी अपने बच्चों से विमुख नहीं हो पातीं। मिलने आती रहीं लौट-लौटकर। पोतियां बड़ी हुईं तो उन्हें भी अपने साथ ले गईं। मूल-गोत्र के बंधनों को तोड़ उनका विवाह अयोध्या के परिवारों में ही कराया। मां-पापा की शादी के बाद भी आईं थीं, मां को देखने। उन्होंने अपने लिए शांति का मार्ग ढूंढा लेकिन क्या मुक्ति का भी?

कुछ दे सकने के लिए काफी कुछ छोड़ना भी तो होता है। और कहां छूट पाती हैं औरतों से कभी उनकी एक सी दिनचर्या। कोरी भावुकता से भरी औरतों को जाने क्यों परिवार की अनगिनत जवाबदेहियां कभी ज़ंजीर नहीं लगते। फिर कैसे मिलता होगा स्त्रियों को मोक्ष, मुक्ति, त्राण? कैसे पार कर पाती हैं वो वैतरणी? कयामत के रोज़ किस उम्मीद की चमक ला पाएंगी, फैसले का इंतज़ार करती उनकी आंखें?

घर और बाहर के बीच संतुलन बिठाने की सतत् कोशिश के बीच तो मुक्ति और निर्वाण जैसे शब्दों को याद रखना भी जटिल। चौके की उमस में, बच्चों के पोतड़ों में, जूठे बर्तनों के ढेर में भी क्या भगवान आ सकते हैं कभी?

ज़रूर आ सकते हैं। बल्कि आना पड़ता है उनको, आते रहे हैं वो।

स्त्रियां चूंकि मुक्ति के लिए पलायन नहीं करतीं, तभी शायद वो देख पाती हैं छोटी-छोटी चीज़ों में अपना ईश। परीक्षा के दुर्दम्य क्षणों में भी मन्नतों के धागे बन जाते हैं उनकी जिजीविषा को जीवित रखने की सबसे मज़बूत कड़ी। एक छोटी सी ताबीज़ में ढूंढ पाती हैं वो विश्वास का अथाह सागर। आना होता है ईश्वर को उनतक उसी रूप में जिससे उनकी पहचान है।


हो ना हो, वैतरणी के उस पार का एक रास्ता रसोई के धुंए, बच्चों की हंसी और परिवार की ज़रूरतों से होकर भी जाता है। 

Saturday, July 16, 2016

ग़ैरत गर मिस्प्लेस्ड हो


यूं कहानी आंखों के सामने की है फिर भी नाम बताने की ज़रूरत नहीं। हर शहर के हर मुहल्ले की हर गली में मर्दानगी से लबरेज़ ऐसे नमूने ज़रूर होते हैं जिनके ज़िक्र के बिना औरतों की मुहल्ला गोष्ठी कभी पूरी नहीं होती। औरतें आंखें गोल-गोल किए, पल्लू से मुंह ढककर, फुसफुसाती आवाज़ में उस आदमी का नाम लेतीं हैं और उसकी बीवी के लिए च्च-च्च जैसी कुछ आवाज़ निकालतीं और अपनी किस्मत पर रश्क करतीं घर निकल जाती हैं। तो जनाब ऐसे ही भरे-पूरे मर्द थे जिनकी मर्दानगी का एक ना एक सबूत बीवी के शरीर पर चोट के निशान के तौर पर हमेशा मौजूद रहता। यूं मां-बाप से भी गाली-गलौज करते, फिर भी थे तो बेटे ही, सो बीवी पर हाथ उठाते वक्त मां-बाप का भी पूरा सहयोग मिला करता उन्हें। बीवी बड़े संस्कारी किस्म के परिवार से आई थी, इसलिए अर्थी के अलावा मायके लौटने के लिए कोई और सवारी मयस्सर नहीं थी उसे। मार खाती, आंसू बहाती और इकलौती बिटिया को लेकर कोने में सो रहती।

Saturday, July 9, 2016

तुम समझ पाओगे?


जब से तुम्हारे घर से फोन आया है मेरे घर में हलचल मची है। मेरे ऑफिस से लौटते ही कई चहकती आवाज़ों ने मुझे बता दिया कि कल तुम अपने परिवार के साथ मुझे देखने आ रहे हो। मन तभी से  खट्टा हो गया है। तुमसे मिले बगैर तुम्हें लेकर एक किस्म के प्रतिक्षेप से भर गया है मन। ये जो हम दोनों के मिलने के मौके को देखने की रस्म का नाम दे दिया गया है ना, ऐसा लगता है जैसे बराबरी के इस सो कॉल्ड रिश्ते की शुरूआत में ही एक सेंध लग गई है। जैसे ये पहला अधिकार है जो मुझसे छीनकर तुम्हें दे दिया गया है। पहली स्वीकृति का अधिकार। और शुरुआत तो हमेशा एक से ही होती है।