Saturday, July 30, 2016

स्त्री, अर्थ, अनर्थ?


कौन कहता है कि मर्दों के लिए औरतें शरीर मात्र हैं। अब इतनी भी संकुचित नहीं है उनकी मानसिकता। नज़र घुमाने की देर है, ऐसे परम प्रतापियों से भरी पड़ी है दुनिया जिनकी औरतों में दिलचस्पी चातुर्दिक होती है। जो उनके धर्म, काम और मोक्ष के साथ-साथ उनके अर्थ के भी तारणहार बनना चाहते हैं। जो हमारे अर्थोपार्जन पर हर किस्म की टिप्पणी करने का दम खम भी उतनी ही शिद्दत से रखते हैं। बहुतों की नींदें हराम रहीं हैं ये सोच सोचकर कि औरतों को नौकरी क्यों चाहिए, पैसों की ज़रूरत ही क्यों है, कमाती हैं तो उनका करती क्या हैं वगैरा-वगैरा।
हम जब नौकरी की तलाश में आकाश पाताल एक कर रहे थे तो साथ पढ़ने वाले कुछ लड़के ऐसे देखते जैसे जॉब मार्केट में उतरने की हिमाकत कर लड़कियों ने उनके हिस्से की रोटी छीनकर खा ली हो। एक ने तो दार्शनिक अंदाज़ में कह भी दिया हमारे लिए भी तो छोड़ दो कुछ नौकरियां, तुम्हें कौन सा घर चलाना है, कमाने वाला पति तो ढूंढ ही देंगे मां-बाप

Saturday, July 23, 2016

आधी आबादी का निर्वाण


अपने ईश को पाने के लिए, अपने दीन की राह में, अपने सत्य की तलाश के लिए, पुरूष छोड़ते आए हैं अपना घर, अपना परिवार, अपने लोग। हर वो रिश्ता जो सत्य संधान और उनके बीच बाधा बनकर आ सकता है। बिना पीछे मुड़े, मोह के सारे बंधन एक झटके में तोड़ चले गए। फिर उन्होंने पा भी लिया अपना सत्य, अपना प्रभुत्व। नए धर्म गढ़े, नए पंथ जोड़े। उन्होनें कहे हज़ारों शब्द, हर शब्द पत्थर की लकीर, जिसे अपना अंतिम सत्य मानने वाले लाखों अनुयायी भी जुट गए।

लेकिन प्रथम पुरूष की छाया से जन्मी, आदम की पसली से गढ़ी गई, किसी औरत ने कभी कोई धर्म नहीं गढ़ा। कोई स्त्री नहीं सिरज पाई किसी पंथ को, नहीं दिखा पाई कोई राह मुक्ति की आस लगाए अनुयायियों को। औरतों ने नहीं रचीं ऋचाएं, आयतें, वर्सेज। इन पन्नों में उनके लिए लिखे कर्मों की सूची भी तो भौतिक कर्तव्यों से इतर कुछ ज़्यादा नहीं। स्वर्गारोहण के मार्ग में, सुमेरू की तलहटी में सबसे पहले पांचाली के ही तो पैर फिसले थे। परिवार और प्रजा के प्रति आसक्त द्रौपदी की चाहतों की सीमा से कितना परे था ना सशरीर स्वर्ग में प्रवेश का सौभाग्य। 

शाम की चाय उस दिन लंबी खिंच गई थी। बाबूजी (श्वसुर) तन्मयता से लक्ष्मीनाथ गुसाई की कहानी सुना रहे थे। 18 शताब्दी के प्रसिद्ध कवि और योगी, कई दूसरे सत्यान्वेषी योगियों की तरह उन्होंने परिवार के कहने पर शादी की और पत्नी की ओर देखे बिना घर छोड़ दिया। पांडित्य प्राप्त करने के बाद जब पत्नी, संग की कामना के लिए उनके पास पहुंची तो उन्होने इसका प्रयोजन पूछा। पुत्र प्राप्ति की चाहना की तो पति की खड़ाऊं मिली जिसे धोकर पीने से लाल की प्राप्ति होगी। हो गई प्राप्ति। और साथ में पति  धर्म का निर्वाह भी। कहानी सुनकर मैं और मां एक दूसरे को एक सी नज़र से देख रहे थे, पुरूषों के लिए निर्लिप्त रह पाना इतना सहज कैसे हो पाता है? 

बचपन में अपने पिता की नानी की कहानियां सुना करती थी। पति की बेरुखी और मनमानियों से आहत एक बार अयोध्या गईं तो सीता की प्रतिमा में मन ऐसा रमा कि लौट कर कभी घर नहीं आईँ। वहीं के एक आश्रम में जीवन के बाकी साल बिता दिए। लेकिन घर पूरी तरह से तो भी नहीं छूट पाया उनसे। पति का परित्याग करने वाली औरतें भी अपने बच्चों से विमुख नहीं हो पातीं। मिलने आती रहीं लौट-लौटकर। पोतियां बड़ी हुईं तो उन्हें भी अपने साथ ले गईं। मूल-गोत्र के बंधनों को तोड़ उनका विवाह अयोध्या के परिवारों में ही कराया। मां-पापा की शादी के बाद भी आईं थीं, मां को देखने। उन्होंने अपने लिए शांति का मार्ग ढूंढा लेकिन क्या मुक्ति का भी?

कुछ दे सकने के लिए काफी कुछ छोड़ना भी तो होता है। और कहां छूट पाती हैं औरतों से कभी उनकी एक सी दिनचर्या। कोरी भावुकता से भरी औरतों को जाने क्यों परिवार की अनगिनत जवाबदेहियां कभी ज़ंजीर नहीं लगते। फिर कैसे मिलता होगा स्त्रियों को मोक्ष, मुक्ति, त्राण? कैसे पार कर पाती हैं वो वैतरणी? कयामत के रोज़ किस उम्मीद की चमक ला पाएंगी, फैसले का इंतज़ार करती उनकी आंखें?

घर और बाहर के बीच संतुलन बिठाने की सतत् कोशिश के बीच तो मुक्ति और निर्वाण जैसे शब्दों को याद रखना भी जटिल। चौके की उमस में, बच्चों के पोतड़ों में, जूठे बर्तनों के ढेर में भी क्या भगवान आ सकते हैं कभी?

ज़रूर आ सकते हैं। बल्कि आना पड़ता है उनको, आते रहे हैं वो।

स्त्रियां चूंकि मुक्ति के लिए पलायन नहीं करतीं, तभी शायद वो देख पाती हैं छोटी-छोटी चीज़ों में अपना ईश। परीक्षा के दुर्दम्य क्षणों में भी मन्नतों के धागे बन जाते हैं उनकी जिजीविषा को जीवित रखने की सबसे मज़बूत कड़ी। एक छोटी सी ताबीज़ में ढूंढ पाती हैं वो विश्वास का अथाह सागर। आना होता है ईश्वर को उनतक उसी रूप में जिससे उनकी पहचान है।


हो ना हो, वैतरणी के उस पार का एक रास्ता रसोई के धुंए, बच्चों की हंसी और परिवार की ज़रूरतों से होकर भी जाता है। 

Saturday, July 16, 2016

ग़ैरत गर मिस्प्लेस्ड हो


यूं कहानी आंखों के सामने की है फिर भी नाम बताने की ज़रूरत नहीं। हर शहर के हर मुहल्ले की हर गली में मर्दानगी से लबरेज़ ऐसे नमूने ज़रूर होते हैं जिनके ज़िक्र के बिना औरतों की मुहल्ला गोष्ठी कभी पूरी नहीं होती। औरतें आंखें गोल-गोल किए, पल्लू से मुंह ढककर, फुसफुसाती आवाज़ में उस आदमी का नाम लेतीं हैं और उसकी बीवी के लिए च्च-च्च जैसी कुछ आवाज़ निकालतीं और अपनी किस्मत पर रश्क करतीं घर निकल जाती हैं। तो जनाब ऐसे ही भरे-पूरे मर्द थे जिनकी मर्दानगी का एक ना एक सबूत बीवी के शरीर पर चोट के निशान के तौर पर हमेशा मौजूद रहता। यूं मां-बाप से भी गाली-गलौज करते, फिर भी थे तो बेटे ही, सो बीवी पर हाथ उठाते वक्त मां-बाप का भी पूरा सहयोग मिला करता उन्हें। बीवी बड़े संस्कारी किस्म के परिवार से आई थी, इसलिए अर्थी के अलावा मायके लौटने के लिए कोई और सवारी मयस्सर नहीं थी उसे। मार खाती, आंसू बहाती और इकलौती बिटिया को लेकर कोने में सो रहती।

Saturday, July 9, 2016

तुम समझ पाओगे?


जब से तुम्हारे घर से फोन आया है मेरे घर में हलचल मची है। मेरे ऑफिस से लौटते ही कई चहकती आवाज़ों ने मुझे बता दिया कि कल तुम अपने परिवार के साथ मुझे देखने आ रहे हो। मन तभी से  खट्टा हो गया है। तुमसे मिले बगैर तुम्हें लेकर एक किस्म के प्रतिक्षेप से भर गया है मन। ये जो हम दोनों के मिलने के मौके को देखने की रस्म का नाम दे दिया गया है ना, ऐसा लगता है जैसे बराबरी के इस सो कॉल्ड रिश्ते की शुरूआत में ही एक सेंध लग गई है। जैसे ये पहला अधिकार है जो मुझसे छीनकर तुम्हें दे दिया गया है। पहली स्वीकृति का अधिकार। और शुरुआत तो हमेशा एक से ही होती है।  

Saturday, July 2, 2016

सब ठीक है, फिर भी...



ट्रेन से सफर के दौरान इस बार हर ओर अद्भुत नज़ारे दिखे। स्टेशन पर लोग डस्टबिन ढूंढ-ढूंढकर अपना कचरा फेंक रहे थे। कहीं थोड़ी गंदगी पड़ी रह गयी तो तुरंत सफाई वाले को बुलाकर साफ कराया गया। उसके उपर किसी ने भी अपना कचरा ये सोच कर नहीं डाला कि जाने दो पहले से तो है ही एक हमारे कचरे से क्या फर्क पड़ेगा। एक जगह लाइन लगी थी, पास जाकर देखा तो पता चला थूकने वालों की है। पान, तम्बाकू, बलगम सब मुंह में दबाए लोग-बाग पंक्तिबद्ध होकर कचरे के डब्बे में थूक रहे थे, ताकि प्लेटफॉर्म पर गंदगी ना फैले। किसी के बच्चे को जब आई तो उसकी पैंट नीचे कर उसे पटरी की तरफ घुमाकर खड़ा करने के बजाय कर्तव्यनिष्ठ पिता भागा गोद में उठाकर टॉयलेट की ओर। इसके बावजूद हर जगह गंदगी फैली थी। अजब निकम्मी सरकार है इस देश की। वैसे पिछली सरकारें भी कम निकम्मी नहीं थी। अब इसमें बिचारी जनता का क्या दोष?

Saturday, June 25, 2016

मैं, तुम और बस....


मेरे शरीर के नज़र आ सकने वाले हर हिस्से पर तुम्हारे नाम की मुहर लगा दी गई थी, मांग में, माथे पर, कलाइयों में, हथेलियों पर, पैरों में। मेरे अस्तित्व के हर कोण को तुमसे गुज़रने की अनिवार्यता समझाई जा रही थी, नाम, पता, पहचान।  जबकि मन को बस एक वो डोर चाहिए थी जो इन सब प्रतीकों के परे सीधे तुमसे जुड़ सके। पता है क्या, बहुत सारे प्रतीक दरअसल अविश्वास से जन्मते हैं, फिर वो रिश्ता हो, समाज या कि देश। और ज़्यादातर बेईमानियां भी इन्हीं प्रतीकों की आड़ में होती हैं।

और हां, साथ में सात जन्मों के बंधन का वास्ता भी तो था हमें कसकर बांधने के लिए। (यूं सात जन्मों की बात मुझे अक्सर उलझा देती है क्योंकि इस बारे में हर कोई ऐसे बात करता है मानो ये पहला ही जन्म हो, दूसरा, तीसरा या सातवां भी तो हो सकता है ना।) सोचो तो, रिश्ते की सुंदरता क्या उसकी लंबाई से नापी जा सकती है? उफ्फ, संस्कार-परंपराएं, रीति-रिवाज़, लोक-लाज, उम्मीदें-अपेक्षाओं की इतनी दुहाइयां कि सब के सब कलेजे में एक साथ जम कर भय का रूप लेने लगे थे। इतना भय कि मन की सहज, सुंदर तरंगे एक-दूसरे तक पहुंच अनछुई ही लौट आएं।

और इन सबके बाद मुझे और तुम्हें एक साथ निर्माण में जुट जाना था, गृहस्थी की इमारत के। वो इमारत जिसकी एक-एक ईंट पीढ़ियों की आज़मायी हुई थी, ठोक बजा कर रखी, दूसरों के अनुभवों के जोड़ से जुड़ी। एकदम फेवीकोल का जोड़ जहां गलतियों के आ-जा सकने के लिए दरवाज़ा ना हो, कोई गवाक्ष तक नहीं। गलतियां क्या, वहां से तो छोटी-छोटी खुशियां, छोटे-छोटे सुख-दुख भी नहीं आ जा सकते। इमारत कितनी भी भव्य हो, रहती तो निर्जीव ही है ना। उसकी नींव चाहे कितनी भी गहरी हो, धरती के सीने से अपने लिए खुद पोषण नहीं ले सकती। वो सब तो एक पेड़ कर पाता है। जीवित, स्पंदन करता पेड़, जिसके ऊपर कोई छत नहीं होती, मौसम की मार से सारे पत्ते भी झड़ जाते हैं उसके, फिर उग आने के लिए।  

सोचो कैसा विरोधाभास है, फल देने के पहले पेड़ों को सालों पानी दिया जाता है, दोस्ती का रिश्ता धीरे-धीरे पुख्ता होता है, चलाने की कोशिश कराने से पहले बच्चे के पैरों के भी मज़बूत होने का इंतज़ार होता है। केवल दाम्पत्य ऐसा रिश्ता है जिससे पहले दिन ही रिज़ल्ट की उम्मीद की जाती है। शादी ना हुई वन टाइम इन्वेस्टमेंट हो गया, मंत्र पढ़े, फेरे लिए और शुरू हो गई मिल-जुलकर कैदखाना तैयार करने की कवायद। या जैसे ऑनलाइन मंगाया गया कोई रेडीमेड फर्नीचर हो, सारे टुकड़े साथ जोड़े, ड्रिल किया, पेंच कसे और इस्तेमाल को तैयार। यूं ही नहीं उम्मीदों के बोझ तले ज़्यादातर रिश्तों को कोंपलें मुरझा जाया करती हैं।

शुक्र है इमारत बनाने का हुनर ना तुम कभी सीख पाए ना मैं। हमें जोड़े रखने के लिए अनुभवों के फेवीकोल का स्टॉक खाली करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी। देखो तो, कोई बंधन नहीं है सिवाए उनके जो हमने चुने अपने लिए। आलते, बिछुए जाने कौन से अतीत की बात हो गए, चूड़ी, बिंदी की ज़रूरत केवल ड्रेस कोड के हिसाब से होती है, शादी के गहने तरतीब से लॉकर में रख दिए गए, त्यौहारों में निकालने के लिए। सिंदूर भी याद नहीं रहता अक्सर। साथ रहने के नियम हमारे, उनमें की गलतियां हमारी, उनसे सीखे सबक भी हमारे। पतझड़ आकर भी गए तो कोमल नए पत्तों के उग आने की उम्मीद में। बाप रे, कितनी बातें अब याद भी तो नहीं रहतीं, बस तुम्हारी छाती के सफेद हो रहे बालों को गिनती हूं तो तसल्ली होती है, साथ चलते-चलते एक अरसा हो गया।

वैसे सुनो, क्या तुम्हें उस पंडित का नाम और शक्ल याद है जिसने शादी के मंत्र पढ़े थे?
मुझे भी नहीं। 

Saturday, June 18, 2016

फिर पापा, मां बन जाते हैं


गलत कहता है विज्ञान। समय कभी एक गति से नहीं चलता। अगर चलता तो छोटा सा बचपन ज़िंदगी का सबसे लंबा हिस्सा कैसे लगता? सबसे ज्यादा कहानियां बचपन की, सबसे ज़्यादा यादें बचपन से। बचपन की बस एक ही चीज़ छोटी होती है, स्कूल की छुट्टियां। खासकर तब, जब छुट्टियों के उस पार बोर्डिंग वाला स्कूल इंतज़ार कर रहा हो।

बोर्डिंग से हमसे ज़्यादा चिढ़ मां को थी। हम बोर्डिंग में होते तो मां रात-रात को उठकर रोतीं, पापा से लड़तीं, अच्छी पढ़ाई के लिए बेटियों को हॉस्टल भेजने पर मां ने पापा को कभी माफ नहीं किया। हर छुट्टी के बीतते-बीतते मां, पापा से छुपकर, हज़ार-हज़ार प्रलोभन देती, एक बार बोल दो नहीं जाना है, मत जाओ, यहीं के स्कूल में पढ़ना। छोटा है तो क्या हुआ, पढ़ाई तो तुम्हारी मेहनत पर निर्भर करेगी। दिल डोल जाता, फिर हमारी ज़रूरत की चीज़ें जुटाने में स्कूटर से शहर के कई-कई चक्कर लगाते पापा का चेहरा याद आता और हम मन मार लेते। मां घर में तैयारियां करतीं और रोती रहतीं। पापा रोते नहीं, आखें नम होती हों शायद, लेकिन मां के आसुंओं की बाढ़ में उनकी नम आखों की याद हमेशा धुंधला जाती।

Saturday, June 11, 2016

स्त्री विमर्श की आड़ में...




ऐसा क्यों लगता है आपको कि अपनी देह और मन की आज़ादी की बात खुलकर बस वैसी औरतें ही कर सकती हैं जो किसी टूटे रिश्ते या रिश्तों के कछार पर खड़ी हों? ये भी तो हो सकता है कि दैहिक और वैचारिक स्वतंत्रता की पैरोकार वो स्त्री एक ऐसे समृद्ध रिश्ते की ज़मीन पर पूरे आत्मविश्वास से पैर जमाए खड़ी है जहां से, देह तुम्हारी, संस्कार तुम्हारे, मर्जी और अधिकार हमारे जैसे बेतुके कंकड़ों को बहुत पहले चुन लिया गया हो। इसलिए उनके आज़ाद ख्यालों की आड़ में उनसे फ्लर्ट करने के मौके ढूंढने का कोई फायदा नहीं। ये मान लेने में इतनी ज़ोर से क्यों हिलता है असहमति से भरा आपका सिर? पुरुषत्व के अहम् के बोझ से?

तीन समय चूल्हा जला पूरे परिवार की पसंद का खाना पकाने वाली औरत भी अपने स्वतंत्र स्पेस की प्रतिरक्षा के लिए कटिबद्ध हो सकती हैं जहां अपनी जिम्मेदारियां पूरी होते ही वो खुले मन से वापस पहुंच जाती हैं। उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा अपना होता है जहां अनधिकृत प्रवेश वर्जित का बोर्ड हर किसी के लिए लगा होता है, इसका ये मतलब नहीं कि अपनी ज़िंदगी के बाकी हिस्से दूसरों को खुश रखने में बिताने से गुरेज़ है उनको।  

Saturday, June 4, 2016

महाभारत जारी है....


फिर कौरवों ने पांडवों से कहा, ये बताने की ज़रूरत नहीं कि तुम्हारा ऐश्वर्य देखकर हमारे कलेजे पर सांप लोट रहे हैं, हमने लाख तुम्हें अपने से कमतर रखना चाहा लेकिन अपनी शिक्षा, कर्मठता और शौर्य के बल पर तुमने हमें पीछे छोड़ दिया। हम चाहें भी तो निष्ठा, लगन, वीरता और कर्तव्यपरायणता में तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकते और हम चाहें भी तो तुम्हारे लिए हो रहे इस जय घोष को सुनने के बाद चैन की नींद नहीं सो सकते। इसलिए हमने विजय के मापदंड ही बदल दिए। हम चाहते हैं कि तुम अब द्यूत क्रीड़ा में हमें परास्त करो तब हम तुम्हें विजयी समझेंगे। पांडव जानते थे कि ये छल है, इस एक निर्णय से उनका अभी तक का सारा श्रम और पराक्रम व्यर्थ हो सकता है। फिर भी उन्हें अपने प्रभुत्व का प्रमाण देना था और इसके लिए हर चुनौती स्वीकार की जानी थी। इसलिए उन्होंने द्यूत का आमंत्रण स्वीकार किया और उसके बाद हज़ारों सालों तक दोहरायी जाने वाली कहानी का जन्म हुआ।
इतिहास में प्रासंगिकता की ये बिसात बार-बार बिछाई जाती है। इस बार इसके आर-पार दो इंसानी नस्लें हैं।  सदियों से अपने प्रभुत्व के मद में झूमते पुरुष और उसके रचे समाज में अपना होना तलाशती स्त्रियां।

Saturday, May 28, 2016

नानी की चिड़ैया



बचपन था, गर्मी की छुट्टियां थीं और उन छुट्टियों के कुछ दिन नानी के घर के लिए मुकर्रर थे। नानी का घर दरअसल एक तिलिस्म था जहां पहुंचते ही सब खो जाते, मांएं अपनी दुनिया में और हम बच्चे अलग अपनी दुनिया में। मां के लिए यहां बस उनकी मां थोड़े ही थीं, आलमारी के कोने में पुराने कपड़ों की तहों में सिमटा उनका बचपन भी था जो उंगलियों के पोरों के छूने भर से वापस हरकत में आ जाता था, कमरों के कोने में वो कहानियां थीं जो ज़रा सी सरगोशी से हुमक पड़तीं और जिन्हें अभी भी याद कर मां और मौसियां घंटों हंसती जा सकती थीं। रसोई में अभी तक कच्ची उम्र में की गई नाकाम कोशिशों की महक तक मौजूद थी। हमारे लिए भी तो वहां रोज़ के बोरिंग काम नहीं थे, बोरिंग सुबह और शाम भी नहीं थे।