Saturday, February 24, 2018

उजाले अपनी यादों के...



रोनाल्ड रेगन अमेरिका के सबसे ताकतवर और लोकप्रिय राष्ट्रपतियों में रहे. टैक्स और महंगाई की दर में कमी के लिए,उनके फैसलों को आज भी रेगैनोमिक्सके नाम से जाना जाता है. राष्ट्रपति बनने से पहले वे हॉलीवुड अभिनेता और एक्टर यूनियन के अध्यक्ष भी थे. लेकिन व्हाइट हाउस छोड़ने के कुछ ही साल बाद रेगन में अल्ज़ाइमर्स के लक्षण दिखाई दिए. जब रोग उनके उपर हावी होने लगा तो उनकी पत्नी उन्हें लेकर एक तरह से हाउस अरेस्ट हो गईं. डॉक्टरों, परिवार के लोगों और कुछ करीबी दोस्तों के अलावा किसी और को अपने चेहते राजनेता मिलने की इजाज़त नहीं थी. अपने जीवन के आखिरी दस साल रेगन को पूरी तरह सार्वजनिक जीवन से दूर रखा गया. अमेरिकी जनता को साल 2004 के जून  महीने में सीधा उनकी मौत की सूचना ही मिली. उनके देहांत के बाद पूर्व फर्स्ट लेडी नैंसी रेगन ने एक बयान में कहा कि वो नहीं चाहती थीं कि पूरा देश अपने चहेते नेता को असहाय और बीमार के तौर पर याद रखे. शायद रेगन भी अपने लिए ऐसा नहीं चाहते.

लोकप्रियता का वही शिखर स्थान भारत में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मिला है. स्ट्रोक ने उन्हें भी लगभग एक दशक से सार्वजनिक जीवन से दूर रखा है. जिनके शब्द और शब्दों के बीच की लंबी, सोची-समझी चुप्पी भी करोड़ों तालियां बटोर लाती थीं आज वो आवाज़ लंबे समय से खामोश है. गिने-चुने लोगों को ही उनसे मिलने की अनुमति है. दो साल पहले जब उन्हें भारत रत्न दिया गया तो समारोह से मीडिया को पूरी तरह दूर रखा गया. सरकार ने जो आधिकारिक तस्वीर जारी की उसमें भी कैमरे का एंगल कुछ यूं रखा गया कि ट्रे के पीछे से लोग अपने चहेते नेता का आधा चेहरा ही देख पाएं.

इन दिनों मशहूर शायर बशीर बद्र का वीडियो सोशल मीडिया पर बड़ी तादाद में देखा जा रहा है. बशीर साहब ने हाल ही में 83 साल पूरे किए. जो आवाज़ रात-रात भर चलने वाले मुशायरों में कभी खत्म नहीं होने वाली तालियों की गड़गड़ाहट का सबब बनती थी आज वो लड़खड़ा गई है. व्हील चेयर पर बैठे वो अपनी की पंक्तियां याद करने की कोशिश करते हैं फिर नाकाम हो बच्चों सी मासूमियत से हंस पड़ते हैं. इन्द्रियां शिथिल हो रही हैं, फिर भी उनके मुंह में माइक ठूंस उनसे बुलवाने की लगातार कोशिश ने मन को जुगुप्सा से भर दिया. लाख कोशिश करें, अब उनका दिल तोड़ने वाला यही रूप याद रह जाएगा. उनकी नज़्में, उनकी दमदार आवाज़ और आवाज़ की वो कशिश सब पर बेचारगी सी हावी हो गई है. अपने कलाकारों को कभी भरपूर इज़्ज़त नहीं देने वाले हम उनकी एक अच्छी याद भी सहेज कर नहीं रख सकते? 

बुढ़ापे और बीमारियों का इंसान के साथ अपना अलग बहीखाता चलता है. क्रियाशीलता के दिनों की उसकी उपलब्धियां और रुतबा उनपर कोई प्रभाव नहीं डाल पातीं. उन्हें नहीं जानना कौन, कहां, कितनी शोहरत और दौलत छोड़ आया है. उन्हें बस उसके जीतेजी अपना हिसाब पूरा करना है.

अक्सर हम अपने अधिनायकों से कुछ इस कदर जुड़ जाते हैं कि उनसे जुड़ी हर जानकारी को हासिल करना अपना अधिकार समझने लगते हैं. उस वक्त ये भी भूल जाते हैं कि ज़िंदगी की विद्रूपताओं में उनका हिस्सा भी है जो उन्हें ही उनके जीवन के हर प्रकोष्ठ में झांकने की धृष्टता भी उनका अपमान करना ही है.  बेहद अंतरंग और निजी क्षण, अच्छे या बुरे, केवल उनके हैं. उनकी पब्लिक इमेज से इतर, अक्सर विरोधाभासी भी. प्रशंसक या फॉलोवर होने की अपनी सीमाएं हैं, उसे लांघने की चेष्टा मनुष्य के तौर पर हमें कमतर ही बनाती है.

हम अपने आप को जिनके मुरीद बताते हैं, क्या उन्हें ये तय करने का हक भी नहीं दे सकते कि वो खुद को किस रूप में याद रखना चाहेंगे? कि उनके चले जाने के बहुत बाद भी जब भी अपनी आंखें बंद करें, गौरव और आत्मविश्वास से लबरेज़ उनका वही चेहरा हमारी आंखों के सामने आए जो हताशा के क्षणों में हमारा पाथेय बनता आया है?


Wednesday, February 14, 2018

अर्धनारीश्वर शिव हैं सच्चे प्रेम के प्रतीक


सुंदर संयोग है कि प्रेम के दो दिन साथ-साथ मनाए जाएंगे. वैलेंटाइन डे, प्रेम की अभिव्यक्ति का दिन है तो शिवरात्रि, प्रेम की परिणति का. अनादि, अनंत शिव का कैसा जन्मदिवस? उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन तो उनके विवाह का उत्सव है. शिवरात्रि दिन कुंवारी लड़कियों के लिए शिव सा पति मांगने का है तो शादी-शुदा औरतों के लिए पार्वती सा अखंड अहिबात मांगने का. समय चाहे कितना भी बदल जाए, पति या प्रेमी के तौर पर शिव की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी. चूंकि शिव सच्चे अर्थों में आधुनिक, मेट्रोसेक्सुअल पुरुषत्व के प्रतीक हैं, इसलिए हर युग में स्त्रियों के लिए काम्य रहे हैं.
शिव का प्रेम सरल है, सहज है, उसमें समर्पण के साथ सम्मान भी है. शिव प्रथम पुरुष हैं, फिर भी उनके किसी स्वरुप में पुरुषोचित अहंकार यानि मेल ईगो नहीं झलकता. सती के पिता यक्ष से अपमानित होने के बाद भी उनका मेल ईगो उनके दाम्पत्य में कड़वाहट नहीं जगाता. अपने लिए न्यौता नहीं आने पर भी सती के मायके जाने की ज़िद का शिव ने सहजता से सम्मान किया. आज के समय में भी कितने ऐसे मर्द हैं जो पत्नी के घरवालों के हाथों अपमानित होने के बाद उसका उनके पास वापस जाना सहन कर पाएंगे? शिव का पत्नी के लिए प्यार किसी तीसरे के सोचने-समझने की परवाह नहीं करता. लेकिन जब पत्नी को कोई चोट पहुंचती है तब उनके क्रोध में सृष्टि को खत्म कर देने का ताप आ जाता है.
हिंदु मान्यताएं कहती हैं कि, बेटा राम सा हो, प्रेमी कृष्ण सा लेकिन पति शिव सा होना चाहिए. पार्वती के अहिबात सा दूसरा कोई सुख नहीं विवाहिता के लिए. क्यों? क्योंकि शिव सा पति पाने के लिए केवल पार्वती ने ही तप नहीं किया, शिव ने भी शक्ति को हासिल करने लिए खुद को उतना ही तपाया.  
शक्ति के प्रति अपने प्रेम में शिव खुद को खाली कर देते हैं. कहते हैं, पार्वती का हाथ मांगने शिव, उनके पिता हिमालय के दरबार में सुनट नर्तक का रुप धर कर पहुंच गए थे. हाथों में डमरू लिए, अपने नृत्य से हिमालय को प्रसन्न कर जब शिव को कुछ मांगने को कहा गया तब उन्होंने पार्वती का हाथ उनसे मांगा.
शिव ना अपने प्रेम का हर्ष छिपाना जानते हैं, ना अपने विरह का शोक. उनका प्रेम निर्बाध और नि:संकोच है, वह मर्यादा और अमर्यादा की सामयिक और सामाजिक परिभाषा की कोई परवाह नहीं करता. अपने ही विवाह भोज में जब शिव को खाना परोसा गया तो श्वसुर हिमालय का सारा भंडार खाली करवा देने के बाद भी उनका पेट नहीं भरा. आखिरकार उनकी क्षुधा शांत करने पार्वती को ही संकोच त्याग उन्हें अपने हाथों से खिलाने बाहर आना पड़ता है. फिर पार्वती के हाथों से तीन कौर खाने के बाद ही शिव को संतुष्टि मिल गई.
यूं व्यावहारिकता के मानकों पर देखा जाए तो शिव के पास ऐसा कुछ भी नहीं जिसे देख-सुनकर ब्याह पक्का कराने वाले मां-बाप अपने बेटी के लिए ढूंढते हैं. औघड़, फक्कड़, शिव, कैलाश पर पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए एक घर तक नहीं बनवा पाए,. तप के लिए परिवार छोड़ वर्षों दूर रहने वाले शिव.  साथ के जो सेवक वो भी मित्रवत, जिनके भरण की सारी ज़िम्मेदारी माता पार्वती पर. पार्वती के पास अपनी भाभी, लक्ष्मी, की तरह एश्वर्य और समृद्धि का भी कोई अंश नहीं.
फिर भी शिव के संसर्ग में पार्वती के पास कुछ ऐसा है जिसे हासिल कर पाना आधुनिक समाज की औरतों के लिए आज भी बड़ी चुनौती है. पार्वती के पास अपने फैसले स्वयं लेने की आज़ादी है. वो अधिकार जिसके सामने दुनिया की तमाम दौलत फीकी पड़ जाए. पार्वती के हर निर्णय में शिव उनके साथ है.  पुत्र के रुप में गणेश के सृजन का फैसला पार्वती के अकेले का था, वो भी तब, जब शिव तपस्या में लीन थे. लेकिन घर लौटने पर गणेश को स्वीकार कर पाना शिव के लिए उतना ही सहज रहा, बिना कोई प्रश्न किए, बिना किसी संदेह के. पार्वती का हर निश्चय शिव को मान्य है.
शिव, अपनी पत्नी के संरक्षक नहीं, पूरक हैं. वह अपना स्वरुप पत्नी की तत्कालिक ज़रूरतों के हिसाब से निर्धारित करते हैं. पार्वती के मातृत्व रुप को शिव के पौरुष का संरक्षण है तो रौद्र रुप धर विनाश के पथ पर चली काली के चरणों तले लेट जाने में भी शिव को कोई संकोच नहीं. शिव के पौरुष में अहंकार की ज्वाला नहीं, क्षमा की शीतलता है. किसी पर विजय पाने के लिए शिव ने कभी अपने पौरुष को हथियार नहीं बनाया, कभी किसी के स्त्रीत्व का फायदा उठाकर उसका शोषण नहीं किया. शिव ने छल से कोई जीत हासिल नहीं की. शिव का जो भी निर्णय है, प्रत्यक्ष है.
वहीं दूसरी ओर शक्ति अपने आप में संपूर्ण है, अपने साथ पूरे संसार की सुरक्षा कर सकने में सक्षम. उन्हें पति का साथ अपने सम्मान और रक्षा के लिए नहीं चाहिए, प्रेम और साहचर्य के लिए चाहिए. इसलिए शिव और शक्ति का साथ बराबरी का है. पार्वती, शिव की अनुगामिनी नहीं, अर्धांगिनी हैं.  
कथाओं की मानें तो चौसर खेलने की शुरुआत शिव और पार्वती ने ही की. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि गृहस्थ जीवन में केवल कर्तव्य ही नहीं होते, स्वस्थ रिश्ते के लिए साथ बैठकर मनोरंजन और आराम के पल बिताना भी उतना ही ज़रूरी है. शिव और पार्वती का साथ सुखद गृहस्थ जीवन का अप्रतिम उदाहरण है.
अलग-अलग लोक कथाओं में शिव और शक्ति कई बार एक दूसरे से दूर हुए, लेकिन हर बार उन्होने एक दूसरे को ढूंढ कर अपनी संपूर्णता को पा लिया. इसलिए शिव और पार्वती का प्रेम हमेशा सामयिक रहेगा, स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता हुआ. क्योंकि, शिव होने का मतलब प्रेम में बंधकर भी निर्मोही हो जाना है, शिव होने का मतलब प्रेम में आधा बंटकर भी संपूर्ण हो जाना है.





Saturday, February 10, 2018

सफरकथा: कुछ दिनों की बात


फ्रेम की हुई तस्वीर से हंसते मुस्कुराते चेहरों वाले परिवार ने घुसते ही ट्रेन के कूपे के हर कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली. मैंने अपने इकलौते सूटकेस को परे सरकाते हुए, फैले हुए पैर भी समेट लिए. आवाज़ की ठसक और माथे की चमक से अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं कि उम्रदराज़ सहयात्री लड़के की मां हैं. उनका प्रभुत्व बोगी को दीप्त किए है. तर्जनी के इशारे से वो सामान इधर-उधर रखवा रही हैं दो बेटे उनकी आज्ञापालन को तत्पर., उसमें खाना है, थैली सामने रखो, बड़ा सूटकेस उस ओर, संभाल कर, मेरा सूटकेस चप्पलों को ना छू जाए, उसमें साफ कपड़े हैं. अरे, उस बैग में तो गौरी की मूर्ति है, उसे उपर के बर्थ पर डालो, दुल्हिन साथ में रखकर सो जाएगी. मैंने कनखियों से दुल्हिन पर नज़र डाली, चटक लाल कुर्ता, गले में दुपट्टा और पैरों में बिछुए, आंखों पर वोग का चौकोर फ्रेम वाला चश्मा और लाख की चूड़ियों से भरी कलाई से झांकती राडो की घड़ी, पहनावे में काफी कुछ बेमेल. साइड बर्थ पर पैर सिकोड़े वो मूक दर्शक बनी बैठी रही, बीच-बीच में फोन पर नज़रें जमा लेती. चहुं ओर से निश्चिंत हो माताश्री की कृपा दृष्टि मुझपर पड़ी,

अकेली हो,’ सरीखे प्रश्न में उनकी भृकुटि तनी. मैंने सिर हिलाकर हामी भरी.

माताश्री का एकालाप जारी है. सूरज बड़जात्या की फिल्म सरीखे उनके वक्तव्य यूं मुझको सीधे संबोधित नहीं है लेकिन कुछ इस तरह उवाचे जा रहे हैं जिससे मेरा पात्र परिचय बिना किसी भ्रांति के सम्पन्न हो जाए. तो प्रवासी उत्तर प्रदेशी परिवार की मुंबई में पली और दिल्ली में नौकरी कर रही कायस्थ बाला का दिल अपने सहकर्मी पर आ गया जो बिहार के प्रतिष्ठित कान्यकुब्ज ब्राह्मण का बड़ा चिराग है. बेटे के हठ के सामने झुककर माताश्री ने उसकी शादी को लेकर अपने तमाम अरमानों को होम कर दिया और खानदान की इज़्जत को परे सरकाकर, पिता समेत पूरे परिवार को मना पाने का गुरुतर बोझ भी अपने उपर ले लिया.

समझना आसान था कि मां के इस एक त्याग के सामने जीवन भर की गुलामी का पट्टा लगाकर बेटा नतमस्तक हुआ पड़ा है. ये भी कि, ममता के जिस कर्ज से वो दबा पड़ा है उसका भुगतान चक्रवृद्धि ब्याज़ समेत पत्नी को करना है. तीन महीने पहले हुई शादी के बाद रिश्ते के देवर की शादी के बहाने नई बहु की ये पहली ससुराल यात्रा है जिस दौरान उसे अपने चरित्र, स्वाभाव, व्यवहार सबकी उत्कृष्टता का सर्टिफिकेट दूर-पास के हर रिश्तेदार से लेना है. बहु का आगमन त्रुटिविहीन हो इसे सुनिश्चित करने के लिए माताश्री ने स्वंय दिल्ली आकर सबको लिवा लाने की एक और ज़िम्मेदारी संभाल ली.

बेटे मां के अलग-बगल हैं और बहु मेरे बगल में. थोड़े समय बाद माताजी को बाथरुम जाना था. चप्पल शायद सामान के पीछे थी. छोटे बेटे ने खींचकर पैरों के पास रख दी. ये छोटा बड़ा आज्ञाकारी है, मुझसे पूछे बिना कभी कुछ नहीं करता, माताश्री ने गर्वोन्नत हुंकार भरी और बड़े बेटे-बहु की ओर तिर्यक दृष्टि डालकर चलती बनीं.

माताश्री के दूरभाषिक वार्तालाप ने किताब के पीछे छिपे मेरे कानों को सूचित किया कि कुछ रिश्तेदार एसी थ्री की बोगी में हैं और जल्द ही मिलने आने वाले हैं. अब हर कोई एसी टू में तो सफर नहीं कर सकता, माताश्री ने चच् वाली बेचारगी दिखाई. फिर तुरंत दुल्हिन को सिर ढंकने का आदेश हुआ, वो और सिकुड़ गई. आधे घंटे के बहु परीक्षण, नाश्ते-पानी और हो हल्ले के बाद शांति बहाल हुई. रिश्तेदारों के सामने दुपट्टा सरकने के माताश्री उलाहने के परिणामस्वरुप दुल्हिन को पति की झिड़की मिली और बेटे की इस कर्तव्यपरायणता से गद्गद माताश्री से कुछ दिनों की बात वाले जुमले की सौगात. जो प्यार कभी बराबरी का रहा होगा अब रिश्तों के तराज़ू की बंदरबांट में उपर-नीचे का हो गया.

कुछ समय बाद माताजी का मन रिश्तेदारों वाली बोगी के विज़िट का हुआ. छोटे श्रवणकुमार को लिए वो उधर निकलीं तो बड़े बेटे के चेहरे से जैसे एक नकली परत खिसकी. पहले अंडे वाले को रोककर उसने दो उबले अंडे खरीद पत्नी संग खाया. कुछ मिनट पहले माताश्री इसी फेरीवाले को अंडे की बदबू फैलाने के लिए फटकार लगा चुकी थीं. 17-18 साल का वो बालक लेकिन पक्का बिजनेसमैन था, चेहरे पर बिना कोई भाव लाए पैसे लेकर चलता बना. मैंने किताब को चेहरे से थोड़ा नीचे सरकाकर चोर दृष्टि से सामने वाले बर्थ पर देखा, मनुहार वाली मुद्रा में पतिदेव ने नई-नवेली के ईयरफोन का एक सिरा अपने कान में लगा रखा था, दोनों का हाथ परस्पर बंधे हुए.

भरोसे के इन्हीं पलों की रेज़गारी लिए उसे अगले कई दिन काटने हैं. समय कम था, मन किया ड्राइवर बाबू से कहकर एसीथ्री की उस बोगी को बाकी की ट्रेन से अलग ही करा दूं. लेकिन एसीथ्री की बदहाली पर नाक-भौं सिकोड़तीं माताश्री सशरीर उपस्थित हो ही गईं. 

अगली सुबह उनकी यात्रा मुझसे चंद घंटे पहले सम्पन्न हुई.  सबके पीछे उतरती दुल्हिन को फिर से देखने के लिए मेरी चादर चेहरे से नीचे सरकी. मन किया उसका हाथ पकड़कर बोल ही दूं, सुनो ये कुछ दिनों की बात नहीं है. ऐसा धोखा है जिसकी तुम्हें धीरे-धीरे आदत डाल दी जाएगी अच्छा हुआ नहीं बोल पाई, कुछ भ्रम देरी से टूटें तो ही अच्छा है. 

मैंने बगल में रखी खालिद हुसैनी की तीसरी किताब पर नज़र डाली,  कल शाम से अब तक दो-चार पन्ने ही आगे बढ़ पाई थी. घिसी-पिटी ही सही, जीती-जागती कहानी जब साथ हो तो बेस्टसेलर को भी नज़रअंदाज़ करने में कोई पाप नहीं. 


Saturday, January 27, 2018

टीनएज शादी के फलसफे



पहला डिस्क्लेमर तो ये कि यहां बात टीनएज में हुई शादी की नहीं विवाहोपरांत उस दौर की हो रही है जब शादी-शुदा ज़िंदगी अपने टीनएज में प्रवेश करती है. वैसे भी गुणी जन कह गए हैं कि जहां का अनुभव हो उसी ज़मीन पर अपनी कलम घिसें. और बात दरअसल ये है कि देश की 80 फीसदी शादियों की तरह हमारी शादी भी एक सोची-समझी साज़िश के तहत हुई थी. मने 600 निमंत्रण कार्ड छपवा के और 800 मेहमानों को जिमा के. हां कुंडली खोल गुण नहीं मिलाए गए थे, शायद इस उम्मीद में कि बाकी की पूरी ज़िंदगी इसी का गुणा-भाग करने में ही तो बितानी है.

यूं शादी नाम का सफर कभी इस मुकाम पर नहीं पहुंचता जब इंसान सामान सलीके से जमा कर टांगे पसार, पलके मूंदने का फैसला ले पाए. कन्फर्ट ज़ोन केवल एक मामले में मिल पाता है, युद्ध के लिए अलग से मुद्दे जुटाने नहीं पड़ते, मूड होने पर या मूड नहीं होने पर, किसी भी स्थिति में, महज़ दस सेकेंड की तैयारी में यल्गार किया जा सकता है. इस समय तक आपसी सहमति से सारे अस्त्र-शस्त्र साझा शास्त्रागार में जमा हो चुके हैं, ऐसे में ब्रह्मास्त्र उसे प्राप्त होता है जो उसकी ओर पहले हाथ बढा दे. अगले ने ज़रा सी देरी की, दांव हाथ से निकल बहीखाते में एक हार दर्ज करवा चुका होता है.

लेकिन सालों का अनुभव इतना धीरज भी सिखा देता है कि विषम परिस्थिति में भी व्याकुलता हावी नहीं होने पाती. नर हो ना निराश करो मन को, कौन सा स्कूल का इम्तिहान है जो अगले साल ही दोहराया जाएगा. इतने लंबे साथ में एक दूसरे को इस कदर आत्मसात कर चुके होते हैं कि याद ही नहीं रहता इकोसिस्टम में कौन सा अवगुण कौन लेकर आया. अवगुणों के उद्गम को लेकर ही कई लड़ाइयां यूं ही लड़ ली जाती हैं.

अब शादी कोई लोकतंत्र तो है नहीं जिसका तंबू केवल चार बंबुओं के सहारे खड़ा रह सके. इसे टिकाए रखने के लिए दोनों पक्षों के मां-बाप, भाई-भतीजे, बहन-बहनोई, मित्र-मित्राणी जैसे तमाम खूंटे खुद के ज़मींदोज़ करने की तत्परता में खड़े रहते हैं. ज़्यादातर मामलों में खूंटे ज़रूरत से इतने ज़्यादा होते हैं कि अतिरिक्त खिंचाव के मारे तंबू का फटना ही तय हो जाता है. तिस पर भी पड़ोस वाली मुंह बोली बहन या चाची के रिश्ते का वो हैंडसम भाई नुमा कोई प्रकट हो, अपना अलग बंबू खुसेड़ मुश्किल से टिके-टिकाए तंबू की ऐसी की तैसी कर सकता है.

वैसे भी स्वस्थ, सुंदर और सर्वमान्य शादियों पर ना बाज़ार का कोई सिद्धांत काम करता है ना विज्ञान का. लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न्स का यहां कोई काम नहीं. बहुत संभव है कि जब बाज़ार में उछाल हो तो आप अपनी जेब कटी पाएं और मंदी के दिनों में कोई विंड फॉल गेन हो जाए. आईंस्टाइन के सिद्धांत भी यहां फेल हो जाते हैं क्योंकि किसी मासूम से एक्शन का रिएक्शन समानुपात से दस गुना ज़्यादा भी हो सकता है. ये तो ऐसा मैथमैटिकल इक्वेशन है जिसके हेंस प्रूव्ड स्टेज पर भी कोई नया वेरिएबल आकर आपके सारे ज्ञान के ऐसी की तैसी कर सकता है और उसके बाद जाने के लिए एक ही रास्ता बचता है, बैक टू स्टेप वन विथ एडिशनल बैगेज.

और हमने तो हमारी शादी के बचपन में ही फ़ार्चून 500 कंपनियों में से एक की मल्लिका इंद्रा नूई का एक इंटरव्यू पढ़ लिया था जिसमें उन्होंने ये कहकर हमारे ज्ञान चक्षु खोल दिए कि जब तक एक औरत की शादी टीनएज में प्रवेश करती हैं तब तक उसका इकलौता अदद पति भी टीनएजर बनने का फैसला ले चुका होता है. तब से पति नामक इंसान के अंदर से किसी क्षण एक ज़िद्दी, सिरचढ़े बच्चे के बाहर कूद पड़ने की दुश्चिंता में काफी समय व्यतीत होता रहा.

अनुभव ने ज्ञानकोश में एक इज़ाफा ये भी किया कि इतिहास की तरह जोक्स भी जीतने वाला पक्ष ही लिखवाता है. हर सुबह इनबॉक्स में ठेले जाते पत्नी पीड़ित पतियों की दुखद गाथा सुनाते चुटकुलों ने इस बात पर विश्वास और पुख्ता कर दिया है.

यूं दिल छोटा करने की कोई ज़रूरत नहीं, इस देश में क्रिकेट के बाद शादी ही एक ऐसा मुद्दा है जिसके ज्ञान से लबलबाता अक्षय पात्र हर पात्र-कुपात्र के पास होता है. सो किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में नुस्खों, नसीहतों, टोटकों और दांव पेंचों का पिटारा दसो दिशाओं से प्राप्त होने लगता है.

वैसे ध्यान रहे, शादियां होमियोपैथी की गोलियों की तरह होती हैं, केवल उपर से ही एक सी दिखती हैं. अंदर का फॉर्म्यूला सबका अलग. सो सबसे ज़्यादा भरोसा अपने खुद के नुस्खे पर करें. शादी के टीनएज का सबसे बड़ा हासिल ये एक ज्ञान.    

Saturday, January 13, 2018

कन्यादान कब तक?



कलर्स चैनल के कार्यक्रम शनि देव में प्रसंग शनि की गंधर्व कन्या धामिनी से विवाह का था. कन्यादान की रस्म को कार्यक्रम के नायक शनि ने ये कहकर रोक दिया कि उनकी होने वाली पत्नी कोई वस्तु नहीं जिसे दान में दिया जा सके. पौराणिक कथाओं या पटकथाओं को आधुनिक दर्शकों के लिए लिखते समय उसमें सम-सामयिक विषयों और विवादों का छौंक नज़र आ जाना कोई नई बात नहीं. चर्चित कथाकार अमिष त्रिपाठी ने अपनी राम कथा के पहले भाग में दिल्ली के निर्भया गैंग रेप का सब प्लॉट शामिल किया था. सॉयन्स ऑफ इक्ष्वाकु में मंथरा की बेटी के सामूहिक बलात्कार और हत्या का प्रसंग विस्तृत तौर पर आता है. बीते कुछ सालों में बेटियों को पढ़ाने और बचाने को लेकर जनमानस की बढ़ती मुखरता के बीच स्टार प्लस ने भी अपने सीरियल सिया के राम में रामायण की कहानी को सीता के दृष्टिकोण से दिखाने की कोशिश की थी. पर्दे पर अवतृत हुए रामायण के तमाम संस्करणों में ये पहली बार था जब राम की कहानी के साथ उनकी बहन शांता की कहानी भी कही गई थी. शायद ये वजह भी हो कि अब तक दिखाई गई शनि की कहानियों में न्याय और वक्र दृष्टि के पहलुओं से थोड़ा इतर,  इस बार के कथानक में उनके वैवाहिक और गृहस्थ जीवन को रखा जाना तय किया गया हो. ऐसे में इस कथा में कन्यादान जैसी पुरातन और अनिवार्य रस्म पर प्रश्न उठा, उसे अस्वीकार करने का शनि का फैसला उनके न्यायप्रिय होने की अवधारणा को और मज़बूत करता नज़र आ रहा है.

स्त्री विमर्श से जुड़े तमाम पहलू जितने व्यापक स्तर पर मुख्यधारा के विषय बनते जाएंगे उन तमाम रीति-रिवाजों को नए सिरे से परिभाषित किया जाना भी ज़रूरी हो जाएगा जो अब तक केवल पुरातन होने के कारण पावन और पुनीत माने जाते थे. हिंदु धर्म ने परित्याग को हमेशा ही पुण्य की सर्वोच्च श्रेणी में रखा है. स्वाभाविक है भौतिक वस्तुओं से इतर, जीती जागती, जतन से पाली गई कन्या पर से अपने सारे अधिकार भूल उसका दान कर पाना, पुण्य के उत्कृष्टतम शिखर पर ही विराजमान होगा. यूं भी जो त्याग किसी से करवा लेना सहज-सरल ना हो, उसे पारलौकिक प्रलोभनों के बिना करवा पाना किसी तरह संभव नहीं. सो दान की इस विधा के तहत, अपने जीवन भर की सुरक्षा और भरण पोषण के एवज़ में कन्या किसी के परिवार की समस्त लौकिक और स्थूल ज़िम्मेदारियां अपने कंधों पर लेकर अंतिम सांस उसके निर्वाह को प्रतिबद्ध कर दी जाती है. तिस पर तुर्रा ये कि इस वचनबद्धता का पुण्य भी उसे नहीं उसे दान करने वाले को दिया जाता है. वैसे होने को ये भी हो सकता है कि पुण्य के इस आकलन के पीछे सुकन्या समृद्धि योजना के तर्ज पर ही बेटियों को जीवित बचा कर रखने जैसा कोई पुरातन समीकरण भी शामिल हो.

यूं शादी से जुड़े रीति-रिवाज़ चाहे जिस परंपरा के हों, साथ निभाने और एक घर छोड़कर, दूसरा बसाने की प्रतिबद्धता हर समाज में लड़कियां ही उठाती रही हैं. फिर विवाह सप्तपदी और मंत्रों के साथ हुआ हो या केवल वचनों को दोहराकर. बहरहाल,. हमारी शादियों में विदाई से पहले सबसे भाव विह्वल करने वाला क्षण कन्यादान का ही रहा है. बचपन से लगभग हर शादी में कन्यादान के वक्त वधु के साथ उसके बाकी परिजनों की भरी आखों ने इतनी बार खुद की आखें गीली की हैं कि अपनी शादी तक भी इस रीति को लेकर कोई प्रश्न, कोई शंका मन में नहीं आई. विरोध का तो ख़ैर सवाल ही नहीं. लेकिन जब विवेचना की उम्र आई तो इसके मूल और अर्थ में छिपे अनादर ने विचलित करना शुरु कर दिया. 

पवित्रता का जामा तो एक समय सतीत्व को भी पहना कर उसे इतना महान बना दिया गया कि उसके पीछे की वीभत्सता को समझने में सदियां खप गईं. वैधव्य की पावनता पर से भी पर्दा अब हटने लग गया है. दहेज चूंकि धन से संबद्ध है और धन कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकता, इसलिए उसके जाने में इतना वक्त लग रहा है. इन सभी कुरीतियों के मुकाबले कन्यादान पितृसत्ता से जन्मी ऐसी रस्म है जिसकी बदलते परिवेश में प्रतीकात्मक ज़रूरत भी नहीं. क्योंकि इसका औरतों की आत्मनिर्भरता और सम्मान से सीधा-सीधा विरोधाभास है. अपने आत्मविश्वास और जिजिविषा के दम पर खड़ी लड़की का कोई किस हक से दान करेगा? फिर उसके भरण की हैसियत भी किसके पास? बराबरी जैसे-जैसे मज़बूत होती जाएगी, कन्यादान उतनी ही तेज़ी से अप्रासंगिक होगा. 
 
शादी में केवल साथ निभाने की प्रतिबद्धता सत्य है. बाकी सब सामयिक अनुष्ठान, जैसे प्राण के लिए देह और उसकी सज्जा का आडम्बर. और समय के साथ बदलते जाना ही रीति-रिवाज़ों और अनुष्ठानों की नियति है. समय की बात है, तमाम प्रतीकों और ताम-झाम के बावजूद एक दिन इसे भी चले जाना है. 






Sunday, January 7, 2018

व्यापार की भाषा


पीछे समंदर की लहरें अभी भी एक-दूसरे का पीछा करतीं चूर-चूर हो रही थीं लेकिन अंधेरा होने पर उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं था. सारी रौनक बीच की दूसरी ओर लगी दुकानों और सी फूड से भरे रेस्तरां की कतारों तक सिमट आई थी. उसकी दुकान रेत के उसी फैलाव पर लगी थी. चटक पीली ज़मीन पर लाल फूलों वाली उसकी कुर्ती दूर से ही नज़र आ रही थी. नाक का बूंदा बायीं ओर और कानों में लंबी लटकन वाले चांदी के झुमके. रंग-बिरंगे धागों में अंग्रेज़ी के अक्षरों को पिरोती, नाम वाले ब्रेस्लेट बनाने में जुटी उसकी उंगलियों में बिजली का स्फुरण था. 
राजस्थान से हूं मैं, सवाई माधोपुर सुना है आपने?” 
उसकी नज़रें बस सेकेंड भर के लिए उठीं और बाकी का जवाब सधे हाथों की रफ्तार के साथ दिया गया. बीच में जब एक दक्षिण भारतीय नवोढ़ा मेहंदी लगवाने की गरज से दाम पूछने आई तो जवाब मलयालम में दिया गया.
अब यहां व्यापार करना है तो इनकी भाषा तो सीखनी ही होगी
उसने हंसते हुए कैफियत दी और ग्राहक की पसंद की डिज़ायन का ठप्पा उठा लिया. खास दक्षिण भारतीय तेल से गुंथीं, थक्के की शक्ल की मेहंदी के डब्बे को खोला गया. कलात्मक स्टांप को उसमें दबा कर हथेली पर एक ठप्पा और बेल के आकार के ठप्पे उंगलियों पर. दो मिनट का काम और सत्तर रुपए उसकी जेब में. हफ्ता भर रह जाती है ये इंस्टैंट मेहंदी, उसने उसी अदा से मेरी और बेटी की ओर देखा, फिर कोई जवाब नहीं देख हमारे बताए ब्रेस्लेट पूरे करने लग गई. अंग्रेज़ी की एक क्लास में नहीं गई लेकिन नामों के अक्षर पहचान उन्हें पिरोने में मिनट, दो-मिनट से ज़्यादा नहीं लगते. व्यापार चलाना है तो दो अजनबी भाषाओं को साधना ही होगा, वो भी काम के साथ-साथ, अलग से कोई कोचिंग, कोई ट्रेनिंग नहीं.

यूं तो दिल्ली में एमजी रोड पर सफेद संगमरमर के मंदिर बेचने वाली दुकानों की कमी नहीं लेकिन जिस तफ्सील से रहमान भाई मंदिर दिखाते हैं और जिस सब्र से खरीदार को पसंद आ जाने का इंतज़ार करते हैं वो दुर्लभ है. हाथ बांधे वो बड़े सब्र से एक-एक मंदिर के सामने खड़े होकर उसकी बारीक़ियां बताते हैं. पंसद आने पर ग्राहक से उसके पास उपलब्ध जगह की मालूमात करते हैं और फिर बड़े अदब से बताते हैं कि यूं पैसा देने वाले का है फिर भी बस लेने के लिए इतना बड़ा मंदिर लेने का मतलब नहीं क्योंकि रखने की जगह कम पड़ जाएगी. आखिर में मंदिर के रख-रखाव के बारे में हिदायत देते हुए वो पेशगी लेते हैं और तय समय से दस मिनट पहले ठेले वाला मय मंदिर आपके घर की घंटी बजा देता है. उसे निर्देश है कि ठेले से घर तक मंदिर पहुंचाने में कोई जल्दबाज़ी ना की जाए और मंदिर को हल्की सी खरोंच भी ना आने पाए.

अगर दो कामवालियां रखनी हों तो कोशिश करो कि दोनों अलग धर्मों की हों, ये मंत्र गृहस्थी संभालने के कई साल बाद समझ में आया. दोनों अपने-अपने त्यौहारों पर छुट्टियां लेंगी और किसी भी दिन आपका घर, अजायबघर बनने से बच जाएगा. जब से ये रास्ता अपनाया ज़िंदगी में थोड़ी आसानी हो गई. लेकिन ये सोच दूसरी ओर वाला भी रखता है ये सुनना हैरानी से भरा था. पता तब चला जब एक को उसके धर्म वाली के घर काम करने भेजने का आग्रह एक सहेली से आया तो उसने कंधे झटका दिए, आपके जैसा लोग के घर काम करेगी. नहीं तो वो हमारा त्यौहार पर ही हमको छुट्टी नहीं देगी. उसने सात सेकेंड में मन्तव्य साफ कर दिया. प्योर बिज़नेस डिसीज़न.

स्वीट्ज़रलैंड के माउंट टिटलिस पर पारंपरिक पोशाक में फोटो खिंचाने की दुकान और वहां आने का आग्रह अंग्रेज़ी के अलावा चार और भाषाओं में लिखा हुआ जिसमें हिंदी भी शामिल. वजह, आने वाले सैलानियों में भारतीयों की बड़ी तादाद. पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता से इसका कोई नाता रिश्ता नहीं. अंदर मिलने वाले पिज़्ज़ा में भी इंडियन मसाला पिज्ज़ा का ऑप्शन.



व्यापार की अपनी एक अलग भाषा होती है और अक्सर ये भाषा बाक़ी की ज़ुबानों से ज़्यादा उदार और पारदर्शी होती है क्योंकि उसके मतलब और मक़सद में किसी भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं रहती. 

Sunday, December 17, 2017

तोता बनाम सनी, बिपाशा



आजकल टीवी पर न्यूज़ नहीं देखती तुम, बीते कई महीनों में ससुर जी कई बार टोक चुके हैं.
जी, अब तो हमारा सबकुछ मोबाइल पर ही हो जाता है, मेरा जवाब सतर्कता से चुना गया होता है.  
शादी के बाद के सालों में जब सब साथ बैठकर टीवी पर समाचार देखा करते, परिवार के बाकी लोगों को भूलकर सबसे गर्मागर्म बहस हम दोनों में ही हुआ करती. वो इंटेलिजेंस ब्यूरो के सेवानिवृत आला अधिकारी और पत्रकारिता के जोशोखरम में डूबी मैं. हर खबर का पोस्टमार्टम सरकार बनाम जनता और प्रशासन बनाम पत्रकार के तौर पर होता. हर बहस के दौरान उनकी नौकरी से जुड़ी एक रोमांचक कहानी भी सुनने को मिलती. ये सब मैं अभी भी मिस करती हूं, फिर भी नौकरी की ज़रूरत होते हुए भी परिवार के साथ बैठकर ख़बरों का एक पूरा बुलेटिन सुने ज़माना हो गया. वजह, हर तीसरे मिनट एक एड ब्रेक और हर ब्रेक में कंडोम का एक विज्ञापन, जो अपनों के ही बीच आपको नज़रें चुराने पर मजबूर कर देता है. ऐसी मुश्किल परिस्थिति में फंसने से बेहतर है ऐसे मौके आने ही ना दिए जाएं.

ऐसा नहीं है कि हममें से कोई परिवार नियोजन का महत्व या कंडोम का उपयोग नहीं समझता. लेकिन सुहागरात पर कामुक अदाओं के साथ पहले गहने, फिर कपड़े उतारती सनी लियोनी या पति के साथ बिटवीन द शीट्स खेलतीं बिपाशा बसु को हर दसवें मिनट देखने पर कंडोम के फ्लेवर्स और कामोत्तेजना के बारे में आपका ज्ञानवर्धन चाहे जितना हो जाए, परिवार नियोजन या यौन स्वास्थ्य जैसे शब्द दिल-दिमाग के आसपास भी नहीं फटकते.



फिर एक दिन खबर आती है कि सरकार ने रात के आठ घंटों को छोड़कर टीवी पर कंडोम के विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक लगा दी है. बीमारी के इलाज़ के नाम पर पूरे का पूरा अंग काट लेने की फितरत हमारी सरकारों की आज से तो है नहीं इसलिए उनसे इससे बेहतर समाधान की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी. आदेश का विरोध होना था सो हुआ भी, लोगों ने कंडोम के विज्ञापन देखने के अपने अधिकार को संभोग के मौलिक अधिकार से जोड़कर पोस्ट लिखे, डियोडोरेंट के विज्ञापनों के औचित्य पर सवाल भी उठाए लेकिन सोशल मीडिया पर आक्रोश के ये बुलबुले बनने के अड़तालीस घंटे के भीतर फूट भी गए.

इस देश में जहां लोग टीवी पर नागिन को न्याय दिलाने के इंतज़ार में अपना खाना-पीना भूल जाते हैं और प्रज्ञा को अभि से मिलवाने की चिंता में उनके खुद के बच्चों की शादी की फिक्र पीछे छूट जाती है, जनसंख्या का विस्फोट रोकने या यौन स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए टेलिविज़न से अच्छा प्लेटफॉर्म नहीं मिल सकता. ऐसे में सरकार के सरकार के इस तुगलकी फरमान का औचित्य वाकई समझ से बाहर है. इस समस्या का समाधान बेहतर विकल्प ढूंढकर निकाला जा सकता था जिसके लिए इच्छाशक्ति की कमी दोनों ओर नज़र आई.

दस साल पहले टीवी विज्ञापनों की दुनिया में एक बेहद आम दिखने वाले ब्वाय नेक्स्ट डोर का अवतरण हुआ, कंधे पर एक कंप्यूटर जनित तोता लिए उस भोले भाले शख्स ने पूरी संजीदगी के साथ कहा कि मर्द की पहचान मूंछें नहीं, सुरक्षा की पहचान हेलमेट नहीं, दरअसल मर्दानगी की निशानी है बिना हिचक कंडोम बोलना, दुकान पर जाकर उसकी मांग करना और जो ये ना कर सके वो असली मर्द नहीं. विज्ञापनों की इस कड़ी में कबड्डी के खेल के दौरान कबड्डी-कबड्डी की जगह कंडोम-कंडोम बोलने और मोबाइल फोन पर कंडोम का रिंगटोन डाउनलोड करने जैसी पहल भी शामिल थे.

इस विज्ञापन सीरीज़ को बीबीसी मीडिया एक्शन ने बनाया था. बीबीसी की इस पहल ने कंडोम की खरीद और उपयोग को लेकर कई वर्जनाएं तोड़ डालीं. कुछ ही दिनों में सात लाख से ज़्यादा लोगों ने कंडोम थीम के रिंगटोन को डाउनलोड करने की अर्जी दी. कैंपेन की लोकप्रियता की मुरीद केन्द्र सरकार भी हुई और जल्दी ही इसे सरकारी प्रचार-प्रसार का हिस्सा भी बना लिया गया. यही नहीं, सीएनएन ने इसे कंडोम के सबसे अनूठे विज्ञापन का खिताब भी दिया.

बेचा यहां भी कंडोम ही जा रहा था, बल्कि आज के समय से कहीं ज्यादा दकियानूसी समाज में, फिर भी इनमें ऐसा कुछ नहीं था जिसपर किसी को एतराज़ होता.  

हालिया विज्ञापनबंदी के विरोध में एक मुखर स्वर डियोडोरेंट के विज्ञापनों पर रोक लगाने का भी आया. बीते कुछ सालों में विज्ञापन कंपनियों ने कुछ बाज़ार में डियोडोरेंट की प्लेसमेंट कुछ इस तरह से की है कि इनका मक़सद बस लड़कियों को बिस्तर तक खींच कर ले जाने तक सिमटता लगता है. दरअसल, कंडोम हो या डियोडोरेंट, भेड़चाल में फंसना विज्ञापन कंपनियों की पुरानी बीमारी है. यूं किताबी स्तर पर देखा जाए तो विज्ञापनों का मक़सद खरीदारों को अपने सामान के बारे में अवगत कराने से लेकर, उन्हें उसे खरीदने के लिए कंविंस करना, अपनी क्रिएटिविटी से उस सामान की छवि को निखारने के अलावा उसके उपयोग की ज़रूरत पैदा करना भी होता है. लेकिन हकीकत में ज़्यादातर विज्ञापनों की कोशिश  अपने प्रोडक्ट की ईमेज को नई दिशा में मोड़ने तक सीमित हो गई है. इसी रेलमपेल के बीच करीब दो साल पहले चुपके से घुस आया एक ब्रांड फॉगऔर देखते ही देखते बाज़ार की दशा-दिशा ही बदल गई. बाज़ार में मिले दोस्त, कंटीले तारों के दोनों ओर खड़े भारत और पाकिस्तान के जवान, पुलिस अधिकारी से बात करता मुखबिर, सबसे एक स्वर में दूसरे से ये ही कहा, आजकल तो बस फॉग ही चल रहा है बिना किसी सेक्सुअल इंटोनेशन के, बिना गैस वाले फॉग ने साल भर में प्रचलित ब्रांडों की हवा निकाल दी और बाज़ार का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन बैठा.

इतिहास और बाज़ार दोनों गवाह हैं कि लीक तोड़ने वाले विज्ञापनों ने अक्सर बाज़ार की दशा और दिशा दोनों बदल दी है. बेहतर होता अगर सरकार कंडोम के विज्ञापनों पर सिरे से रोक लगाने के बजाय विज्ञापन फिल्मों के कंटेट को लेकर कोई दिशानिर्देश बनाती. और कुछ नहीं तो टीवी विज्ञापनों पर हर रोज़ जो एक करोड़ से ज़्यादा रुपए सरकारी बजट से खर्च किए जा रहे हैं उसका एक हिस्सा ही क्रिएटिविटी के नाम कर देती. सनी और बिपाशा मार्का कंडोम एड से परे जाकर इस बाज़ार की दशा और दिशा बदलने का ख्याल हमारी सरकार को कभी क्यों नहीं आया?




Saturday, November 25, 2017

असुरक्षित बचपन के ज़िम्मेदार हम


वॉशिंगटन के दिनों में एक शाम बच्चों को पार्क से लेकर घर लौट रही थी. डेढ़-एक साल का बेटा वापस आने को तैयार नहीं था, लिहाज़ा पूरी भारतीयता के साथ चीख-चिल्लाकर रोने लग पड़ा. एक अपरिचित अमेरिकन महिला हमारे साथ लिफ्ट से उतरी और पीछे-पीछे घर तक आ गई. दरवाज़े पर खड़ी होकर उसने विनम्रता से पूछा कि बच्चे को संभालने के लिए मुझे किसी मदद की ज़रूरत तो नहीं. चूंकि हजरत घर घुसते ही खिलौनों में उलझकर कुछ मिनट पहले की मां की शर्मिंदगी भूल चुके थे, वो मुस्कुराकर वापस चली गई. पता चला उसका घर ना केवल किसी दूसरी मंज़िल बल्कि बिल्डिंग के दूसरे ब्लॉक में है. दोस्तों से बातचीत के दौरान बाद में ये एहसास हुआ कि वो दरअसल ये जानना चाह रही थी कि मां होने के बावजूद बच्चा कहीं मेरी किसी गलती की वजह से तकलीफ में तो नहीं है या फिर ये कोई ऐसा मसला तो नहीं जिसे लेकर उसे अथॉरिटीज़ को अलर्ट करने की ज़रूरत हो. वो पड़ोसी का सामान्य शिष्टाचार ही नहीं एक सजग नागरिक का धर्म भी निभा रही थी.

अमेरिकी संस्कृति से अपनी तमाम असहमतियों के बीच वो एक घटना अभी भी एक बड़ी सीख लिए जहन में ताज़ी है. इसकी एक वजह ये भी कि अपने समाज में हम बड़ी तेज़ी से इस सजगता को भूलते जा रहे हैं. आधुनिकता की आड़ में हमने बड़ी सहूलियत से पड़ोसी धर्म को निजता के हनन का जामा पहनाकर परे कर दिया है. जबकि सच्चाई ये है कि हर वो मसला जो सचमुच निजता के हनन के दायरे में आता है चटकारे लेकर उसे जान जाने में हमारी दिलचस्पी अभी भी बरक़रार है.

अपने बच्चों को सुरक्षित बचपन देने के लिहाज़ से दुनियाभर में भारत का स्थान 116वां है. इसके पहले कि इसका ठीकरा कुपोषण, गरीबी, लौंगिक प्राथमिकताएं जैसे मसलों पर फोड़ा जाए, ये जान लेना भी ज़रूरी है कि बाल अपराध के ज़्यादातर मामले महानगरों में होते हैं.

औसत परिवारों में पत्नियों के काम करने या नहीं करने के फैसले स्त्रीवाद, स्वतंत्रता और समानता जैसे भारी-भरकम शब्दों की नियमावली के तहत नहीं लिए जाते. चूंकि हम लैंगिक समानता जैसे मुद्दों को अभी तक केवल सतही स्तर पर समझ पाए हैं, मर्दों के लिए कमाकर परिवार चलाना अभी भी उनके जीवन की प्राथमिकता है. औरतों का नौकरी करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि भौतिक सुविधाओं से लैस परिवार चलाने के लिए दो लोगों की कमाई की दरकार होती है.  इस अलावा भी औरतों की पढ़ाई-लिखाई अपने साथ केवल ज्ञान और डिग्री ही नहीं लेकर आती है, लेकर आती हैं एस्पिरेशन्स, आगे बढ़ने की लालसा. लेकिन एकल परिवारों की चलन के बीच औरतों के करियर के शीर्ष पर नौकरी छोड़ने की एक बड़ी वजह होती है बच्चों की सुरक्षा और परवरिश को लेकर उपजी समस्याएं.

अफ्रीकी कहावत है, एक बच्चे की परवरिश के लिए एक गांव की ज़रूरत होती है. समाज चाहे जितना भी आधुनिक हो जाए, सुविधाओं के लिए चाहे कितनी मशीनें और उपकरण जुटा लिए जाएं, बच्चों की परवरिश के लिए हमेशा ही प्यार, देखभाल और सुरक्षित वातावरण की ज़रूरत सबसे उपर होगी. हम मुहल्लों को छोड़ अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स में बस गए हैं जहां एक दरवाज़ा भर बंद कर देने से दुनिया से कटा जा सकता है, जहां व्हाट्सएप पर भले ही फॉर्वर्ड किए ऊल-जलूल मैसेज बेखटके हम तक पहुंच जाएं, हमसे बिना अप्वायंटमेंट लिए कोई हमारा दरवाज़ा नहीं खटखटा सकता. बंद दरवाजों के पीछे दुनिया बसाने की हमारी इसी चाहना ने हमारे बच्चों की सुरक्षा को बिना किसी आहट के दांव पर लगा दिया है.

बचपन में पापा की तमाम मित्र पत्नियों में केवल एक वर्किंग थीं. छोटे से बच्चे को आया के पास छोड़ काम पर जातीं. पूरी दोपहर वो बच्चा तो काम वाली की निगरानी में होता लेकिन उस कामवाली के उपर पड़ोस की सभी औरतों की नजर रहा करती. शाम को घर लौटने पर उनका बेटा किसी भी घर में सुरक्षित खेलता मिल जाता था. आज हम भले ही बड़े व्यस्त होने का दंभ भरते हों, क्या ये सब कर पाना सचमुच इतना मुश्किल है?

बार-बार एक सी कहानियां कलेवर बदल कर हमारे सामने आ जाती है, हम सदमे से मुंह फाड़े अपने बच्चों को छाती से चिपकाकर ज़माने को लानत भेजते हैं और घंटे भर बाद मॉल में शॉपिंग थेरेपी के लिए चले जाते हैं. एक बार रुक कर ख़ुद से पूछ नहीं सकते कि अपने स्तर पर इसे बदलने के लिए क्या किया जा सकता है?

कहीं कोई बच्चा संदिग्ध स्थिति में दिखे, हमारी ओर से एक सतर्क नज़र, व्यस्त होने का नाटक छोड़कर दो मिनट रुकने की जहमत, दो-चार सवाल पूछने की हिम्मत इससे ज़्यादा की तो दरकार भी नहीं. घर-बाहर, दफ्तर-बाज़ार, मॉल-पार्क, हर जगह बस ये सोचते हुए नहीं रहा जा सकता कि बच्चा चाहे किसी का हो, समाज और उसके भविष्य में हमारे बच्चों के बराबर का भागीदार है.

सोचकर देखिए, क्या ये सब किया जाना सचमुच इतना मुश्किल है?






Saturday, November 11, 2017

बड़ा होना भी कोई होना है



जब तक ये ख़बर लगती है कि बड़ा होना चाहत नहीं मजबूरी है, बहुत सारा वक्त पोरों से रिस चुका होता है. ज़िंदगी चाहे कितने ही पन्ने पलट ले, पहले पन्ने की सतरें कोई नहीं भूलता. अच्छी तरह याद है पहली बार बड़े होने की चाहना हुई थी ताकि मिलने जाने पर कॉलोनी की आंटियां  स्टील की बड़ी प्लेट में बाकी बच्चों के साथ पकड़ाने के बजाए नाश्ता अलग से सजा कर दें, जैसे मम्मी को मिलता है, बोन चाइना की प्लेट में. बड़ा होने की जल्दी यूं भी मचती कि उन दीदियों की तरह लंबे बाल पीछे झटक अदा से दुपट्टे को गिरा फिर लहराकर उठा सकें या कभी निचले होंठ काटकर तो कभी छोटी से जीभ निकालकर कई तरह के अंदाज़ में बातें की जा सकें. ये दौड़-दौड़कर पकड़म-पकड़ाई खेलने का बचकानापन तो छूटे पहले.

लेकिन हाथ में पकड़ी पेसिंल के पेन में बदलने का दर्प जबतक अपनी जड़ें जमाता है, कद मां के कंधे को पार कर जब तक उनके कान को छूकर निकलने लग पड़ता है, दुपट्टे की अनिवार्यता उसके बोझ लगने की शुरुआत करा चुकी होती है. बड़े होने की जल्दी फिर भी उतनी ही तीव्र होती है. इस बार यूं कि घर के फैसलों में हमारी भी रायशुमारी हो, मां और मौसियों की फुसफुसाती कहानियां दरवाज़े की दरार से सुनने के बजाय सामने बैठ कर सुनी जा सकें. फिर एक समय वो सारी कहानियां आपके साथ भी बांटी जाने लगती हैं. वक्त भी ना, कम चालें नहीं चलता, एकदम से छलांग लगाकर वहां पहुंच जाता है जहां इन कहानियों से रिसते दर्द का बोझ उठाए नहीं उठता. अपनी टेढ़ी चाल से वक्त जब तक बताता है कि फैसला सुना देना दुनिया का सबसे आसान काम नहीं होता, फैसले लेने के बाद उनको उठाने की ज़िम्मेदारी से कंधे भी झुक जाया करते हैं.

आपके कॉलेज में पता कैसे चलता है कि टीचर कौन और स्टूडेंट कौन?”  छुटपन में अपनी मौसी को पूछा था. मौसी की तबतक शादी हो चुकी थी और वो साड़ी और सिंदूर में कॉलेज जाया करतीं.
अंतर होता है ना बेटा, प्रोफेसर हमसे बड़ी होती हैं, उन्होंने समझा दिया. 
एक बार बड़े होने के बाद और कितना बड़ा हुआ जा सकता है, मैं सोच में पड़ गई. 

एक वक्त वो भी होता है जब पचास और साठ के बीच का फासला नज़र नहीं आता. फिर नज़र की उस मासूमियत को वक्त की नज़र लग जाती है. बारीकियों को देख पाने की उम्र नज़र के कमज़ोर होते जाने की शुरुआत की उम्र भी होती है. अनुभव अपने साथ अधजगी रातों की बेचैन करवटें भी लेकर आता है. 

अब जैसे हर रोज़ ठहरकर वक्त अपने बीतने का एहसास कराता है. किसी सुबह अचानक चाय की प्यालियों के पार जाती नज़र मुंह पहले से ज़्यादा पोपला पाती है. महीने भर बाद हुई मुलाकात में नज़र जाती है हड्डियों को छोड़कर लटक आए मांस पर. टोको तो हंसते हुए जवाब मिलता है, तो अब क्या बचा करने को, खाली बैठकर बाकी बची सांसे हीं तो गिननी है.जिनके होने आश्वस्ति पर, जिनके चेहरे की चमक को देखते अब तक की रेस में भागते चले वो अचानक यूं उदासीन हो रहे जैसे स्टेशन आने के पहले अपना सामान समेटने की हड़बड़ी में सहयात्रियों को नज़रअंदाज़ करता मुसाफिर.

बस अब इससे ज़्यादा बड़ा नहीं होना, बड़े होने के नाम पर सांस उखड़ रही है अब.

वक्त तो भी बेरहम है, दो पल रुक कर उन रास्तों को देखने भी नहीं दे रहा जो पीछे छूट गईं, आगे उतना ही लंबा रास्ता पड़ा है, लेकिन ये हिस्सा बंजर, वीरान, पथरीला. सारी हरियाली जैसे पीछे छोड़ आए हम. उम्र बढ़ने के साथ याद्दाश्त जैसे सागर तट की रेत पर लिखी इबारत हो जाती है, ज़िम्मेदारियों का एक रेला आया और मिटा ले गया सब.

कभी बिल्डिंग की बहुत सारी औरतों के साथ एक गेम खेला था, कोई हाथ भर लंबी डोरी में गांठ बांधनी थी, एक मिनट में जितनी बंध सके उतनी. मिनट भर के बाद जिसकी उंगलियां सबसे जल्दी चलीं उनसे सबको को गर्वोन्मुख होकर देखा, बाकियों की आवेश से कांपती उंगलियां शर्म से सिमट आईं. लेकिन ठहर जाओ, ये तो गेम का पहला हिस्सा ही रहा, आखिरी हिस्से में उतनी ही तेज़ी से गांठे वापस से खोल सीधी डोरी वापस पकड़ानी थी. जिंदगी का कोई भरोसा नहीं. कभी-कभी अपना सबकुछ सबसे पीछे चलने वाले के नाम भी कर देती है.

गांठें किसी के साथ नहीं जातीं, सबको अपनी गांठें यहीं खोल कर जाना है.



Sunday, November 5, 2017

कुछ रंग सीरियलों के....


देश में हिंदी टीवी सीरियलों के कंटेंट की जैसी हालत है और उनको लेकर चेतना सम्पन्न आबादी के जैसे विचार हैं, ये कहना कि आप किसी भी तरह से इन सीरियलों से संबंध रखते हैं आपके बुद्धिजीवी होने पर सवाल खड़ा कर सकते हैं. इस ख़तरे को अच्छी तरह समझते हुई भी ब्लॉग में आज पहली बार किसी टीवी सीरियल के बारे में लिखने का रिस्क ले रही हूं.  

कार्यक्रम है टीआरपी के मामले में थोड़े गरीब चैलन सोनी पर पिछले हफ्ते ख़त्म हुआ सीरियल कुछ रंग प्यार के ऐसे भी.” मुझे इसके चर्चित जोड़े शाहिर खान यानि देव और एरिका फर्नांडिस यानि सोनाक्षी की युवाओं में लोकप्रियता पर कुछ नहीं कहना, बात करनी है उसकी कहानी पर. मध्यवर्गीय परिवार की एक स्वाभिमानी न्यूट्रीश्निस्ट गरीबी और खुद्दारी में बड़े हुए बिज़नेस टायकून की मां की निजी डॉक्टर बनकर घर आई और उसके प्यार में पड़ गई. चूंकि सीरियलों वाली शादी थी तो बिना साज़िश, बहकावे और ग़लतफहमी के हो भी कैसे सकती थी सो उन अड़चनों में कुछ हफ्तों के एपिसोड गंवाने के बाद वह भी हो गई. जहां तक याद है शुरुआती कुछ हफ्तों तक देखने के बाद इसी दौरान ऊब कर मैंने इस सीरियल से नाता तोड़ लिया था. उसके बाद बीच-बीच में इंटरनेट पर कहानी के अपडेट पढ़ने का सिलसिला जारी रहा फिर जैसे ही पता चला कि अपने हीरो-हिरोइन के बीच गलतफहमी के चलते डिवोर्स हुआ और कहानी कुछ साल आगे खिसककर वहां पहुंची जहां मुख्य किरदार उर्फ सोनाक्षी एक सफल बिज़नेस वुमन और एक बच्ची की मां है जिसके पिता यानि हीरो देव इस बात से अनजान हैं, अपनी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फिर गया. उसके कुछ महीने बाद सोनी टीवी ने कौन बनेगा करोड़पति के लिए जगह बनाने के लिए हड़बड़ी में कहानी में सब कुछ ठीक कर उसे खत्म कर दिया गया.

लेकिन महीने भर बाद ही जनता की मांग पर कहानी नए समय पर दूसरे सीज़न के साथ वापस आई. इस बार सोनाक्षी दो बच्चों के साथ करियर और परिवार के बीच तालमेल बिठाती हुई मां है जिसे पति के सहयोग के बावजूद सबकुछ बिखरा सा लगता है. और यहीं आता है एक ऐसा मोड़ जो हिंदी सीरियलों के कथानक के अब तक के रिकॉर्ड से आशातीत है. करियर के लिए बीवी का समर्पण देख पति ने घर पर रहकर बच्चे संभालने की ज़िम्मेदारी ले ली है और एक छोटी सी दुर्घटना की बदौलत रोडियो जॉकी बन गया है. देव के रोडियो कार्यक्रम का नाम है सुपर डैड जो करियर और परिवार के बीच तालमेल बिठा रहे पिताओं और पतियों के बीच बेहद लोकप्रिय है. महज़ आठ हफ्ते चले दूसरे सीज़न में कहानी ने ब्लू व्हेल के ख़तरे जैसे मुद्दे को भी उठाया.

दिनों दिन पिछड़ेपन की ओर बढ़ते टीवी सीरियलों की कहानी के बीच इस तरह की बात रख पाना बेहद सकारात्मक है. इससे ज़्यादा उत्साहित करने वाली बात ये कि भले ही रेटिंग की दौड़ में ये सीरियल ससुराल सिमर का और ये रिश्ता.. जैसे थके कार्यक्रमों के आगे टिक नहीं पाई लेकिन यू ट्यूब पर इसके लगभग हर एपिसोड को दस लाख से ज़्यादा बार देखा गया है. इंटरनेट मूवी डेटाबेस यानि आईएमडीबी ने भी इसे 10 में से 9.3 की रेटिंग दी है. जबकि सिमर और साथिया जैसे थकाउ कार्यक्रमों को यहां 2 से भी कम की रेटिंग मिली है.

हमने काफी संभावनाओं से भरी कहानियों को टीआरपी की चौखट पर असमय दम तोड़ते देखा है. जो बच गईं उन्होंने बचे रहने के लिए टीवी सीरियलों के कुल जमा चार-पांच फॉर्मूला में से एक या ज़्यादा को आत्मसात कर लिया. ये बात कई बार कही जा चुकी है कि टीवी सीरियलों को सोप ओपरा इसलिए कहा जाने लगा क्योंकि उन्हें ज़्यादातर साबुन कंपनियों के विज्ञापन मिलते थे. लेकिन भारतीय परिवेश में ढलने के बाद ये सास-बहु सीरियलों के नाम से ज्यादा पहचाने गए. वजह, इनका किचन पॉलिटिक्स और कहानियों को खींचते जाने के चार-पांच आज़माए नुस्खों से कभी आगे नहीं बढ़ पाना. कई बार बदलाव की उम्मीद के साथ शुरु हुई कहानियां भी प्रतीकों और फॉर्मूला के जाल में फंसकर टीआरपी की बलि चढ़ गईं. फिर वो टीवी सीरियलों का इतिहास बदलने वाली  बालिका वधु हो या फिर बंधुआ मज़दूरी की समस्या पर बनी उड़ान, स्क्रीन पर अपनी उम्र लंबी करने के मोह में ऐसे फंसे कि मुद्दे से फिसल कर सारी प्रतिष्ठा खो बैठे. ऐसे में सोनी की ये पहल बेहद सकारात्मक है.

वैसे टीआरपी रेटिंग के आगे नतमस्तक हुए बड़े चैनल बीच-बीच में केटेंट के साथ प्रयोग करने की कोशिश में नज़र आते रहे हैं. इज्रायली सीरियल प्रिज़नर ऑफ वॉर पर बनी स्टार प्लस की पीओडब्ल्यू बंदी युद्ध के हो या गैंगरेप की शिकार लड़की फातमागुल की कहानी पर आधारित स्टार प्लस की ही क्या कसूर है अमला का चैनल अब सीमित एपिसोड वाले सीरियलों पर पैसा लगाने और टीआरपी के मोह में पड़े बिना तय समय पर उन्हें ख़त्म करने का रिस्क ले रहे हैं. लेकिन मक्खी बनी सिमरों और सहमी-सिहरी गोपी बहुओं के झंझावत के आगे इन प्रयोगों को लंबे समय तक याद्दाश्त में बने रहने के लिए बहुत मेहनत की ज़रूरत है.

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में टीवी सीरियलों की जिस हद तक घुसपैठ है उसे सकारात्मक बना पाने के लिए सार्थक बहस वाली ऐसी कहानियों का कहा और देखा जाना बेहद ज़रूरी है जिससे उनकी आर्थिक सफलता भी बनी रहे.