Saturday, October 31, 2015

भाग्य-भाग्य की बात



भाग्यशाली फिर भी औरतें ही होतीं हैं। पुरुषों के भाग्य में भाग्यशाली होना कम ही लिखा है।

अच्छा तुम्हारा पति घर का कामों में तुम्हारा हाथ बंटाता है, सुबह जब तक किचन का काम संभालती हो वो बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर देता है, ताकि दोनों साथ में दफ्तर के लिए निकल सको? फिर शाम को जब घर पहुंचती हो तो जब तक तुम किचन, अगली सुबह के कपड़े, सफाई वगैरा का काम देखती हो वो बच्चों को होमवर्क भी करा देता है? अगर किसी दिन तुम्हें देर हो गई तो वो चाय भी बना कर इंतज़ार करता है तुम्हारा? सचमुच किस्मतवाली हो तुम।

Thursday, October 15, 2015

नियम तोड़ने और सीखने का दिन

एम्सटरडम घूमने के लिए बस एक दिन था हमारे पास और वो भी बूंदा-बांदी और तेज़ हवाओं वाला बेहद ठंढा दिन। मई के आखिर में तपती दिल्ली का अभ्यस्त हमारा शरीर सूती जैकेटों में रह-रहकर कंपकंपा उठता था। दिन का पूरा उपयोग करने के लिए हमने होटल सुबह ही छोड़ा, सामान एम्स्टरडम सेन्ट्रल स्टेशन पर रखा और सिटी टूर बस में बैठ गए। इस तरह, यात्रा के बाकी दिनों की तुलना में उस दिन सबसे कम चलना हुआ (हालांकि दोपहर बाद ये कसर एम्सटरडम के मशहूर आर्टिस चिड़ियाघर में तीन घंटे चलकर पूरी हो गई)। बस का ज़िक्र यहां इसलिए क्योंकि सड़क पर कम चलने के बावजूद उस एक दिन में मैंने ट्रैफिक के इतने नियम तोड़े जितने शायद पूरी ज़िंदगी में नहीं।

Thursday, October 8, 2015

शॉनब्रुन पैलेस : एकतरफा प्रेम की दास्तान का मौन साक्षी

विएना में एब्सबर्ग (Habsburg) राजवंश के तीन सौ साल पुराने निवास शॉनब्रुन (Schönbrunn) पैलेस का नाम दुनिया के चंद बेहतरीन राजमहलों में शुमार है। शॉनब्रुन का मतलब है सुंदर वसंत। विएना की यात्रा इस परिसर को देखे बिना पूरी नहीं मानी जाती, और इसे अच्छी तरह देखने के लिए एक पूरा दिन भी कम पड़ जाता है। सड़क के दोनों ओर सतर सिपाहियों से खड़े करीने से कटे पेड़, खूबसूरत बाग़ीचे, उनके बीच झाड़ियों की भूल-भुलैया, संग्रहालय, रोमन खंडहर, नेप्च्यून फाउन्टेन, शाही बग्गी की सवारी और मूल महल के 1400 से ज्यादा कमरे, जिनमें केवल 60 पर्यटकों के लिए खुले हैं। वैसे परिसर के हर हिस्से में जाने के लिए टिकटों के कई तरह के पैकेज मौजूद हैं और सब ख़रीदने पाने में अक्सर जेब की रज़ामंदी नहीं होती। 

Monday, October 5, 2015

मुलाक़ात मोनालीज़ा से

Mosse de Orsay  यानि म्यूज़ियम ऑफ मॉडर्न आर्ट से निकलकर सेन नदी पार कर मोनालीसा के घर The Louvre Museum तक जाने के रास्ते उस दिन बड़ी गुनगुनी सी धूप निकल आई थी। जैसे सूरज ने बादलों की चादर झटककर फेंक दी हो एकदम से। दो दिन से ऐसी धूप को तरसते हम सब छोड़छाड़ कर वहीं पार्क की चमकती घास पर बैठ गए और मोनालिसा को थोड़ा और इंतज़ार करने दिया।
हमारी ये गुस्ताखी शायद ना मोनालीसा को रास आई ना हमारे क़दमों को। तभी तो, म्यूज़ियम में घुसते ही पता चला कि मोनालीसा की चौखट की ओर जाने वाले एस्केलेटर बंद कर दिए गए हैं। दूसरी ओर से चढ़ते ही इलेक्ट्रॉनिक गाईड और नक्शों के बावजूद हम रास्ता भटक गए।

यूं भी, साढ़े छह लाख स्कवेयर फीट में फैले दुनिया के इस सबसे प्रसिद्ध म्यूज़ियम में रखी गई 35000 नायाब पेंटिंग्स और कलाकृतियों को नज़र भर देखने में ही कलाप्रेमी हफ्तों बिता देते हैं। लेकिन कला के नाम पर लगभग अनपढ़ हम जैसों के लिए यहां आकर मोनालिसा को सामने से देख पाना लगभग वैसा ही है जैसे पूजा में ना बैठने के बावजूद आपने प्रसाद पाकर ख़ुद को पुण्य का भागी मान लिया।
सो भटके हुए रास्ते में जो नज़र आया उसे मुग्ध आंखों से पीते हुए हम उस ओर बढ़े जहां सबसे ज्यादा भीड़ जा रही थी। तीन मंज़िल के बराबर सीढ़ियां, सात-आठ गलियारे और दसियों कमरे पार कर मोनालीसा को तलाशना कुछ-कुछ उस राजकुमार की कहानी की याद दिला रहा था जो अपने पिताजी महाराज के आदेश पर बाग का सबसे बड़ा सेब तोड़ने जाता है और रास्ते में पड़े एक से एक खूबसूरत सेबों को नज़रअंदाज़ कर देता है, ये सोचकर कि आगे और बढ़िया मिलेगा।

Friday, October 2, 2015

यातनाशिविर की पाश्विक क्रूरताओं के साक्ष्य

टूरिस्ट बनकर किसी देश में जाना किसी के घर जाकर ड्राईंग रूम में बैठने जैसा है। घर का सबसे साफ-सुथरा, सजा-संवरा कोना जहां बैठने वाले को ना बाथरुम में टपक रहे नलके की चिंता ना किचन की आलमारियों के टूट रहे कब्जों की, ना बाल्कनी की कुर्सियों पर धूल की परतों की खबर ना स्टोर में लटक रहे डेढ़ हाथ के जालों की। अलग-अलग इमारतों, चौराहों और बाज़ारों के सामने जब आप रंग-बिरंगी मुस्कान ओढ़ फोटो खिंचवाते हैं तो एंबुलेंस या सायरन की आवाज़ भी चौंका देती है। अच्छा! अस्पताल भी हैं यहां, ज़रुरत इनकी भी होती है रोशनी और खिलखिलाहटों से भरे इस शहर को!
लेकिन बर्लिन के थोड़ा हटकर ओरानियनबर्ग की यात्रा बिल्कुल वैसी रही जैसे आपने किसी के घर का सबसे वर्जित कोना देख लिया हो.....उस बंद दरवाज़े के पीछे झांकने की हिमाकत कर ली हो जिसने घर के इतिहास के सारे काले पन्नो को अपने अँधरे में क़ैद कर रखा है।

बराबरी का खेल

एक-एक बढ़ता सेकेंड अब मुझपर भारी पड़ रहा था...लेकिन दरवाज़ा पकड़े वो अपनी सशक्त उम्मीदवारी का सारा परिचय जैसे अभी के अभी दे देना चाहती थी। मैं अपने इस घिसे-पिटे इंटरव्यू को जल्द से जल्द निपटा लेना चाहती थी ताकि 10 मिनट बाद कम से कम आज बिना ताने सुने अपनी कॉल शुरु कर सकूं। लेकिन पहली मुलाकात में ही अपनी झल्लाहट दिखाकर उसे अपना असली परिचय भी नहीं देना चाहती थी। घर में पोंछा लगे तीन दिन हो गए थे और आज की कॉल में मुझे क्लाईंट से दूसरी बार प्रपोज़ल बनाने की डेडलाइन बढ़ाने की रिक्वेस्ट करनी थी। कामवाली और क्लाईंट में से किसी एक को चुनना था मुझे इस वक्त। ये उन असंख्य चुनावों में एक था जो हम औरतों को हर रोज़, हर क़दम पर करने पड़ते हैं, छोटे या बड़े। करियर और बच्चों के बीच, प्यार और ज़िम्मेदारी के बीच, मन और मकसद के बीच।

Saturday, September 26, 2015

घर और शहर

घर वो अपना जहां आपने अपना बचपन बिताया, जिसकी दीवारों पर अपने बढ़ते क़द की निशानियां छोड़ीं, जिसकी चाहरदीवारी को फांद गीली गेंद उठाई, कच्ची अमिया चुनी, जामुन चुराए, आंगन में गढ्ढे खोद अपने खज़ाने छुपाए, मां ने नाराज़गी में कान उमेठे तो मां का नाम लेकर ही रोए, जहां सुबह भाई-बहनों के साथ झगड़कर संपत्ति और सीमा का बंटवारा किया और शाम तक फिर सब मिला लिया। जहां आंगन में आम के पेड़ पर चढ़ उत्सुक हाथों से तोते के अंडे गिने और हाथ लग उनके गिर जाने पर फूट-फूट कर रोए। जहां कैंपकॉट पर सूख रहे धुले गेहूं की रखवाली की, रात के अँधेरे में छत पर लेट तारों और हवाई जहाज़ में अंतर करना सीखा। घर वो जहां नाम नहीं रिश्ते जिए।

Thursday, September 24, 2015

यादें ना जाएं....2

बचपन से सुनती आई, हमारे गांव नेहरा को उसकी समृद्धि और विकास के कारण मिथिला का पेरिस कहा जाता है। संयोग ऐसा कि इस बार जब दो दशक बाद गांव जाना हुआ तो पेरिस समेत कुछ और यूरोपीय देशों की यात्रा से तुंरत लौटी थी। सो बचपन से सुनी गई तुलना और प्रत्यक्ष में झलकते विरोधाभास और व्याजोक्ति ने बरबस मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया। पटना से नेहरा तक सड़क के रास्ते बदलाव टुकड़ों में दिखा। पटना से निकले और एक ओर से आधे टूटे गांधी सेतु पर ज्यादा ट्रैफिक नहीं मिला तो ड्राईवर ने चैन की सांस ली। हाजीपुर और मुज़फ्फरपुर के रास्ते कमोबेश वैसे ही लगे। मुज़फ्फरपुर से सकरी की सड़क लेकिन विकास का उद्घोष कर रही थी। सकरी स्टेशन के बाद के सात किलोमीटर कैनवास के उस कोने से लगे जिसके होने ना होने का चित्रकार को आभास ही नहीं रहा।

Friday, September 18, 2015

यादें ना जाएं...

19 साल बाद अपने गांव जाना हुआ। ज्यादातर रिश्तेदारों से शादी के बाद पहली बार मिलना हुआ, कुछ से तो दो दशकों में पहली बार। आख़िरी कस्बे के जर्जर रेलवे स्टेशन को छोड़ जब हमारी टैक्सी चली मुझे डर लगा कहीं रास्ता भूल आगे ना बढ़ जाऊं। इन रास्तों पर तो कुछ नहीं बदला था, बस इन सालों में मेरी दुनिया बदल गई थी। लेकिन हमारे टोले वाली गली ने सौ मीटर पहले ही मेरा हाथ पकड़कर रोक लिया मुझे। इन रास्तों से पहचान के सारे तार खुद-ब-खुद जुड़ गए, सालों के फासले एक पल में मिट गए। गली के मुहाने पर दो काका कड़ी धूप में इंतज़ार कर रहे थे हमारा, चूंकि पता था साथ में जमाई बाबू भी आ रहे हैं। जमाइयों के लिए उमड़े इस अनावश्यक प्यार से पता नहीं क्यों अब मुझे जलन नहीं होती क्योंकि इसके मूल में बेटी के लिए खूब सारा प्यार और उससे कहीं ज्यादा उसकी फिक्र होती है।

Saturday, September 12, 2015

योर च्वाईस बट कंडीशन्स अप्लाई

एक बार मेरे घर पर, मेरे हाथ का बना तीन कोर्स का खाना खाकर डकार मारते हुए एक परिचित ने कहा, वैसे आप खाना-वाना बनाने टाइप लगती नहीं हैं।
क्या मतलब?’ उनसे ज्यादा बेतकल्लुफ नहीं थी सो थोड़ा अटपटा लगा।
पढ़ी-लिखी, मॉडर्न हैं आप, मीडिया जैसी इंडस्ट्री से हैं, विदेश-उदेश भी रह आई हैं ऐसी फ्री थिंकिंग लड़कियां आजकल कहां किचन-विचन का काम करती हैं। उन्होंने अपना बेतकल्लुफ अंदाज़ जारी रखा।