Sunday, August 19, 2018

आवाहनं ना जानामि




बचपन में पढ़ा था, जिनके भगवान जितने सूक्ष्म होते हैं वो उसमें उतना ही उलझकर मरते हैं. जिनके भगवान स्थूल रहते हैं वो सुगमता से अपनी मुक्ति का मार्ग निकालते जाते हैं. मेरी बुद्धि का शैथिल्य कहो या उस पढ़े गए का प्रतिफल, मेरे भगवान स्थूल ही बने रह गए. उतना ही पगडंडीनुमा रिश्ता भी रह गया हमारा, बिना किसी नियम-क़ायदे के लेकिन नंगे पैर भी चल सकने लायक.
दादाजी को सुबह का नाश्ता फ्रेश होने के तुंरत बाद चाहिए होता था और लंच होता नहाकर निकलने के बाद. जबतक खाने के लिए अंदर से पुकार होती आरामकुर्सी पर बैठ आंखें बंद कर कुछ बुदबुदा लिया करते. ये कैसी पूजा हुई भला, ना दिया, ना अगरबत्ती, ना घंटी, ना फूल. इसको भगवान के दरबार में हाजरी लगाना कहते हैं, उनको याद दिलाना होता है कि हमसे किसी का कोई बुरा ना हो जाए इसका ख्याल रखें.
मेरे आलसी मन को ये विधि जम गई, हींग लगे ना फिटकरी, रंग चोखा. ना विधि की चिंता, ना विधान की, एक सरल सी डोर बन जाए एक सहज रिश्ते को बांधे रहने का सबब.
अक्सर कई-कई दिन मंदिर की ओर जाना नहीं हो पाता, मिलने पर उलाहना दे बैठती हूं, कितने सारे कामों में लगा छोड़ा है, इंसान दो मिनट आसन बिछा बैठ भी नहीं सकता तुम्हारे सामने. नियम पालन में बड़ी वाली ग़लती के बाद क्रोध और दंड जैसे शब्द तारे दिखाने लगते हैं तो पूछना पड़ता है, क्यों जी, इतने इंसानी हो तुम, मन के विपरीत हो तो तुरंत बदला लोगे? कुछ समय बाद समझ आ जाता है कि बात दिल को लग गई, उस ओर से फॉर्गेट एंड मूव ऑन का फैसला ले लिया गया है
यूं उम्र के साथ मन का झुकाव कृष्ण से शिव की ओर बढ़ा है, लेकिन छोटे से मंदिर में देव मूर्तियों का घनत्व देश की जनसंख्या जितना ही है. जो तीर्थ के लिए जाता है प्रसाद के साथ वहां के अराध्य की एक मूरत लाकर साधिकार मंदिर में स्थापित कर देता है. देसी देवताओं के बीच बैंकाक से लाए बुद्ध महाशय भी ठाठ से बैठे हैं. मैने कई बार पूछा, जब तुमको साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं होती तो बाहर वालों को समझाते क्यों नहीं. इस सवाल पर मेरी तरह वो भी निरुत्तर रह जाते हैं.
बाल्कनी के गमलों में खिले फूल अक्सर कम पड़ जाते हैं, तोड़कर मंदिर के बीचों-बीच रख देती हूं, मिल बांटकर ग्रहण कर लो. या फिर जिन देवता की विशेष पूजा का दिन होता है एक फूल उनके सामने डाल बाकी साझा खाते में, वैसे ही जैसे बर्थडे वाले दिन मां से एक मिठाई ज़्यादा मिला करती थी. कभी आसन पर बैठने के बाद याद आता है, फूल तोड़ना तो भूल गए. उनको कह देती हूं, छोड़ो ना पेड़ में लगे हैं तो कौन सा तुमसे अलग हैं, समझो वहीं से अर्पित हो गए तुमको, वो उतना भी मान जाते हैं. कामवाली मुस्लिम है, पूजा के बर्तन चमकाकर रख जाती है, ना उन्होंने इसपर कोई एतराज़ जताया ना मैंने
कभी चोट खाया मन जाकर गुहार लगाता है, किसी ने धोखा दिया है मुझे. वो कहते हैं देखने की जगह बदलकर देखो, वो तुमको नहीं अपने आपको धोखा दे रहे हैं. मैं मान जाती हूं, मन हल्का हो जाता है. व्रत के मामले में हमारा बहीखाता एकदम पक्का है, मैं कहती हूं बीएमआई सुधारने के लिए करती हूं, वो कहते हैं कुछ कर लो, वो कभी ठीक नहीं होगा. ना वो मेरा मन बदल पाते हैं ना मैं अपना शरीर. तीर्थयात्रा पर जाने का मकसद धुमक्कड़ी ही रही, मंदिरों से निकलने की सबसे ज़्यादा हड़बड़ी भी मुझे ही रहती है. मैं कहती हूं इन बंद दीवारों की धक्कापेल से ज़्यादा तुम तो बाहर नज़र आते हो. वो खामोशी से स्वीकारते हैं इसे
बहुत बरस हुए, मेरे मन को मंदिरों की दानपेटी से दूर कर दिया है. ब्राह्मणों (नाम के ही सही) के लिए तो तीन समय खाना वैसे ही पकाना पड़ता है इसलिए अलग से कुछ कर सकने की ज़रूरत नहीं बची. लेकिन मन को अभी भी भीरू ही रख छोड़ा है इसलिए मन्नतों के धागे बांधने होते हैं जब-तब. उनकी पूर्णाहूति हमेशा किसी संस्था से जुड़ने, किसी बच्चे की पढ़ाई का भार अपने उपर लेने, किसी आश्रम के लिए किताबें भिजवाने में होती है. हर ऐसे काम के बाद मैं उलाहना दे आती हूं, इसी वजह से ही डर भरा था ना मेरे अंदर? जानबूझकर काम अटकाते हो मेरे और खर्चा बढ़वाते हो. वो शरारत से मुस्कुराते हैं.
जन्म मरण जैसे गूढ़ विषय हमारे संवाद में स्थान नहीं पाते कभी. जीवन बना रहा तो भगवान ने बचा लिया और जीवन चला गया तो भगवान ने बुला लिया का फलसफा मेरी समझ के परे ही रहा. मैं पूछती हूं तुम बचाने में अधिक उदार हो या बुलाने में?  वो चुप लगा जाते हैं.
हमारी डील पक्की है, मैं कहती हूं ज़्यादा समझकर क्या होगा तुम अपने सरलतम रूप में मिलो ना मुझे, मैं अपने कोशिका भर ज्ञान से तुमको पाकर तृप्त हूं. उनके अंदर की मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर खिंच आती है. तभी रातों को सुकून भरी नींद आती है.

Saturday, August 11, 2018

विकासनामा





इन दिनों हम दोनों के बीच चिंता की महीन लकीरें फिर से हिलोरे ले रही हैं. हर बार की तरह उसकी चिंता स्थूल है, जिसका कोई ना कोई हल वो निकाल लाएगी. मेरी चिंता हमेशा की तरह सूक्ष्म है जो बेमतलब रह जाएगी. वो परेशान है ये सोचकर दिवाली बाद जब उसे महीने भर के लिए गांव जाना होगा तो मेरे घर का काम कौन देखेगा. मेरी परेशानी उसके गांव जाने की वजह है. उसे बेटी की शादी करानी है जिसमें अब हो रही हर बरस की देरी का उनके लिए मतलब ज़्यादा दहेज़ जुटाना है.

बड़ी समझदार बेटी है उसकी, मां-बाप से दूर गांव में रह अकेली पूरे परिवार को संभाल रही है. इस साल बारहवीं के इम्तहान भी दिए थे, उम्मीद अच्छे नंबरों की थी लेकिन चारेक नंबरों से अंग्रेज़ी में रह गई. उधर रिज़ल्ट निकले और मारे गम के वो तीन दिन फोन पर भी नहीं आई. ये परेशान कि फोन पर बात हो तो तसल्ली मिले. पिछले बरस तीन महीने बीमार रही, गर्दन में निकले अल्सर के कैंसर होने का शक हुआ. ऑपरेशन हुआ, तब जाकर ठीक हुई और परीक्षा में बैठ पाई.

इतने से रह गई तो क्या हुआ? फिर दे लेगी, मैं इसे समझाती रही.

अब इस बरस में शादी का मतलब उसका बारहवीं पास करने की उम्मीद का हमेशा के अधर में लटके रह जाना है. 

शादी के बाद एक पेपर तो दे लेगी ना?”

पता नहीं, वो तो कइसा आदमी मिलेगा तो बताएगा

फिर क्यों इतनी जल्दी मची है तुम्हें शादी कराने की? मार्च में इम्तहान दे लेने दो, फिर कराना

आप कुछ नहीं समझते, वहां गांव में लोग बात बनाता है हमारे लिए

 तुमको जो कहा था उसको कम्प्यूटर कोर्स करा दो उसका क्या? फीस के पैसे मैं दूंगी ना, तुमने वो भी नहीं लिए.
`
पास के सेंटर में अच्छा नहीं सिखाते, उसको कोर्स के लिए बस में दूर जाना पड़ता, उधर के लड़के परेशान करते हैं, उसने नाम लिखाने से मना कर दिया

जब कोर्स ही नहीं करना तो फीस के पैसे मुझसे लेकर रखने का ख्याल इसको दूर-दूर तक भी नहीं आया होगा, इतना इसको पहचानने लगी हूं मैं.

बेटी को पूछा तुमने वो क्या कहती है शादी के लिए,” मैने फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी

वो क्यों कुछ कहेगी, बेटी बहुत अच्छी है हमारी, हम जो कहेंगे वही करेगी. उसकी आवाज़ गर्वोन्नत है

फिर क्या फायदा उसे पढाकर, अपने फैसले लेने लायक भी नहीं बनाया तुमने तो उसे, मैं झुंझला उठती हूं

वो मेरी तरफ वैसी नज़रों से देखती है जिसके लिए अंग्रेज़ी का Exasperated शब्द सबसे सटीक है, जैसे इससे बेहतर तर्क की मुझसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती.

उसने कटी सब्जियां मेरी तरफ बढ़ाकर बर्तन धोने शुरु कर दिए हैं

सुनो, क्या फायदा उसे इतना पढाकर, अगर उसे भी तुम्हारी तरह बर्तन ही धोने हैं तो तुम्हारे और उसमें क्या अंतर रह गया, दो-तीन साल और रुक जाओ, बीए कर लेगी तो अच्छी नौकरी मिल जाएगी उसे, अबकी मेरी आवाज़ में मनुहार है

वो चुप रह जाती है.

मुझे अपनी जीत का क्षणिक आभास हुआ ही था कि उसके मास्टरस्ट्रोक ने पासा पलट दिया, वैसे मेरी बहन के बेटे को अभी तक नौकरी नहीं मिली, पांच साल कॉलेज पढ़ा, कम्पूटर कोर्स भी किया, अब छोटा काम करता नहीं, ऑफिस का काम मिलता नहीं.”

ये उसका ब्रह्मास्त्र है जिसके आगे मैं हर बार की तरह ध्वस्त हूं. बहन के बेटे की नौकरी का जुगाड़ अभी तक नहीं किया जा सका है.

वैसे अभी लड़का मिला नहीं है, नहीं मिलेगा तो परीक्षा के बाद करेंगे, मुझे दिलासा देकर वो पोंछे की बाल्टी लाने निकल जाती है.

मेरा बस चले तो उसके गांव के आस-पास के विवाह योग्य सारे लड़कों को अगले आठ महीनों के लिए ताले में बंद कर दूं.

अगली सुबह हमारी बातचीत का मुद्दा दूसरा है,

आपको पता है बकरीद में पूरी कालोनी खाली हो रही है हमारी. बस दो घर में हमलोग रहेंगे बाकी सब जा रहे हैं गांव

उसकी कालोनी मतलब ड्राइवरों, कामवाली बाइयों, प्लबंरों और क्लीनरों के किराए के कमरों की कतार

मेरी ओर से जवाब नहीं पाकर वो खुद बात बढ़ाती है, 
सबने प्लेन का टिकट कटाया है, एक तरफ का ढाई हज़ार का. तीन दिन नहीं, अब एक दिन में पहुंच जाएंगे गांव

अच्छा? इतने सस्ते में टिकट मिल गई

हां और क्या, एक महीना पहले कटाओ तो मिल जाती है,  

ट्रेन में तो तीन महीना पहले नहीं कटाया तो तत्काल में कटाना पड़ता है, बिना एसी का भी बारह सौ लगेगा, उपर से दो दिन ज्यादा. इससे तो प्लेन अच्छा है ना, दो दिन इधर ज़्यादा काम कर लेगें तो पइसा बराबर

उसका गणित और अर्थशास्त्र हमेशा से ही सुलझा हुआ रहा है, क्योंकि उसने ये दोनों की बातें किसी क्लासरूम में नहीं सीखीं.

बेटी का शादी में जाएगा तो हम भी प्लेन से टिकट कटाएगा

उसकी आवाज़ भले ही सपाट हो लेकिन मुझे लगा उसकी पूरी कालोनी मुझे चिढ़ा रही है.  

Sunday, July 29, 2018

इतवारनामा: बच्चे बड़े होते हैं, माएं नहीं





इतवार की दोपहर मेरे पास चार घंटे खाली हैं जिन्हें मॉल में गुज़ारना है. फिलवक्त कोई छूटा काम भी नहीं है जिसे पूरी करने की चिंता घर वापस ले जाए क्योंकि इस मोहलत के बाद बच्चों को इसी मॉल से वापस ले जाना है, बर्थडे पार्टी के बाद. इसके पहले मैं उन्हें बायनुमा कुछ बोलूं दोनों ने घूमकर मुझसे ही कह दिया, आप बाहर जाकर एन्जॉय करिएगा प्लीज़.

संभावना से भरी दोपहर है, पार्लर, शॉपिंग, मूवी, कुछ भी हो सकता है. लेकिन बाहर निकलते ही मेरे क़दम खो से गए हैं. छोटे बच्चों को मां-बाप, बहनों के पास छोड़कर भागते हुए मॉल-मूवी जाने में जो एक किस्म की बेफिक्री होती थी वो उनके बड़े होते जाते ही जाने कहां खो सी गई है. मल्टीप्लेक्स के गेट के बाहर तीन-चार चक्कर लगाने के बाद गेटकीपर के निगाहों से बचने के लिए मैं एक फ्लोर नीचे उतरकर चक्कर काटने लगती हूं.

हर दुकान के बाहर सेल का बोर्ड लगा है, इत्तेफाक ये कि इतवार और सेल की ख़बर पूरे शहर को है. सामने पहली दुकान में कदम रखते ही भागने का मन किया. एक फॉर्मल शर्ट लेनी तो थी, सामने रखी शेल्फ से एक उठाया, ट्रायल रूम के बाहर लंबी कतार देख पैर बिलिंग काउन्टर पर मुड़ चले. ट्राई करें भी तो पसंद की मुहर किससे लगवाएं.  सेल लिखा ही सही अब एक शॉपिंग बैग हाथ में है, मॉल के अंदर भटकना जस्टीफाई किया जा सकता है. 

मुझे लगता है किसी भी वीकएंड मॉल जाने के फैसला हमें जिंदगी के कई अधर में लटके वक्ती फैसलों पर सोचने की ज़हमत से बचा लेता है.

किसी और दुकान के अंदर जाने का मन नहीं हुआ, बस साइड में लगी कुर्सी पर बैठा जा सका.
अंकल मेरे ठीक सामने से निकले हैं, फिर पीछे मुड़कर पूछा, एही है रे यहां का सबसे बड़ा मॉल
बेटा थोड़ा पीछे मां के साथ है, ऊंची आवाज़ में पूछे सवाल से सिकुड़ा सा, हां यही है, आप बताइए लंच क्या करेंगे.
कुच्छो कर लेगें, पहले बैइठने का इंतजाम करा दो, टांग टटा रहा है
मेरे बगल की सीट पर जिन हजरत का बैग रखा है वो फोन में मस्त हैं, मैं उठने को होती हूं लेकिन बेटा मां-बाप को लेकर आगे निकल गया. आंटी की साड़ी पीछे से बित्ता भर मुड़ गई है, इतनी की पेटीकोट पर लगी मिट्टी भी नज़र आ रही है. मेरा मन किया आगे बढ़कर ठीक कर दूं, अच्छा नहीं लग रहा आंटी, लाख छोह दिखा लें बेटे, ये बारीकियां कहां समझ पाते हैं. तबतक एस्केलेटर के सामने ठिठकी आंटी बेटे के कान में कुछ कहकर लिफ्ट की ओर निकल चलीं.

मेरी बगल की सीट अब खाली है, पचासेक साला महिला वहां अकेली आकर बैठी, हाथ में मैकडॉनल्ड की सॉफ्टी लिए, हम दोनों ने मुस्कुराहट भरी नज़रें मिलाईं. उन्हें अकेला एन्जॉय करते देख हौसला और भूख दोनों जगे. फूड कोर्ट में, खुद से फैसला लेना है किसी की मर्ज़ी नहीं जाननी, एक राय बनाने पर कोई बहस नही, फिर भी एक-एक काउन्टर के बाहर रुकते रहे. ऑर्डर आखिरी काउन्टर पर दिया गया.  

एयरपोर्ट के रास्ते से पति का फोन आया, मेरी आवाज़ मेले में खोकर मिल गई बच्ची सी चिहुंकने लगी. शिकायत सुनते ही दूसरे छोर पर हंसी तैर जाती है, अब समझी तुम ट्रिप पर जाना घर से पीछा छुड़ाना नहीं होता. मैं आपस में किया महीनों पहले का वादा याद दिलाना चाहती हूं, हम एक दूसरे के लिए शापिंग करने साथ निकलेंगे. लेकिन बदली सी आवाज़ कानों में आती है,

आप उठेंगीं ना?’

उनकी आवाज़ में सौम्यता है, लेकिन आंखों में हड़बड़ी. मैनें आखिरी निवाला मुंह में ठेलते हुए प्लेट उठा ली. घड़ी देखी, 2 घंटे 40 मिनट और बाकी हैं, फोन ने सूचित किया अबतक 5000 कदमों की घिसाई हो चुकी है. 

ऐसे में एक ही जगह पनाह ली जा सकती है. यूं बुक स्टोर में भी सेल है, भीड़ भी, लेकिन मेरे पंसदीदा कोने में कोई हलचल नहीं. किताबें हाथ में उठाकर खिड़की के बगल की कुर्सी पकड़ ली.

बेचैनी फिर भी मिज़ाज पर तारी है. कुछ समय पहले बिटिया से फिर से घिसा-पिटा सवाल पूछ लिया कि बड़ी होकर क्या बनना चाहती है, इस समय की सारी संभावनाएं क्रमबद्ध गिनाने के बाद उसने पलट सवाल किया, आप बड़ी होकर क्या बनेंगी?
उसकी आंखों की शरारत देखकर मुंह से बेसाख्ता निकला दादी और नानी बनूंगी और क्या,. उसने मुझे जिन नज़रों से देखा उसे उसकी  जेनरेशन गो गेट अ लाइफ कहती है

मातृत्व एकतरफा पगडंडी है, चलते जाना होता है, रुकने का मन भी करे तो भी. मैं किताबों के पन्ने पलटने लगती हूं, अब समय सरपट दौड़ेगा.

कुछ शॉपिंग भी की या बुक स्टोर ही गए, बच्चे देखते ही पूछते हैं.

मैं चोरी पकड़ी जाने वाली नज़र से उन्हें देखती हूं. साथ-साथ ही तो चल रहे थे इनके, फिर भी बराबर रास्ता कहां तय पाए? ये तो बड़े भी हो गए..और मां?

Saturday, July 28, 2018

‘बेचना’ युगधर्म है



बनाने वाले से बेचने वाला ज़्यादा बड़ा होता है, ये आज के दौर का सबसे गूढ़ सत्य है अतएव इस पंक्ति को इक्कीसवीं सदी का वेदवाक्य माना जाए. जिसने इसका मर्म और इससे जुड़े कर्म, दोनों सीख लिए उसने अरमानों और आकांक्षाओं से भरी सांसारिक वैतरणी पार करने का अचूक उपाय पा लिया समझो.

बड़े होते समय एक फिल्म देखी थी जिसे देखना हमारी पीढ़ी में बड़ा होने के लिए ज़रूरी समझा गया था. रिचर्ड गियर और जूलिया रॉबर्ट्स की प्रीटि वुमन. फिल्म में रिचर्ड का किरदार एडवर्ड बिज़नेस टायकून होता है. वो घाटे में चल रही कंपनियों को कम क़ीमत पर ख़रीदकर, उन्हें टुकड़ों में बांट ऊंची क़ीमत पर बेचता और मुनाफा कमाता है. जूलिया पेशे से कॉलगर्ल है कुछ दिनों के लिए एडवर्ड की गर्लफ्रेंड बनने का नाटक कर रही है ताकि उसके साथ बिजनेस मीटिंग्स में जा सके. एक दृश्य में वो रिचर्ड से उसके बिज़नेस के बारे में जानना चाहती है और जवाब सुनकर आश्चर्य से पूछती है, मतलब तुम बस बेचते हो, कुछ बनाते नहीं?” वो फिल्म थी इसलिए वो सवाल रिचर्ड की ज़िंदगी बदलने वाला साबित होता है और आखिर में वो ख़ुद को बेचने से बनाने वाले में तब्दील कर लेता है. लेकिन असल ज़िंदगी में जिसने बेचने की कला सीख ली उसके लिए बेचने का लोभ छोड़ पाना इतना आसान नहीं होता.

मेरे जैसे यथार्थपरक लोग इसलिए मंटो में ज़्यादा यकीन रखते हैं. मंटो की एक कहानी (नाम याद नहीं) में विभाजन के बाद चार नाई एक ख़ाली पड़े सैलून में अपना धंधा शुरु करते हैं. एक बेघर इंसान उनसे दुकान के पीछे रहने की इजाज़त मांगता है. बदले में उनका बहीखाता संभालने की ज़िम्मेदारी ले लेता है. कुछ महीनों में वो उन सबका मैनेजर और चारों नाई उसके वेतनभोगी मुलाजिम बन जाते हैं.

बेचने वालों का प्रभामंडल है ही ऐसा, रास्ता दिखाने के नाम पर आंखें ऐसी चुंधिया देता है कि बनाने वाले बिचारे उसी के दिए अंधेपन के निकलने के लिए उसी के हाथों का सहारा लेने को मजबूर हो जाते हैं. बनाने वाले की त्रासदी ये है कि वो बनाने की नैसर्गिक क्रिया में ही इतना सुख पा लेता हैं कि उससे उपर उठकर कभी सोच ही नहीं पाता. तिसपर बेचने वाला उसे सतत् आश्वासन देता रहता है कि वो अपनी कला पर ध्यान लगाए, ये सारी निकृष्ट सांसारिक ज़िम्मेदारियां उसके लिए छोड़ दे. ये निकृष्ट सांसारिक ज़िम्मेदारी दरअसल वो शेषनाग है जिसकी फुंफकार बनाने वाले पर पड़ती है और सेज बेचने वाले के लिए तैयार रहती है.

चूंकि समय कभी एक सा नहीं रहता समय के साथ समझदार होते जाना पीढ़ियों का क्रमविकास (evolution) पूरी तरह वैज्ञानिक है इसलिए अब हर कोई बस बेचना सीखना चाहता है. चारदीवारी के भीतर जिनके हिस्से भविष्य को बनाने की जिम्मेदारी थी वो अब उस कमरे की सीटें बेचने का काम कर रहे हैं. चौथा खंभा तो कब से अपनी दुकान के बाहर हम विज्ञापनों के व्यापार में हैं का बोर्ड लगाकर बैठा है. लोकतंत्र जितना खुद से बिक सकता था बिका, अब उससे आगे के लिए स्पेशलिस्ट काम पर लगा दिए गए हैं.

आम जनता बेचने के चातुर्दिक चमत्कार को साष्टांग होकर स्वीकार कर चुकी है. इसलिए बेचने का कारोबार सिखाने वाली दुकाने गली-गली खुल चुकी हैं. जिसे देखो सदी की इस महानतम कला को आत्मसात करने में लगा हुआ है. आधे कलात्मक और आधे सांसारिक इन इंसानों ने डार्विन के सिद्धांत को उस चोटी पर पहुंचा दिया है जहां से केवल उतार ही उतार बचता है.

बेचने और बिकने के बीच कोई विभाजक रेखा बची ही नहीं. एक ही समय पर हर कोई बेचने और बिकने दोनों क्रियाओं के लिए बाज़ार में खड़ा है. इस हद तक कि ये समझ पाना मुश्किल कि कौन किसको बेच रहा है.
एक दिन इस दुनिया में केवल बेचने वाले रह जाएंगे, बनाने वाला कोई नहीं बचेगा देख लेना.

Thursday, June 28, 2018

स्वयंसिद्धा- 4



हम आठ साल बाद मिले हैं, मुझे देखकर वो मुस्कुराते हुए कहती है, आ गइला नैहरा. मैं हँसने लगती हूं, अब यही मेरा स्थाई मायका है. पापा की ट्रांसफर वाली नौकरी में हर दो-तीन साल में बदलते घरों के बाद हम सबके लिए ठहराव का वक्त आया है. उसके सांवले चेहरे का पानी अब भी वैसा ही है, बस गाल खूब भर गए हैं. पेट आगे को निकल गया है, वो आँचल से उसे ढकते हुए फिर मुस्कुराती है, एतना साल में घर के काम करई के आदत छूट गेल रहो, फल के ठेला लगावत रहलियो, ईंटा के भट्टी पर काम करलियो, तेही से (इतने सालों में घर में काम करने की आदत छूट गई है, फल का ठेला लगाया, ईंट की भट्टी पर काम किया, इसलिए). इतना तो देखकर भी पता लगता है, अब घर के कामों में उसके हाथों में पहले सी चपलता नहीं है, पोंछा करते हुए हांफने लगती है, बस खाना मन लगाकर बनाती है. फिर भी इस घर से आए बुलावे को टाला नहीं जा सकता. इसलिए जब इतने सालों बाद मां-पापा की गाड़ी एकदम से उसके सामने रुकी तो बिना किसी सवाल के उनके साथ बैठकर चली आई. वो जानती है इस शहर में अपना घर बनाते वक्त मां को कहीं ये तसल्ली भी थी कि घर वो ही संभाल लिया करेगी. यूं भी शहर में जब से वापस आना हुआ, उसे ढूंढने की कोशिश लगातार की जाती रही. पता चला अपने पति का घर वो कई साल पहले छोड़कर जा चुकी है.

कपड़े उतार कर तालाब में नहाने की उम्र में ब्याह हुआ था, 14 साल की होकर ससुराल आई तो उसकी मां ने इकलौती लाडली बेटी से वादा किया था कि जिस रोज़ एक शाम भी भूखे रहने की नौबत आई, उसे अपने पास बुला लेगी. फिर उसने कई बरस तक एक-एक शाम का खाना खाकर निकाल लिया, मां को कभी भनक नहीं लगने दी. शाम के वक्त पाव भर चावल में पांच लोगों के पेट का जुगाड़ ढूंढती, उसमें जो बच रहता उससे अपना पेट भरती. जब बच्चों के लिए भी खाना कम पड़ने लगा तो लोगों के घर काम ढूंढना शुरु किया. एक मुश्किल सुबह मेरी मां को ये ऐसे ही घर के बाहर मिली, उसी दिन से दोनों ने एक दूसरे को संभाल लिया. जिस दिन मां-पापा ने शहर छोड़ा, पुराने बर्तनों, कपड़ों और फर्नीचर से उसका घर भर दिया. दोनों के पास यही एक तसल्ली थी. लेकिन यकायक सम्पन्न हो गई अपनी गृहस्थी को भी उसने एक दिन अचानक छोड़ दिया. उसे पति की बेकारी और बेजारी तो भी कुबूल थी लेकिन नशा करने के बाद उसकी बदतमीज़ी के साथ गुज़ारा करना एक दिन के लिए भी मंज़ूर नहीं था.

मायके में चार भाइयों को बहन का घर से बाहर काम करना पसंद नहीं आया, उसे घर बिठाकर खिलाना चाहते थे. इसने लेकिन सबको बरज दिया, तोहर भात साथे तोहर बात के सुनतौ, कालि के तोहर कनियो बात सुनेतो, हम अप्पन घरवाला के नई सुनलियौ त तोहर कईसे सुनबो(तुम्हारे भात के साथ तुम्हारी बात कौन सुनेगा, कल को तुम्हारी बीवी भी बात सुनाएगी, मैंने अपने घरवाले की नहीं सुनी तो तुम्हारी कैसे सुनूंगी). बच्चों को स्कूल में डालकर वो निकल पड़ी, जिस रोज़ जो काम मिल गया कर लेती, तिनका-तिनका जोड़ कर अपनी गृहस्थी जमाई, मायके के गांव में ज़मीन ख़रीदा, उस में अपना घर बनवाया. मां का नया घर देखने से पहले उसने पहले उन्हें अपना नया घर दिखाया था, एक कमरे का, रसोई और आंगन वाला, आगे-पीछे खुली ज़मीन वाला. इसके बगल में एक और नया घर बनाने की कवायद भी शुरु है. टायलेट भी बन रहा है. बेटे ने पढ़ाई छोड़ दी, मकैनिक की ट्रेनिंग पूरी कर चुका है, इतने दिनों में इसने उसका बिज़नेस शुरु करने लायक पैसे भी जुटा लिए हैं. बेटी स्कूल जाती है.

उसके छोटे संसार में हर ओर खुशी है. और अब तो उसकी माय (मां) समान मालकिन भी आ गई है. जिसके लिए वो शहर के दूसरे छोर पर अपने मायके वाले गांव से एक ओर एक घंटे का सफर तय करके भी रोज़ आ सकती है.  वो मां को उनकी लापरवाही के लिए डांट भी सकती है, उन लोगों पर आंखें भी तरेर सकती है जिन पर उसे मां-पापा को ठगने का अंदेशा है. उसे पता है ये वो घर है जहां भूख लगने पर वो सबसे पहले परोस कर खाना खा सकती है, बैठकर पोंछा लगाने में दिक्कत हो तो उसके लिए पोंछे की नई मशीन खरीदी जा सकती है.

उसकी आंखें पहले से ज़्यादा चमकदार हैं. बात-बात पर हँसती है, कहानियाँ सुनाने का उसका अंदाज़ निराला है, उसके साथ हम भी हँसते हैं.
आदमी कहां है अब तुम्हारा?’
जिंदे छियउ, खायी छियउ, पियई छियउ, पड़ल रहई छियउ, घरि के याद पड़ई छियउ त आबि जाई छियउ (ज़िंदा है, खा-पीकर पड़ा रहता है, घर की याद आती है तो आ जाता है)
अब क्यों आता है तुम्हारे पास?’
भूख लगते त कुकुर और कहां जतई(भूख लगने पर कुत्ता और कहां जाएगा)', वो ठठा कर हँसती है
उसे छोड़कर दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेती तुम
छोड़ि त देबे करले छियई, शादी कर के की होतई, दू गो बच्चा होई गेलई, आब मरद के हमे की करबई( छोड़ तो दिया ही है, लेकिन शादी करके क्या होगा, दो बच्चे हो गए, अब मैं मर्द का क्या करूंगी), उसे ये बोलने से पहले सोचने की ज़रूरत भी नहीं पड़ी.

ठेस खायी औरत को मर्द की ज़रूरत नहीं होती, औरत जिस रोज़ खुद से प्यार करना सीख लेती है, अपने लिए भरपूर मर्द भी खुद ही बन जाती है.

मेरे वापस आने का दिन आ गया है, वो गांव से मेरे लिए ताज़ा कटहल उठा लाई है. मां के हाथ की कटहल की सब्ज़ी और बड़े मेरी कमज़ोरी है ये उसे याद है. अब हम हर साल मिलेंगे, मुझे राहत है कि अब मां को लेकर हमारी चिंता थोड़ी कम होगी.

उसे लेकिन बस एक बात परेशान करती है बार-बार. जब कभी पीकर उसका पति उसके नए घर पहुंचकर हंगामा खड़ा करता है तो उसके भाइयों के हाथों खूब पिटकर जाता है. हमें पूरी संजीदगी से ये बात बताते-बताते वो फिर से ठठाकर हंसने लगती है. उसके साथ-साथ हम भी.

Friday, June 15, 2018

मेरे बच्चों के पापा



मेरे बच्चों के पापा,
तुमसे पहली बार मिलने के सोलह महीने और बीस दिन बाद मैं तुम्हारे दोनों बच्चों की मां बन चुकी थी. हमारे रिश्ते की ज़मीन तब इतनी कच्ची थी कि हमारे दरम्यान किसी तीसरे की चर्चा भी तब शुरु नहीं हुई थी. तिस पर कुछेक महीनों का कच्चा-पक्का बसा-बसाया छोड़ हम एकदम से पराए देश में नए सिरे से शुरुआत करने जा पहुंचे थे.  

हम जैसे धरती पर दो अलग दिशाओं से आए उल्कापिंड थे. तुम बड़े से परिवार के सबसे छोटे, तुमने सालों से अपने परिवार के अंदर सबकी अलग दुनिया बसते देखा थे, तुम्हारे लिए मैं और हमारे बच्चे अपने अस्तित्व का लॉजिकल एक्सटेंशन थे. मैं परिवार की सबसे बड़ी बेटी, मेरे लिए लंबे समय तक तुम्हारा नंबर मां-बाप और बहनों के बाद आता रहा, तुम धैर्य से अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे.

मैं महीने भर पहले टीवी रिपोर्टिंग का अफलातूनी करियर छोड़, नए देश के खाली-खाली से अपार्टमेंट में बदहवास भटका करती, तुम हर रोज़ मुझे समझाते, थोड़ा और सहेजते. उन महीनों में मेरे अंदर का सन्नाटा जैसे बाहर पसर गया था और बाहर की सारी हलचल मेरे अंदर होने लगी थी. अंदर बाहर सब नया और फिर कुछ हफ्तों बाद पहली सोनोग्राफी में डॉक्टर की खुशी से किलकती चीख, You got to be kidding me, there are two’ मेरे पसीने से तर हाथ को तुमने थामा था, मैं हूं ना सब संभाल लूंगा. अगले आठ महीने मैं देखती रही, कैसे तुम्हारे हाथों मेरे भरोसे की नींव पर रोज़ एक नई ईंट रखी जा रही थी. सही मायनों में हमारी गृहस्थी की कच्ची दीवार उन आठ महीनों में ठोस होती गई.

जिस देश में लेबर रूम में भी पिताओं की उपस्थिति अनिवार्य और सहज थी, डॉक्टर और नर्स तुम्हें ‘Father who knows everything about his babies, even better than the mom’  बुलाया करते. आखिरी दिनों के डर को डॉक्टर सॉर्किन वेल्स ये कहकर हवा में उड़ा देती कि, ‘He doesn’t need me to deliver your babies, he can handle them both alone’

तुम्हें शायद पता नहीं होगा, औरत सबसे ज्यादा वल्नरेबल तब होती है जब वो नई-नई मां बनी होती है. जिस क्षण वो सबसे अनमोल सिरजती है उसी क्षण वो सबसे ज़्यादा बिखर भी जाती है. उसके कलेजे का टुकड़ा जब एक हाथ से दूसरे हाथ खिलौने की तरह घुमाया जा रहा होता है, वो उन सबसे भाग किसी अंधेरी सुरंग में छुप जाना चाहती है. उस क्षण उसे बधाइयों से ज़्यादा सहारे की ज़रूरत होती है. तभी शायद प्रसव के लिए लड़कियां मायके जाती हैं अपनी मां के पास.  मेरी मां तो मुझसे 45 हज़ार मील दूर थी लेकिन उन दिनों तुम मेरे लिए मेरी मां भी बन गए. बच्चों के साथ मुझे भी सहेजते, संभालते रहे. मेरे हिस्से दो बच्चे आए थे, लेकिन तुमने तीन को एक साथ पाला. सुना था बच्चे के जन्म देने भर से मां नहीं बना जाता, मां बनना सीखना होता है. मैंने तुम्हें देख-देखकर मां बनना सीखा.

शुरु के उन महीनों में जब मांओं के लिए दिन-रात, सर्दी-गर्मी सब एक रंग में ढल जाते हैं, तुम एक रात भी अपनी नींद पूरी करने के नाम पर उनसे अलग नहीं सोए. उनकी हल्की सी कुनमुनाहट पर मुझसे पहले जागे. चार महीने के बच्चों के साथ मैं नई नौकरी शुरु कर पाई क्योंकि तुमने अपनी कपंनी को वर्क फ्रॉम होम प्रोजेक्ट के लिए मना लिया था. सहेलियां छेड़तीं रहीं, ऊपर वाला भी सोच-समझकर ही ट्विन्स भेजता है.

तुम हमेशा मुझसे ज़्यादा उनकी मां रहे, दफ्तर से सीधा घर भागने वाले, बेटी की परफेक्ट चोटी बिना दर्द कराए बनाने वाले, रात-रात जग उनके प्रोजेक्ट बनाने वाले, उनसे लड़कर रूठ जाने वाले, उनकी छोटी-छोटी सफलता पर रो देने वाले, उनकी क्लास के व्हाट्सएप ग्रुप में तमाम मांओं के बीच मौजूद इकलौते पिता. मेरी नई हेयरस्टाइल नोटिस करने में तुम चाहे दस मिनट लगा दो, अपने बच्चों के हाथ पर मच्छर काटे का निशान तुम्हें दस फुट की दूरी से दिख जाता है.

यूं तुम किताबें नहीं इंसानों को पढ़ते हो, फिर भी बता दूं, चांद-तारे तोड़ने का वादा करने वाले मर्द, औरतों को आकर्षित ज़रूर करते हैं लेकिन वो अपना अस्तित्व उसी मर्द के लिए मिटा पाती है जो उसके मन को, उसके सिरजे अंश को समझ पाए. घर बसाना औरत का सबसे बड़ा सपना होता है और उस घर को उसके जितनी ही अहमियत देने वाला पति उस सपने का सबसे मुकम्मल हासिल.

जिनके नन्हें क़दम कभी फर्श पर सीधे नहीं पड़ते थे वो हमारी उंगलियां छोड़ लंबे-लंबे  रास्ते नापने लगे हैं. उनसे भी लंबे हो चले हैं उनके सपने. एक रोज़ जब वो हमारी ओर पीठ किए उन सपनों से अपना दामन भरने निकल चलेगें, मेरी उंगलियों को तब भी तुम्हें थामे रहने की ज़रूरत होगी. हम उस रोज़ भी यही रह जाएंगे, अपने बच्चों के ममा-पापा. हमारी दोस्ती के बाद हमारे रिश्ते की सबसे मज़बूत कड़ी.

ममा वाले पापा को पिता होने का दिन मुबारक़ हो.



Sunday, June 3, 2018

स्वयंसिद्धा-3




फिर यमराज, सत्यवान के अंगुष्ठ मात्र प्राण को लेकर दक्षिण दिशा को बढ़ चले, सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी. उनसे धर्मयुक्त वचन कहती जाती और बदले में एक-एक वरदान के रूप में अपने श्वसुरकुल और पितृकुल के सभी कष्ट दूर करती जाती. आखिरी वरदान उसने सौ पुत्रों की मां बनने का मांगा, तथास्तु कहते ही यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े. वट सावित्री की कथा सावित्री और सत्यवान के दीर्घकाल तक राज्य और संतान सुख भोगने के साथ समाप्त होती है. काश ज़िंदगियों में भी कथा-कहानियों सी सरलता हुआ करती. कथा के बाहर की सावित्रियों को यमराज ना इतना मान देते हैं ना इतनी मोहलत.

यूं भी इस कहानी का पहला अध्याय इसके बहुत पहले एक दूसरे शहर में शुरु हुआ था, सदी भी दूसरी ही थी.

18-19 की उम्र कैसी होती है? स्कूल पूरा कर बंदिशों के पीछे छूट जाने की, कॉलेज के बेफिक्र सालों के इंतज़ार के महीनों में यूं ही खेल-खेल में बेकरी का एक छोटा कोर्स पूरा कर लेने की. उसके अगले कुछ सालों को बादलों के पंख लग जाते हैं जैसे. किताबें हज़ार-हज़ार बाहें फैलाएं हर वक्त अपने आगोश में क़ैद किए रहती हैं. शेक्सपीयर के जटिल पात्रों की एक-एक परत को उघाड़ कर हर बार कुछ नया ढूंढ पाने की, कीट्स के ओड और वर्ड्सवर्थ के बलाड में डूब जाने की चाहत के आगे दिल कुछ और सोचना भी नहीं चाहता. किताबें सीने से लगाए चांद के डूबने तक भी पलकें भी नहीं झपकाने के साल इतने ख़ूबसूरत होते हैं कि वक्त की कदमताल बदल जाने की भनक भी नहीं लगती.  बादलों की सवारी में बड़े धोखे हैं क्योंकि हक़कीत की पथरीली ज़मीन पर मां की वो असाध्य बीमारी छह महीने की मोहलत में ही सब कुछ ख़त्म कर डालती है. फिर सारी बेफिक्री फुटमैट के नीचे बुहार देनी होती हैं, साहित्य तब भी मज़बूती से हाथ थामे रहता है. घर की तमाम ज़िम्मेदारियों की संभाल के बीच भी क़िताबें अपने इश्क का हक़ अदा कर जाती हैं. अंग्रेज़ी साहित्य में एमए का रिज़ल्ट जब आता है तो यूनिवर्सिटी की मेरिट लिस्ट में नाम सबसे उपर नज़र आता है.

फिर एक घर को सहेजते-सहेजते बारी आ जाती है दूसरे घर को संवारने की. वो घर जहां प्रवेश करते वक्त चावल से भरे पात्र को पैर के स्पर्श से अंदर की ओर गिराती, संकोच की लाल गठरी बनी लड़की से अपेक्षा होती है अपनी पीठ पीछे का सब भुलाकर अंदर आने की. नए घर के रिवाज़ अलग-ज़िम्मेदारियां नईं. इस बार क़िताबें और डिग्रियां संदूक की तलहटी में छुपी अपने वक्त का इंतज़ार करते हैं. उनके उपर की धूल कई साल बाद झाड़ी जाती है, स्कूली बच्चों को पढ़ाने की नौकरी के वक्त. विषय पर पकड़ और बच्चों के बीच लोकप्रियता इतनी कि जल्दी ही देश के सबसे बड़े स्कूलों में एक से बुलावा आता है, तीन गुनी तनख्वाह पर. गृहस्थी तिनका-तिनका जोड़ी जा रही है, हर ओर खुशियां बिखरी हैं. इतना सुख कि इस बार लबालब प्याला छलकता नहीं, दरक जाता है. ताप से झुलसी उंगलियां दरार रोकने को तड़पने लग जाती हैं वापस से.

जिस बीमारी ने एक बार दंश दिया था उसने कलेवर बदल लिया है. शराब को कभी हाथ नहीं लगाने वाले पति को लीवर सिरोसिस डायग्नोज़ हुआ, जिसने कभी बिना मोहलत मां को छीन लिया था. इस बार कितनी मोहलत है पता नहीं. दिन और रात का अंतर फिर मिट गया. दिन अस्पतालों और डॉक्टरों की अनवरत भागदौड़ में बीतते और रातें आशंकाओं के बीच.

इसी बीच स्कूल में हफ्ते भर के लिए बेकरी की क्लास लेने की ज़िम्मेदारी औचक मिल गई और यूं मिली कि सालों पहले किए छोटे से कोर्स ने संभावनाओं की सभी सीमाएं तोड़ डालीं. दिल को यकीन नहीं हुआ कि हाथों ने उस हुनर को अब तक साध रखा है. ये काम साहित्य पढ़ाने से थोड़ा कम वक्त लेता, बचा वक्त अस्पतालों को दिया जा सकता था.
इधर समय के साथ ज़िंदगी की रेस जारी थी. लीवर ट्रांस्प्लांट के लिए डोनर ढूंढने में निकला हर दिन आंशकाओं को प्रबल करता जाता. कभी आधी रात की बेचैनी रसोई की ओर मोड़ देती तो कभी एक नए रिपोर्ट में बदतर होती स्थिति का दर्द उंगलियों से रिसता और स्वाद बनकर पिघल जाता केक, पेस्ट्री, कप केकों के अलग-अलग फ्लेवरों में. दर्द बढ़ता गया, हाथ सधता गया. घर में जो कुछ बनता दोस्तों-पड़ोसियों में बांट दिया जाता, घरवालों की जीभ पर डॉक्टरी हिदायत की सख्त पहरेदारी थी. ज़्यादा वक्त नहीं लगा, कई जगहों से ऑर्डर आने लगे. जो एक बार चखता बड़ी दुकानों से ऑर्डर देना भूल जाता. बढ़ते काम को संभालने वाला कोई नहीं था, डॉक्टरों के पास भागमभाग बढ़ती जा रही थी. कई बार ख़ुद के हाथ पीछे खींचने पड़ जाते.

कई बार डोनर मिलता, लाखों ख़र्च कर टेस्ट कराए जाते और आख़िरी वक्त में कोई कमी निकल आती.  एक समय वक्त ने घुटने टेकने पर लगभग मजबूर कर दिया था. पति ने हाथ थाम कर कह दिया, सब छोड़ देते हैं, जितना वक्त है उसी में जीने की कोशिश करते हैं. वो रात शायद सबसे भारी थी, सुबह तकिया हर बार से ज़्यादा गीला. आत्मा की पुकार दूर तक गई होगी क्योंकि जवाब सात समन्दर पार से आया और डोनर हफ्ते भर बाद की फ्लाइट से. सारे टेस्ट पॉज़िटिव निकले. ऑपरेशन की तारीख तय की गई.

सावित्री को तो पति के जीवन के साथ उसका राज-पाट भी वापस मिल गया था लेकिन मेडिकल साइंस जब किसी सत्यवान को यमराज के पाश से मुक्त कराता है तो उसके एवज़ में तिजोरियां तो क्या सालों से पैसा-पैसा जोड़ी गईं गुल्लकें भी खाली करा डालता है. बैंक-बैलेंस, इंश्योरेंस, गहनों के साथ क्राउड फंडिंग का सहारा भी मिला. ज़रूरत अपने और पराए का फर्क मिटा देती है. वक्त ने सारी दुनिया में फैले दोस्तों को पास ला दिया, कई देशों में पैसे इकट्ठा करने की कोशिशें हुई. साल का पहला हफ्ता खुशखबरी लाया. ऑपरेशन सफल हुआ और सफल हुई कई-कई सालों की तपस्या. चढ़ाई खत्म हुई लेकिन ढलान पर भी फिसलन कम नहीं. लाखों का खर्च और महीनों की तीमारदारी अब भी बाक़ी है. लेकिन रातों की बेचैनियां अब उतनी तीक्ष्ण नहीं रहीं, नींद में सपनों की वापसी भी होने लग गई है.
मैंने दर्द में डूबे दिनों के हाथों का स्वाद कई बार चखा है. गुड़गांव आने के बाद शायद ही कहीं और से केक ख़रीदा हो. सर्जरी के बाद के महीनों में बेसब्री से उनके मैसेज के आने का इंतज़ार किया है और बेकिंग शुरु होते ही पहला ऑर्डर भी दिया है. इस बार की मिठास ज़बान से कभी नहीं उतरेगी. अब जितनी बार उनकी रसोई में केक के अलग-अलग फ्लेवर तैरेंगे नए सपने पूरा करने की एक और ईंट रखी जाएगी. अपना घर बनाने का सपना, बेटे के सुरक्षित भविष्य का सपना, सालों-साल तक के साथ का सपना.

उसके पहले एक वेबसाइट बनेगा, ऑर्डर बिना किसी अड़चन के लिए जाएंगे.

मैं मार्केटिंग में बिल्कुल भी अच्छी नहीं, वो हंसने लगती हैं
आपके हुनर को उसकी ज़्यादा ज़रूरत भी नहीं, मैं उन्हें आश्वस्त करती हूं.