पिछले दिनों सुना डॉटर्स डे देश में आकर बिना
ज़्यादा शोर मचाए निकल लिया, काम की अधिकता थी सो ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाई. चूंकि देश अभी तक बेटियों को बचाने और पढ़ाने में
ही जूझ रहा है, इन मौकों पर आमतौर पर गर्माया रहने वाला बाज़ार भी बेटियों को
तोहफे देने की अपील में सुस्त ही रहा.
हां, बेटियों की तारीफ में काफी कुछ लिखा-पढ़ा
ज़रूर गया. इनमें सबसे ज़्यादा दोहराई गई पंक्ति रही, हमारी बेटी सौ या दस बेटों
के बराबर है. और बेटियों के बारे में यही एक पंक्ति मुझे हमेशा से सबसे ज़्यादा
विस्मित करती आई है.
“आप किसी बात की चिंता करते ही क्यों हैं, आपकी तो
एक-एक बेटी दस बेटों के बराबर है.”









