Monday, October 16, 2017

सौ बेटों के बराबर बेटियां कैसी होती हैं?



पिछले दिनों सुना डॉटर्स डे देश में आकर बिना ज़्यादा शोर मचाए निकल लिया, काम की अधिकता थी सो ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाई.  चूंकि देश अभी तक बेटियों को बचाने और पढ़ाने में ही जूझ रहा है, इन मौकों पर आमतौर पर गर्माया रहने वाला बाज़ार भी बेटियों को तोहफे देने की अपील में सुस्त ही रहा. 

हां, बेटियों की तारीफ में काफी कुछ लिखा-पढ़ा ज़रूर गया. इनमें सबसे ज़्यादा दोहराई गई पंक्ति रही, हमारी बेटी सौ या दस बेटों के बराबर है. और बेटियों के बारे में यही एक पंक्ति मुझे हमेशा से सबसे ज़्यादा विस्मित करती आई है.

आप किसी बात की चिंता करते ही क्यों हैं, आपकी तो एक-एक बेटी दस बेटों के बराबर है.

Sunday, October 8, 2017

और भी व्रत हैं ज़माने में....



आप करवा चौथ का व्रत नहीं करेंगी?” बिटिया पांचेक साल की रही होगी जब ये सवाल पूछते वक्त उसकी आंखें आश्चर्य से गोल थीं और अविश्वास से भरीं.
वो स्कूल में अपनी टीचर्स की करवा चौथ को लेकर तैयारियों और बातचीत से उत्साहित इस उम्मीद में घर लौटी थी कि यहां भी वैसा ही कुछ माहौल मिलेगा. जहां तक याद है उसी साल उसकी क्लास टीचर की शादी भी हुई थी. मेरे इंकार ने पहले कुछ क्षणों के हैरत को तुरंत ही अस्वीकार में तब्दील कर दिया. हाथों को हवा में लहराकर वो कई मिनट मुझे समझाती रही कि कैसे ये व्रत हर ममा के लिए कम्पल्सरी है क्योंकि उसकी सभी टीचर्स ये करती हैं.

ओके, पर मैं तो मेहंदी लगवा सकती हूं ना?”  काफी कोशिश के बाद उसने हथियार डाले. तब से ये हर साल का सेलिब्रेशन है हमारे लिए, उसके छोटे-छोटे हाथों की मेहंदी और चेहरे की चमक हमारे लिए इस दिन को बाकियों से अलग बनाती है. बाकी का समय हम दिवाली की तैयारियों में बिताते हैं.

Monday, October 2, 2017

भूगोल बदल रहा है








अष्टमी वाली सुबह ही यात्रा से लौटना हुआ, घर पहुंचते ही किसी तरह देवी पाठ निबटा यूनिवर्सिटी की भागमभाग. पिछली रात की अधूरी नींद भी पलकों की सवारी कसे अपना बकाया मांग रही थी. अष्टमी का दुर्गा दर्शन किसी तरह टाला नहीं जा सकता, सो बस रस्म निभाकर वापस लौटना हुआ. नीचे पार्क में गरबा नाइट का आयोजन तेज़ धुनों के साथ आमंत्रण दे रहा था लेकिन किसी तरह भी वहां जाना नहीं हो पाया. बाल्कनी से झांक कर दिल को वैसे भी ज़्यादा लोग कहां हैं वाली तसल्ली दे ली. इन दिनों यूं भी हर मौके पर एक से मौसमी गीतों का शोर कुछ यूं  होता है कि पता ही नहीं लगे, शादी वाला डीजे बज रहा है, कांवड़ियों की सवारी निकली है, गणपति का विसर्जन है या नवरात्रि गरबा. कनफोड़ू संगीत ने वैसे ही आधी रात तक जगाए रखा.

Sunday, September 24, 2017

बेटियों, ख़ुद बचो, ख़ुद पढ़ो और ख़ुद के लिए लड़ो



उसने मेरे साथ छेड़खानी की.’
तुम उस वक्त वहां कर क्या रही थी?’
वो मुझे गंदी नज़रों से देख रहा था.
तो तुम्हारी नज़रें उसकी आखों की तरफ देख ही क्यों रही थी?’
वो मुझे भद्दे इशारे कर रहा था.
उसे देखने के लिए तुम वहां खड़ी क्यों थीं, सामने से हट क्यों नहीं गई?’
ये हमारी सुरक्षा का सवाल है.
हम भी उसी की बात कर रहे हैं, दुनिया के सारे ताले तुम्हारी सुरक्षा के लिए ही तो बनाए गए हैं. तुम्हें उनके पीछे जाने में एतराज़ भला क्यों है?’
लड़की हो तो तुम्हारे हर बयान पर सवाल दागे ही जाएंगे, उनके जवाब देने की आदत डाल लो. तब तक,  जब तक कि सवाल खत्म ना हो जाएं, क्योंकि सवाल पूछने वाले का मकसद जवाब सुनना तो है ही नहीं, वो तो तुम्हारे चुप हो जाने का इंतज़ार कर रहा है ताकि खुद को विजेता घोषित कर सके.

Saturday, September 9, 2017

अपने दिल के दरवाज़े की खुद ही मालिक हैं गीताश्री की नायिकाएं


अमृता प्रीतम ने अपनी नायिका के दिल के दो दरवाज़े बनाए. सामने का दरवाज़ा उसकी मर्ज़ी से नहीं खुलता और पिछले दरवाज़े का खुलना वो किसी को दिखा नहीं सकती. ना ही पिछले दरवाज़े से आने वाले के लिए सामने का दरवाज़ा खोला जा सकता. पिछला दरवाज़ा खोलने के लिए भी हौलसा चाहिए होता, क्योंकि उस दरवाज़े से जो दिल एक बार चला जाता वो लौटकर कभी छाती में वापस नहीं आता. शायद इसलिए गीताश्री ने अपनी नायिकाओं के दिल में बस एक दरवाज़ा बनाया, उसकी सारी आकांक्षाएं, सारी चाहनाएं सब इस चौखट से नज़र आने दीं. अपनी हसरतों को शब्दों में ढाल कर वो अपने दिल के दरवाज़े को अपनी मनमर्ज़ी से खोलने और बंद करने का हौसला रखती है. गीताश्री की नायिकाओं का दिल हौले से धड़कता नहीं, बड़े हौल से हुलसता है, क्योंकि अपने शरीर और मन की चाहनाओं पर उसने शर्मिंदा होना नहीं सीखा. फिर वो कटोरी भर मलाई खाने की सुरीलिया (मलाई) की हसरत हो या प्रेम में भी अपना स्व बचाकर रखने की सुषमा (सी यू) की ज़िद, पाठक अपने आपको नायिकाओं के इंतिख़ाब के सामने झुकता हुआ पाता है और पन्ने पलटते-पलटते उन्हें अपनी सहमति दे बैठता है.

Tuesday, September 5, 2017

जानने और सिखा पाने के बीच का फर्क



If you can’t explain it simply, you don’t understand well enough 

साठ के दशक में ही इंटरनेट के आने की भविष्यवाणी कर ग्लोबल विलेज की बात करने वाले मशहूर दार्शनिक और संचारविद् मार्शल मैकलुहान यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में प्रोफेसर भी थे. मैंने अपने गुरु से उनके बारे में एक दिलचस्प कहानी सुनी थी. एक बार मैकलुहान को अपनी पार्किंग में उनकी एक छात्रा की गाड़ी खड़ी दिखी. उन्हें बड़ा गुस्सा आया, उन्होंने उसकी कार की विंडशील्ड पर एक पर्ची लिखकर टांग दी, ये आखिरी बार होना चाहिए जब मुझे तुम्हारी गाड़ी, अपनी पार्किंग में नजर आई है.
अगले दिन छात्रा का जवाब उनकी गाड़ी की विंडशील्ड पर था, ये पहली बार है जब आपकी कही कोई बात मेरी समझ में आई है.

Saturday, September 2, 2017

मौत तू एक....


छोटी सी थी, पांच-छह साल की. दादी के साथ सटी रहती. वो बहुत कम बोलतीं लेकिन प्यार करते करते एक सवाल बार-बार पूछतीं, "जियोगी, मरोगी या हुकुर-हुकुर करोगी." मैं सोच में पड़ जाती. मरने का सवाल तो खैर था ही नहीं, लेकिन जीने का मतलब रोज़-रोज़ स्कूल जाना, वापस आकर होमवर्क करना. बहुत सोच-विचारकर भी मैं हर बार लगभग एक ही जवाब देती, हुकुर-हुकुर करब. वो हंस पड़तीं, धुर बतहिया कहकर प्यार करने लग पड़तीं. उस उम्र तक ये नहीं पता था कि हर सुबह उठकर जीने का फैसला हमें खुद ही लेना पड़ता है वरना जब तक जिंदगी के हक में होता है वो हमें हुकुर-हुकुर करते रहने का ही विकल्प देती है.

मौत कोई नहीं चुनता इसलिए चुनने के अधिकार मौत ने अपने पास रख लिए हैं. मरण सागर के पार किसी को नज़र नहीं आता इसलिए हर कोई उस दृश्य को अपने हिसाब से गढ़ लेता है.

Saturday, August 26, 2017

तलाक विमर्श के बाद....




कुछ साल पहले एक पढ़ी लिखी लड़की की कहानी सुनी थी. प्यार और आत्मविश्वास से पली, मां-बाप ने धूम-धड़ाके से शादी की. कुछ ही महीनों में पति ने बिना किसी वजह के छोड़ दिया. मान-मनौवल, बीच-बचाव की सारी कोशिशें नाकाम हुईं. पड़ोस और समाज की सारी संवेदनाएं भी बिचारी लड़की के साथ थीं जो अब मायके में रहकर अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश कर रही थी. कुछ सालों के इंतज़ार के बाद लड़की का धैर्य जवाब दे गया, माता-पिता की सहमति से उसने अदालत में तलाक की अर्ज़ी दे दी. पत्नी की ओर से भेजा गया कानूनी नोटिस लड़के वालों के नाग के फन से फुंफकारते अहम पर ठेस था. उन्होंने उसका जवाब देना अपनी शान के खिलाफ समझा. साल भर बात लड़की को इसी बिना पर तलाक मिल गया. परिवार ने खुशी-खुशी उसकी पसंद के लड़के से उसका घर दोबारा बसाने की तैयारियां शुरु कर दी.
क्या इसे सुखांत समझा जाए?
असल में पूरी तरह नहीं.

Sunday, August 13, 2017

सजना है मुझे.....



यकीन मानिए इस पंक्ति का अगला हिस्सा यमक अंलकार का अप्रतिम और सबसे लोकप्रिय उदाहरण होने से ज़्यादा और कुछ नहीं. यूं इसे पूरा सच मानकर आत्ममुग्धता के शिखर पर बैठी पुरुषों की कई पीढ़ियां अपनी उम्र की सीढ़ियां चढ़ चढ़कर उतरती गईं. और मानते कैसे नहीं, इंकार करने से उनके लार्जर देन लाइफ ईगो को ठेस नहीं लगती भला? तो ज़माने भर के नगमों और कैफियतों से आपके अहम के गुब्बारा इस कथ्य ने फुला दिया कि भई औरतों के कपड़े, साज-श्रृंगार सब अपने उनको रिझाने के लिए. और इसे दुनिया का पहला और आख़िरी ब्रह्म सत्य मानकर आप चले जा रहे हैं कभी गहनों की शॉपिंग पर, कभी फ्यूशा पिंक ड्रेस की मैचिंग लिपस्टिक की ख़रीदारी पर तो कभी सी ग्रीन साड़ी का फॉल ढूंढने. और कर भी क्या सकते हैं आप, वक्त रहते किसी ने आपको सचेत जो नहीं किया.

Saturday, August 5, 2017

हैप्पी फ्रेंडशिप डे, गर्लफ्रेंड्स



नए फैशन के तमाम दिनों की तरह फ्रेंडशिप डे भी बाज़ार का गढ़ा हुआ, गिफ्ट ख़रीदने की बाध्यतता लेकर आया हुआ त्यौहार है. अमेरिकी और यूरोपीय देशों में गर्मी की छुट्टी के दौरान, एक दिन दोस्ती के नाम किया गया. यूं दिन, त्यौहार कोई सा भी हो, हिन्दुस्तान की दुकानें ज़रूर सज जाती हैं. सोचा जाए तो इसमें ग़लत ही क्या है. दोस्ती निभाने में यूं भी हमारा कोई सानी नहीं. कृष्ण-सुदामा की हो या दुर्योधन और कर्ण की, शेर या चूहे की हो या फिर हिरण और कौवे की, पौराणिक कथाएं हों या जातक, दोस्ती की अनूठी मिसाल हर रूप में मिल ही जाती है. हमारे दिल दिमाग को हर कदम पर संचालित करने वाले बॉलीवुड को भी जब-जब प्रेम और बदले से छुट्टी मिली, दोस्ती की आंच पर कुछ ना चढ़ा देता रहा. लेकिन ध्यान रहे, दोस्ती के ये तमाम नायाब किस्से बस एक अधाई को समर्पित हैं. बाकी की आधी आबादी को दोस्ती के लहलहाते महासागर की तलछट भी नसीब नहीं.