उसका
नाम मुझे कभी पता नहीं चला, मेरे मुहल्ले में वो कहां रहता था ये भी नहीं जानती.
आबनूसी रंग के बीच उसकी लाल आंखें डरावनी
लगती थीं. सुबह से शाम तक वो कई बार हमारे घर के सामने से होकर आया-जाया करता और
पूरे वक्त हमारे घर की ओर मुंह किए लगातार घूरा करता. बरामदे या लॉन में अगर कोई
मर्द बैठा नहीं दिखता तो वहीं रुक कर कुछ इशारेबाज़ी भी करता. नहीं पता कि कानून
की परिभाषा में इसे ईव टीज़िंग कहते हैं या नहीं, लेकिन उसकी आंखो के भय ने अक्सर
घर से बाहर निकलते मेरे कदम रोके हैं. कई बार गेट से बाहर निकलते ही उसे देख लेने
पर उल्टे पैर घर के अंदर भी भागकर आई हूं. आज इतने सालों के बाद पहली बार इस बात
की चर्चा करने पर अपना वो डर कितना अर्थहीन लग रहा है, लेकिन उस उम्र में इस तरह
की कई छोटी-छोटी घटनाओं ने मेरे जैसी बहुत सी जीवट लड़कियों का आत्मविश्वास तोड़ा
है, आज भी तोड़ती जा रही हैं.
Saturday, May 27, 2017
Sunday, May 14, 2017
इस मदर्स डे...
मॉल, बाजार, दुकानें फिर से सज गई हैं. हर सुबह
दरवाज़े पर पड़े अखबारों को उठाते ही अंदर से कई रंग-बिरंगे फ्लायर्स निकलकर, ऊंची
आवाज़ में हमें याद दिला रहे हैं कि मदर्स डे आने वाला है और अगर मां से प्यार
जताने का ये मौका हम चूके तो मातृभक्ति साबित करने की अगली बारी बावन हफ्तों बाद
ही आएगी, और वक्त का क्या भरोसा. तो मां के नाम की सेल में कपड़ों, गहनों, मोबाइल
फोन्स से लेकर किचन के बर्तनों तक, सब पर छूट जारी है. अपनी श्रद्धा और हैसियत के
हिसाब से उठा लो, ना हो तो मां को कैंडल लाइट डिनर के लिए ही ले जाओ.
Wednesday, May 3, 2017
बस इतना सा..
रेस्टोरेंट मंहगा था, लेकिन गंवई अंदाज़ का. शायद
थीम ही वही रही हो उसकी. लकड़ी की भारी भरकम चौखट पर भारी नक्काशी का काम था. सिर
झुकाकर अंदर घुसने की कोशिश में उंगलियां कुछ क्षणों के लिए एक-दूसरे से उलझ गईं
तो दोनों चौखट के आर-पार एक-एक पैर किए ठिठक कर खड़े हो गए. जगह ढूंढने के बहाने
दूसरी ओर देखते हुए भी अमोल जान गया था कि सुमी की उंगलियां इस वक्त सख्ती से अंदर
की ओर मुड़ी होंगी और उसकी पलकें झपकना भूल गई होंगी.
Saturday, April 29, 2017
सशर्त इज्ज़त के विरोध में....
हम उम्र के उस दौर से गुज़र रहे थे जिसे टीनएज
कहा जाता है. किसी भी बात पर टोका-टाकी तीर की तरह लगती, और मां थी कि चलने, उठने,
खाने, रहने, पढ़ने हर चीज़ का एक रूल बुक लेकर हमारे पीछे पड़ी रहती. आए दिन किसी
ना किसी बात पर डांट पड़ती और हम कई-कई रोज़ मुंह सुजाए घूमते रहते. इसी बीच मां
को अनदेखा कर पापा के आगे-पीछे करने की आदत पड़ी. जब भी मां से डांट पड़ती हम उनसे
मुंह फुला लेते और खूब तत्परता से पापा को खुश करने में लग जाते.
Sunday, April 23, 2017
चालीस की उम्र
इस शीर्षक का एक लेख ग्रेजुएशन में कम्पल्सरी
हिंदी के सिलेबस में था. अठ्ठारह बीस की उम्र में जब चालीस का मतलब बुढ़ापा होता
है, वो लेख हमें पढ़ाने का क्या मतलब था, समझ में नहीं आया. पढ़ाते वक्त
हमारी प्रोफेसर भी बार-बार याद दिलाती रही कि क्योंकि पूरे कमरे में चालीस के पार
केवल वही हैं इसलिए उस लेख का गूढ़ मतलब भी केवल वही जान सकतीं हैं. सुनकर ये
विश्वास और पुख्ता हो गया कि ये वानप्रस्थ की बाते हैं, हमारे लिए बेज़रूरत.
Saturday, April 15, 2017
फुलटाइम फेमिनिज्म के पहले..
अब बस, बहुत हो गया,
अब मैं फेमिनिस्ट हो जाना चाहती हूं, फुलटाइम. नारीवाद से पुरूषत्व की बू आती है,
फेमिनिज़्म खांटी जनाना शब्द लगता है. एकदम कूल और वोग, बिल्कुल मेरे शब्दों के
चयन की तरह.
हर सुबह जब मैं आटे
और मसाले सने हाथों को जल्दी-जल्दी साफ कर, एक हाथ में कंघी और दूसरे में
ब्रेकफास्ट का डब्बा लिए भागती हुई गाड़ी में बैठकर ऑफिस के लिए निकलती हूं तो
मेरा मन विद्रोह कर उठता है. क्या फायदा कमाकर खाने वाले स्वाभिमान से, इससे तो
फेमिनिस्ट ही हो जाते.
Monday, February 27, 2017
फेमिनिज़्म बनाम...टु हेल विद इट
‘कुमारी’ ने छोटे शहर के बड़े से घर में आखें खोलीं थीं.
परवरिश, संयुक्त परिवार में पाई, जहां लड़के और लड़कियों को पालने में कोई अंतर
नहीं किया जाता, खाना-कपड़ा, पढ़ाई-लिखाई का वातावरण दोनों को एक समान मिलता. बाकी
लड़के को महंगी पढ़ाई के बाद हर हाल में नौकरी करनी होती थी और लड़कियों को सपनों
का राजकुमार होम डिलीवर करने के वादे किए जाते. कुमारी को सपने देखना बेहद पसंद
था, चूंकि इतना सारा वक्त सपने देखने में चला जाया करता कि कुछ और करने का समय ही
नहीं बचता. कुमारी को पूरा भरोसा था कि जिसने सपने दिए हैं वही उन्हें पूरा करने
के रास्ते भी बताएगा. कुमारी की आंखें बड़ी-बड़ी और बातें बड़ी मीठी हुआ करती थीं.
बातें करना उसे बेहद पसंद भी था, नख से शिख तक प्रसाधन युक्त होकर, बड़ी अदा से
कंधे उचकाकर, आंखें गोल-गोल घुमाकर, वो घंटों अपनी बात सही साबित करने में लगी रह
सकती थी.
Saturday, February 25, 2017
Sunday, February 19, 2017
कहानी ???
दावे के साथ कह सकता
हूं कि लड़कियों की दुर्दशा पर आठ-आठ आंसू बहाने वाले और उन्हें बराबरी का हक
दिलाने के लिए गला फाड़कर चिल्लाने वाले मर्द कभी भी किसी गर्ल्स कॉलेज की भीतर
अकेले नहीं गए होंगे और अगर गए भी होंगे तो बिना सिर मुंडाए बाहर लौट कर नहीं आए
होंगे। पहली बार मेरा जाना हुआ था जब मिताली फीस भरने के आखिरी दिन पैसे और
आईकार्ड घर भूल आई थी और पापा ने मुझे सीधे उसकी प्रिंसीपल के ऑफिस पहुंचने का
हुक्म सुनाया था। बास्केट बॉल कोर्ट की दीवार पर तीस-चालीस लड़कियां कोरस में
टांगे झुलातीं दिख गईं तो नज़रों समेत मेरा पूरे का पूरा सिर 60 डिग्री के कोण पर
झुक गया। बड़ी मुश्किल से हकलाते हुए एक से मैंने प्रिंसिपल ऑफिस का रास्ता पूछा
तो गेट से दाएं, फिर तीन दरवाज़े पार बाएं, फिर सीधे, दाएं और बाएं का दुरूह
रास्ता समझ जिस जगह पर मेरी यात्रा खत्म हुई उसके सामने संड़ांध मारता टायलेट नज़र
आया। उल्टे पैर वापस बाहर आया तो सामूहिक ठहाकों ने ऐसा स्वागत किया कि फिर वापस
अंदर...
Sunday, February 12, 2017
बियाह किलास
हम जिस दौर में आंखें खोलकर दुनिया पहचानना सीख
रहे थे, शादी ब्याह के संदर्भ में ‘लड़की क्या करती है’ जैसा सवाल पूछने लायक नहीं बना था. वैसे
करने को तो लड़के भी कुछ नहीं करते रह सकते थे लेकिन सवाल का गैरज़रूरी होना
केवल लड़कियों तक सीमित था. समय के साथ तमाम गैरत-बगैरत की जिज्ञासाओं के साथ ये
सवाल भी पूछा जाना शुरू हो गया तब उर्वरक दिमागों ने एक नया शब्द इज़ाद किया,
लड़की ‘बियाह
किलास’ में
पढ़ती है. अर्थात, जब तक बियाह तय नहीं हो जाता है, कॉलेज में नाम लिखा दिया गया
है. बियाह किलास में पास होने के लिए इम्तिहान होना या रिज़ल्ट निकलना कभी ज़रूरी
नहीं होता था. जिस दिन लड़के वालों ने तिलक-दहेज फिक्स कर मुंह दिखाई की अंगूठी पहनाई,
कन्या का बियाह किलास से कस्टमाइज़्ड फेयरवेल हो गया समझो.
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